स्टेशन की मुलाकात Hansraj Puvar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्टेशन की मुलाकात

बहुत अर्से पहले की बात हैं जब मैं छोटा था, समय की इस छलांग लगाकर वह जगह आज वापस जाने का मन कयों होगया वो पता नहीं, पर बहुत अजीब था वो समय | जब हमें सिर्फ हमारी दुनिया ही सब से अच्छी लगती थी, मतलब हम जिन्हे पहचानते थे, उतनी ही हमारी दुनिया होती थी | एक दम रियल, जिसे हम बुलाये तो वो सुन सकते थे जवाब दे सकते थे | लेकिन अब वो बात कहाँ, अब तो हमारे दोस्त रियल में कम और सोशियल साइट्स पे ज़्यादा हैं | पापा का डाटना और मम्मी का सहलाना जैसे अब वो धुंधली पेड़ो की छाऊँ जैसा होगया हैं जो अब हमें शहरों में मिलती ही नहीं हैं | अब सबकुछ ऑनलाइन होने लगा हैं | जो प्यार हम कभी इंसानो से करते थे, अब वो मशीनों से करने लगे हैं | अभी-अभी मैंने थोड़े दिन पहले ही इंस्टाग्राम पे एक पोस्ट पढ़ी थी जिसमें एक लड़की ने लिखा था की “I am in relationship with my phone" | अब बताओ सब जगह प्यार का बटवारा हो चूका हैं | मैं भी इस नयी दुनिया में कहीं न कहीं फसा हुआ तो हूँ ही पर सिर्फ मेरे काम के लिए | पता नहीं आगे का समय तो क्या लाएगा पर पहले ऐसा नहीं था |

मैं करीबन कुछ १२ साल का था | रविवार का दिन था तो स्कूल की छुट्टी थी | मुंबई में मेरी एक बुवा रहती थी | वो वह पे टीचर थी | पापा के साथ कुछ दिनों पहले उनकी बात हुई होगी तो बताया था की वो आनेवाले हैं | तो वो कुछ शनिवार रात को ही ट्रैन में बैठ गए थे | पापा उनको लेने सुभे जल्दी उठके तैयार हो गए और स्टेशन जाने निकले, रविवार का दिन था तो मैंने भी पापा के साथ मैं चलने की ज़िद की और पापा ने भी मुझे लेके बाइक पे बिठा दिया, ठंडी का समय था तो मम्मी ने मुझे जैसे मैं कही जंग में जा रहा हूँ, वैसे बख्तर जैसे बड़े बड़े दो स्वेटर पहना दिए | मुझे स्वेटर बिलकुल अच्छे नहीं लगते थे | वो पहनके मुझे ऐसा लगता था की स्वेटर के अंदर मेरे कपडे ढक जायेंगे और मैं अच्छा नहीं दिखूंगा, पर क्या करे तब कितना भी रोलो पर पहनना तो पड़ता ही था | मैं और पापा स्टेशन के लिए निकले | जाते-जाते मम्मी ने पापा को कम से कम चार बार तो कहाँ ही होगा की "ये लड़का आगे बैठा हैं तो बाइक धीरे चलाना" | इतनी फिक्र तो सिर्फ माँ ही कर सकती हैं लेकिन तब मैं माँ से थोड़ा गुस्से था क्योंकि उन्होंने मुझे वो भद्दी बड़ी स्वेटर जो पहना दी थी | लेकिन तब का गुस्सा सिर्फ पांच मिनट का होता था, पर तब ये अहमियत नहीं थी की वो सबकुछ माँ सिर्फ मुझे एक छोटी सी छींक ना आजाये इसके लिए करती थी, हम घर से निकल गए लेकिन पापा ने थोड़ा आगे जाके एक पार्लर के पास बाइक रोक दी और चॉकलेट दिला दी इसलिए नहीं की रास्ते में मैं चीज़े देखके उनसे खरीदने की ज़िद करूँगा पर इसलिए की पापा को पता था की मैं खुश नहीं था स्वेटर को लेके | पापा ने चॉकलेट दिलाई और मैं वापस से अपनी दुनिया में वही हंसी लेके गुल सा गया | मम्मी को आज भी पता नहीं हैं की पापा उस समय ठंडी में भी छुप-छुपाके मुझे आइसक्रीम और चॉकलेट खिलाते थे | इसी वजह से पापा मेरे फेवरेट थे, तब कहाँ पता चलता था की कौन कितना प्यार करता हैं | तब तो जो चॉकलेट खिलाये और घूमने लेजाए वही फेवरेट की लिस्ट में आता हैं | पापा ने मुझे चॉकलेट दिलाई और ऐसा भी बोला की " मम्मी को मत बताना वरना वो हम दोनों को पीटदेगी " मैंने गला पकड़के कसम खाई और पापा हसने लगे और हम दोनों स्टेशन पहुंचे |

