छूना है आसमान - 5 Goodwin Masih द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

छूना है आसमान - 5

छूना है आसमान

अध्याय 5

उसी समय भीड़ में से निकलकर एक आदमी ने उससे कहा, ‘‘बेटी, मैं हर साल नये साल पर अपनी कम्पनी की तरफ से लोगों को देने के लिए हजारों कलेण्डर छपवाता हूँ। मेरी हार्दिक इच्छा है कि अब से हर साल मेरे कलेण्डर का डिजाइन और कलाकृतियाँ तुम ही बनाया करो। बदले में तुम जितना पैसा चाहोगी, मैं तुम्हें दूँगा, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम अपनी इस खूबसूरत कला को इस तरह रेत या जमीन पर बनाकर बर्बाद करो।

उस वीडियो को देखकर चेतना इतनी भावुक हो गयी, इतनी भावुक हो गयी कि खुद को रोक नहीं पायी और वह रो पड़ी। कुछ देर तक वह यँूं ही सिसकती रही और न जाने क्या सोचती रही। फिर उसने अपने आपको सम्भाला। उसके बाद उसने अपने हाथों से अपने चेहरे को इस तरह साफ किया, जैसे पसीना पोछ रही हो। फिर उसने अपने रोनित सर की तरफ ध्यान से देखा। रोनित भी उसे ध्यान से देख रहा था।’’

‘‘क्यों, क्या हुआ चेतना......?’’ रोनित ने उसकी भावुकता को देखकर पूछा।

‘‘कुछ नहीं सर, बस यही सोच रही हूँ कि इस दुनिया में मैं ही नहीं, मुझ जैसे न जाने कितने लोग हैं। मैं तो अब तक यही समझती थी कि मुझ जैसा इंसान दूसरों के ऊपर बोझ बनकर ही रह सकता है, लेकिन खुद कुछ नहीं कर सकता। सर, इस वीडियो को देखकर आज मुझे यह अहसास हो गया है कि कुदरत ने अगर इंसान से चलने-फिरने, दौड़ने-भागने, छूने-पकड़ने, देखने-दिखाने और बोलने-चालने की शक्ति छीन ली तो क्या हुआ, उसे सोचने-समझने के लिए अच्छा दिमाग तो दिया ही है। इस दिमाग का इस्तेमाल करके वह दूसरों पर बोझ न बनकर, आत्मनिर्भर बन सकता है।’’

‘‘चेतना, तुमने पर्वतारोही अरूणिमा सिन्हा का नाम सुना है......?’’

‘‘जी सर, खूब सुना है।’’

‘‘तुम अरूणिमा सिन्हा के बारे में कुछ जानती हो......?’’ रोनित ने पूछा।

‘‘बस इतना ही कि उनका एक पैर नहीं है, फिर भी उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी (ऐवरेस्ट) पर चढ़कर सुनहरा इतिहास बनाया है। उन्होंने एक मिसाल कायम की है और लोगों को यह बताया है कि अगर इंसान के अन्दर कुछ करने की चाह हो तो वह कुछ भी कर सकता है।’’

‘‘तुमने बिल्कुल ठीक कहा, ’’वास्तव में अरूणिमा सिन्हा ने हौंसलों की उड़ान भरकर आसमान को छू लिया है। चेतना, क्या तुम जानती हो कि अरूणिमा का एक पैर कब, क्यों और कैसे काटा गया......?’’

‘‘नहीं सर।’’ चेतना ने कहा।

‘‘तो सुनो चेतना, मैं आज तुम्हें बताता हूँ कि अरूणिमा सिन्हा, कौन है, वह कहाँ की रहने वाली है, वह पर्वतारोही बनने से पहले क्या करती थी। ‘‘चेतना, उत्तर प्रदेष के अम्बेडकर नगर में रहने वाली 25 वर्षीय अरूणिमा सिन्हा, पर्वतारोही बनने से पहले एक बहुत अच्छी और जानी-मानी बाॅलीबाॅल प्लेयर थी और अपनी नौकरी के सिलसिले में ट्रेन द्वारा दिल्ली की तरफ जा रही थी। रास्ते में दो-तीन गुण्डे टाइप लड़के उसकी बोगी में चढ़ आये, और उसके गले में पहनी उसकी सोने की चेन छीनने लगे। लेकिन अरूणिमा ने उन्हें चेन नहीं लेने दी और उनसे मुकाबला करने लगी। जब लड़के उसकी चेन छीनने में कामयाब नहीं हो पाये, तो उन्होंने उसे चलती ट्रेन से नीचे धक्का दे दिया।

