पॉलिटेक्निक वाले फुट ओवर ब्रिज पर - 2 Pradeep Shrivastava द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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पॉलिटेक्निक वाले फुट ओवर ब्रिज पर - 2

पॉलिटेक्निक वाले फुट ओवर ब्रिज पर

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग-2

रुहाना को उसकी हालत पर बड़ी दया आ रही थी। खासतौर से उस दुधमुंहे डेढ़ साल के बच्चे पर, जो उस ठंड में बचने लायक कपड़े तक नहीं पहने था। उसे उसी तरफ देखते पाकर श्वेतांश समझ गया कि वह क्या देख रही है। उसने उसे टोकते हुए कहा, ‘क्या देख रही हो?’ श्वेतांश ने अपना चेहरा तभी दूसरी तरफ घुमा लिया था जब उन सब ने खाना शुरू किया था। उसके प्रश्न पर रुहाना ने भी उसी की तरफ मूंह कर लिया और कहा, ‘इन सब को देख रही हूं। इस ठंड में बेचारों के पास कपड़े तक नहीं हैं। ठंड से ठिठुर रहे हैं, खाना भी पता नहीं क्या खा रहे हैं? जो बच्चा दूध पी रहा है, उस बेचारे को देखो वह भी आधा नंगा है। नन्हीं सी जान को ठंड लग गई तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी।’

‘हां, लेकिन तुम, हम क्या कर सकते हैं। जब उसकी मां को ही अपने बच्चे का ध्यान नहीं है, बच्चा नंगा है, उसे ठंड लग रही है या नहीं, इससे बढ़कर यह कि जब उसे अपना ही होश नहीं है तो वह बच्चे के बारे में क्या सोचेगी। बेवजह परेशान हो रही हो।’

‘अरे यार इतना कठोर ना बनो। सोचो हम लोग इतने कपड़े पहने हुए हैं, तब भी ठंड से परेशान हैं। मुझे गुस्सा तो इन औरतों के आदमियों पर आ रही है कि इतने बच्चे पैदा करके सब पता नहीं कहां गायब हैं। इनमें से किसी का भी आदमी इनके साथ दिखाई नहीं दे रहा है।’

‘इनके आदमी होंगे तब ना दिखेंगे।’

‘क्या मतलब?’ रुहाना चौंक कर बोली, ‘हां, इनको शायद पता भी नहीं होगा कि इनके बच्चों के पिता कहां हैं। वह सब भी कहीं मांगते-खाते घूम रहे होंगे। सुनता तो यहां तक हूं कि कई बच्चों के बारे में तो खुद इन्हें भी मालूम नहीं होगा कि इनके बच्चों का पिता कौन है? कभी कुछ पुलिसवाले, तो कभी रात में घूमते कुछ और कमीने लोग इन्हें शिकार बनाते हैं। कुछ पैसे इनके सामने डाल देते हैं बस। अब तुम इस छोटे बच्चे वाली मां को ही देखो, अभी तो बेचारी खुद ही बच्ची है, लेकिन ना जाने किस मजबूरी में दो-दो बच्चों की मां बनी हुई है। इनके आदमियों की जो तुमने बात की तो वह सब भी कभी-कभी रात-दिन में आते हैं और बच्चों का बोझ इनमें रोप कर चल देते हैं। खुद आए, ऐश की, चल दिए और तिल-तिल कर मरने के लिए इन्हें छोड़ जाते हैं?’

‘इन बेचारी लड़कियों, बच्चों के बारे में इतना सब कुछ तुम कैसे जानते हो?’

रुहाना के प्रश्न पर श्वेतांश बिल्कुल गम्भीर हो गया। सोचता रहा कुछ। तो रुहाना ने फिर पूछा, ‘क्या बात है, तुम क्यों इतना सीरियस हो गए?’

