GOPI GEET - 1 books and stories free download online pdf in Hindi

गोपी गीत । - 1

* गोपियाँ बोली *

गोपियाँ विराहावेश में गाने लगीं…प्यारे ! तुम्हरे जन्म के कारण वैकुंड आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गई है, तभी तो सौन्दर्य और मृदुत्नता की देबी लक्षमी जी भी अपना निवासस्थान वैकुंड छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास काने लगी हैं इसकी सेवा करने लगी हैं । परन्तु , प्रियतम्! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों मैं ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं वन -वन में भटक कर तुम्हें ढूंढ रही हैं। । ९ ।

।। श्री राधे ।।

हमारे प्रेमपूर्ण हृदय कै स्वामी ! हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं । तुम शरद्कालीन जलाशय में सुन्दर से सुन्दर सरसिज की कर्णिका वी सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमे घायल कर चुके हो । हमारे मनोरथ पूर्ण करने वाले प्राणेश्वर ! क्या नेत्रों से मारना वध नहीं है? केबल अस्त्रो से हत्या करना ही वध है ? । २ ।

।। श्री राधे ।।
पुरूषशिरोमणि ! यमुनाजी के विषेले जल से होने वाली मृत्यु , अजगर के रूप में खाने वाले अघासुर, इन्द्र की वर्मा , आँधी , बिजली , दावानल , व्रषभासुर और व्योमासुर आदि से एवं भिन्न-भित्र अवसरों पर सब प्रकार बो भयों से तुमने जार-चार हम लोगों की रक्षा की है। ३ ।

।। श्री राधे ।।

तुम केबल यशोदानन्द ही नहीं हो, समस्त शरीरधारियों को हिर्दय में रहने वाले उनके साक्षी हो अन्तर्यामी हों । सखे ' ब्रह्माजी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए तुम यदुवंश में अवतीर्ण हुए हो । ४।

।। श्री राधे ।।

अपने प्रेमियों की अभिलाषा पूर्ण करने बालों में अग्रगण्य यदुबंषाशिरोमणे! जो लोग जन्म मृत्यु रूपी संसार कै चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण काते हैं, उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्रछाया में लेकर अभय कर देते है । हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकडा है, हमारे सिर पर रख दो । ५ ।
।। श्री राधे ।।

ब्रजवासियों के दुख दूर करने वाले वीरशिरोमणि श्यामसुन्दर ! तुम्हारी मंद मंद मुस्कान की एक उज्जवल रेखा ही तुम्हारे प्रेमीजनों के सारे मानमद को चूर चूर करने के लिए पर्याप्त है । हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत , प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी है, तुम्हारे चरणों पर न्यौछावर है । हम अबलाओं को अपना वह परम सुन्दर सांवला मुखकमल दिखालाओ । । ६ । ।

।। श्री राधे ।।

तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापो को नष्ट कर देते हैं । वे समस्त सौंदर्य-माधुर्य की खान हैं और स्वयं लक्ष्मीजी उनकी सेवा करती रहती है। तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछडों वी के पीछे पीछे चलते हो और हमारे लिए उन्हें सांप के फणों पर रखने में भी तुमने संकोच नही किया । हमारा ह्रदय तुम्हारी विरह व्यथा की आग से जल रहा है, तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमे सता रही है । तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष:स्थल पर रखकर हमारे हृदय की ज्वालाको शान्त कर दो। ७।

।। श्री राधे ।।

कमलनयन । तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है । उसका 'एक-एक पद , 'एक-एक शब्द , एक एक अक्षर मधुरातिमधुर है । बड़े-बड़े विद्वान उसमें रम जाते हैं । उस पर अपना सर्वस्व न्यौछाबर कर देते हैं । तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करबो तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैँ । दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य, अमृत से भी मधुर, अधर-रस पिलाकर हमें जीवनदान दो , छका दो । ८ ।

।। श्री राधे ।।

प्रभो! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत्तस्वरर्वप है । विरहसे सताये हुए लोगों के लिए तो वह जीवनसर्वस्व ही है । बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं और भक्त कवियों ने उसका गान किया हैं । वह सारे पाप-ताप से मिटाती ही है, साथ श्रवणमात्र से परम मंगल , परम कल्याँण का दान भी करती है । वह परम सुंदर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है, जो तुम्हारी उस लीला-वठशा का गान करते हैं, वास्तव में भूलोक में वे ही सबसे बडे दाता है । । ९ । ।

।। श्री राधे ।।

' प्यारे ! एक दिन वह था , जब तुम्हारी प्रेम भरी हँसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह-तरह की क्रोड़ाओँ का ध्यान करके हम आनंदमग्न हो जाया करती थीं । उनका ध्यान भी परम मंगलदायक हे । उसके बाद तुम मिले । तुमने एकान्त में हृदयस्पर्शी ठिठोलियॉ कीं , प्रेम की जातें कहीं । हमारे कपटी मित्र ! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मन क्रो क्षुब्ध किये देती है ।। १ ० ।।

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