पगडण्डी विकास - 1 Pradeep Shrivastava द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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पगडण्डी विकास - 1

पगडण्डी विकास

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग 1

हाय दिल्ली की सर्दी कह कर ठंड से कुड़कुड़ाने वाले लोग अगर एक बार महोबा के रेलवे स्टेशन पर रात गुजार लें, तो निश्चित ही कहेंगे ‘हाय महोबा की सर्दी। इससे तो अच्छी है अपनी दिल्ली की सर्दी।’ महोबा स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक की बेंच पर बैठा मैं ठंड से कांप रहा था। दिल्ली में पांच साल रह कर मैं वहां की पांच सर्दियां झेल चुका था। किंतु इतनी ठंड मैंने वहां कभी महसूस नहीं की थी। ना ही उतना कोहरा उन पांच सालों में मैंने वहां कभी देखा था जितना कि इकत्तीस दिसंबर की रात को उस वक्त वहां देख रहा था।

महोबा में ट्रांसफर होकर आने के बाद वहां मेरा सर्दी का यह पहला मौसम था, साथ ही पहला मौका जब वहां रात में घर से बाहर था। मैं थोड़ा डरपोक किस्म का आदमी हूं। ऑफ़िस से आने के बाद घर से मैं बाहर तभी निकलता हूं जब बहुत जरूरी हो जाता है। नहीं तो अपने कमरे में खा-पी कर टीवी देखता हूं और किशनगंज, बिहार में अपने परिवार से बात कर के सो जाता हूं।

ट्रांसफर होकर मैं कुछ ही महिने पहले वहां पहुंचा था। बीवी दोनों छोटे बच्चों को किशनगंज बाबू जी, अम्मा जी के पास भेजा दिया था। कहा था यहां मुझे ज़्यादा दिन ठहरना नहीं है। बच्चे अभी छोटे हैं। छोटा तो तीन ही महिने का है। यहां अनजान शहर में मैं तो दिन भर ऑफ़िस में रहूंगा, तुम सब को कौन देखेगा। ज़रूरत पड़ने पर कोई भी मदद को नहीं है। बीवी का मन कतई नहीं था कि मैं महोबा में अकेले रहूं और वह सास-ससुर के पास।

आज कल की दबंग बीवियों सी होती तो शायद ना मानती। और मेरे जैसा दब्बू, डरपोक पति ऐसा कहने की हिम्मत भी ना कर पाता। मगर मेरी अतिशय, सीधी-सादी, भावुक, सीरियल में भावुक दृश्य देख कर हुचक-हुचक कर रो पड़ने वाली बीवी बिना किसी बहस के मान गई कि ठीक है जैसे भी हो साल भर किसी तरह सास-ससुर के पास रह लूंगी। मगर उससे ज़्यादा नहीं रुक पाऊंगी। फिर ऐसे बिलख-बिलख के रोई कि पूछिए मत।

जिस दिन मैंने यह कहा था उसके बाद घर छोड़ने जाने तक उसकी आंखें मुझे गीली ही दिखीं। उसकी ये गीली आंखें मुझे भी कमज़ोर कर रही थीं। तो मैंने कहा सुनो अगर यही हाल बनाए रखना है तो मैं भी यहां नहीं रुक पाऊंगा। और तुम्हें यहां रख कर दिन भर ऑफ़िस चला जाऊं यह भी मुझसे नहीं होगा। ऐसे में नौकरी छोड़ कर सीधे अम्मा-बाबू जी के पास किशनगंज चलते हैं। वहीं कुछ करेंगे-धरेंगे। इतना कहने के बाद उसने अपने को बड़ी मुश्किल से संभाला था।

