अक्षयपात्र : अनसुलझा रहस्य - 7 - अंतिम भाग Rajnish द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

अक्षयपात्र : अनसुलझा रहस्य - 7 - अंतिम भाग

अक्षयपात्र : अनसुलझा रहस्य

(भाग - ७)


तीनों ध्यान लगाकर एक विशेष दिन की कहानी को हृदय की गहराइयों से स्मरण करते हैं।
...और मायाजाल अपना असर दिखाना शुरू करता है।
कुछ समय पश्चात...
उन तीनों को एक मोर के बोलने का आभास होता है। सुंदर सा मोर अपने पंख फैलाए उनके ऊपर से आंशिक उड़ान भरता हुआ ऋषि शुकदेव के पास विचरण करने लगता है।
तीनों ही सफेद पलाश के फूलों की झाड़ियों में छिपकर शुकदेव के भागवत खत्म करने की प्रतीक्षा करते हैं।
शुकदेव: राजन, अपने मन से भय को समाप्त करिए। ये सब परमपिता ब्रह्मा के आशीर्वाद और उनके काल गणना के अनुसार ही हो रहा है।
जिस कलयुग की शुरुआत ने आपको व्यथित कर रखा है उस कलयुग की समाप्ति की भूमिका परमात्मा ने लिखना प्रारम्भ कर दिया है।
परिक्षित: हे मुनिवर! आप के कथन का आशय मैं समझ नहीं पाया।
शुकदेव: कुछ नहीं राजन, आप बताए। आज आप मुझसे किसी गोपनीय बात के लिए चर्चा करना चाह रहे थे।

परिक्षित उन्हें अपने पूर्वजों द्वारा हस्तांतरित अक्षयपात्र को दिखाते है और उसके बारे में विस्तार से बताते है। फिर उनसे निवेदन करते है कि वो इसे छिपाने और कलयुग के प्रभाव से दूर रखने का कोई उपाय करें।

मुनि उस अक्षयपात्र को छुपाने के लिए राजा परीक्षित के साथ अन्तर्ध्यान होकर सूर्य शिखर पर्वत पर जाते हैं। जहां वो पर्वत देव को प्रसन्न कर अपनी शक्तियों से एक गुफा का निर्माण करते है और अंदर प्रवेश करते है।

तीनों दोस्त यश, अवंतिका और सैम भी उनके पीछे चलते है।

सैम: उन्होंने हमें अपना पीछा करते देख लिया तो?
यश: तभी यश अपनी जेब से सफेद पलाश के फूल निकालकर उन दोनों को देता है। सभी फूल की पंखुड़ियों को तोड़कर मुंह में रखते है और अदृश्य हो जाते है।

शुकदेव, अक्षयपात्र को सामने रख अनुष्ठान करते है और मंत्र की शक्तियों से उसे अदृश्य कर देते है। राजा परीक्षित पूरी प्रक्रिया को उनके पीछे खड़े होकर देखते रहते है।
शुकदेव उसे अदृश्य करने के साथ ही ऐसी माया गढ़ते है की उसे ढूंढने वाला आसानी से उसे प्राप्त न कर सके और गुफा के मुख्य द्वार पर एक पौधा लगा देते है जो क्रमिक विकाश के साथ एक पेड़ बन अपनी जड़ों और शाखाओं से गुफा के मुख्य द्वार को छिपा ले।

राजा परीक्षित और मुनि शुकदेव गुफा से बाहर आते है। राजा उनसे पूछते है, मुनिवर अगर इस अक्षयपात्र की भविष्य में प्रजा कल्याण के लिए कभी जरूरत पड़े तो इसे कैसे वापस पाया जा सकता है।

राजन अपने पुत्र जन्मेजय को ये विधि बता देना कहते हुए वो उन्हें अक्षयपात्र को प्राप्त करने का तरीका बता देते है। हालांकि शुकदेव को अपने नजदीक छिपकर घूम रहे भविष्य से आए अदृश्य मानवों के होने का आभास हो जाता है।

...और उस तरह वो एक मंद मुस्कान देते हुए राजा के साथ वापस अपने आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं।

