हिम स्पर्श - - 62

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द्वार पर वफ़ाई खड़ी थी। वह जीत को ही देख रही थी। जीत चौंक गया।

कब से वफ़ाई यहाँ खड़ी होगी? क्या वह मेरे अंदर चल रहे द्वंद को देख रही होगी? जीत ने अपने आप को देखा। उसके दोनों हाथों की मुट्ठी अभी भी बंध थी। दाहिना हाथ हवा में उठा हुआ था। एक विचित्र मुद्रा थी वह।  

जीत ने अपने उठे हुए हाथ को नीचे किया, हाथ की मुट्ठियाँ खोल दी, सीधा खड़ा हो गया। वफ़ाई को देखने लगा।

उसकी आँखों में एक आभा थी, होठों पर स्मित था। भिन्न सी आभा, भिन्न सा स्मित! जीत को लगा कि इस आभा और स्मित में कुछ बात है, कुछ खास है यह। वह स्मित, वह आभा जीत को अंदर तक छु गया।

क्या है यह स्मित? कैसी है यह आभा? इसमें कुछ तो है। क्या वह जीवन का संकेत है? क्या यह स्मित मुझे मेरी मृत्यु से बचा सकती है? यदि यह स्मित मेरे साथ रहे तो में मृत्यु से लड़ सकता हूँ, उसे हरा सकता हूँ।

जीत ने अपनी पलकों को क्षण भर के लिए झुकाई, बंध कर दी, फिर खोल दी। सामने वफ़ाई वही जीवन से भरपूर स्मित को लेकर खड़ी थी। जीत को विश्वास हो गया कि वफ़ाई और वफ़ाई का स्मित कोई भ्रम नहीं पर सत्य है, स्थायी है, चिरंजीवी है।

जीत ने अधूरे मन से स्मित करने का प्रयास किया। जीत के स्मित में वह प्रसन्नता नहीं थी, जो वफ़ाई के स्मित में थी। यदि कुछ था तो बस पीड़ा थी।   

वफ़ाई अभी भी स्थिर सी खड़ी थी, वही स्मित को ओढ़े हुए, देख रही थी जीत के सारे मनोभावों को। जीत भी अब स्थिर हो गया।

कुछ क्षण व्यतीत हो गए। वफ़ाई और जीत दोनों अपनी अपनी स्थान पर स्थिर खड़े थे। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, दोनों मौन थे। समय की एक तरंग भी दोनों के साथ वहीं रुक गई।

“चलो, भोजन तैयार है।“ वफ़ाई ने रुके हुए समय को चलित किया। हवा भी चलने लगी, समय भी, जीत भी।

“भोजन से पहले मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।“ जीत ने साहस जुटाया।  

“मुझे भी बहुत बातें करनी है। पर, पहले भोजन। उसके पश्चात सब कुछ।“

“किन्तु मेरी बात अत्यंत आवश्यक है।“

“संस्कृत के पंडितों ने कहा है कि कितने भी काम हो सब छोड़ कर भोजन ले लेना चाहिए।“

वफ़ाई चली गई।

“कितना धैर्य, कितनी स्थिरता है तुम में वफ़ाई? और मैं, अत्यंत विचलित।”

थालियाँ परोसी गई। दोनों चुप चाप भोजन करने लगे। जीत को लगने लगा कि इस अन्न के एक एक दाने में जीवन भरा हुआ है। अन्न के रस में जीवन रस है। उस मौन में कुछ पदचाप है जो जीवन से भरे है।

आज मुझे प्रत्येक बात में, प्रत्येक वस्तु में जीवन के संकेत दिख रहे हैं। मुझे अब मृत्यु से भयभीत नहीं होना है। मुझे जीना है। मैं जीना चाहता हूँ।  