उस सर्दी में जब मैं स्टेशन के लिए घर से चला था तब भी पत्नी को फ़ोन किया था। उसकी हिदायत थी कि स्टेशन पहुंच कर फ़ोन करूं। फ़ोन पर आते ही उसने नसीहत दी कि ‘किसी से कुछ ले-दे कर खाना नहीं। ज़्यादा बात नहीं करना। कहां जा रहे हो यह किसी को ना बताना। ठंडा बहुत हो रहा है। बैग से कंबल भी निकाल कर ओढ़ लेना।’ उसकी हिदायत पर मैंने एक बैग में कंबल रख लिया था। जैकेट, टोपी, मफलर सब पहन रखा था। बीवी की नसीहत पर कंबल रखना मुझे तब भारी लगा था। लेकिन स्टेशन पर जब ठंड ने सताना शुरू किया तो लगा कि अच्छा किया।

हालांकि मैं रास्ते के लिए हमेशा लोई पसंद करता हूं, तो उसी बैग में मैंने लोई भी रख ली थी। वही ओढ़ कर बेंच पर बैठा ट्रेन का इंतजार करने लगा। पूरे प्लेटफॉर्म क्या करीब-करीब पूरे स्टेशन पर सन्नाटा पसरा था। जबरदस्त कोहरा था। लाइट के बल्ब, हैलोजन, ट्यूब ऐसे लग रहे थे जैसे उन पर मिट्टी पोत दी गई है। खूब धूल उड़ रही हो। कोहरा हल्की चलती हवा के कारण धुआं सा उड़ता दिख रहा था। रेलवे ने प्लेटफॉर्म काफी लंबा बनाया है लेकिन शेड उसके करीब चालीस पर्सेंट हिस्से पर ही है। पूरे प्लेटफॉर्म पर इक्का-दुक्का लोग ही दिख रहे थे। स्टाफ भी अपने-अपने कमरों में दुबका था। प्लेटफॉर्म के दूसरे सिरे पर एक चाय वाला जहां मैंने थोड़ी देर पहले चाय पी थी वह भी अपनी दुकान बंद कर के चला गया था।

मुझ से दस-पंद्रह क़दम की दूरी पर प्लेटफॉर्म की छत को सहारा देता मोटा पिलर ऊपर तक गया था। पिलर से ही सटे दो कुत्ते एक दूसरे से गुंथे से पड़े सो रहे थे। मुझे बेंच पर बैठे आधा घंटा हो रहा था। ट्रेन का टाइम भी हो रहा था। मन में व्याकुलता हो रही थी कि ट्रेन जल्दी आ जाती तो उसमें बैठूं। इस ठंड से कुछ तो छुटकारा मिले। ठंड को ध्यान में रख कर ही मैंने थर्ड एसी में रिजर्वेंशन कराया था।

प्लेटफॉर्म का सन्नाटा देखकर मैंने सोचा कि महोबा से क्या मैं ही अकेला जा रहा हूं। टाइम हो रहा है और कोई दूसरा यात्री दिखाई नहीं दे रहा। मुझे ठंड बराबर बढ़ती हुई लग रही थी। मैंने तभी मोबाइल में लोकल टेम्प्रेचर देखा तो वह पांच डिग्री सेंटीग्रेड हो रहा था। कुछ देर में मुझे लगा कि टेम्प्रेचर देखने के बाद मुझे और ठंड महसूस हो रही है।

दिल को तसल्ली दी कि बस थोड़ी देर और ट्रेन आ ही रही होगी। घर से मोबाइल पर ही ऑन लाइन ट्रेन की स्थिति देख कर ही चला था। इस कोहरे और हाड़ कंपाती ठंड में भी वह मात्र डेढ़ घंटे लेट थी। अन्य बहुत से लोगों की तरह मेरे लिए भी यह थोड़ा आश्चर्य का विषय था। नहीं तो ऐसे मौसम में ट्रेन का सात-आठ घंटे लेट होना आम बात रही है। मैंने सोचा चलो जो भी है, आए तो जल्दी। और ऐसे ही पहुंचा भी दे। आठ-नौ घंटे लेट ना हो। साले की शादी दो ही दिन बाद है।