‘तुम बहुत दिन से पूछ रही हो ना कि मैं इस ब्रिज पर हर बृहस्पति को क्यों आता हूं, क्यों देर तक रहता हूं, मुझे लगता है यह सब बताने का इससे अच्छा अवसर दूसरा नहीं मिलेगा। पहले तो सोचा था कि यह बात जीवन में कभी किसी को नहीं बताऊंगा। लेकिन अभी स्थिति ऐसी बन गई है कि तुम्हें इस बारे में सब बता देना मुझे ठीक लगता है।’

‘लेकिन अभी तो मैंने यह पूछा कि इन महिलाओं, बच्चों के बारे में इतना कुछ तुम कैसे जानते हो?’

‘वही बताने जा रहा हूं कि इनके बारे में कैसे जानता हूं।’

ये तभी जान समझ पाओगी जब यह जानोगी कि यहां मैं क्यों आता हूं।‘

’बड़ी अजीब बात है। ठीक है बताओ।’

’हुआ यह कि मैं पैसों की तंगी के चलते पढ़ाई-लिखाई तो ठीक से कर नहीं सका। सच यह भी है कि पढ़ने-लिखने में मेरा मन भी नहीं लगता था। शुरू से ही नेता बनने का सपना देखता था। सोचता जब अनपढ़, गुंडे, माफिया नेता बन जाते हैं। मंत्री-मुख्यमंत्री, माननीय बन जाते हैं तो वही बना जाए। पढ़ाई-लिखाई सिवाय समय बरबादी के और कुछ नहीं है। मगर इन माफिया से नेता बने लोगों की तरह मैं नेता अकूत कमाई के लिए नहीं बनना चाहता था। मैं सपने देखता था कि मैं क्रांति करूंगा। देश को बदल कर रख दूंगा।

लोकतंत्र खत्म कर दूंगा। क्योंकि मैं यह समझता था बल्कि अब भी मानता हूं कि लोकतंत्र ने अपने देश को बनाया कम बरबाद ज्यादा किया। यदि बनाया ज्यादा होता तो हम-तुम यूं दर-दर भटक न रहे होते। ये जो भिखारी हैं ये भिखारी न होते। लोग, बच्चे ऐसे फटेहाल न होते। सड़कों-गलियों-चौराहों पर एक जून खाने, सिर ढकने के लिए एक छत को तरस न रहे होते। मैं हर आदमी को शिक्षा-चिकित्सा, रोटी-कपड़ा और मकान सच में हरहाल में देने का सपना देखता था।

इसके लिए मैं डिक्टेटरशिप, डेमोक्रेसी, आर्मी रूल के एक मिलेजुले रूप वाली शासन व्यवस्था लागू करने की सोचता था। मगर जब आगे बढ़ा तो ऐसे मगरमच्छों के झुण्ड के झुण्ड मिले कि मुझे अपना रास्ता बंद मिला। फिर सोचा पढ़-लिख कर ही कुछ बना जाए। जब-तक यह समझा समय मेरे हाथ से निकल चुका था। पढ़ाई-लिखाई डिस्टर्ब हो चुकी थी। बस खींचतान के पढ़ रहा था। मन पढ़ने में तब लगना शुरू हुआ जब सब बिखर चुका था। बेरोजगारी मुझे भी परेशान करने लगी। रोजगार के लिए हाथ-पैर मारने लगा। एक दिन घर पर था, वहीं पेपर में यहां नौकरी का विज्ञापन देखा।

पापा से बहुत कहने पर यहां आने-जाने का किराया भर मिला। यहां आया, पेपर में दिए एड्रेस पर पहुंचा तो वह फर्जी निकला। मेरी तरह ठगे गए कई और लड़के-लड़कियां वहां मिले। वह सब कई दिन पहले ही वहां पहुंचे थे। रजिस्ट्रेशन के नाम पर वह फर्जी कंपनी उन सब से पैसे हड़प कर भाग चुकी थी। मैं देर से पहुंचा था इसलिए रुपये-पैसे ठगे जाने से बच गया।’

‘थैंक गॉड। फिर क्या हुआ?’

