हैवनली हैल - 1 Neelam Kulshreshtha द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

हैवनली हैल - 1

हैवनली हैल

नीलम कुलश्रेष्ठ

(1)

वह रिसेप्शन में सोफ़े पर देखती है सारे हॉल में मैरून सफेद फूलों वाला ग्रे कलर का गुदगुदा कालीन बिछा हुआ है.एल के आकर के रिसेप्शन काउंटर पर रिसेप्शनिस्ट का गहरी लाल लिपस्टिक लगा मुस्कराता चेहरा है. पास बैठे दो सहायक कंप्यूटर पर काम करने में व्यस्त हैं. सामने वाली दीवार पर आड़ी टेड़ी मॉडर्न आर्ट में नारी आकृति के उभार हैं. कोने की मेज पर रक्खे बोन चाइना के बड़े पॉट से ताजे गुलाबो की महक उस तक पहुँच रही है.

रास्ते में देखे गए उनकी फ़ैक्टरी के नक्काशीदार गेट, गेट से ऑफ़िस तक लम्बी सड़क के दोनों ओर करीने से एक कतार में सजे फूलों वाले पौधों के गमले यानि कि हर चीज में झलकती वही `एरिस्टोक्रेसी `, तो वह मामूली स्त्री क्यों उनका चुनाव थी ? या उसे बेवजह समय गुज़ारने का शगल बनाना चाहा था ?जब ज़िद पूरी नहीं तो वह और बढ़ती गई. सालों के दिनों पर पैर रख़ते आज भी ज़िन्दा है.

जब उसने ये व्यवसायिक संपर्क छोड़ने का फैसला किया था तो सारी दुनियाँ को ख़रीदकर अपनी जेब में र लेने वाले वे हतप्रभ थे. उनका विश्वास भी टूटा था कि आज के समय हर चीज़ पैसे या ताकत से ख़रीदी जा सकतीं है. कौन सी व्यवसायी स्त्री इतनी मूर्ख होगी कि जो अपने पेशे के सबसे समर्थ आदमी के सामने घुटने ना टेक दे जबकि वह व्यक्ति उसकी व्यावसायिक ज़रूरत भी हो व मन की भी. मन की बात तो उसने ज़ुबाँ पर आने ही नहीं दी थी उससे पहले ही -----.

कितने बरस हो गए इस सम्पर्क को छोड़े हुए ----आठ ?नहीं दस ?----कुछ कहानियाँ कैसी होती है जिनका ना इक़रार किया जाता है, ना स्वीकार किया जाता है लेकिन अलग अलग दुनियाँ में जीते हुए दो इनसानो के मन में गुँथी चलती रहती हैं. कभी गलतफ़हमी होती है कि महीनो की व्यस्तता में उन्हें भूल गए हैं लेकिन कभी एकांत में बैठो तो अचानक वे सिर उठाने लगती हैं.

वह अच्छी तरह जानती है कि इस विशाल औद्योगिक प्रतिष्ठान के बीच कितनी ही स्त्रियां उनके जीवन में आती जाती रही होंगी. वे सच ही सफ़ल रहे है. उसे उन्होंने अपने आपको भूलने नहीं दिया है. अपने तमाम लटके झटकों से वे अपनी याद दिलाते रहे हैं. वह किसी भी कम्पनी में संपर्क करती है, तो पता नहीं कैसे उन तक ये सूचना पहुँच जाती है. जब तीसरी बार वह उस कम्पनी में जाती है तो बाहर उनकी कम्पनी का बोर्ड स्वागत करता मिलता है. उसके निजी ऑफ़िस में जाने के रास्ते पर उन्होने जानबूझकर दो तीन अपनी कम्पनी के बोर्डस लगवाये हैं. उसने इन सबके लिए अपने को पत्थर बना लिया है. लेकिन कभी तो कुछ दरकता ही है. हो सकता है हाथ से छूटे हुए शिकारों के लिए उनका एक जैसा ही फॉर्मूला हो.

वह रिसेप्शन में सोफ़े के पीछॆ अपनी गर्दन हल्की सी टिका लेती है, उसने कैसी किस्मत पाई है ---बहिन भाइयो की परवरिश में उसकी उम्र निकल गई, उसने अपनी परवाह नहीं की. कोमलता ने पंख़ पसारे भी तो किसके लिए जिसके लिए औरत महज़ एक खिलौना है.

सामने के केबिन से धुंधले काँच के दरवाजे के पीछॆ से नल के चलने व पानी के गिरने की आवाज़ सुनकर उसे आश्चर्य होता है, वह घड़ी पर नजर डालती है, पन्द्रह मिनट हो चुके हैं, अभी तक बुलावा नहीं आया है.

