पॉलिटेक्निक वाले फुट ओवर ब्रिज पर - 1 Pradeep Shrivastava द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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पॉलिटेक्निक वाले फुट ओवर ब्रिज पर - 1

पॉलिटेक्निक वाले फुट ओवर ब्रिज पर

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग-1

फुटओवर ब्रिज पर इधर-उधर टहलते हुए रुहाना को आधा घंटा से ज़्यादा हो चुका था। उसे आते-जाते लोगों में घर जाने की जल्दी साफ दिख रही थी। सात बज गए थे। अंधेरा गहरा हो चुका था। दिन भर छिटपुट इधर-उधर फैले बादलों ने इस समय इकट्ठा होकर आसमान को पूरा ही ढंक लिया था। हवा कुछ और तेज़ हो चुकी थी। सवेरे ही रुहाना ने ई-पेपर में पढ़ा था कि आंधी के साथ तेज़ बारिश हो सकती है, ओले भी पड़ सकते हैं। इससे ठंड एक बार फिर लौट सकती है।

यह न्यूज़ पढ़कर ही उसने रोज की अपेक्षा ज़्यादा भारी कपड़े पहन रखे थे। वह ठंड से बचाव के प्रति ज़्यादा सतर्क रहती है। क्योंकि उसकी जरा सी लापरवाही से उसका इस्नोफिलिया एकदम बढ़ जाता है। फिर सर्दी जुखाम से वह हफ्तों परेशान रहती है। इसीलिए वह इस समय कुछ ज़्यादा ही बेचैन हो रही थी कि कहीं मौसम विभाग की सूचना सही हो गई तो उसके लिए बड़ी मुश्किल हो सकती है। कपड़े कितने ही पहने हो बारिश, ओले उसके लिए कुछ ज़्यादा ही बड़ी मुसीबत हैं। परेशान होकर उसने श्वेतांश को फिर फ़ोन किया, लेकिन इस बार उसने फ़ोन रिसीव ही नहीं किया। उसे बड़ी गुस्सा आई।

श्वेतांश की कॉल रिसीव ना करने की आदत को लेकर वह कई बार उससे लड़ चुकी थी। लेकिन हर बार वह कोई ना कोई बहाना बता कर निकल लेता है। उसने गुस्से में सोचा कि आज इसे सबक सिखा ही देती हूं। इसे भी यह एहसास होना चाहिए कि कॉल रिसीव ना होने पर कितनी टेंशन, कितनी इरिटेशन होती है। उसने एक बार ब्रिज से बाहर ऊपर आसमान में घने बादलों को देखा, अजीब भूरे-भूरे से हो रहे थे। फिर मोबाइल को ऑफ कर दिया। ऐसा करते वक्त उसने मन ही मन सोचा कि, ‘आज तुम्हारी यह आदत छुड़वाती हूं। तुम यहीं खड़े-खड़े इंतजार करते रहना। अपने इस प्रिय फुटओवर ब्रिज पर। रात भर मेरा नंबर मिलाते रहना।’

यह सोचते हुए वह ब्रिज से नीचे उतरने के लिए बढ़ चली। दो-तीन सीढियाँ ही उतरी होगी कि पीछे से उसके कानों में श्वेतांश का स्वर सुनाई दिया ‘रुहाना रुको।’ वह जब तक रुकी श्वेतांश हंसते हुए एकदम उसके सामने आ खड़ा हुआ। और बोला, ‘सॉरी जाम में फंस गया था।’

‘क्या सॉरी, तुम्हारा हमेशा का यही तमाशा है। जब मैं कॉल नहीं रिसीव कर पाती तब तो दुनिया भर की बातें कह डालते हो।’

‘सुनो-सुनो मेरी बात तो सुनो, इस बार जब तुमने कॉल की तो मैं नीचे बाइक खड़ी कर रहा था। सोचा जब पहुंच ही गया हूं तो कॉल रिसीव करके क्यों बेवजह तुम्हारा बिल बढ़ाउूँ ।’

रुहाना उसके साथ वापस ऊपर चलती हुई बोली, ‘अब क्यों बिल की बात करते हो, इतना सस्ता, इतना ज़्यादा टॉक टाइम मिलता है कि खत्म ही नहीं होता।’

‘चलो अच्छा ठीक है। जा कहां रही थी?’