जबसे मुझे समझ आयी उसके बाद स्टेशन जाना मेरा सायद तीसरी या चौथी बार था | उससे पहले हम मुंबई और मनाली घूमने गए थे | तब सायद हमारी ट्रैन लेट थी और हमने बहुत मस्ती की थी | पर इसबार मुझे स्टेशन कुछ अलग लग रहा था या तो मैं बड़ा हो गया था इसके लिए या फिर आज हम साथमें बैग लेके घूमने नहीं निकले थे इसके लिए | पर कुछ तो अलग था | माहौल के जैसे कुछ अलग ही रंग थे | बुवा की ट्रैन कुछ १०:३० बझे पहुंचने वाली थी और हम उधर १० बझे पहुंच गए थे | तो पापा ने प्लेटफार्म टिकट ली और हम अंदर गए | अंदर जाते जाते पापा ने मुझे बोला की बुवा से कोई चीज़ मांगना नहीं वो लेके आये होंगे तो तुमें ज़रूर देंगे | लेकिन मुझे पता था की बुवा मेरे लिए कुछ तो लाएंगे ही, क्योंकि वो करीबन १ साल बाद हमसे मिलने आ रहे थे | लेकिन पापा की बात में मैंने धीरे से सर हिलाके हाँ का इशारा किया | हमारा चार नंबर का प्लेटफार्म था | रविवार का दिन था तो भीड़ बहुत थी | ये देखके तब मुझे लगता था की इतने सारे लोग कहाँ जातें होंगे | जैसे हम ही काम से आये थे बाकि तो पूरा शहर ही बेकार ही यहाँ वहां जाने निकल चूका हैं | पापा और मैं वह एक बेंच थी उसपे जाके बैठ गए | हमारी बेंच पे ओर चार लोग बैठे थे और बेंच सिर्फ तीन लोगो की ही थी और उतने में ही एक बूढ़े दादाजी हमारे पास आ खड़े हुए, करीबन पैसठ साल की उनकी उम्र होगी और कंधे पे एक कपडे की बेग थी, आँखों पे गोल काले रंग के चश्मे और हाथ में एक लकड़ी जिसके सहारे वो खड़े हुए थे, पापा को लगा की उनको बैठना हैं तो पापा ने मुझे अपनी गोदी में ले लिया और उनको कहाँ की "अंकल आप यहाँ बैठ जाइये" | दादाजी ने पापा के हाथ का सहारा लिया और वो बैठ गए | उन्होंने पापा को बोला की "भगवन तुम्हारी सदा मदद करे" और मेरे सर पे हाथ रखके आशीर्वाद दिया | वो मेरे सामने देखके थोड़ा मुस्कुराएं, मैं भी उनको देखके थोड़ा मुस्कुराया | दादाजी ने फॉर्मल कड़क इस्त्री वाले कपडे पहने हुए थे | देख के लग रहा था की वो कोई दूर की जगह जाने वाले हैं | अब हम तीन की बेंच पे छे लोग बैठे हुए थे | हमारी डाईनि साइड पे तीन आदमी बैठे थे | जो एकदम एग्जीक्यूटिव कपडे में थे | वो तीनो एक ही कंपनी में काम कर रहे हैं वैसा लग रहा था | उनको देखके मैं तब ये सोच रहा था की आज रविवार के दिन भी इनके सर ने उन्हें छुट्टी नहीं दी और ऊपर से हस्ते-हस्ते बात भी कर रहे हैं | तो मुझे सवाल हुआ की छुट्टी नहीं मिली तो भी ये खुश क्यों हैं? मैं होता तो घर पे आराम से सोता | मुझे तो छुट्टी जैसे स्वर्ग की जैसी लगती थी, क्योंकि वो एक ही दिन था जब मुझे हमारे इंग्लिश के फांदू टीचर को मिलना नहीं होता था | उनकी फांद इतनी बड़ी थी की फांद के ऊपर वाले शर्ट