सोचा इस साले को भी और कोई डेट नहीं मिली थी। हर साल तो यह कड़ाके की ठंड पड़ती है, वह यह अच्छी तरह जानता है। फिर भी यह मूर्खता किए बैठा है। मगर उसकी सारी मूर्खता एक तरफ है क्यों कि आखिर वो साला है, वो भी इकलौता। पहुंचना हर हाल में है। मेरा साला बना भी तो दिसंबर में ही था। हां तब इस साले ने बड़ी खुराफात की थी। मेरे सीधे होने का पूरा फायदा उठाया था। नाक में दम कर दिया था। चलो साले से ब्याज सहित हिसाब पूरा करूंगा। अब बेचैनी में मैं बार-बार मोबाइल में टाइम देखने लगा। लगता जैसे टाइम बढ़ ही नहीं रहा है। इसी बीच मेरे कानों में किसी के कराहने की आवाज़ पड़ी ।

आवाज़ मेरी बेंच के पीछे से आ रही थी। इस समय ऐसा क्या हुआ? कुछ गलत की आशंका से दिल की धड़कनें बढ़ गईं । मैंने पीछे मुड़कर देखा। मेरी बेंच से करीब आठ फिट की दूरी पर दिवार से सटी एक प्रौढ़ महिला जमीन पर लेटी थी। उसने कार्टन के टुकड़े बिछा रखे थे। चिथड़ा सी धोती और उसी पर पुरानी सी बुशर्ट कुछेक कपड़े उसने और पहने थे। एक शॉल भी फटी-लत्ता सी लपेट रखी थी। इस हाड़ कंपाती ठंड में उसके पास ठंड से बचने के लिए और कुछ नहीं था। शॉल भी इतनी फटी थी कि वह उससे अपने को पूरा नहीं ढंक पा रही थी। बुरी तरह कांप रही थी।

मैंने उसे ध्यान से देखने का प्रयत्न किया लेकिन कपड़ों के कारण जब समझ ना पाया तो उठ कर उसके पास गया। वह दर्द से कराह रही थी। उसे क्या तकलीफ़ थी मैं नहीं समझ पा रहा था। मैंने दो तीन बार पूछा कि क्या तकलीफ है? मगर वह कराहती रही। मैंने भी मूर्खता की हद कर दी थी। एक भिखारिन की तकलीफ़ क्या हो सकती है? भूख, प्यास, आवश्यक कपड़ों, सर्दी, गर्मी, बरसात, आंधी, तुफान, से अपनी रक्षा ना कर पाने से जो भी कष्ट हो सकते हैं, उसके अलावा और क्या दुःख दर्द होंगे इसके। मैं वहां कुछ देर खड़ा रहा।

उस की हालत पर मुझे बड़ी दया आ रही थी। मन में आया कि इसकी कुछ मदद कर सकूं तो बहुत अच्छा होगा। मगर क्या करूं? इतनी ठंड इसके लिए कहीं जानलेवा ना साबित हो, यह सोच कर मैंने तय किया कि जैसे भी हो पहले इसे ठंड से बचाऊं। फिर मैंने बैग से कंबल निकाल कर उसे दोहरा करके ओढ़ा दिया। जिससे वह ज़्यादा कारगर हो। यह भूखी भी होगी यह सोचकर मैंने जो भी बिस्कुट वगैरह जो मेरे पास थे उसे उसके सिरहाने ले जाकर रख दिया।

इसी बीच एक और आदमी दो-तीन सूटकेस, बैग लिए आकर बेंच पर बैठ चुका था। उसे पहुंचाने एक आदमी आया था। शायद वह उसका टैक्सी ड्राइवर था। महिला को कंबल ओढ़ाने के बाद भी उसके कराहने की आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी। मेरे मन में उसे आराम देने के लिए व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। मन में ऐसी तीव्रता मैंने कभी किसी के लिए महसूस नहीं की थी। मैंने फिर बैग खोला। उसमें से पत्नी की दो शॉल जो उसने मंगाई थी वह निकाली और दोनों उसी के ऊपर डाल दी।