‘घर जा रही थी। घंटे भर से इंतजार करते-करते थक गई हूं। मौसम अलग खराब हो रहा है। फ़ोन उठाते ही नहीं तो और क्या करती, कब तक यहां खड़े-खड़े आते-जाते लोगों की गिनती करती रहती।’

रुहाना ब्रिज के बीचो-बीच पहुंच कर उसकी रेलिंग से टिक कर खड़ी हो गई। श्वेतांश भी उसके सामने खड़ा हो गया। उसे शांत कराते हुए बोला, ‘तुम्हें कितनी बार सब बता चुका हूं। नौकरी का हाल तो जानती हो। जब निकल लो तब समझो छुट्टी हुई। सीनियर जब छुट्टी का टाइम होता है तभी आकर बैठ जाता है। उसके रहते निकल नहीं सकता। बिना किसी गलती के ही चिल्लाता रहता है। बहाने ढूंढ़-ढूंढ़ कर डांटता रहता है। उसके रहते निकल दूं तो नौकरी ही ले लेगा। प्राइवेट सेक्टर की तो सारी बातें जानती ही हो, कोई सरकारी नौकरी तो है नहीं जो निश्चिंत रहो।’

‘अरे यार मैं केवल कॉल रिसीव कर सिचुएशन बता देने की बात कर रही हूं, जिससे कोई कंफ्यूजन ना रहे। बेवजह मन परेशान होता है ना। एक तो मैं यह नहीं समझ पा रही हूं कि तुम हर बृहस्पति को यहां इस ब्रिज पर ही क्यों आते हो? मिलने के लिए तुम्हें और कोई जगह नहीं मिलती क्या?’

‘लो पहले ये यह समोसा खाओ।’ श्वेतांश ने समोसे का पैकेट उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा तो रुहाना एक समोसा निकालती हुई बोली, ‘अब यहां समोसा खाएंगे और पानी कहां पिएंगे।’

‘नीचे।’

‘अरे यार बड़ा अजीब लगता है मुझे, यहां खाओ, पानी कहीं और पियो। उसके लिए भी अभी पता नहीं कितनी देर इंतजार करना पड़ेगा, क्योंकि घंटे भर से पहले तुम यहां से उतरने वाले नहीं।’

‘चलो आज जल्दी चलूंगा क्यों परेशान हो रही हो।’

‘जल्दी कहां चल पाओगे। जब यह बारिश बंद होगी तब चलोगे ना।’ रुहाना ने सामने की तरफ बाहर देखते हुए कहा। तेज़ हवा के साथ बारिश शुरू हो गई थी। बादल भी रह-रहकर खूब तेज़ गरज-चमक रहे थे। श्वेतांश ने बाहर देखते हुए कहा ‘ज़्यादा देर बरसने वाला नहीं है। तेज़ हवा चल रही है, जल्दी ही निकल जाएगा।’

उसका आखिरी शब्द रुहाना नहीं सुन पाई, क्योंकि उसी समय बादल की तेज़ गड़गड़ाहट से पूरा एरिया थर्रा उठा था। उसने दोनों हाथों से कान बंद कर लिए थे। बिजली की तेज़ चमक से आंखें पहले ही चुधियां गई थीं। उसे श्वेतांश पर गुस्सा आ गया कि उसी के कारण उसे इस हाल में यहां रुकना पड़ा। बादलों की गड़गड़ाहट कम ही हुई थी कि हर तरफ से तड़-तड़ की आवाज सुनाई देने लगी। सड़क पर स्ट्रीट लाइट में वह अच्छे खासे बड़े-बड़े ओले साफ़ देख पा रही थी।

श्वेतांश ने उन्हें देखकर कहा, ‘बहुत दिनों बाद इतने बड़े-बड़े ओले देख रहा हूं।’

‘बड़े हों या छोटे लेकिन आज के बाद मैं इस ब्रिज पर नहीं आऊंगी।’ रुहाना ने यह बात धीमी आवाज़ में कही क्योंकि पानी से बचने के लिए बहुत से लोग ऊपर आ गए थे। पूरा ब्रिज करीब-करीब भर गया था। उस के स्वर में गुस्से को भांपकर श्वेतांश ने कहा, ‘बारिश कोई अपने हाथ में नहीं है, अपने मौसम पर ही वह बरसेगी। तुम ब्रिज पर गुस्सा क्यों निकाल रही हो। देर से मैं आया, इसमें ब्रिज का क्या लेना-देना।’

‘है ना लेना-देना। बारिश पता नहीं कब बंद होगी। लोग बढ़ते ही जा रहे हैं। अब यहां खड़ी-खड़ी धक्के खाती रहूं। समझ में नहीं आता तुम्हें इसके अलावा कोई और जगह क्यों नहीं मिलती। ऐसा क्या है यहां जो तुम्हें यह अच्छा लगता है।’

‘तुम नहीं समझोगी यह ब्रिज मेरे लिए क्या है?’