जीत के मन में जीवन की लालसा जाग उठी। एक जिजीविषा ने जन्म ले लिया।

भोजन सम्पन्न हो गया।  

“मैं झूले पर हूँ, तुम शीघ्र वहाँ आ जाओ।“ जीत चला गया।

वफ़ाई भी कुछ क्षण बाद झूले के पास आ गई। वफ़ाई जीत के समीप झूले पर बैठ गई। दोनों ने झूले को धकेला, झूला धीरे धीरे चलने लगा। कुछ क्षण मौन ही बीत गए।

“जीत, तुम्हें मुझसे कुछ कहना था।“ वफ़ाई ने झूले को रोक दिया।

जीत इसी क्षण की प्रतीक्षा में था, “तुम तैयार हो सुनने के लिए?”

“हाँ बाबा हाँ। अब जो कहना है वह सीधे सीधे बता दो।“ वफ़ाई जीत की तरफ मुड़ी। वह उत्साह से भरी थी।

आज जीत दिल की बात करेगा। प्रेम की बात करेगा।

वफ़ाई मन ही मन हंस पड़ी।  

“मैं जो कहने जा रहा हूँ उस बात की तुम्हें लंबी प्रतीक्षा थी।“

“शिघ्रता से कह दो। मैं अधीर हो रही हूँ।“ वफ़ाई की आँखें उत्सुक थी।

“ठीक है, ध्यान से सुनना।“ जीत ने आकाश की तरफ देखा, वहाँ घूमते बादलों को देखता रहा।

“तुम जानना चाहती थी कि मैं जीवन के इस पड़ाव पर इस मरुभूमि में क्यूँ आया। मेरे जीवन का रहस्य क्या है?” जीत रुका।

“हाँ, जानना चाहती थी, किन्तु...।“ वफ़ाई जीत की बात सुनकर निराश हुई। उसे जिस बात की अपेक्षा थी उस बात के बदले जीत दूसरी बात कह रहा था। वह मन ही मन सोचने लगी-

कल तक मैं अधीर थी यह जानने के लिए कि जीत का भूतकाल क्या है। ऐसी कौन सी बात है जिसने जीत को सब कुछछोडकर यहाँ मरुभूमि में आकर बस जाने को विवश किया? मैं जानने का प्रयास करती थी और वह हर बार उसे टाल देता था। कितना गुस्सा आता था तब जीत पर? और आज वही बात जीत सुनाना चाहता है और मुझे रुचि नहीं है। क्यूँ?

क्यूँ कि आज तुम कुछ और सुनना चाहती थी। तुम्हें यह सुनने कि लालसा थी कि जीत कहे की मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। और जीत तो कुछ और ही बात कह रहा है।

किन्तु जब जब मैं जो जो बात सुनना चाहती हूँ, वह बात तब तब क्यूँ नहीं होती?

हर बात का एक निश्चित समय होता है।

जो सदैव मेरी अपेक्षा से भिन्न होता है। ऐसा क्यूँ?

क्यूँ कि हमारी अपेक्षा का...।

नहीं सुननी मुझे तुमसे यह ज्ञान की बातें।

मत सुनो। पर जीत की बात तो सुननी ही पड़ेगी।

अब क्या अर्थ है उसके बीते हुए कल की बात सुनने का? मैंने तो उसे प्रेम किया है, बिना उसके भूतकाल को जाने हुए। मैंने तो उसके वर्तमान से प्रेम किया है और उसके भविष्य को मेरे भविष्य से जोड़ना चाहती हूँ। नुझे उसके बीते हुए कल से क्या संबंध? मुझे नहीं सुनना उस कल को, जो बीत चुका है।

किन्तु जीत के मन में वह समय अभी भी जीवित है। और जब तक उसके मन और ह्रदय से यह समय बीत नहीं जाता, वह वर्तमान में नहीं जी सकेगा। और यदि तुम उसे तुम्हारे वर्तमान में चाहती हो तो उसके भूतकाल को बह जाने दो, निकल जाने दो। जीत को वर्तमान में ले आओ। और उसके लिए उसे सुनना अनिवार्य है।

तो मैं क्या करूँ?