के बटन भी बंध नहीं होते थे | इसलिए सब ने उनका नाम फांदू सर रखा था और वो हमेंशा गुस्से में ही होते थे, तो उनको देखके आधा क्लास तो जैसे कोई मरगया हो वैसा ही मुँह कर लेता था | पर ये तीनो को देखके ऐसा लग रहा था की छुट्टी के दिन भी काम करके ये खुश हैं | हमारी सामने की साइड ट्रेने आ रही थी, पर हमारी साइड तो कुछ दिख ही नहीं रहा था | इसलिए मैंने पापा से पूछा की "अभी कितनी देर हैं हमारी ट्रैन आने मैं?" पापा ने बोला की "बस बेटा कुछ १५-२० मिनट ओर" ये सुनके पास वाले दादाजी ने मुझसे कहा की "क्यों बहुत जल्दी हैं जाने में", तो मैंने पापा की तरफ देखा और पापा ने हस्ते हुए कहा की "नहीं अंकल हम कही नहीं जा रहे हैं, मैं मेरी दीदी को लेने आया हूँ " | दादाजी ने कहा की "अच्छा वो मुंबई की जो ट्रैन आने वाली हैं उसमे आ रहे हैं ?" पापा ने कहा "हाँ अंकल" | दादाजी ने ये सुनके अपना बैग खोला और अंदर से एक बिस्किट का पैकेट निकाल के मुझे देने लगे | मैंने उसको लिया नहीं और पापा के सामने देखा | ये देखके दादाजी ने कहा " अपने पापा के सामने क्या देख रहा हैं ?, वो कुछ नहीं बोलेंगे तुमें" पापा ने धीरे से हलकी सी हसी के साथ सर हिलाके मुझे ले लेने को कहा | वो मेरे फेवरेट बॉर्नबॉर्न बिस्किट थे तो मैंने वो हाथ में ले लिए | दादाजी ने हलकी सी हसी दी और कहा " शाबाश " | पापा ने मुझे रेपर तोड़के दिया | मैं बिस्किट खाते खाते यही सोंच रहा था की अगर सायद मेरे दादा होते तो वो कुछ ऐसे ही दीखते और ऐसे ही होते | मैंने दादाजी को देख के थोड़ी सी हसी बिखेरी और दादाजी ने मेरे गाल पकड़के धीरे से प्यार से खींचा | दादाजी का वो स्पर्श कुछ अलग था, लगा जैसे कोई अपना हैं | मुझे उनकी खुरखुरी उंगलिया जैसे इतनी अच्छी लगी की उसके बाद उन्होंने अपना हाथ आगे किया और मैंने उनको हाईफाइव भी की | दादाजी मेरे इस वर्ताव के कारण बहुत खुश हुए | उतने में ही पापा ने दादाजी को पूछा की "अंकल आप कहाँ जा रहे हो?" | दादाजी ने बताया की "बस मुंबई वाली ट्रैन में बैठके आगे जाना हैं" | पापा ये सुनके थोड़ा हसे और बोले की " अंकल मुंबई की ट्रैन का आखरी स्टैंड ही यही हैं आगे नहीं जाएगी वो" | मैं बस देख रहा था और मैं भी थोड़ा मुस्कुराया | दादाजी भी हसने लगे और पापा को बताया की " बेटा नहीं, वो जाएगी, मैं पचास साल से ट्रेनों में घूमता हूँ " | पापा तुरंत ही बोले " अंकल आपकी बात बिलकुल सही हैं पर ये ट्रैन नहीं जानेवाली हैं " | अब मैंभी थोड़ा कंफ्यूज हुआ, पर मैंने सोचा की कहीं पापा गलत होंगे क्योंकि पापा का जन्म हुआ उसके पहले से दादाजी ये ट्रैन की मुसाफरी कर रहे हैं | दादाजी ने फिर से हस्ते हुए कहाँ की " बेटा आप देखना मैं जाऊंगा " | पापा मेरे सामने ऐसे देखने लगे जैसे उनकी आँखे कह रही थी की कैसे इस अंकल को समझाऊ |