‘पूछ तो रही हूं इतने दिनों से, जब बताते नहीं तो क्या जानूंगी। मैं तो सारी बातें बता देती हूं। तुम्हीं पता नहीं क्यों मुझसे ना जाने कितनी बातें छुपाते रहते हो।’

‘कुछ भी छुपाता नहीं हूं। बस वह बातें मैं तुमसे नहीं करना चाहता या हर उस व्यक्ति से नहीं करना चाहता जिससे उस व्यक्ति का कोई मतलब नहीं है। और उन बातों को सुनकर उसका मूड खराब हो जाए।’

‘ओफ़्फो तुम्हारी बातें कभी-कभी इतनी उलझी हुई होती हैं कि समझना मुश्किल हो जाता है। यहां हर बृहस्पति को तुम क्यों बहुत देर तक रहते हो यह ना बताने के लिए इतनी सारी बातें कर रहे हो। सीधी साफ बातें करना कब सीखोगे।’ इसी बीच रुहाना को दो-तीन छीकें आ गर्इं। ठंडी हवा ने अपना असर उस पर दिखाना शुरू कर दिया था। उसने अपना स्टोल सिर, चेहरे पर कस कर लपेट लिया था। फिर भी उसे ठंड महसूस हो रही थी।

उसकी छीकों ने श्वेतांश को कुछ देर बोलने से रोक दिया। उसने एक नजर बाहर डालकर कहा, ‘कहो तो टैक्सी बुला दूं, तुम जल्दी घर चली जाओ। नहीं तो यह मौसम तुम्हें ज़्यादा नुकसान पहुंचाएगा।’

‘टैक्सी के लिए फालतू पैसे नहीं हैं मेरे पास। इतना नहीं कमाती की टैक्सी में चलूं।’

‘मैं मजबूरी की बात कर रहा हूं। ओला या ऊबर में दो-ढाई सौ रुपए में पहुंच जाओगी। तुम्हारी तबीयत बिगड़ी तो छः-सात सौ तो डॉक्टर की फीस ही हो जाएगी। दवाएं अलग से, हज़ारों रुपए का खर्चा है।’ ‘चलो जो होगा देखा जाएगा।’

‘देखना क्या, मुझे लग रहा है कि यह पानी जल्दी बंद होने वाला नहीं। आज तुम्हें टैक्सी की सवारी करनी ही पड़ेगी, नहीं तो रात भर इसी ब्रिज पर रहोगी। देख रही हो यह गुगल बता रहा है कि यहां आज रात का मिनिमम टेम्परेचर नौ सेंटीग्रेड हो जाएगा। इतनी ठंड के हिसाब से ना मैंने कपड़े पहने हैं ना तुमने।’

‘अच्छा, मैं टैक्सी में चली जाऊं और तुम, तुम क्या करोगे?’

‘करूंगा कुछ, बाइक छोड़ कर तो जा नहीं सकता। और ना ही भीगते हुए। ठंड जो लगेगी वह तो लगेगी, इतनी तेज़ हवा में बाइक चलाना और मुश्किल है। रास्ते भर पेड़ों की टहनियां, पेड़ टूटे पड़े होंगे। यहीं देखो न, डिवाइडर पर लगे पेड़ों की कितनी डालियां टूटी पड़ी हुई हैं।’

‘हां, देख रही हूं। रुहाना ने बाहर की तरफ देखते हुए कहा। बड़ा चौराहा और पास ही वेब सिनेमा हाल होने के कारण वहां स्ट्रीट लाइट कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी। गनीमत यह थी कि तेज़ हवा में भी लाइट वहां आ रही थी। अमूमन ऐसे में चली ही जाती है। फुटओवर ब्रिज पर दोनों ओर बाउंड्री से ऊपर तक विज्ञापन की होर्डिंग लगी होने के कारण पूरी तरह बंद थी, जिससे ब्रिज पर हवा कम लग रही थी।

खड़े-खड़े बात करते हुए रुहाना थक गई तो उसने श्वेतांश से कहा, ‘यहां बैठने के लिए भी कुछ नहीं है।’

‘इतनी जल्दी थक गई।’

श्वेतांश ने उसे छेड़ा तो वह बनावटी गुस्सा दिखाती हुई बोली, ‘अच्छा, तुम्हारे आने के एक घंटा पहले से इंतजार करती यहां खड़ी थी। मेरे लिए यहां सोफे नहीं पड़े थे कि मैं आराम से बैठी थी, समझे। टाइम से आ जाते तो अब तक घर में होते। यहां ठंड से आंछी, आंछी ना कर रहे होते।’

रुहाना की आंछी करने के ढंग से श्वेतांश को हंसी आ गई।

उसकी हंसी देखकर आखिर में रुहाना भी हंस पड़ी। फिर बोली, ‘अब मुझसे खड़ा नहीं रहा जा रहा है। कुछ बैठने का जुगाड़ करोगे, कब तक खड़े रहेंगे।‘