जीत को उसके भूतकाल से वर्तमान में आने में उसकी सहायता करो। उसकी बात का हाथ पकड़कर उसे तुम्हारे ह्रदय तक लेकर आओ। जब भी जीत वर्तमान में आ जाएगा, वह तुम्हारा हो जाएगा। केवल तुम्हारा। तुम भी तो यही चाहती हो। है ना?

हाँ। हाँ।  

“वफ़ाई, तुम कहाँ हो?”

“कुछ नहीं जीत, तुम कुछ कह रहे थे। मैं तुम्हारे उस बीते हुए कल को सुनना चाहती हूँ। कहो न क्या रहस्य है? तुम्हारी बात बड़ी रुचिकर होगी। है न?” वफ़ाई ने पूरे उत्साह और अपेक्षा से जीत की तरफ देखा, उसकी आँखों में आँखें डाली और मौन स्मित लिए अपने अधरों को बंध कर दिया।

जीत ने बिखरे हुए अपने आपको समेटा। गहरी सांस ली,”वफ़ाई, मेरा भी एक परिवार था। पत्नी भी थी। अच्छा सा कारोबार था। जीवन की तमाम सुविधा थी, आनंद भी था।“ वह रुका, आकाश की तरफ देखता रहा।

“फिर क्या हुआ?” वफ़ाई अधीर हो उठी।

“एक दिन हम दोनों घूमने के लिए किसी बर्फीले पहाड़ पर गए।” जीत ने पूरी कहानी बता दी।

“तो तुम रोगी हो? तुम सोच रहे हो कि तुम्हारे पास समय नहीं बचा और शीघ्र ही तूम...।”

“किन्तु मैं मरना नहीं चाहता, मैं जीना चाहता हूँ।“ जीत चिल्ला उठा। झूले पर से उठ खड़ा हुआ और दूर जा कर भीत से सटकर खड़ा हो गया।

वफ़ाई जीत के पास गई और उसका हाथ पकड़ कर झूले पर ले आई।

”जीत, तुम बैठो यहाँ पर। सब ठीक हो जाएगा।“

वफ़ाई अंदर गई, पानी लेकर आई और जीत को अपने हाथों से पिलाया। जीत को अच्छा लगा। वफ़ाई के हाथों ने पिलाये पानी में जीत जीवन की संभावनाएं ढूँढने लगा। उसे धुँधली सी कोई किरण दिखाई देने लगी, जो जीने के लिए प्रेरित कर रही थी। जिजीविषा करवट ले रही थी।

क्या था इस पानी में? जब से मैं यहाँ आकार रुका हूँ मैं यही पानी पी रहा हूँ। किन्तु आज इस पानी में पहली बार जीवन की अभिलाषा दिखाई देने लगी है। कुछ तो है।

जो भी है वह बात पानी में नहीं, वफ़ाई के हाथों में है।

हो सकता है। किन्तु...।

“यह तो कोई बात नहीं हुई। कोई ऐसे ही सब कुछ छोड़ कर चला नहीं जाता। तुम्हारी बात में अर्धसत्य है अथवा बात ही आधी है। मैं नहीं जानती।“ वफ़ाई ने प्रश्न भरी द्रष्टि से जीत की तरफ देखा।

“तुम मेरी बात पर विश्वास क्यूँ नहीं करती? मैंने जो भी कहा सत्य ही कहा है।“

“हो सकता है की अधूरा कहा हो?”

