मम्मी पढ़ रही हैं - 2 Pradeep Shrivastava द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

मम्मी पढ़ रही हैं - 2

मम्मी पढ़ रही हैं

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग-2

ड्रॉइंगरूम में उसे उम्मीदों के अनुरूप नमन पढ़ता मिला। पूछने पर उसने फिर कहा ‘मम्मी ऊपर टीचर जी से पढ़ रही हैं।’ यह सुनकर हिमानी ने मन ही मन कहा आज देखती हूं तेरी मम्मी कौन सी पढ़ाई कर रही हैं। उसने प्यार से नमन के गाल को छूते हुए कहा ‘ठीक है बेटा मैं उनसे ऊपर ही जाकर बात कर लूँगी। तुम अपनी पढ़ाई करो।’ हिमानी इतनी उतावली थी शिवा की पढ़ाई देखने को कि नमन कुछ बोले उसके पहले ही दबे पांव तेजी से चल दी ऊपर। मित्रता के चलते घर में पहले से आना-जाना था इसलिए घर का कोना-कोना वह जानती थी। उसे कमरे तक पहुंचने में देर नहीं लगी। जिस कमरे के दरवाजे बंद थे और अंदर लाइट जल रही थी। उसी के दरवाजे पर पहुंच कर उसने अंदर की आहट लेने की कोशिश की। लेकिन कोई आवाज उसे सुनाई न दी। अपने उतावलेपन के कारण वह अपने को चार-पांच सेकेंड से ज़्यादा न रोक सकी।

हल्के से शिवा का नाम लेते हुए उसने दरवाजे को अंदर को धकेला तो वह एकदम से खुल गया। जितनी तेजी से दरवाजा खुला उतनी ही तेज़ी से वह अंदर को दाखिल भी हो गयी। उसकी तेज़ी से कहीं ज़्यादा अंदर बेड पर टीचर और शिवा हरकत में आए। फटी-फटी आंखों से गहरी-गहरी सांसे लेते हुए वह उन दोनों को अस्त-व्यस्त हालत में देखती रही और शिवा घुटी सी आवाज में क्रोधित होती हुई बोली ‘तुम बिना बताए घर में कैसे घुस आई।’ हिमानी कुछ बोले उसके पहले ही टीचर उसकी बगल से बिजली की फूर्ती से निकल गया नीचे की ओर। हड़बड़ाहट में वह हिमानी का कंधा छीलते हुए निकला था।

हतप्रभ हिमानी शिवा की नफरत, क्रोध से काफी हद तक भयभीत हो गई बोली ‘ नहीं-नहीं मैं, मैं जा रही हूँ।’ कहकर वह पलटी और दो कदम ही आगे बढ़ी होगी कि शिवा ने कहा ‘रुको मेरी बात सुनो।’ हिमानी रुक गई तो शिवा ने उसका हाथ पकड़ कर पहले उसे बेड पर ही बैठाया। फिर उसका हाथ पकड़े-पकड़े ही सामने ही एक मोढ़ा खींच कर बैठ गई। उसकी आँखें आँसुओं से भर गई थीं। कुछ देर तक दोनों शांत रहीं। फिर शिवा के नीचे झुके चेहरे को अपने दोनों हाथों से ऊपर करते हुए हिमानी ने कहा , ‘परेशान होने की ज़रूरत नहीं। मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी। मगर तुम्हें गेट वगैरह बंद रखना चाहिए था।