वापस आकर बेंच पर बैठा तो वह आदमी मुझे देख रहा था। उसने मुंह में तंबाकू दबा रखी। उसे मैंने अब गौर से देखा तो हुलिया से मुझे कोई बिजनेसमैन लगा। मुझे अपनी तरफ देखता पाकर उसने कहा। ‘भाई साहब एक बात कहूं नाराज तो नहीं होंगे?’ मेरे ‘नहीं’ कहने पर वह बोला। ‘आपने जो किया बढ़िया है। लेकिन आप इन सब को जानते नहीं हैं। इसे आपने कपड़े दे दिए हैं। लेकिन ये कल फिर ऐसी ही मिलेगी। ये यह सारे कपड़े कहीं बेच देगी। फिर नशा-पत्ती करेगी। इन सब ने इसे धंधा बना लिया है। इतने सारे नियम-कानून हैं लेकिन पुलिस भी कुछ नहीं करती। वह भी इनसे हफ्ता लेती है। इस लिए इनको देना इनकी आदत खराब करना है। भीख मांगने की आदत को बढ़ावा देना है।’

उसकी बात पर मुझे बड़ी गुस्सा आई कि अजब आदमी है। किसी की तकलीफ में उसे एक पैसे की मदद तो करना दूर, दूसरे को भी मना कर रहा है। मानवता नाम की चीज ही नहीं। ऊपर से मुझे शिक्षा दे रहा है। कुछ देर तो मैं समझ ही नहीं पाया कि इसे इसकी बातों का जवाब क्या दूं? मैं देखता भर रहा। तभी वह फिर बोल पड़ा। ‘देखिए जब इन को भीख नहीं मिलेगी तभी ये कुछ काम-धंधा करेंगे। नहीं तो ऐसे ही मागेंगे और खाएंगे-पिएंगे। इस तरह हम अपने बीच से कभी भिखारियों को खत्म नहीं कर सकेंगे। भीख मांगना एक धब्बा, अभिशाप है हमारे समाज का। आखिर कब तक इसे अपने साथ चिपकाए रखेंगे। ये अभी तक हमारे साथ चिपके हुए हैं इसके लिए हमारी ये बेकार की दया ही ज़िम्मेदार है कि हम ऐसे ही दे-दे कर इन्हें पाले हुए हैं। इन्हें और आगे बढ़ने की खुराक देते हैं।’

उसकी यह बातें मुझे खुद पर बड़ी तोहमत लगी। और उसकी ढिठाई भी। कि इसकी हिम्मत तो देखो कि ना जान ना पहचान और लेक्चर ऐसे दे रहा है जैसे मैं इसका नौकर हूं। अब तक मैं भी उसको जवाब देने के लिए तैयार हो चुका था। मैंने छूटते ही कहा ‘ऐसा है कि सारे नियम-कानून से ऊपर है मानवता। मुझे मालूम नहीं है कि दुनिया में कहीं कोई ऐसा कानून है कि किसी की जान बचाने के लिए किसी को सजा दी जाए। और यह भी कि किसी की जान खतरे में है तो उसे नजरंदाज कर आगे बढ़ जाएं, उसकी जान ना बचाएं।’ मेरी बात सुनते ही वह थोड़ा तेज़ आवाज़ में बोला।

‘नहीं-नहीं मैं किसी की जान बचाने से मना नहीं कर रहा । मैं तो भीख ना देने की बात कर रहा हूं। जिससे भीख मांगने की प्रथा को बढ़ावा ना मिले।’

