आत्मा की आवाज(भाग 1) Kishanlal Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • Money Vs Me - Part 3

    मैं दिन भर कैफ़े में काम करता और शाम को सज संवर कर निकल जाता...

  • भय से मुक्ति

    ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्स...

  • मंजिले - भाग 49

    परिक्रमा की ही साथ चलती पटरी की तरा है, एक से गाड़ी उतरी दूसर...

  • सीप का मोती - 5

    भाग ५ "सुनेत्रा" ट्युशन से आते समय पीछे से एक लडके का आवाज आ...

  • Zindagi

    Marriage is not just a union between two people. In our soci...

श्रेणी
शेयर करे

आत्मा की आवाज(भाग 1)

गणेश को बचपन से ही चोरी की आदत पड़ गई थी।बड़ा होकर वह शातिर चोर बन गया।छोटा था तो छोटी चोरी करता था।बड़ा हुआ तो बड़ी चोरी करने लगा।रात को जब लोग अपने अपने घरों में सो रहे होते।तब वह सेंध लगाकर किसी घर मे घुसता।घर के लोग गहरी नींद में सो रहे होते और वह नगदी,गहने चुराकर रफूचक्कर हो जाता।वह बडी होशियारी, चालाकी से चोरी करता था।इसलिए कभी नही पकड़ा गया था।जिस घर मे चोरी करता।उसमे रहनेवालो को भी सुबह ही घर मे चोरी होने का पता चलता।
चोरी की घटना होने पर जनता हल्ला मचाती। अखबार में समाचार प्रमुखता से छपते।लोग पुलिस पर ऊगली उठाते।दबे स्वर में चोर सेे मिले होने के आरोप भी पुलिस पर लगते। मीीडिया पुुुलिस की निसक्रियता के लियेे सरकार की आलोचना करता।
आलोचना होने पर सरकार पुलिसः के आला अधिकारियों को लताड़ती।पुलिस के बड़े अफसर नीचे वालो के कान खींचते।पुलिसः मुस्तेद हो जाती लेकिन चोर को नही पकड़ पाती थी।
गणेश होशियार होने के साथ बुद्धिमान और चालाक भी था।जब तक शहर में चोरी का हल्ला रहता।लोग सतर्क रहते।मीडिया पुलिस पर दोष मढ़ रहा होता। पुलिस चुस्त और सक्रिय होती।तब गणेश चोरी नही करता था।बहुत दिनों तक शहर में चोरी की कोई वारदात न होने पर मामला ठंडा पड़ जाता।लोग बेफ्रिक हो जाते।मीडिया शांत हो जाता।पुलिसः भी सुस्त पड़ जाती।तब गणेश सक्रिय हो जाता।और मौका देखकर वारदात को अंजाम दे देता।
अमावस्या की अंधेरी रात को वह एक पुरानी और काफी बड़ी कोठी में दीवार फांदकर चोरी करने के लिए घुसा था।अंधेरा इतना गहरा था कि हाथ से हाथ सुझाई नही दे रहा था।इसलिए वह धीरे धीरे बहुत ही सावधानी से चल रहा था।वह एक कमरे के दरवाजे के पास पहुंचा, तभी उसे आवाज़ सुनाई पड़ी,"पानी पानी पानी
अभी कोई जग रहा है।उस आवाज को सुनकर उसके मन मे विचार आया।यह विचार मन मे आते ही उसने वहा से भागने में ही अपनी भलाई समझी।वह जिधर से आया था।उसी तरफ जाने के लिए पलटा।दीवार के पास आकर ज्यो ही उसने ऊपर चढ़ना चाहा।तभी उसके कानों में फिर वो ही आवाज पड़ी,"पानी पानी।
उस आवाज को उसने ध्यान से सुना तो उसे ऐसा लगा, मानो कोई कराह रहा है।उसे ऐसा लगा कोई बीमार है और पानी के लिए तड़प रहा है।
उस आवाज को सुनकर गणेश की आत्मा से आवाज आयी,"असहाय,लाचार,बीमार आदमी की मदद करनी चाहिए।
आत्मा की आवाज सुनकर वह जहाँ का तन्हा खड़ा रह गया।
"पानी। पानी फिर वोही दर्दीली आवाज अंधेरे को चीरती हुई उसके कानों तक चली आयी।"
"मुझे उस प्यासेआदमी की मदद करनी चाहिए।"गणेश की अंतरात्मा बोली थी
"पागल हो गया है।"गणेश के मन मे बैठे चोर ने उसे सावधान किया था,"तू एक चोर है।यंहा चोरी करने के लिए आया था।यंहा से भाग चल।अगर ज्यादा देर तक रुका, तो पकड़ा जाएगा।"
"मुसीबत में पड़े आदमी से मुंह मोड़कर चले जाना इंसानियत नही है।विपत्ति में पड़े आदमी की सहायता करना मानवता है।मानवता ही इस संसार मे सबसे बड़ा धर्म है।"गणेश के भीतर के इंसान ने फिर कहा था।
"इस समय तेरा धर्म है, अपने को बचाना।"गणेश के मन मे बैठे चोर ने तर्क दिया था।
(शेष भाग अगली किश्त में पढ़े)