‘फिर उस फर्जी कंपनी के ऑफ़िस के गेट से बाहर आया। क्या करूं, किधर जाऊं कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता रहा। वहीं पर मिला एक और लड़का भी साथ था। वह बड़ा जुझारू लड़का है। उसी के साथ बैठा जीपीओ के पास चाय पी रहा था।

पहले मैंने सोचा कि घर लौट जाऊं। मगर घर पर क्या जवाब दूंगा यह सोच कर मैं परेशान हो गया। उससे पूछा तो वह बोला उसके क्षेत्र के विधायक यहीं विधायक निवास में रहते हैं। वह उन्हीं के यहां रुकेगा। कोशिश करेगा किसी और कंपनी में। उसी की सलाह पर मैं भी रुक गया। चाय वाले के यहां पेपर में एक और विज्ञापन देखकर उसी लड़के के साथ वहां चला गया। संयोग देखो कि वह वहां पर सुपरवाइजर हो गया और मैं सिक्योरिटी गार्ड।

मैंने सोचा चलो कुछ तो बात बने, जब बात स्टार्ट हुई है तो आगे तक भी जाएगी। दोनों को तुरंत ही काम पर लग जाना पड़ा। मैंने सोचा शाम को उसी के साथ विधायक निवास पर ही रुक जाऊंगा। एक-दो दिन में फिर देखूंगा कहीं ठौर-ठिकाना। लेकिन शाम को उसने मजबूरी बता दी कि वह वहां किसी और को लेकर नहीं जा सकता। मैंने कहा किसी तरह एक रात की व्यवस्था हो जाए, अगले दिन कुछ ना कुछ इंतजाम कर लूंगा, लेकिन उसने साफ मना कर दिया।

रात बिताने के चक्कर में भटकते-भटकते यहां पहुंच गया। भूख बड़ी तेज़ लगी हुई थी। तो यहीं इसी वेब सिनेमा के पास एक ठेले वाला पूड़ी सब्जी बेचता है। घर वापस जाने के लिए जो किराए का पैसा था उसी से खाना खा लिया। अब बात आई सोने की, कि कहां सोऊँ ? दिनभर इधर-उधर भटकने, ड्यूटी करने से बुरी तरह थक गया था। पैदल ही इसी पॉलिटेक्निक चौराहे की तरफ चला आ रहा था। यहां गोरखपुर जाने वाली बस दिखी तो मन में एकदम से आया कि भाड़ में जाए गार्ड की नौकरी। चलता हूं गोरखपुर घर। सच बताऊँ उस समय यदि किराए के पैसे रहे होते तो मैं घर वापस चल देता। तो पैसे की मजबूरी ने मुझे यहीं रोक दिया। बस चली गई। मैं भटकते-भटकते इस फुट ओवर ब्रिज की बेहद थके कदमों से सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर आ गया। थक कर एकदम चूर हो रहा था।

तो यहीं एक जगह किनारे बैठ गया। जो न्यूज़ पेपर घर से आते समय बस में लिया था वही बैग से निकाल कर बिछाया और बैग को सिर के नीचे रख कर लेट गया। उसके पहले घर फ़ोन करके पैरेंट्स को बता दिया था कि नौकरी मिल गई है। यहीं एक दोस्त के साथ रहने का भी इंतजाम हो गया है। थक कर चूर था ही तो लेटते ही गहरी नींद में सो गया।

दो-तीन घंटे बाद पेशाब लगी तो नींद खुल गई। उठने लगा तो मुझे लगा कि मेरा सिर तो पथरीली फर्श पर टकरा रहा है। एक झटके में दिमाग बैग की तरफ गया। देखा तो चौंक गया। मैं एकदम पसीने-पसीने हो गया। अब क्या करूं, बड़ी देर तक तो पेशाब लगी है यह भी भूल गया। इधर-उधर नजर डाली तो मेरे जैसे एक दो और लोग भी सोते मिले। मगर सोते समय तीन-चार भिखारियों का जो समूह पहले से ही यहां सो रहा था वह नहीं दिखा। मुझे पक्का यकीन हो गया कि वही सब मेरा बैग ले गए।