पापा की एक आदत थी शर्त लगाना वो घर पे भी मम्मी के साथ हर छोटी सी बात पे शर्त लगाते रहते जैसे "सीरियल का एन्ड क्या होगा,सरगामा से कौन जायेगा,मैच में कौन जीतेगा" ऐसी हर एक चीज़ो में वो शर्त रखते और मम्मी एक दो बार को छोड़के सभी बारी हारती ही थी | पापा ऐसा करके मम्मी को बहुत चिढ़ाते थे | मैं भी हरबार पापा की ही टीम में रहता पर जब कभी पापा हार जाते तो मैं रोने लगता था, पर मेरे रोने पे मम्मी मुझे कस के पकड़के अपने सिने से लगा लेती और फिर दोनों मुझे हँसाने में लग जाते | तब ऐसा लगता था की जैसे मेरी हसीं में ही इनका पूरा जीवन छुपा हुआ हैं | बस फिर क्या पापा ने यहाँ भी शुरू करदिया | पापा ने दादाजी को बोला की " अंकल शर्त लगाते हैं की ये ट्रैन आपको लेके नहीं जाएगी" ये सुनके दादाजी झोर से हसने लगे और दादाजी ने मुझे देखके बोला की "तू छोटा हैं की तेरा बाप" मैं भी ये सुनके हसने लगा | पापा ने कहा की " अंकल आप जीत जाओगे तो आप मांगे वो मैं दूंगा " | पापा बहुत ही कॉन्फिडेंस के साथ बोल रहे थे, पर मैं सोंच रहा था की पापा आज पक्का हारने वाले हैं और जब ये बात मम्मी को बताऊंगा तो वो पापा पर बहुत हसेगी | दादाजी ने हसी के साथ कहा " ठीक हैं बेटा तो शर्त लगाते हैं, मुझे कुछ नहीं चाहिए बस मुझे मिले बिना जाना नहीं, मैं तुम्हारा हारा हुआ चहेरा देखना चाहता हूँ " | पापा ने कहा " ठीक हैं अंकल लेकिन मुझे पता ही हैं की मैं ही जितने वाला हूँ " | दादाजी ने मुझे ताली दी और बोले " तेरे बाप का मुँह देखना आज कैसा होता हैं" मैं और दादाजी हसने लगे | कोई उस समय अगर हमें दूर से देख रहा होगा तो ऐसा ही लगा होगा की बाप, बेटा और दादाजी आज मस्ती कर रहे हैं और उनको पता ही नहीं चला होगा की ये मेरे असली दादाजी नहीं हैं | वो पल मैं बहुत खुश था लगा जैसे परिवार में बड़ो की अहमियत से कितना अच्छा लगता हैं | ये हसीं चल ही रही थी की इतने में हमारी साइड ट्रैन की साइरन की आवाज़ सुनाई दी और पापा बोले की "चलो ट्रैन आगयी बुवा की बेटा" और दादाजी से कहा की "दादाजी आपके शर्त हारने का समय आगया बस आप इधर ही बैठना " | पापा ने मुझे गोदी में से उतारकर खड़े होकर मेरी ऊँगली पकड़ी और हसके दादाजी को बोला की " मैं दीदी को लेके आता हूँ फिर आपका सामान उठाके मैं बैठा दूंगा " दादाजी ने कहा " ठीक हैं तुम मुझे ट्रैन के दूसरे डिब्बे के पास मिलना " | पापा ने मुझे दादाजी को बाय बोलने को कहा | दादाजी को मैं बाय बोला और दादाजी ने मुझे अपने पास खींचकर गाल पे एक पप्पी दी | मैंने नज़दीक से देखा तो दादाजी की आँखे थोड़ी नम सी थी | उन्होंने मुझे कहा की "अपने माँ-पिताजी का कहना मानकर उनका नाम रोशन करना " | तब मैंने हसके अपनी गर्दन हिलाके ठीक हैं का इशारा किया, पर जैसे तब लगा की मुझे भी उनसे दूर नहीं जाना हैं, तब लगा की में इधर पापा के साथ नहीं पर दादाजी के साथ आया हूँ | दो सेकंड में माहौल जैसे बदल ही गया | तब पापा बोले "ठीक हैं अंकल हम आते हैं" और पापा की ऊँगली पकड़ी और मैं उनके साथ चलने लगा | मैं मुड मुड के पीछे दादाजी की ओर देख रहा था | दादाजी मुझे हाथ के इशारे से बाय बाय बोल रहे थे | हम थोड़ा आगे निकले और ट्रैन के लिए भीड़ जमा होगयी और दादाजी दिखना बंध हो गए | पापा मुझे लेके आगे चलते रहें और जहाँ बी-वन लिखा हुआ बोर्ड था, वहां मुझे लेके खड़े रहे और मुझे