उसके व्यग्रता देख़कर रिसेप्शन पर बैठी लड़की उससे पूछती है, ``केन आई हेल्प यू मैम?``

``नो, आई वॉन्ट टु मीट योर एम. डी. ``

एम.डी. के नाम के साथ ही उसके सामने एक म्यूज़िक शॉप का बोर्ड तिर जाता है जिस पर लिखा है ``हैवनली हैल ``.जब भी वह अपने ऑफ़िस जाती है तो इस बोर्ड पर उसकी नजर ज़रूर पड़ती है. जिसमें नए अंग्रेज़ी गानों के नए एलबम्स की तेज़ ``वेस्टर्न बीट्स` या लोक संगीत के गीत बाहर छनकते रहते हैं. कितनी बार सोचा कि दोपहिये से उतर कर उसके मालिक से मिले व पूछे कि इतने ग्लैमरस दुकानों के नामों की भीड़ में उसने अपनी दुकान का इतना बेतुका नाम क्यों रक्खा है ? फिर सोचती उससे क्या पूछना ?वह स्वयम भी उसकी तरह या संसार के हर व्यक्ति की तरह स्वर्गमय पृथ्वी के नर्क को झेल रहा होगा या नर्क के बीच स्वर्ग तलाश रहा होगा.

सुबह को दोबारा आने के लिये साँझ के रुप में रात में विलय होना पड़ता है, सुख -दुःख़, धूप- छान्ह, यहां तक कि इंसान के अन्दर देवता व दानव एक दूसरे में गडमड हैं. नरक चौदस यानि दिवाली की रात को भी दीपमालाओ की ज्योति से सजाया जाता है यानि कि वही `हैवनली हेल.

उसे बचपन से स्वर्ग मिला था -साफ़ सुथरा अच्छाइयों से पगा. उसे इसी पर पूरी निष्ठा थी. शायद इसी कारण अपने लिए बस दोपहिया जुटा पाई है लेकिन उनकी प्रगति की बातें उसे अचरज में डाल देती है. वह उसी व्यक्ति के ऑफ़िस में स्वर्ग नर्क को विश्लेषित करने चली आई है, जिसने उसे मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी ?

बरसों पहले भी वह आश्चर्य करती थी कि ज़िन्दगी को खेल समझने वाला, बात बात पर बेपर की उड़ानें वाला, ऊँचे ऊँचे ब्लफ़ मारने वाला व्यक्ति, उसके अपने व्यक्तित्व व से विपरीत व्यक्तित्व वाला उससे बेहरा तरीके से जी रहा है तो क्या वे पृथ्वी की अपनी गढ़ी हुई परिभाषाये है या ऊपर वाले [मतलब भगवान से ही है ]ने अच्छी बुरी`जींस `इंसानो में रोपकर उन्हें पैदा किया है ?जिनमें बुरी `जींस `होती हैं वे कुछ ना कुछ खुराफात करते रह्ते हैं, अच्छे लोग भुगतत्ते रहते हैं, लड़ते रहते है. समय ऎसे ही कटता है.

रावण की लंका भी सोने की थी. विभीषण कुटिया में रहते थे. रावण मरा, सोने की लंका जली, तो विभीषण भी तो मिटे. रावण की मृत्यु की बात, लंका के जलने की बात सभी जानते हैं. विभीषण कब और कैसे मरे कोई नहीं जानता. क्या अच्छाई आरंभ से ऐसी ही बिचारी रही है ?

वह समझ नहीं पा रही वह यहां क्यों आई है ?बरसों पहले के अपने उस दृड़ विश्वास को देख़ने कि यदि इस उफनते समुद्र पर कोई बाँध बाँधकर सही रास्ता बता दे तो यही समुद्र गज़ब ढा देगा. अपनी शक्ति लहरों पर पटक पटक कर नष्ट नहीं करेगा. बहुतों के काम आयेगा. वह भी तो उफनते समुद्र पर बाँध बाँधने का हट कर बैठी थी. वह बाँध बाँधते बाँधते स्वयम्‌ भीग गई थी. भीग क्या गई थी, ऊँची ऊँची लहरों में लपेट दूर बहा दी गई थी. बहा क्या दूर पटक दी गई थी औद्योगिक व्यव्साय की दुनियाँ से दूर .