उनके उस गुफा से जाते ही अवंतिका, यश और सैम, अक्षयपात्र को प्राप्त करने के लिए वैसे ही मंत्रोच्चारण में लग जाते है। इस उम्मीद के साथ की इसकी प्राप्ति से अगली बार उन्हें सशरीर इस गुफा से बाहर आने का मौका मिलेगा और अपने परिवार से वो पुनः मिल पाएंगे।

प्रक्रिया खत्म होते ही दिल थमा देने वाली बिजली की कड़कड़ाहट के साथ धरा से जबरदस्त विस्फोट होता है और सूर्य के तेज़ की तरह सुनहरी किरणे प्रस्फुटित होती हैं। सबकी आंखें चुंधिया जाती हैं।

मायाजाल काम करता है...

रोशनी सामान्य होने पर आंख खुलते ही सभी खुद को एक गांव की कुटिया के बाहर खड़ा पाते है। जहां कुटिया के अंदर से एक महिला की पीड़ा में कराहने कि आवाज़ आती है। तीनों कुटिया के अंदर प्रवेश करते है। वहां एक महिला प्रसव पीड़ा से कराह रही होती है। वो अपनी पूरी हिम्मत से उन्हें इशारा कर उसकी मदद के लिए कहती है।

अवंतिका उस महिला के पास रुकती है। सैम और यश बाहर निकलकर उस महिला के लिए गांव के अन्य घरों में मदद कि आस लेकर जाते हैं। घर घर जाने पर उन्हें पता चलता है कि आस पास के सभी घर खाली पड़े है। कहीं कोई व्यक्ति नहीं दिख रहा। पीड़ा इतनी हो रही की कहीं दूर जाकर मदद लाना शायद उस महिला को संकट में डालना होगा।
सैम और यश कुटिया में वापस जाते है और उनके निराश चेहरे को देखकर अवंतिका समझ जाती है कि उन्हें कहीं मदद नहीं मिली।
अंततः सभी मिलकर यह निश्चय करते हैं कि उन्हें ही अब प्रसव कराना पड़ेगा।
अवंतिका को ध्यान आता है कि उसने बाहर कॉहोस का पेड़ देखा था जिसकी जड़ एक औषधी के रूप में प्रसव को प्रेरित करने के काम आ सकती है। वो उसे तोड़कर लाती है और उपचार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू करती है। अपने प्रसव अनुभव और मेडिकल जानकारी "अम्नियोटोमी" के आधार पर प्रसव कराने का कार्य पूर्ण करती है।

अंततः उस महिला को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

अवंतिका: कितना फूल सा कोमल बच्चा है।
यश: मुझे तो घबराहट हो रही थी। ये अनुभव मेरी जिंदगी का यादगार अनुभव रहेगा। अच्छा रहा जच्चा बच्चा दोनों कुशल है।
सैम: फूल नहीं कली है ये। फूल तो बाद में बनेगा। छिपकली के हाथ में कली। पर आज की कली तो तू है ये तो कल की कली है।
स्त्री: सुंदर नाम है "कल्कि"!
"कल्कि" हां कल की कली " कल्कि"
अवंतिका (बुदबुदाते हुए): कल्कि..
ओह नो... शिट.. मैन..!!!
इसका मतलब..ये सब अनहोनी नहीं..!
सब पहले से तय था।
यश: क्या हुआ अवंतिका ? तुम क्या सोच कर बड़ बड़ा रही हो?
सैम: क्या हुआ अवंतिका?
अवंतिका: तुम्हें पता है ये बच्चा "कल्कि" कौन है?
यश: हमारे सामने ही तो इस दुनिया में आया और हमें ही नहीं पता होगा। एक मासूम सा बच्चा ही तो है।
अवंतिका: अगर मैं गलत नहीं हूं तो इस युग के अंत की शुरआत होने वाली है।
सैम: मतलब??
अवंतिका: कल्कि कोई और नहीं, भगवान विष्णु के दसवें अवतार है। जो कलयुग का अंत करके सतयुग की नींव रखेंगे।
यश: तुम्हें यकीन है। ऐसा होगा।
अवंतिका: शुकदेव जानते थे कि हम वहीं हैं। फिर भी उन्होंने हमारे रहते रहस्योद्घाटन किया। ये सब अनायास ही नहीं हुआ। सब पहले से ही लिखा हुआ है। ये होना निश्चित था।
अवंतिका कल्कि के पांव को माथे से लगाती है और आशीर्वाद लेते हुए उनसे आज्ञा लेती है।
अवंतिका: हमारी अज्ञानता के लिए हमें क्षमा करना प्रभु!
सैम बाहर निकलकर देखता है।

मायाजाल फिर असर दिखाता है...