यहां दरवाजा भी खुला रखा था। कहीं तुम्हारा बेटा ही आ जाता तो? सोचो तुम दोनों को इस हालत में देख लेता तो तुम्हारी क्या हालत होती। बच्चा कल को अपने बाप को भी कह सकता है। तब क्या होगा? जीवन तबाह होते देर नहीं लगेगी। पति चाहे जैसे हों, वह अपनी पत्नी को पल भर को भी किसी दूसरे की बांहों में बर्दाश्त नहीं कर सकते। फिर तुम्हारे पति तो फौजी हैं। वो तो जानते ही तुम्हें गोली मार देंगे। इतनी बड़ी लापरवाही तुम कैसे कर बैठी? मेरा शरीर अब तक थरथरा रहा है। दिमाग में सांय-सांय सी हो रही है कि यह सब तुम क्या कर बैठी? सबसे बड़ी बात यह है कि वह तुम्हारे बच्चे का ट्यूटर है। अभी महीना भर भी नहीं हुआ उसको यहां आते। उसने कौन सा ऐसा जादू कर दिया कि तुम अपनी सुध-बुध खो बैठी।

‘पता नहीं... उसने जादू कर दिया या मैं ही फिसल गई। उस दिन तुमने मजाक में ही कहा था कि वह विवेक ओबरॉय सा है और कि देखो उसके चक्कर में न पड़ जाना। मगर तब यह सोचा भी न था कि कुछ ही दिन में इस हद तक पहुंच जाऊंगी। उस दिन रात को जब नमन सो गया था तो अकेले ही टी.वी. देख रही थी। इनका फ़ोन दिन में आया था कि आज नाइट ड्यूटी है। बॉर्डर पर जहां तैनाती है वहां आतंकवादियों का बहुत खतरा है।

बात करते हुए यह बोले ‘‘जान हथेली पर लेकर ड्यटी करनी पड़ती है। किसी भी वक्त कुछ भी हो सकता है।’’ मैने हमेशा की तरह फिर कहा कि चले आइए हमेशा के लिए। कुछ और बातें भी कहीं। इस पर वह कुछ नाराज हुए। फिर समझाते-समझाते खुद भी बेहद भावुक हो गए। बोले ‘‘समझा करो, कौन होगा जो अपने बच्चे-बीवी के पास नहीं रहना चाहेगा। उन्हें छोड़ कर जान हथेली पर लिए घूमना चाहेगा। लेकिन सब घर में ही बैठे रहेंगे तो कौन करेगा देश और देशवासियों की रक्षा।’’

फिर उन्होंने तमाम प्यार भरी बातें कीं। यह भी कहा कि अब की बहुत जल्दी आऊंगा। उनकी बातों से मैं बहुत भावुक हो गई थी और-और कुछ उत्तेजित भी। असल में वह जब भी बातें करते हैं... अब तुम्हें क्या बताऊं करीब चार सालों से हम लोग इस नौकरी की वजह से एक होकर भी अलग ही हैं। छुट्टी कुछ ही दिन की होती है। आते ही कब खत्म हो गई पता ही नहीं चलता।

उस दिन टी.वी. देख रही थी चैनल भी आदत के मुताबिक बदल रही थी। लेकिन दिमाग में इनसे की गईं बातें ही घूम रही थीं। सेक्स संबंधी बातें कुछ ज़्यादा ही घूम रही थीं। उस समय इनसे बात भी नहीं कर सकती थी। बड़ी देर बाद कहीं खुद पर नियंत्रण कर पाई और तब कहीं सोई।

दरअसल चार साल से रोज ऐसे ही अकेले रात-दिन बीतता है। रात का सन्नाटा,अकेलापन मुझे तोड़कर रख देता है। हालत यह है कि पूरे-घर की लाइट ऑन रखती हूं फिर भी डर लगता है। बाथरूम जाने को भी डरती हूं। जी चुराती हूं कि सुबह हो तो जाऊँ। बस यही ज़िन्दगी जिए जा रही हूं। यकीन करो इसके बावजूद मेरे दिलो-दिमाग में कभी भी किसी गैर मर्द के लिए कभी कोई भावना उठी ही नहीं। सामने हों या न हों हर वक्त इनके सिवा किसी को नहीं सोचती।