वहीं देर तक बैठा मैं सोचता रहा कि अब क्या करूं। जेब में तीस-चालीस रुपए से ज़्यादा कुछ है नहीं। खाना खाने के बाद यही बचे थे। बैग में एक सेट कपड़ा, तौलिया मेरा जो कुछ था, सब चला गया था। मोबाइल ऑफ करके पैंट की जेब में रखा था तो वही बच गया था।

‘पहली रात इस ब्रिज पर बिताई, शायद बृहस्पति का दिन था इसीलिए यहां आते हो हर बृहस्पति को।’ ‘रुहाना सिर्फ़ पहली रात ही यहां नहीं बिताई, आगे और अड़सठ दिनों तक यह ब्रिज मेरा ठिकाना बना रहा है। इस शहर में मेरा पहला आशियाना यही था।’

‘क्या! दो महिने और, क्यों, जहां नौकरी कर रहे थे वहां सैलरी नहीं मिल रही थी क्या?‘

’मिली, पहली सैलरी दो महीने बाद मिली।’

‘क्यों, दो महीने बाद क्यों?’

‘इतना क्यों चौंक रही हो, यह छोटी-मोटी प्राइवेट कंपनियां क्या करती हैं तुम्हें मालूम नहीं। तुम भी तो प्राइवेट कंपनी में हो।’

’हां लेकिन मेरे यहां पहली सैलरी पैंतीस दिन बाद मिल गई थी। उसके बाद अब हर तीन-चार तारीख को मिल जाती है। मैं पहला एक हफ्ता यहां एक रिश्तेदार के यहां रही। सोचा था कि पहला एक महीना वहीं गुजारूंगी। उसके बाद किसी गर्ल्स हॉस्टल में रूम लूंगी। लेकिन पहले दिन से ही उनकी नाक-भौं ऐसी सिकुड़ी रही कि मैंने हफ्ते भर में ही हॉस्टल में रूम ले लिया। लेकिन तुम दो महीने तक इस ब्रिेज पर कैसे रहे? मैं तो सोच कर ही परेशान हो रही हूं। यहां रुके हुए दो घंटा ही हुआ है। लेकिन मैं ऊब गई हूं कि कैसे पानी बंद हो और यहां से निकलूं।’

‘मेरे पास कोई ऑप्शन ही नहीं था तो क्या करता। दूसरे किसी से कोई हेल्प मैं तभी मांगता हूं जब कोई दूसरा ऑप्शन नहीं होता।‘

’घर वापस नहीं जाना चाहते थे तो कम से कम काम भर का पैसा तो मंगा ही सकते थे। सामान चोरी हो गया था, पैसे भी नहीं थे, कैसे क्या करते?’

‘देखो मैं अपने घर की हालत जानता हूं। यह सब जानने के बाद फादर पैसा जरूर भेजते, लेकिन उन्हें किसी से कर्ज लेना पड़ता। इसलिए मैंने सोचा जो भी हो पैसा नहीं मांगूंगा।’

‘तो फिर क्या किया? कैसे चलाया खाना-पीना, नहाना-धोना सब कैसे हुआ?’

‘नहाना-धोना तो नीचे कॉर्नर पर यह जो पब्लिक टॉयलेट है यहां होता था। सोना यहां ब्रिज पर और खाना-पीना ठेलों पर।’

‘इन सब के लिए पैसे, वह कहां से लाए? तुम्हारे पास तो पैसेे नहीं थे।’