भरी आंधी चल रही है। सैम आवाज़ देता है।
यश और अवंतिका बाहर आते है। धूल का विशाल गुबार सब धुंधला कर देता है। दृश्यता स्थाई होने पर वो स्वयं को गुफा के अंदर पाते है और अक्षयपात्र उनकी आंखों के सामने रखा होता है।
सैम: तो यही है वो चमत्कारी पात्र, लेकिन इसका फायदा क्या अब। जब इस गुफा के अंदर ही सड़ना है।

तभी एक अनजान युवक की आवाज़ आती है।
कोई है नीचे..हम मदद के लिए आए है।
रस्सी नीचे पहुंचने पर उसे पकड़ कर हल्के झटके द्वारा इशारा करें।
सैम, यश और अवंतिका बेहद खुश होते है। हालांकि उनके मन में अभी भी ये भय बना रहता है कि ये भी कोई आने वाली अगली समस्या या भ्रम न हो। अब तो उन्हें वास्तविकता और भ्रम में अंतर दिखना ही खत्म हो चुका है।
सभी रस्सी से बारी बारी से ऊपर पहुंचते है। ऊपर आने के बाद।

यश (मददगार युवक से): तुम्हारा ये एहसान हम कभी नहीं भूलेंगे।
सैम : यश, अवंतिका, अब हम इस अक्षयपात्र को पाकर अमीर हो गए। सबके सपने पूरे हो जायेंगे। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि ऐसी भी कोई चीज हो सकती है।..और वो भी मेरे हाथ में। ये तो एक सपने जैसा है।
यश : हम सबके सपने पूरे होंगे।

तीनों बेहद खुश है। सब एक दूसरे के गले लग एक दूसरे को बधाई देते है और गुफा से बाहर आने के लिए ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करते है।

..तभी उन सबकी नजर अपने चारों ओर पड़ती है।
...चारों तरफ विध्वंश के नजारे है।
उनके चेहरों की खुशियां कुछ ही समय में वापस चली जाती है।

ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने न्यूक्लियर वेपन गिरा दिया हो। हर तरफ तबाही का मंजर था।

सब एक दूसरे को देखकर हैरान है।

अक्षयपात्र लेकर बाहर तो आ गए लेकिन क्या इस अक्षयपात्र का पाने का कोई लाभ होगा ?
कई ऐसे प्रश्न जिनका उत्तर किसी के पास नहीं। जैसे वो युवक कौन था?
कल्कि अवतार, जिनका धरती पर आने का उद्देश्य ही सतयुग का आरंभ था। क्या श्रृष्टि के विनाश और सृजन के क्रम में ये तीनों दोस्त अपनी महती भूमिका निभाने के लिए पृथ्वी पर बचे है? कैसे होगी सतयुग की शुरूआत? कौन बनेगा इन सब घटनाओं का साक्षी? क्या होगा अब आगे....?
इन सभी प्रश्नों के साथ इस कहानी का यह अध्याय यहीं खत्म होता है।

उम्मीद करता हूं कि आप सभी को ये ७ भागों की सीरीज, अक्षयपात्र : अनसुलझा रहस्य, पसंद आएगी और आप सभी पाठक उचित प्रतिक्रियाएं देकर न वरन इस कहानी को सराहेंगे बल्कि इस कहानी की त्रुटियों को सुधारने के लिए अपने अमूल्य सुझाव देंगे।
आप सभी का आभार एवम् धन्यवाद 🙏

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(डिस्क्लेमर : यहां बताई गई सभी बातें, स्थल, विचार, कथा, सब काल्पनिक है। पौराणिक बातों का उल्लेख सिर्फ कहानी को रोचक बनाने के लिए किया गया है। इसका मकसद किसी की भी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाने का नहीं है।)

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समाप्त।


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