“नहीं तो? यही सत्य है, पूरा सत्य। मेरा विश्वास करो।“

“कैसे करूँ? एक युवक लग्न कर लेता है, हनीमून पर जाता है और बीमार पड़ जाता है। बीमारी गंभीर अवश्य है किन्तु मृत्यु के इतनी भी समीप नहीं कि कोई मरने से पहले जीना छोड़ दे। और एक बात, आज कल विज्ञान के पास हर रोग का उपचार है। यदि उपचार नहीं है तो भी आशा तो है ही। कोई ऐसे ही केवल रोगी होने के कारण जीना नहीं छोड़ देता है। मुंबई जैसे शहर में रहते थे, पत्नी थी, परिवार था, कारोबार था और उपचार के लिए पैसों की भी तो समस्या नहीं थी। ऐसे में कोई सब कुछ छोड़ कर, ज़िंदगी से हारकर भाग नहीं जाता। उसका पूरी शक्ति से सामना करता है। किन्तु तुम तो कायरों की  भांति...।“ जीत ने वफ़ाई की बात बीच में ही काट दी।

“मैं कायर नहीं हूँ, नहीं हूँ।” जीत उत्तेजित हो गया। हाँफ गया।

“तो पूरा सत्य क्या है? तुम्हें बताना पड़ेगा।“ वफ़ाई ने जीत पर अधिकार प्रकट किया।  

वफ़ाई का इस तरह अधिकार करना जीत को अच्छा लगा। मन ही मन बोला,

वफ़ाई की इस हठ में भी जीवन की अपार संभावनाएं है। जीवन के कैसे कैसे संकेत दे रही है यह हठ?

“तुम पूरा सत्य बताते क्यूँ नहीं?” वफ़ाई ने फिर पूछा।

जीत कुछ समय मौन रहा। सोचता रहा –

किस तरह से वह सब सत्य बता दूँ? दिलशाद तथा नेल्सन के विषय में क्या बताऊँ? कैसे बताऊँ? और यदि बता भी दूँ तो वफ़ाई क्या सोचेगी मेरे विषय में?

सोचना क्या है? वफ़ाई तो सोच ही चुकी है कि तुम कायर हो। तुम अपने आप ही हार गए हो।

तो क्या करता मैं? आँख बंध कर दोनों को देखता रहता? मन ही मन जलता रहता? वह आग में जलने से तो अच्छा ही था कि मैं भाग गया। जीवन की तमाम संभावनाएं उस आग में जल गई थी, राख़ हो गई थी।

पर अब हवा बदल गई है, समय ने करवट ली है। वफ़ाई के रूप में कोई आशा, कोई जीवन, कोई अपेक्षा द्वार पर आ खड़ी है, तुम्हें पुकार रही है। यदि उसे भी ठुकराना चाहो तो तुम्हारी इच्छा। यह क्षण जो एक बार बित गया तो फिर न लौटेगा।

“बता भी दो अब। कब तक कोई ह्रदय पर भार रखता है? थक जाओगे उसे उठाते उठाते।“

“थक ही तो गया हूँ। मेरी मृत्यु अब बिलकुल सामने...।” जीत पूरी बात कह नहीं पाया।

“मनुष्य मृत्यु से नहीं मरता, पर मृत्यु की कल्पना से मरता है। मृत्यु की प्रतीक्षा में मरता है। तुम भी इसी तरह मर रहे हो।“

“मरना कौन चाहता है? मैं जीना चाहता हूँ। किन्तु ...।” फिर कोई विषाद जीत के चेहरे पर आकर रुक गया।

वफ़ाई जीत के पास गई। उसके बालों में उँगलियाँ पसारने लगी। जीतने आँखें बंध कर ली, वफ़ाई के स्पर्श को अनुभव करता रहा। उसे अच्छा लगा। वफ़ाई ने पूरा समय दिया, जीत को। जीत संभलने लगा। शांत हो गया, स्थिर हो गया। हवा धीरे धीरे बहने लगी।

प्रत्येक मोड पर जीवन नई आशाएँ जगा जाती है। वफ़ाई का होना भी तो कोई संकेत है। उसके स्पर्श में कोई बात है, कोई विश्वास है। मैं उसे अपनी बात बता सकता हूँ। जीत ने मन मना लिया, मन बना लिया।

