हिम स्पर्श- 61

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“क्या हुआ, जीत?”

वफ़ाई जीत की तरफ दौड़ी, जीत का हाथ अपने हाथ में लिया, “जीत, जीत. तुम ठीक तो हो?” वफ़ाई के शब्द हवा में ही रह गये। जीत ने उसे नहीं सुना। जीत अभी भी हाँफ रहा था। उसे सांस लेने में कठिनाई हो रही थी।

वफ़ाई को कुछ समज नहीं आया कि क्या हो रहा है? क्या किया जाय? दो चार क्षण वह सोचती रही, फिर दौड़कर पानी ले आई, जीत को पिलाने लगी, “थोड़ा पी लो। तुम थोड़ा विश्राम करो। मैं कहीं से किसी डॉक्टर को लेकर आती हूँ।“

जीत ने पानी पिया। पानी ने असर दिखाया। ठंडी हवा ने भी अपना काम किया। जीत थोड़ा सा ठीक होने लगा। हाँफना थोड़ा कम हुआ। कुछ क्षण वह वहीं बैठा रहा, वफ़ाई भी उसके पास बैठ गई।

एक भीत, उस भीत के सहारे, उसी भीत की परछाई में बैठे दो व्यक्ति। मध्धम धूप, मध्धम हवा और मौन। समय का एक टुकड़ा कुछ क्षण वहाँ रुक गया।

“जीत, तुम विश्राम कर लो। मैं किसी डॉक्टर को बुलाकर आती हूँ।“ वफ़ाई ने जीत के माथे पर अपना हाथ फेरते हुए कहा। जीत को लगा जैसे उसकी माँ उसे सुला रही हो।

“लड़कियां कितनी भी बड़ी हो या छोटी, जब किसी के माथे पर हाथ फेरती हो तो वह माँ बन जाती है। कैसा जादू है इन लड्कीयोंके हाथों में?” जीत ने आँखें बंध रखते हुए कहा। “तुम लड़कियां बहुत जल्दी नानी का और दादी का चरित्र निभाने लगती हो। कैसे कर लेती हो यह सब?”

वफ़ाई चुप चाप माथे पर हाथ फेरती रही। जीत को अच्छा लगने लगा।

“जीत, तुम्हें नींद आ रही है। तुम्हें थोड़ा सो जाना चाहिए। तुम अंदर चलो। चलो उठो।“ वफ़ाई ने जीत को अपना हाथ दिया, पर जीत वहीं बैठा रहा। वफ़ाई के बढ़े हुए हाथ को देखता रहा।

“चलो उठो। चलो हाथ दो।“ वफ़ाई ने पुन: आमंत्रित किया जीत को।

“नहीं, मैं यहीं ठीक हूँ।“

“तुम मेरे साथ अंदर चलो, कहा ना?”

“मैं यहीं विश्राम कर लेता हूँ। तुम अंदर जा सकती हो।“

“अर्थात तुम अभी भी मेरे कक्ष में जाना नहीं चाहते? जीत, तुम अंदर आ सकते हो। मेरे आने से पहले वह तुम्हारा ही तो था। अब भी तुम्हारा ही है। मैं तो केवल अतिथि हूँ।“

“अतिथि हो तो मेरा इतना ध्यान क्यूँ रखती हो?”

“वोह तुम नहीं समझोगे श्रीमान चित्रकार। और में समझाना भी नहीं चाहती। अब हठ छोड़ो और उठो यहाँ से नहीं तो मैं तुम्हें घसीट ले जाऊँगी। उठते हो या?” वफ़ाई ने रौद्र स्वरूप दिखाया।

“देखो फिर से तुम नानी तथा दादी बन गई।“

“तो? तुम्हें कोई समस्या?”

“समस्या तो गंभीर है। इतनी छोटी नानी तथा दादी कभी देखि नहीं न।“ जीत ने दर्द को भूलकर हँसना चाहा, वह हंस न सका।

“जो भी हूँ, तुम्हें मेरे आदेश को मानना पड़ेगा। चलो उठो।“ जीत उठा और झूले पर जा बैठा।

“क्या झूले पर ही सो जाना है?” वफ़ाई ने फिर डांटते हुए पूछा।

“नहीं, अब मुझे सोना नहीं है। तुम मेरे पास आकर बैठो। मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।“ जीत ने झूले को हल्का सा धक्का दिया। झूला धीरे धीरे चलने लगा।

वफ़ाई जीत के लिए लेमन सूप लेकर आई, “अच्छे बालक की भांति लो इसे पी लो। कोई प्रश्न नहीं करना। क्या समझे?” वह झूले के पास खड़ी रही।

जीत वफ़ाई के हाथ को देखता रहा। कुछ भी बोले बिना बस देखता रहा।

“अरे, क्या देख रहे हो इस कटोरे को? देखने से नहीं इसे पीने से लाभ होता है।“

“कटोरे को कौन देख रहा है?”

“तो क्या देख रहे हो?”

“सत्य कहूँ?”

“असत्य तो बोलना ही नहीं।“

“जैसी आज्ञा। मैं तो तुम्हारे हाथ को देख रहा था।“

“क्या देखा इन हाथों में?”