‘हां पहले दिन चालीस-पचास रुपये बचे थे। वह सुबह पब्लिक टॉयलेट और यहां से ऑफ़िस जाने के लिए किराए में निकल गए। ऑफ़िस में फिर उसी पहले दिन वाले लड़के से मिला उसे सारी बातें बता कर मदद मांगी, तो उसने कहा घबराओ नहीं कुछ करता हूं। असल में वह काम कैसे निकाला जाता है यह बहुत अच्छी तरह जानता है। उसने सवेरे का चाय नाश्ता और बाद में लंच भी कराया। लंच के समय ही उसने बताया कि पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया है। और ना ही कहीं रुकने का। बहुत सोच-विचार कर मैंने कहा मेरा मोबाइल ही किसी तरह बिक जाता तो अच्छा था। तो उसी ने कोशिश करके शाम तक मोबाइल चार हज़ार में बिकवा दिया।

ऑफ़िस के ही एक आदमी ने लिया था। लेकिन उसने पूरे पैसे नहीं दिए। दो हज़ार उसी दिन दिए और दो हज़ार एक हफ्ते बाद। तो इन्हीं चार हज़ार रुपयों से मैंने दो महीने निकाले।‘

’सिर्फ़ चार हज़ार में दो महीना।’

‘हां, टॉयलेट वाले से हालात बताकर हेल्प के लिए कहा तो कुछ ना नुकुर के बाद वह पैसा इकट्ठा लेने को तैयार हो गया। सारी डिटेल्स नोट करने के बाद माना। इस तरह डेली का बीस रुपया बचा। यहीं पास में एक ठेले पर कभी छोला चावल तो कभी रोटी सब्जी से काम चलाया। खाना अक्सर एक टाइम ही खाता। दिनभर ऑफ़िस की वर्दी में रहता। एक सेट जो कपड़ा था वही पहन कर आता-जाता।’

‘घर से कपड़े पार्सल मंगवा सकते थे। ऑफ़िस के पते पर।’

रुहाना की बात पर श्वेतांश ने एक गहरी सांस ली। फिर कहा, ‘घर पर भी मेरे पास ऐसे कपड़े नहीं बचे थे जिन्हें मंगा कर मैं यहां काम चला लेता। दो थे वही लेकर आया था। एक चोरी चला गया।

इस टॉयलेट वाले ने बड़ी मदद की। उसी ने दो अंगौछे मंगवाए। उसी को पहन कर नहाता-धोता, कपड़े धोता-सुखाता। इसी तरह पूरा दो महीना निकाला। जब दो महीने की सैलरी मिली तो पहला काम इसका पूरा कर्ज चुकाया। एक सेट कपड़ा खरीदा। और पंद्रह सौ रुपए का एक सस्ता सा मोबाइल लिया। जो मोबाइल बेचा था उसे ट्यूशन वगैरह के पैसे से आठ-दस महीने में खरीदा पाया था। जब पंद्रह सौ का मोबाइल ले रहा था तो उस मोबाइल की बड़ी याद आ रही थी।’

‘सच में तुमने बड़े कष्ट उठाए हैं।’

‘हां, वह दो महीने तो बड़े कष्ट में बीते। इसीलिए उन दो महीनों में जहां भी मुझे एक पैसे की भी मदद मिली उसे मैं भूल नहीं पाया और सच यह है कि मैं भूलना भी नहीं चाहता। इस ब्रिज को तो बिल्कुल नहीं। यहां आकर मुझे लगता है कि जैसे मैं अपने किसी दोस्त के पास आ गया हूं। मैं अपने ही घर के किसी कोने में हूं। वहां की नौकरी मैंने तीन महीने बाद ही छोड़ दी थी। लेकिन आज भी महीने में दो चार बार वहां जरूर जाता हूं। वहां अपने साथियों से जरूर मिलता हूं।’

‘वहां छोड़ क्यों दिया?’

‘असल में गार्ड की नौकरी मुझे पसंद नहीं थी। मजबूरी में ही कर रहा था। इसलिए जैसे ही इस वाली कंपनी में किसी तरह मौका मिला तो छोड़ दिया। पैसा भी यहां डेढ़ गुना ज़्यादा था। और सबसे बड़ी बात यह कि अगर वहां छोड़ता नहीं तो तुम कहां से मिलती।’

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