मगर उस दिन न जाने क्यों विवेक ओबरॉय की बात दिमाग से निकली ही नहीं। फिर जब वह पढ़ाने आने लगा तो मुझे लगा कि तुमने जितना कहा था यह तो उससे कहीं ज़्यादा विवेक ओबरॉय से मिलता-जुलता है। उसने कोई खास कोशिश नहीं की थी इसके बावजूद वह असली विवेक ओबरॉय का छोटा भाई लग रहा था। न चाहते हुए भी मेरी नजर बार-बार उस पर चली जाती थी। फिर अंदर-अंदर बातें करने का मन करने लगा। दो दिन में ही उससे खूब बातें करने भी लगी। वह भी खूब बात करता।

उसके बिंदास अंदाज का मुझ पर बड़ी तेज़ी से असर पड़ रहा था। मुश्किल से पांच-छः दिन ही बीते होंगे कि उसने एक दिन नमन को करीब घंटे भर का काम देकर मुझसे बड़े धीरे से कहा, ‘‘नमन को पढ़ने देते हैं। हम लोगों की बातों से यह डिस्टर्ब होगा। हम लोग दूसरे कमरे में बात करें तो अच्छा रहेगा।’’ उसकी इस बात को हां करने के सिवा मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। क्योंकि मैं इम्प्रेस हो गई थी। मैं आश्चर्य में थी कि नमन डिस्टर्ब होता है यह बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई।’’

शिवा इसके आगे बोल न सकी क्योंकि तभी नमन नीचे से ऊपर आ गया। हिमानी को लगा नमन के अचानक आने से शिवा मानो सहम सी गई है। हिमानी ने कुछ बोलना चाहा लेकिन उसके पहले ही शिवा ने बेटे को यह कहते हुए नीचे भेज दिया कि ‘बेटा मैं तुम्हारी आंटी से कुछ ज़रूरी बातें कर रही हूं तुम नीचे फ्रिज में से अपनी फ्रूटी लेकर वहीं पिओ।’ नमन मानो यही सुनना चाहता था। फ्रूटी ड्रिंक उसकी फेवरेट ड्रिंक थी। उसके जाते ही हिमानी ने जैसे ही बोलना शुरू किया शिवा ने उसे टोकते हुए कहा

-नहीं हिमानी पहले मेरी बात सुन लो।

-ठीक है बताओ...

-नमन के डिस्टर्ब होने की बात मेरे मन में थी और मैं टीचर की बात से एकदम से सम्मोहित सी थी। उठकर दूसरे कमरे में आ गई। पीछे-पीछे वह भी आ गया। नीचे जिस कमरे में हम पहुंचे वहां केवल दो स्टूल और एक तखत पड़ा हुआ है। जिस पर कोई बिस्तर भी नहीं है। मैंने सोचा यह कुछ ऐसी बातें करना चाह रहा होगा जो नमन के सामने नहीं कर सकता। इसी लिए अलग हटने की बात कही। मगर अंदर आए तो बात कल्पना से परे निकली।

-कल्पना से परे निकली?

-हां... पहले उसने मुझे काफी हद तक चौंकाया अंदर आते ही दरवाजे को भेड़ कर, फिर पूरा पर्दा खींच कर। मैं कुछ समझती इसके पहले ही आकर एकदम बेधड़क होकर मुझे बाहों में भर लिया। मैं एकदम से चिंहुँक पड़ी। घुटी-घुटी आवाज में कहा - ये क्या कर रहे हो? इसके आगे मैं कुछ न बोल पायी उसने कसकर मेरे होंठों को अपने मुंह में दबा लिया। मुझे इतना कस कर भींच कर पकड़ रखा था कि कसमसा भी नहीं पा रही थी। उसमें बड़ी ताकत है। इस बीच वह एकदम पगलाया हुआ अजीब-अजीब हरकतें करने लगा। वह हांफ अलग रहा था।