बताया की बुवा का डिब्बा इधर आके ही खड़ा रहेगा | मैं और पापा खड़े हुए थे | लाल कपडे वाले कुली इधर से उधर होने लगे थे | ट्रैन नज़दीक आ रही थी | ट्रैन स्टेशन की लॉबी के अंदर प्रवेश कर चुकी थी | दिख रहा था की कई लोग चालू ट्रैन में से ही छलांग लगाके कूद रहे हैं, जैसे ट्रैन रुकने ही ना वाली हो | पर मुझे जैसे ट्रैन नज़दीक आ रही थी वैसे ये ख्याल भी आ रहा था की दादजी इस ट्रैन में बैठ के चले जायेंगे और मैं उनको फिर कभी नहीं मिल पाउँगा | पता नहीं लेकिन उस समय ऐसा लग रहा था की पापा इस शर्त को जित जाएँ तो अच्छा हैं क्योंकि मैं दादाजी के पास बैठना चाहता था, खेलना चाहता था | ट्रैन नज़दीक आ रही थी इतने में ही माइक में अनाउंसमेन्ट हुआ की मुंबई-अहमदाबाद एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर चार पे आरही हैं | ये सुनके तुरंत ही मैंने पापा से पूछा की "पापा ये माइक में क्या बोल रहे हैं ?" पापा ने कहा ये ट्रैन जो आ रही हैं उसका बता रहे हैं, मुंबई-अहमदाबाद एक्सप्रेस | तो ये सुनके मैंने पापा से पूंछा की "वो दादाजी इस ट्रैन में चले जायेंगे ?" | पापा ने हस्ते हुए कहा की " नहीं बेटा, अंकल को पता ही नहीं हैं ट्रैन के बारे में, ये ट्रैन का लास्ट स्टेण्ड ही हैं " | वो सुनके मैं बहुत खुश हो गया | मैंने राहत की सांस ली पर थोड़ा डर तो ज़रूर था की कहीं पापा गलत ना हो जाएँ | ट्रैन नज़दीक आगयी थी | धीरे धीरे उसका पहला डिब्बा हमारी पास से निकला, मेरी दिल की धड़कने भी बढ़ रहीं थी | बस मेरे दिमाग में सिर्फ यहीं चल रहा था की कहीं दादाजी निकल ना जाएँ मिले बिना ही, पापा जो कह रहे हो वो कहीं गलत न होजायें | दूसरा डिब्बा निकला | उतरने वाले लोग डिब्बे के दरवाजे पर सामान लिए खड़े हुए थे | पापा ने भीड़ की वजह से उंगलिया छोड़के मेरा हाथ पकड़ लियाँ | आखिर मैं हमारे पास छठा डिब्बा आ खड़ा हुआ | चारो तरफ भीड़ ऐसे हो गई हो जैसे कोई मेला हों | चारो तरफ से अलग-अलग आवाज़े इतनी सारी आने लगी की कोई एक आवाज़ सुनकर भी उनकी बात आपको समझ ना आये और मुझे तो सिर्फ पैर ही दिखाई दे रहे थे | कहीं कोई हस रहा था तो कही कोई अपने रिश्तेदारों को चिल्लाके बुला रहा था | तो कहीं कोई अपने सामान को लेके किसीके साथ बहेश कर रहा था | इस आवाज़ों के बिछ पापा कुछ बोल रहे थे और किसीको हाथ कर रहे थे, पर मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था | बस वो मेरा हाथ पकड़के इस तरफ - उस तरफ हो रहे थे | पापा ने सायद बुवा को देख लिया था जो उनके चहेरे की मुस्कान पर से साफ़ पता चल रहा था | पापा जहाँ देख रहे थे, में भी वह ही देखने की कोशिश कर रहा था, पर मुझे कुछ नहीं दिख रहा था | पापा मुझे डिब्बे के दूसरे दरवाजे के पास खींच के ले गएँ और सामने देखा तो मेरी बुवा उसमें से अपना सामान लेकर उतर रहीं थी | हमें देखके उनके चहेरे पे हसीं थी, पापा मुझे उनकी नज़दीक ले गए | मैं भी बुवा को देखके खुश हुआ, पर उतना नहीं जितना मैं आया तब था | मैं इधर उधर और पीछे देख रहा था की कहीं दादाजी दिख जाएँ और आके बोले की "मैं शर्त