उसके तेवर और बात पर मैंने थोड़ी सी विनम्रता ओढ़ते हुए कहा ‘अरे भाई मैं साफ-साफ कह रहा हूं कि मैंने किसी को भीख नहीं दी। मैं भीख को बढ़ावा देने ना देने के बारे में सोचता ही नहीं। मुझे वह महिला बीमार, लाचार, बेसहारा, बेघर दिखी। उसकी हालत ऐसी है कि तुरंत उसे ठंड से बचाया ना गया तो उसकी जान जा सकती है। और मैंने उसकी जान बचाने की ही कोशिश की है। मैं पूरे विश्वास के साथ यह मानता हूं कि मैंने मानवता के नाते अच्छा ही किया है।’ मैंने सोचा अब वह चुप हो जाएगा। लेकिन मेरा आकलन गलत निकला। वह तुरंत पूरी दृढ़ता से बोला।

‘हां ये तो कह सकते हैं कि जान बचाई। लेकिन भीख तो दी ही गई। और इससे इस प्रथा को बढ़ावा भी मिला ही।’

वह यह बात पूरी कर आखिर में हंस भी दिया। इससे मुझे लगा कि वह मेरी खिल्ली उड़ा रहा है। यह बात दिमाग में आते ही मुझे गुस्सा आ गया। मैं इतनी खीझ महसूस कर रहा था कि अपने दब्बू स्वभाव के बावजूद नाराजगी जाहिर करते हुए बोला-

‘अब मुझे जो करना था वह तो मैंने कर दिया। उससे मुझे कोई अफ़सोस नहीं बल्कि संतोष ही है। हां आप चाहें तो पुलिस में कंप्लेंट कर मुझे अरेस्ट करा दें। मैं आपके इस काम से बिल्कुल बुरा नहीं मानूंगा। आप भी अपना कर्त्तव्य पूरा कर लिजिए।’

अब वह समझ गया कि मुझे उसकी बातें अच्छी नहीं लगीं। तो वह रफू करते हुए बोला-

‘अरे नहीं-नहीं मेरा मतलब यह नहीं है। आप तो बुरा मान गए। आप जैसे अच्छे इंसान को कोई क़ानून गिरफ़्तार ही नहीं कर सकता। मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता। मुझे तो यह सोचना भी दुनिया की सबसे बड़ी मुर्खता लगेगी। ये तो हमारी इन सरकारों को सोचना चाहिए कि हमारे देश में गरीब हैं क्यों?’ उसकी बात से मैं समझ गया कि यह उन्हीं लोगों में से एक है जो ऐसे स्थानों पर टाइम पास करने के लिए आस-पास के लोगों को किसी ना किसी मुद्दे पर निरर्थक बहस में उलझा ही लेते हैं।दैवयोग से मुझे भी यह अच्छा लगता है। लेकिन बहस करने में नहीं सुनने में। मगर वहां कोई और नहीं था जो उससे बहस करता। मैंने सोचा चलो जब तक ट्रेन नहीं आती तब तक इसी से झक लड़ाते हैं। यह सोचते हुए मैंने तुरंत बात आगे बढ़ाई। कहा-

‘देखिए असल में हम भारतीयों की असल समस्या यह है कि हम पीढ़ियों से इस सोच के हो गए हैं कि कोई देवता, मसीहा आएगा और हमारी सारी समस्याओं को हल कर देगा। हम केवल एक ही काम करते हैं कि मसीहा का इंतजार करते हैं। यह काम हम बहुत ईमानदारी, निष्ठा, मेहनत से करते हैं। इंतजार में पीढ़ी दर पीढ़ी निकाल देते हैं। लेकिन कभी हताश निराश नहीं होते, कभी नहीं थकते।’

मेरी बात सुनते ही वह आश्चर्य सा व्यक्त करते हुए बोला-

‘अरे भाई साहब आपने तो बड़ी ऊंची बात कह दी। यह बिल्कुल सही है। मैं तो कभी यह सोच ही नहीं पाया। मगर ये बताइए आपके दिमाग में यह कैसे आ गया कि हम भारतीय हमेशा किसी मसीहा का ही इंतजार करते रहते हैं।’