हांफ मैं भी रही थी और शरीर में बढ़ता तनाव मुझे बेबस किए जा रहा था। मैं जैसे झूल सी गई थी उसकी बांहों में। तभी वह मुझे लिए-लिए तखत पर लेट गया। खट् से हुई आवाज़ से मैं थोड़ा हकबकाई। मगर अपने को अलग नहीं कर पाई। उसकी बिजली की सी तेज़ी से हो रही हरकतों के कारण मेरे सारे कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए। साड़ी उसने कमर से ऊपर उलट दी। इसी उठा-पटक के बीच फिर तखत पर खट् से कुछ तेज़ आवाज, हुई तो मैं सकते में आ गई।

एकदम डर गई कि नमन आ गया तो मैं बेमौत मारी जाऊंगी। यह बात मन में आते ही मैंने किसी तरह उसके मुंह पर हाथ रख पीछे धकेला और फुर्ती से उठकर खड़ी हो गई। गुस्सा होते हुए कहा होश में आओ नहीं मैं चिल्ला पड़ूँगी। खड़ी होने पर मेरी अस्त-व्यस्त साड़ी नीचे आ गई और मेरा बदन ढक गया। फिर ब्लाउज वगैरह सब ठीक कर बाहर को चलने को हुई तो उसने फिर पकड़ने की कोशिश की। हाथ तक जोड़ लिया कि मैं रुक जाऊं लेकिन मैं बाहर चली आई नमन के पास। पीछे-पीछे कुछ ही देर में वह भी आ गया। मैंने मार्क किया कि नमन कुछ अजीब सी नज़रों से हमें देख रहा है। मैं इससे अंदर ही अंदर सहम गई। मैंने उसके ध्यान को बंटाने के लिए कहा

बेटा टीचर सोच रहे हैं कि तुम्हें कल से उस कमरे में पढ़ाएं। इसीलिए उन्हें कमरा दिखाने ले गई थी। फिर टीचर की ओर देखकर कहा कल से नमन को उस कमरे में पढ़ाइए। वह कभी मुझे देखता कभी नमन की ओर, इसके बाद कुछ समय पहले ही चला गया।

-तुम चाहती तो उसे अगले दिन से पढ़ाने आने के लिए मना कर सकती थी।

-हां... मगर बात ये थी कि मैं उसके... उसके... मतलब उसके जादू में फंसी हुई थी। उसके जाने के बाद भी मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं उसी की बांहों में कैद हूं और वो बार-बार मुझे प्यार किए जा रहा है। इस बीच नमन जो कुछ कहता मैं बस हां हूं में उसका जवाब देती किसी मशीन की तरह। मैं इतना बेचैन हो गई कि अंततः बाज़ार चली गई और तमाम ऐसे सामान भी खरीद लाई जिनकी वास्तव में उस समय ज़रूरत ही नहीं थी। यहां तक कि नमन ने जो भी कहा वह सब भी खरीद डाला।

चार सौ रुपये के उसने खिलौने ही खरीदवा लिए। जिस चीज के लिए गई थी बाहर कि उसकी तरफ से अपना ध्यान हटा सकूं वह नहीं हो पाया, हुआ उसका उल्टा। उसी के ख़याल में और गहरे उतरती चली जा रही थी। इधर-उधर घूमते-घामते आठ बजे घर आई मगर उसको एक पल को भुला नहीं पाई। घर आई तो नमन के चलते खाना बनाया। नमन को तहरी पसंद है तो उसका फायदा उठाते हुए तहरी डाल दी। फिर उसे खिला पिला कर सुला दिया

-और खुद खाया था।

-नहीं। मन ही नहीं हो रहा था। फिर अचानक ही दस बजे उसका फ़ोन आ गया। उसका नंबर देखते ही मुझे न जाने क्या हो गया कि एकदम से रिसीव कर लिया जैसे कि न जाने कितने दिनों से उसकी प्रतीक्षा में थी। हैलो बोलते ही उसने कहा हाय सेक्सी-सेक्सी डॉर्लिंग क्या कर रही हो? मैंने कहा ये क्या बदतमीजी है? इस पर बड़ी ढिठाई के साथ उसने कहा डॉर्लिंग क्यों बेकार में ड्रामा कर रही हो। तुम मेरी ज़रूरत हो मैं तुम्हारी ज़रूरत हूं। यही सच है। इतनी छोटी सी बात मानने में तुम्हें इतनी देर क्यों लग रही है। इस पर मैंने थोड़ा झिड़कते हुए कहा ,देखो ये सब फालतू की बातें मत करो, मेरा पति है, बच्चा है। मुझे किसी की जरूरत नहीं है। समझे।