हार गया" | पापा और मैं बुवा के पास पहुंचे | पापा ने बुवा के पैर छुए और बोला "जय श्री कृष्णा दीदी" बुवा ने पापा के सर पर हाथ रखा और मुझे मेरा राजा बेटा कहके अपनी गोदी में उठा लिया और मुझे पप्पी करने लगे | पापा बुवा को कुछ कहने ही जा रहे थे, उतने में ही हमारे पीछे सीटिया बज़ने लगी | बुवा मुझे लेके उलटी मुड़ी तो पुलिस वाले दौड़ते दौड़ते हमारे पास से आगे निकले | वो जहाँ दौड़के जा रहे थे उसतरफ मेरी नज़र पहुंची तो आगे वाले डिब्बे की साइड भीड़ इकट्ठी हो रही थी, लोग भी वह दौड़े जा रहे थे | ये देखके बुवा ने पापा को बोला की "कुछ हुआ लगता हैं वह पे सुनील" पापा ने कहा " हाँ कोई फिसल के गिरा होगा, ये लोग भी ना चालू ट्रैन में से छलांग लगा देते है तो गिरेंगे ही ना" | पापा ने बुवा का सामान उठाया और बोले "चलो दीदी हमें उसतरफ से ही बहार निकलना हैं" | स्टेशन से बहार निकलने का रास्ता भी वहीँ से ही था इसलिए भीड़ वहाँ इकट्ठी होती ही जा रहीं थी | मैं बुवा के गोदी में था तो अब मुझे सब दिखाई दे रहा था | हम वहां पहुंचे पर भीड़ इतनी थी तो कौन गिरा हैं वो देखपाना मुश्किल था | तो बुवा ने पास में खड़े एक आंटी से पूछा की " क्या हुआ हैं कौन गिरा हैं" | वो आंटी बोले "पता नहीं पर कोई ट्रैन की पटरी के निचे आगया हैं" | ये सुनके मेरे होश उडगए, पापा ने बुवा से पूछा "क्या हुआ", बुवा थोड़ा दुखी होकर बोले की "कोई पटरी के निचे आगया हैं" पापा ने बुवा को और मुझे साइड में खड़ा रहेने को बोला और सामान हमारे पास रखके तुरंत भीड़ को चीरते हुए अंदर की ओर गए | उनको देखके मुझे लगा की पापा एकदम से अंदर क्यों दौड़े, पर मैं बुवा की गोदी में से पापा को देख सकता था, जहाँ पुलिस वाले खड़े थे वो उनके करीब पहुंच चुके थे | वो सब निचे की तरफ देख रहे थे | पापा ने जैसे ही निचे देखा वैसेही उन्होंने अपने सर पे हाथ रखा और पीछे मुड़े, मेरी नज़र से उनकी नज़र मिली | मैंने देखा की पापा के पीछे का डिब्बा दूसरे नंबर का डिब्बा था | मैं मन ही मन जो सोच रहा था वो मानने की हिम्मत सायद मुझमे नहीं थी इसलिए मैं पापा को देख ही रहा था | पापा का मुँह पूरा उतरा हुआ दिख रहा था | वो मेरे सामने देख रहे थे और वो भीड़ को साइड करते हुए हमारे पास आये | मुझे उठाके उन्होंने झोर से दबा दिया, पापा की आँखो में से जैसे आंसू टपकने का इन्तेजार कर रहे थे वो चाहते थे की वो मेरे सामने ना टपके | ये देखके बुवा ने तुरंत पापा से पूछा "क्या हुआ सुनील कौन हैं, क्या वो मरगया" पापा बोले "हाँ मरगये" | बुवा ने मुँह से थोड़ी चिस्कारि ली और पूछा " कौन था जेंट्स है या औरत" पापा ने मेरे सामने देखा और बुवा के सामने देखके बोले " एक बूढ़े अंकल हैं जो थोड़ी देर पहले ही हमारे साथ बैठे थे" ये सुनके मैं एकदम सुन हो गया | मेरा शरीर जैसे कांपने लगा और मैंने कांपती हुई आवाज़ में पापा से पूछा " क्या वो वही दादाजी हैं " पापा ने मेरे सामने देखा और मुझे झोर से अपनी बाँहों में दबाया और मेरे कानों के पास धीरे से बोले " हाँ बेटा वो वहीँ दादाजी थे, मैं शर्त हार गया " ...