उनके दो ढाई वर्ष उसके व्यवसाय को ख़त्म कर तहस नाहस करने के सारे दान्व पेचो को काटकर अपना छोटा मोटा व्यवसाय पुनर्जीवित कर लिया था. बिंद्रा ब्रदर्स को चार तरह के गियर्स सप्लाई करने का काम जो वो पूरा होने नहीं दे रहे थे, उसने किसी तरह पूरा करके कम्पनी को दिया था. वह काम पूरा करके वह जानबूझकर उन्ही के ऑफ़िस गई थी. . उन्होंने घुमाफिराकर उसे समझना चाहा था,`` अब हमारी असिस्टेंट मैनेजर मनचंदा को देख़ लीजिये, काम ठीक से नहीं करेंगी,कभी बाईं का बहाना करेंगी, कभी बच्चो की बीमारी का.``

``एक लेडी की ये जेनुइन प्रॉब्लम्स हैं. ``

``तो फिर वो घर सम्भाले,नौकरी करने क्यों आती है ?हमारे ऑफ़िस के काम से बाहर भी जाना होता है लेकिन वो हमारे साथ में टूर पर नहीं जाती. ``

वह पर्स हाथ मे उठाकर ख़ड़ी हो गई थी, ``आप सही कह रहे हैं. जब ठीक से काम नहीं हो रहा तो वह छोड़ देना चाहिये. देखिये ना मैंने भी ढाई वर्ष इस काम को पूरा होने मे लगा दिए इसलिए मै ये कॉन्टेक्ट छोड़ रही हूँ. ``

वे चौंकने की आखिरी सीमा पर थे, ``आपको काम छोड़ने के लिए थोड़े ही कह रहें हैं. ``

तब कैसी दृढ़ता उसमें आ गई थी, इस फ़ायदा देने वाले कॉन्ट्रेक्ट को वह छोड़ देगी., ``नो. नो, मै ढाई वर्ष में गियर्स सप्लाई कर पाई हूँ, तो यह काम छोड़ देना चाहिये. ``

``आपको इस कॉन्ट्रेक्ट से आगे और भी बहुत फ़ायदा होगा.ब्रिंद्रा ब्रदर्स की एक और कम्पनी खुल रही है. ``

``नहीं, अब मै यह काम नहीं कर सकती.``

``क्या आपको मुझसे कोई काम नहीं है ?``उनकी आवाज़ की छटपटाहट से वह सिहर गई थी.

``नो. ``

``सच में अब आपको मुझसे कोई काम नहीं है ?``

दिल की बात सारा अहम् लांघती, सारी दृढ़ता मिटाती कातर हो आँखों से छलक चुकी थी, ``आप क्या ये काम छोड़कर मुझे भूल सकोगे ?``अकसर वह उससे ऎसे ही बात करते थे जैसे किसे पुरुष मित्र से बात कर रहे हो.

तब वह चुप रही थी. अब वह सोच पाई है कि वह एक धमकी थी, ``मै तुम्हे अपने को कभी भूलने नहीं दूँगा. `उसे ख़ुद को याद दिलाने के चक्कर में ख़ुद भी तो उसे याद रक्खे हुए हैं. इतने बरसों बाद कहीं वह उसी व्यग्रता को देखने नहीं चली आई है जिसमे वह फँस गई थी. किसी पुरुष को अपने लिए छटपटाते व्यग्र होते हुए देखने का उसका तब पहला अनुभव था, वो भी जब उम्र की ढलान शुरू हो जाती है. वैसे भी उसे छोटे बहिन भाइयो की चिंता व अपना लघु उद्योग जमाने की चिन्ता ने रूखा सूखा बना दिया था. बिलकुल बच्ची जैसी रह गई थी.

उसने जब बृन्दा ब्रदर्स में गियर्स सप्लाई का काम आरंभ किया था तो तीन चार बार इनसे ही मिली थी. वह घुमा फिराकर अपने ऊँचे ख़ानदान की, अपाने ऊँचे रुतबे की डींग मारा करते थे. उसको बहुत मुश्किल से समझ आया था कि बाकायदा उस पर लाइन मारी जा रही है, वह भी अपने से तीन चार वर्ष छोटे पुरुष द्वारा.

उसके व्यव्सायिक अनुभवों ने उसे सिखा दिया था कि हर तीसरा व्यक्ति घर से बाहर आई स्त्री को जलेबी की प्लेट समझता है. उस पर लाइन मारकर चांस लेना चाहता है, भांपना चाहता है कि उसके साथ कितनी दूर तक जाया जा सकता है. यदि ऎसे लोगो को अपरोक्ष रुप से समझा दिया जाए कि उस जैसी स्त्री के साथ कहीं तक भी नहीं जाया जा सकता तो फिर वे अनुशासित हो जाते हैं. उसकी कबलियत जान वे उससे पूरा पूरा सहयोग करने लगते हैं.