इस पर वह फिर बोला, यही तो मैं तुम्हें समझाना चाह रहा हूं कि तुम्हें वास्तव में किसी और पति और बच्चे की ज़रूरत ही नहीं है। वो तो तुम्हारे साथ हैं ही। तुम्हें तो सिर्फ़ एक ऐसे मर्द साथी की ज़रूरत है जो पति के बाद भी तुममें बची रह गई प्यार की ज़रूरत को पूरी ईमानदारी से पूरा कर सके, वो मैं कर सकता हूं इसका मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूं।

उसकी इस बात से मुझे ऐसा अहसास हुआ मानो शरीर में अचानक ही कहीं कुछ चुभ गया है। मगर तुरंत अपने को संभालते हुए बोली ,देखो मेरा पति जी भर कर मुझे प्यार देता और लेता है मुझे किसी और की ज़रूरत नहीं। मेरे पति की जगह कोई और ले ही नहीं सकता! समझे। मेरी इस बात पर वह थोड़ा झुंझलाते हुए बोला, ओफ्फो तुम कैसी औरत हो। यार तुम औरतों की सबसे बड़ी प्रॉब्लम यही है कि मन की बात कहने से डरती हो।

मैं बार-बार कह रहा हूं कि तुम्हारे पति की जगह कोई ले ही नहीं सकता। मैं तुम्हारा एक सच्चा दोस्त बनना चाहता हूँ । जो अभी तक तुम्हारे पास कोई है ही नहीं। जिस तरह तुम्हारे पति की जगह कोई नहीं ले सकता ठीक उसी तरह तुम्हारे दोस्त की जगह कोई नहीं ले सकता। इतनी मामूली सी बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आ रही है। ज़िंदगी का जो सुख दोस्त दे सकता है वो पति नहीं और जो पति दे सकता है वो दोस्त नहीं और मैं यही सुख तुम्हें देना चाहता हूं। क्योंकि तुम्हें इसकी सख्त ज़रूरत है और मुझे तुम्हारी सख्त ज़रूरत है। हम दोनों एक दूसरे की ज़रूरत पूरी करें यही आज की ज़रूरत है। उसकी यह बात मुझे गड्मड् करने लगी। फिर भी थोड़ी सख्त बनने की कोशिश करते हुए कहा ,देखो तुम्हारी ये बातें मेरी समझ में नही आ रही हैं। मेरे पति का फ़ोन आने वाला है अब फ़ोन रखो। इस पर उसने यह शर्त रख दी कि पति से बात करने के बाद उसे फ़ोन करूंगी।

मेरे लाख मना करने पर भी नहीं माना। तो मैंने फ़ोन काट दिया। इस पर उसने बार-बार फ़ोन करना शुरू कर दिया। अंततः मुझे कहना पड़ा कि जब इनसे बात हो जाएगी तब करेंगे। हालांकि इनका फ़ोन आने की कोई संभावना नहीं थी, लेकिन संयोग से इसके फ़ोन रखते ही इनका फ़ोन आ गया। कुछ देर ही बात हो पाई। इसके बाद मेरे दिमाग में इस बात को लेकर उथल-पुथल मच गई कि फ़ोन करूं कि न करूं। इस उधेड़बुन में ग्यारह बज गए। मुझे नहीं नींद आ रही थी और न ही यह तय कर पा रही थी कि फ़ोन करूं कि न करूं। अब तक उसका भी फ़ोन नहीं आया तो मैंने समझा कि वो सो गया होगा। मगर मैं गलत थी थोड़ी ही देर बाद उसका फ़ोन आ गया।

***