अरूणिमा टेªन से नीचे आकर गिरी, उसी समय सामने से दूसरी टेªन आ गयी। रात बहुत हो चुकी थी। इसलिए वह कुछ समझ नहीं पायी और जब तक वह कुछ समझ पाती और खुद को सम्भाल पाती, सामने से आती दूसरी टेªन से उसका एक पैर बुरी तरह कुचल गया।

पैर कुचल जाने के बाद भी अरूणिमा ने हिम्मत नहीं हारी और वह बचने के लिए रात भर वहीं पड़ी संघर्ष करती रही। वह जिस जगह गिरी थी। वह जंगली इलाका था। वहाँ दूर-दूर तक कोई नहीं था।

सुबह को जब कुछ लोग उस तरफ से गुजरे तो उनकी नजर अरुणिमा पर पड़ी। उन्होंने किसी तरह रेलवे पुलिस को फोन करके उसके बारे में बताया। कुछ समय में ही वहाँ रेलवे पुलिस आ गयी और अरूमिणा सिन्हा को अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ मजबूरी में उसकी जान बचाने के लिए डाॅक्टरों को उसका कुचला हुआ बायां पैर काटना पड़ा और उसकी जगह कृत्रिम पैर लगाना पड़ा।

अपना एक पैर गंवाने के बाद कुछ समय के लिए अरूणिमा गहन निराषाओं के अंधकार में डूब गयी, वह सोचने लगी, कि अब वह बाॅलीबाॅल कैसे खेलेगी......? वह सोचने लगी, कि अब उसकी जिन्दगी में कुछ भी नहीं बचा है, सब कुछ खत्म हो गया है। लेकिन कहते हैं, जब एक रास्ता बन्द होता है, तो ईष्वर दूसरा रास्ता खोल देते हैं। ऐसा ही अरुणिमा के साथ भी हुआ।

इलाज के दौरान अरूणिमा ने भारतीय पर्वतारोही बछेन्द्री पाल के प्रषिक्षण केंद्र के बारे में पढ़ा, तो उसने सोचा, अगर उसका एक रास्ता बंद हो गया तो क्या हुआ, दुनिया के सामने मिसाल कायम करने के लिए दूसरा रास्ता तो खुल ही सकता है। और वह रास्ता था पर्वतारोही बनकर देष का नाम रोषन करने का।

अरूणिमा ने फौरन बछेंद्री पाल से सम्पर्क साधा और उसके समक्ष पर्वतारोही बनने की इच्छा व्यक्त की। बछेंद्री पाल ने अरूणिमा का उत्साहवर्धन किया और उसको पर्वतारोही की ट्रेनिंग देने के लिए हाँ कर दी। बस फिर क्या था, अरूणिमा को ऐसा लगा, जैसे उसे सारा जहान मिल गया हो। अरूणिमा ने अपने सपनों की उड़ान भरने के लिए बछेंद्री पाल से ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी।

टेªनिंग के दौरान अरूणिमा ने पहले लद्दाख की छह हजार छह सौ बाइस मीटर ऊंची लंगसर काँगड़ी नामक पहाड़ की चोटी पर फतह हासिल की। उसके बाद अरूणिमा ने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी ‘‘एवरेस्ट’’ पर चढ़ाई करके भारत की बेटियों के सामने एक मिसाल पेष की, जो अपनी विकलांगता को मजबूरी मानते हैं, उन्हें यह दिखा दिया कि अगर हौंसला और साहस हो तो कोई भी मजबूरी आपको आपकी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।

अरूणिमा के अदम्य साहस और हौंसलों की कहानी सुनते-सुनते चेतना पूरे जोष से भर गयी। उसके षरीर के रोंगटे खड़े हो गये। वह अपने मन में ऐसा महसूस करने लगी, जैसे ऐवरेस्ट की फतह बछेंद्री पाल ने नहीं, बल्कि खुद उसने फतह की है। वह एकदम उत्साहित होकर बोली, ‘‘सर, अरूणिमा के साहस और जज्बे ने उसकी आँखें खोल दीं। अब तो उसका मन भी कर रहा है कि उसे भी ऐसा कुछ करना चाहिए, जिससे लोग उसे पहचाने, लोग उसकी इज्जत करें, उसे बेचारी, मजबूर और लाचार न समझें।’’