मुझे लगा कि बात अब उस ओर मुड़ गई है कि अंतहीन बकवास चलती रहेगी। मैंने बात आगे बढ़ाई। कहा-‘देखिए ये स्टेशन ही देखिए। अब याद करिए जरा साल डेढ़ साल पहले के स्टेशन। जब हर तरफ गंदगी भरी रहती थी। छोटे-छोटे स्टेशनों की तो बात ही ना करिए। अच्छा ये बताइए आप तो यहीं के रहने वाले लगते हैं। क्या गवर्नमेंट द्वारा स्वच्छता अभियान शुरू करने से पहले यह स्टेशन इतना साफ-सुथरा रहता था। हालांकि अब भी उतना नहीं है जितना होना चाहिए।’

‘हां...ये बात तो है। सेंट्रल गवर्नमेंट के स्वच्छता अभियान से पहले इतनी क्या इसकी पचीस पर्सेंट भी सफाई नहीं रहती थी। लेकिन इससे मसीहा वाली बात कैसे जोड़ रहे हैं?’

‘बड़ी मामूली सी बात है। देखिए सफाई को लेकर हमारे यहां समाज खासतौर से धर्म में सफाई स्वच्छता के बारे में बड़ी-बड़ी बातें कही गई हैं। बहुत जोर दिया गया है। हम अपने घरों में तो बड़ा ध्यान रखते हैं। लेकिन बाहर जितना चाहें, जहां चाहें वहां उतनी गंदगी करते हैं। हॉस्पिटल, स्टेशन, ऑफ़िस, सड़क, यहां तक कि मंदिर, नदी तक नहीं छोड़ते। हां बातें हम लोग खूब करते हैं। अरे यार यहां इतनी गंदगी है। वहां इतनी गंदगी है। गवर्नमेंट कुछ करती नहीं। लेकिन अपने कर्त्तव्य के बारे में कभी बोलते क्या सोचते तक नहीं। लेकिन ये पी. एम. आया तो इसने सफाई को ही मुख्य मुद्दा बना दिया।

बीमारी, और बाहर फ्रेश होने के लिए जाने वाली महिलाओं की सुरक्षा, को देश के सम्मान से जोड़ दिया। इतना ज़ोर देने लगा कि बहुत लोगों को वह सफाई का पुरोधा, मसीहा नजर आने लगा। देखिए हालात तेज़ी से बदलने लगे कि नहीं। वही देश है। वही लोग हैं। व्यवस्था वही है। बस एक व्यक्ति ने कुछ ऐसी बातें कहीं। कुछ ऐसा जोर दिया कि स्थितियां बदलने लगीं। यानी हम ऐसी सोच के लोग हैं कि सोए रहते हैं। हमें जगाने वाला कोई चाहिए। हनुमान जी को तो श्राप था कि उन्हें अपनी ताक़त का ज्ञान तभी होता था जब कोई उन्हें याद दिलाता था। लेकिन हम सब ऐसे क्यों हो गए? हम इंसानों को तो ऐसा कोई श्राप मिला नहीं फिर भी स्वामी विवेकानंद को कहना ही पड़ा।‘‘उतिष्ठत भारत, जाग्रत भारत।’’.. अगर हम लोग सोते हुए ना होते तो यह बात कही ही क्यों जाती। मेरी बात पूरी होते ही वह बोला-

‘हां मैं मानता हूं इस बात को। आप की बातों से लगता है कि आप किसी राजनीतिक पार्टी से गहरा संबंध रखते हैं। लेकिन भाई काम तो शुरू से होता ही रहा है। कोई नई बात तो है नहीं। धीरे-धीरे एक दिन सब सही हो जाएगा।’

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