“उपचार के लिए मैं और दिलशाद डॉक्टर नेल्सन से मिले।“  

“दिलशाद नाम है तुम्हारी पत्नी का! नाम तो बड़ा सुंदर है। स्वयं भी सुंदर ही होगी। मेरे से तो अधिक ही सुंदर होगी, है ना?“

जीत को यह छेडछानी अच्छी लगी। उसने स्मित दिया। उसे उस स्मित में ज़िंदगी दिखी।  

यहाँ तो हर क्षण में, हवा की हर लहर में जीवन है, आश है। मैं ही मूरख था, उसे समझ ही नहीं पाया। जीत ने अपने आप से बात कर ली।

“इन बातों का कोई अर्थ नहीं है, वफ़ाई।“ जीत ने कुछ क्षण पश्चात उत्तर दिया।  

“छोड़ो उसे। आगे बताओ क्या हुआ?”  

“उपयुक्त उपचार चलने लगा था। उपचार की प्रक्रिया में दिलशाद नेल्सन से मिलती रहती थी। दोनों के बीच कुछ जन्म लेने लगा और एक दिन...।” जीत ने उस संध्या की बात वफ़ाई को बताई जिस संध्या दिलशाद नेल्सन से मिलकर बिना ब्रा के लौटी थी।

“उस संध्या के पश्चात मैं विचलित हो गया। पहले तो मुझे दिलशाद पर क्रोध आया। किन्तु फिर सोचा कि उसने कुछ अनुचित नहीं किया। उसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी और मेरी ज़िंदगी समय के किसी भी बिन्दु पर रुक सकती थी। नेल्सन से अच्छा साथी कौन हो सकता था? जब तक मैं सामने रहूँगा, दिलशाद दुविधा में ही रहेगी। और यदि वह छुप कर नेल्सन से मिलती रहेगी तो मैं भी दुखी रहूँगा। मुझे लगा कि मूझे हट जाना चाहिए। और मैं एक दिन सब कुछ छोड़ कर यहाँ चला आया। मेरा सब कुछ दिलशाद के नाम कर आया।“

वफ़ाई आक्रंद करने लगी जीत की बात सुनकर। वफ़ाई जीत की पीड़ा का अनुभव करने लगी।

वफ़ाई को विलाप करते देख जीत भी क्रंदन करने लगा। एक नदी सब बंधन तोड़कर बहने लगी।

वफ़ाई ने जीत को अपने आँचल में छुपा लिया। स्वयम विलाप करती रही, जीत को भी करने दिया। 

कुछ क्षण पश्चात वफ़ाई ने स्वयं को संभाला, स्वयं से बातें करने लगी।  

लगता है जीत महीनों से रोया नहीं होगा! पुरुष होकर विलाप करना कितना कठिन होता होगा? कोई पुरुष यूं ही नहीं रोता। जब कोई बरफ बड़ी आग से पिघलता होगा तब जाकर कोई पुरुष रोता होगा। और बिना आग के कोई बर्फ नहीं पिघलता, यह तुमसे अच्छा कौन जानता है, बर्फ सुंदरी? 

बर्फ सुंदरी, कितना अच्छा नाम है? जीत तो तुम्हें इसी नाम से पुकारता रहता है ना?

हां। किन्तु समय हो गया इस शब्द को जीत ने नहीं कहा। वह कहता भी तो कैसे। तुम तो जानती हो कि किस स्थिति में है वह।   

अच्छा हुआ तूने उसे आक्रंद करने में सहायता की। अन्यथा अंदर ही अंदर वह मर जाता।

‘नहीं मरेगा वह अब। मैं नहीं मरने दूँगी उसे।‘

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Hetal Thakor 6 महीना पहले

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Avirat Patel 6 महीना पहले

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Bharati Ben Dagha 8 महीना पहले

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दिवाकर सिंह 8 महीना पहले

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Amita Saxena 8 महीना पहले