‘‘चेतना, अरूणिमा सिन्हा ही नहीं, अरूणिमा जैसी न जाने कितनी लड़कियाँ हमारे देष में हैं, जिन्होंने अपनी शारीरिक अक्षमता और अपंगता को अपनी कमजोरी न बनने देकर, ऐसा कुछ कर दिखाया, जो देष के लिए मिसाल बन गया, इतिहास बन गया।

इसलिए मैं भी यही चाहता हूँ चेतना, कि तुम्हारे अन्दर की चेतना जागे। तुम खुद को पहचानो और ऐसा कुछ करने का संकल्प ले डालो, जिससे तुम लोगों में पहचानी जा सको।’’

‘‘यही तो मेरी समझ में नहीं आ रहा है सर, कि मैं क्या करूं......? चेतना ने कहा।

‘‘यह तो तुम्हें ही सोचना होगा चेतना, कि तुम्हें क्या करना है। ......मेरा मतलब है, कि तुम्हारा षौक क्या है, तुम्हारा दिल और दिमाग क्या करने को तुमसे कहता है ? चेतना तुम्हें अपने दिल की आवाज को सुनना होगा। तुम्हारा रुझान जिस तरफ है, उसी तरफ तुम कोषिष करोगी, तो मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि तुम्हें सौ प्रतिषत सफलता मिलेगी।’’

‘‘सर, मैं अरूणिमा सिन्हा और आकृति की तरह तो कुछ भी नहीं कर सकती, क्योंकि मैं हमेषा अपने आपको अपाहिज मानकर बेकार की चीज समझती रही। इसीलिए कभी कुछ करने की सोची ही नहीं......हाँ, मैं गाना अच्छी तरह गा सकती हूँ, क्योंकि मुझे गाने का शौक भी है और मैं गाती भी हूँ।’’

‘‘वो तो मुझे भी मालूम है। मैंने कई बार तुम्हें अपने कमरे में गाते हुए सुना भी है।’’ रोनित ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा।

‘‘जी सर, मैं अपनी आवाज के जादू से ही लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने की कोषिष करूंगी।’’

‘‘वो तो ठीक है चेतना, लेकिन मुझे तुमसे एक षिकायत है, वो यह कि तुम बार-बार अपने आपको अपाहिज कहकर खुद को निराष करती हो......चेतना अपाहिज होना तो एक शारीरिक कमजोरी है, अभिषाप नहीं......फिर शारीरिक रूप से स्वस्थ और सामान्य व्यक्ति के लिए कुछ असमान्य करना आष्चर्य की बात नहीं होती है, जबकि असमान्य व्यक्ति के लिए कोई भी असाधारण कार्य करना हैरत की बात हो सकती है......वैसे भी गाना हर इंसान के वष की बात नहीं होती है, क्योंकि यह प्रतिभा तो ईष्वर किसी-किसी को बतौर तोहफा देता है। इसलिए तुम अपना दिल छोटा मत करो, आज से अपने गाने का अभ्यास शुरू कर दोकृमैं वायदा करता हूँ कि तुम्हारी इस प्रतिभा को लोगों तक पहुँचाने का हर संभव प्रयास करूँगा, ठीक है।’’

‘‘जी सर।’’ चेतना मुस्कुरा दी।

‘‘अच्छा, अब मैं भी चलता हूँ। आज हमारी बातें इतनी लम्बी हो गयीं कि पढ़ाई करवाने का सारा समय निकल गया। अगर मुझे दूसरी ट्यूषन के लिए नहीं जाना होता तो कोई बात नहीं थी मैं तुम्हें पढ़ा भी सकता था। लेकिन अब तो मेरी मजबूरी है। ठीक है, तुम सोचकर रखना, तुम्हें किस तरह क्या करना है ? बाकी इस बारे में हम कल विस्तार से बात करेंगे

‘‘ठीक है सर।’’

क्रमशः ...........

-------------------------------------------

बाल उपन्यास: गुडविन मसीह