‘सही कह रही हो, पानी जल्दी बंद होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। आज मैं भी ज़्यादा थका हुआ हूं। एक ही रास्ता है कि जमीन पर ही कुछ बिछा कर बैठा जाए। मगर क्या बिछाया जाए, कोई पेपर वगैरह भी तो नहीं है। अपनी-अपनी रुमाल ही बलिदान करनी पड़ेगी या फिर ऐसे ही जमीन पर बैठना होगा।’

‘चलो करो रुमाल बलिदान। तुम्हारे इस ब्रिज प्रेम में रुमाल बलिदान होगी वो भी इस तूफानी ठंडी रात में। कभी नहीं भूलेगी यह रात और ना ही यह ब्रिज और तुम्हारा ब्रिज प्रेम।’

रुहाना ने बैग से रुमाल निकाली तो श्वेतांश ने उसके हाथ से खींचकर ले लिया फिर उसके हाथ में वापस थमाते हुए कहा, ‘इसे रखो, मेरे पास दो हैं।’

‘दो रुमाल क्या करते हो?’ ‘एक हेलमेट लगाते समय सिर पर रखता हूं और दूसरा हाथ चेहरे वगैरह के लिए।’

इतना कहते हुए श्वेतांश ने दोनों रुमाल निकालकर ब्रिज की दीवार से लगाकर बिछा दिया और एक पर बैठते हुए कहा, ‘देखा तुम्हारे लिए मैंने रुमाल तक बलिदान कर दिया और तुम हो कि मेरे लिए एक घंटा इंतजार करने में ही परेशान हो गई। ब्रिज को कोस रही हो।’

श्वेतांश के व्यंग्य से रुहाना को हंसी आ गई। बोली, ‘लोग तो अपने पार्टनर के लिए खुद को भी बलिदान कर देते हैं। तुम सिर के पसीने, हाथ को पोंछने से बैक्टीरिया भरे रुमाल को भी नहीं निकाल पा रहे हो और जब देखो तब दस बार डींगे हांकोगे कि तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं। घर-बाहर सब कुछ छोड़ सकता हूं।’ कहते हुए वह भी उसके बगल में बैठ गई।

उसने देखा बारिश के ना रुकने के कारण कई लोग भीगते या फिर जैसे-तैसे निकल गए थे। मगर फिर भी दो ढाई दर्जन लोग अब भी थे। और उससे कुछ ही दूरी पर कई महिलाएं, उनके छोटे-बड़े बच्चे भी ज़मीन पर बैठे हुए थे। उनमें तीन-चार महिलाएं ऐसी थीं जिनकी गोद में बच्चे भी थे। छोटे दुधमुंहे बच्चे। जो ठंड, भूख से रो रहे थे। दो-तीन साल और आठ साल के भी बच्चे थे। दिनभर में इन सबने मांगकर जो पैसा पाया था उसी से खाने का कुछ सामान लिया था। जमीन पर ही पॉलिथीन, पेपर वगैरह बिछा कर खा रहे थे। बच्चों में खाने को लेकर हल्की-फुल्की छीना-झपटी, रोना-पीटना फिर उनकी मांओं का डपटना-चिल्लाना भी चल रहा था।

सब अपने में व्यस्त थे। आस-पास खड़े लोगों का उन पर कोई असर नहीं था। रुहाना की नजर एक ऐसी मां पर बड़ी देर तक टिकी रही जिसकी गोद में मुश्किल से सात-आठ महीने का एक बेहद कमजोर सा बच्चा था। जिसे उसने स्वेटर वगैरह तो फटे-पुराने पहनाए हुए थे, मगर नीचे कोई कपड़ा नहीं था। कमर से नीचे वह पूरा खुला हुआ था। उसकी मां भी रुहाना को बच्ची ही लग रही थी। उसकी उम्र मुश्किल से पंद्रह-सोलह रही होगी। वह खुद भी बीमार लग रही थी। आंखें अंदर धंसी हुई थीं। चेहरे पर थकान लाचारी के अलावा कुछ नहीं था।

सामने एक पेपर पर ही कुछ खाना था। जिसे वह खा रही थी। खाना क्या था उसे रुहाना वहां से नहीं देख पा रही थी। उसकी बगल में एक डेढ़ दो साल का बच्चा बैठा था, बिल्कुल सटा हुआ। बीच-बीच में उसे भी खिलाती जा रही थी। और जो बच्चा गोद में था वह मां का दूध पिए जा रहा था और वह अबोध मां निर्लिप्त भाव से उसे दूध पिला रही थी, कपड़ा हटा हुआ था। बच्चे का मुंह खुला हुआ था। बहुत से लोग आस-पास ही खड़े हैं, इसका जैसे उसे कुछ पता ही नहीं था।

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