उसे पूरा विश्वास था कि जो उस जैसी रुखी सूखी बड़ी स्त्री को फिल्मी लटके झटके दिखा रहा है, लाइन मारना उसकी आदत होगी. उसका सोचना सही था.अपने से आठ दस वर्ष छोटी रिसेप्शनिस्ट उनकी मुठ्ठी में थी. अपने से आठ दस वर्ष बड़ी मिसिज़ मनचंदा को वे अपाने साथ टूर पर ले जाने, की कोशिश में लगे थे. उनसे जुड़ी और भी कहानियों को सुनकर उसे अम्मा का ढोलक पर गाया गीत याद आता था, `पैदा होते ही ललनवा आँख़ मारे दाई को. ``

उनके लिए ये ज़िद इसलिए तूल पकड़ती गई कि एक मामूली औरत उनके प्रस्ताव को ठुकरा रही है. उसने समझाना चाहा, ``देखिये `वेस्टर्न स्टेट्स ` की लेडीज़ की मानसिकता दूसरी होती है. ``

``क्या आप हमे बच्चा समझती हैं ? ``

वह भी शरारत से मुस्कराते हुए ``हाँ `में सिर हिला बैठी थी.

``हम बच्चे नहीं है. आई नो द वीमन ऑफ़ एव्री स्टेट. आई नो वीमन ऑफ़ योर स्टेट हैव वेरी स्ट्रॉन्ग माइंड. .``उनकी भी शरारती मुस्कान ने उसे चुनौती दी थी कि इसी मज़बूत दिमाग़ को मुझे भेदना है.

उसके मन ने ये चुनौती स्वीकार कर ली थी.

उसे पता था कि इस फ़ैक्टरी के मालिक का ये आदमी दान्या हाथ है, इसकी ताकत, इसकी पकड़ इस इंडस्ट्रियल एरिया पर ही नहीं, शहर के और भी औद्योगिक घरानों पर है, वह भी इस छोटी उम्र में जब पुरुष सौंदर्य अपनी पराकाष्ठा पर होता है -अच्छे पद पर काम करने की गरिमा,घर में पत्‍‌नी व छोटे छोटे बच्चे. वेल सेटल होने का उछाह इसी उम्र में सर्वोपरि होता है. वे उसे भी तौलते थे, ``मैडम !ज़िन्दगी में जम्प करना चाहिये. मेरा तो इंटरनेशनल एम्पायर ख़ड़ा करने का सपना है. ``

वह कह देती, ``अपने अपने विचार हैं. मै तो जन्मजात कछुआ हूँ. सही रास्ते चलते चलते जहाँ तक पहुँच जाउ ठीक है. शॉर्ट कट्स पर मेरा विश्वास नहीं है. ``

उसने गियर्स सप्लाई करने के लिये सीधे ही ब्रिंद्रा जी से मिलना चाहा लेकिन वे तो आँखें मूदे इन्हे ही कम्पनी के अधिकार देकर बैठे थे. इन्ही ही डील करना उसकी विवशता थी. वे मिलते कोई ना कोई शरारत लिए हुए. उसे भी ज़िद चद गई थी इन शरारतो को काटकर ही काम करेगी. उन्हें अब भी गलतफ़हमी थी कि उसने जो सफ़लता हासिल की है वह औद्योगिक मंत्रालय, मेटल सप्लायर्स या ख़रीददारो में से कुछ को स्त्री की तरह भुनाकर स्थापित किया है. वह उनकी इस गलतफ़हमी को तोड़ देना चाहती थी कि उसके पास अपना निजी दिमाग है, निजी काबलियत है. उसे कोई ओछे हथकंडों की आवश्यकता नहीं है.

उस दिन वह उनसे कुछ डिस्कस करके चलने को उठी, ``तो मै चलूँ ? ``

उनकी आवाज़ कातर हो चुकी थी, चेहरा छटपटाया सा लग रहा था. आँखों की भावुकता को उन्होंने छिपाने की कोशिश नहीं की थी, ``जब जाना ही था तो आए क्यूँ थे ?``

इस उम्र में उसने अपने जीवन का प्रथम संवाद किसी पुरुष के मुँह से सुना था. एक क्षण चकित रहने के बाद वह बेसाख्ता हँसती चली गई थी जैसे कोई अल्हड़ पहाड़ी झरना पहाड़ी पर बहने से रुक ही नहीं पाता. उसके मुँह से निकल गया था, `जब आए हैं तो जाना तो होगा ही. ``

केबिन के हैंडल पर हाथ रख़कर उसने दरवाज़ा खोला था और मुड़कर कहा था, ``ओ.के. बाय. ``

उनका चेहरा देख़कर उसकी देह सनसना गई थी. उसे लगा था कि कहीं बेहद ग़लत हो गया है. उनके क्रोध से उफ़नते चेहरे व एकटक घूरती आँखों में शक्ति होती तो उसे वे वही भस्म कर देते. उनके गुस्से से भिंचे होंठो को देख़कर वह समझ चुकी थी कि वह किसी भयंकर अनिष्ट को निमंत्रित कर चुकी है.

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Dilip Sharma

Dilip Sharma 2 साल पहले

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Sonal Parmar

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