“एक अज्ञात व्यक्ति, धरती के एक अज्ञात कोने से आकर इस अज्ञात से कोने में, अज्ञात घर में, मेरे जैसे अज्ञात व्यक्ति के लिए अपने उन हाथों से लेमन सूप बनाती है जिन हाथों से वह केमरे से तस्वीरें खींचती थी। क्यूँ करती हो तुम मेरे लिए यह सब? यह सब...।” जीत आगे बोल नहीं पाया।

“अब ज्यादा भावुक होने की आवश्यकता नहीं है। चुप चाप इसे पी लो और सो जाओ।“

“पीना तो पड़ेगा ही। किन्तु सोच रहा हूँ कि क्या संबंध है? क्यूँ कोई इतना करता है किसी के लिए?”

“मैंने अभी अभी कहा था ना कि वोह तुम नही समझोगे चित्रकार। अब और कोई प्रश्न नहीं, कोई बात भी नहीं। बस, इसे पी लो।“

“तुम फिर माँ, नानी और दादी बन गई।“ जीत हंस पड़ा, वफ़ाई भी। जीत लेमन सूप पीने लगा। वफ़ाई अभी भी झूले के पास खड़ी, सूप पीते जीत को देख रही थी। जीत भी सूप पीते पीते वफ़ाई को देख रहा था। वफ़ाई के चेहरे पर मधुर सा स्मित था। जीत को वह स्मित नया सा लगा, सूप का रस भी। उसे लगा कि वह सूप नहीं अमृत पी रहा है।

अमृत? मेरे लिए अमृत तो अब इस मरुभूमि के मृगजल की भांति है, जो कभी हाथ ना आए। उससे पहले ही ...

जीत आगे सोच नहीं पाया। सूप पूरा हो चुका था।

“चलो अब अंदर और थोड़ी देर सो जाओ। सब ठीक हो जाएगा।“ वफ़ाई ने रूम की तरफ संकेत किया। जीत उसे टाल न सका। 

“यह तो कभी सोचा ही नहीं था। कभी ऐसा स्वप्न भी नहीं आया कि इस मरुभूमि के इस घर में मेरे साथ अन्य कोई आयेगा और इस कक्ष में दोनों को साथ साथ सोना पड़ेगा।“

“और वह भी एक सुंदर युवती के साथ? जीत, तुम सपने तो ढंग के देखा करो।“

“सपने? तुम सपनों की बात करती हो, किन्तु मैंने तो, चलो छोड़ो उसे। तो मैं क्या कह रहा था? मैंने इस कक्ष में दो व्यक्तियों की कल्पना ही नहीं की थी, ईस लिए ...।”

“सो जाओ अब। मुझे भोजन बनाना है। तैयार होते ही जगा दूँगी।“ वफ़ाई रसोईघर में चली गई।

जीत ने सोने के तमाम प्रयास किया किन्तु वह सो ना सका।

क्या अब समय आ गया है वफ़ाई को सब कुछ बता देने का? मेरे जाने का? क्या साँसों का रुक रुक कर आना कोई संकेत है?

कितना समय होगा मेरे पास?

मुझे ज्ञात नहीं।

तो सब कुछ बता दो वफ़ाई को।

क्यूँ बताना है वफ़ाई को? उसे बताना आवश्यक है? कुछ ही समय की तो वह अतिथी है। उसे क्यूँ मेरी पीड़ा से दुखी करना?। एक बार वह चली जाएगी बाद में इस जीवन में कभी नहीं मिलेगी। उसे कुछ नहीं बताना चाहिए।

वह अतिथि है नहीं, अतिथि थी। अब वह तुमसे ...।

नहीं। यह सत्य नहीं है। नहीं करना मुझे प्रेम उससे। कोई आशा, कोई अपेक्षा नहीं जगानी है मुझे।

किन्तु वह तो करती है प्रेम तुझसे। कितना अधिकार करती है? क्या ऐसे ही कोई इतना अधिकार करता है किसी पर?

पर मैं तो नहीं करता।   

क्यूँ? क्यूँ भाग रहे हो प्रेम से? क्यूँ भाग रहे हो अपने आप से? वास्तव में तुम भी उससे प्रेम करने लगे हो। बस इस बात का स्वीकार करने का साहस नहीं है तुम में। कायर हो तुम। तुम क्या मृत्यु से लड़ोगे? तुम क्या जीने की इच्छा जगाओगे? तुम्हें तो मरना ही होगा। तुम्हें कोई नहीं बचा सकता आनेवाली मृत्यु से। तुम्हें मरना होगा, हाँ तुम्हें मरना ही होगा। यही तुम्हारी नियति है।

“नहीं, नहीं। मैं मरना नहीं चाहता। मैं जीना चाहता हूँ। मैं जीना चाहता हूँ।” जीत चिल्ला उठा। उसने हाथों की मुट्ठी बंध कर ली और उठ खड़ा हो गया। द्वार की तरफ मुडा।

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Avirat Patel 2 सप्ताह पहले

Amita Saxena 3 महीना पहले

Bharati Ben Dagha 3 महीना पहले

Manjula 3 महीना पहले

Anuj Shukla 3 महीना पहले