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पगडण्डी विकास - 3

पगडण्डी विकास

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग 3

मैं वापस आकर बैठा ही था कि एनाउंसर की आवाज़ फिर गूंजी, यात्री गण कृपया ध्यान दें। मेरे कान खड़े हो गए। ध्यान से सुनने लगा कि कितनी देर में आ रही है ट्रेन। मगर जो एनाउंस हुआ उससे मैंने खीझ कर सिर पीट लिया। ट्रेन लेट नहीं हुई थी। कैंसिल कर दी गई थी। यह सुन कर प्लेटफॉर्म पर जो गिने-चुने यात्री बैठे थे ठंड से सिकुड़े, उन सब में एक हलचल सी उत्पन्न हो गई। धीरज उठकर फिर वहीं पिच्च से थूक कर आया। और मुझसे पूछा-

‘विनायक जी अब क्या किया जाए? ये तो अच्छा तमाशा हो गया।’

‘तमाशा क्या महा तमाशा हो गया। मुझे हर हाल में पहुंचना है। समझ में नहीं आ रहा क्या करूं।’

‘पहुंचना मुझे भी है। चाहूं तो भी जर्नी पोस्टफ़ोन नहीं कर पाऊंगा। क्यों कि अपनी आदत से परेशान हूं। घर से जब निकल देता हूं तो जहां जाना होता है वहां फिर हर हाल में जाऊंगा। फिर चाहे आंधी आए या तुफान। ट्रेन ना सही। बस से जाऊंगा। मगर सबेरे तक तो यहीं रुकना पड़ेगा। इस कोहरे में बाहर कहीं कुछ भी मिलने वाला नहीं। घर में भी कोई ऐसा नहीं जिसे बुला सकूं। होता तो भी मैं इस मौसम में बुलाता नहीं। इस लिए रात तो यहीं काटनी है।’

मैंने भी उससे सहमत होते हुए कहा- ‘हां। काटनी तो यहीं पड़ेगी। रात क्या सवेरे आठ-नौ बजे से पहले कोई साधन मिलने वाला नहीं। इतना लंबा टाइम काटना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। इन सालों ने ये भी नहीं बताया कि ट्रेन कैंसिल क्यों की?’

‘अरे बताएंगे क्या? अंडरस्टुड है। जीरो विजिविलिटी है। यही बताएंगे।’

‘फिर भी धीरज जी बताना तो चाहिए ना, ये तो हम अनुमान लगा रहे हैं। हमारे यहां कोहरे के कारण ट्रेनें ठप्प होती हैं। ज़िंदगी ठप्प होती है। ये सब जानते हैं। कोई नई बात नहीं है। रीजन बता देने से कुछ बिगड़ नहीं जाएगा।’

मैंने जूते पहने-पहने पैर उठाकर बेंच पर रख लिए। उन्हें उतारने की हिम्मत नहीं हुई। पैर जैसे गले जा रहे थे। वूलेन मोजे, जूते पहने थे। लेकिन लग रहा था जैसे कुछ पहना ही नहीं है। लोई को पूरी तरह लपेट लिया था। केवल आंखें खुली थीं। धीरज ने कंबल निकाल कर ओढ़ लिया था। उसने अपने सूटकेस, बैग सब बेंच के सामने सटा कर रख लिए थे। पैर उन्हीं पर फैला लिया था। उसने जूते उतार दिए थे। मैंने भी अपना सामान वैसे ही रखा था लेकिन लोई में सिकुड़ा गठरी बना बैठा था। मैं कांप रहा था। धीरज मेरी स्थिति कुछ ही देर में समझ गया। उसने कहा ‘विनायक जी आप कांप रहे हैं। कंबल, शॉल सब तो आपने उसे दे दिया। अब क्या करेंगे?’

मैंने कहा- ‘कुछ खास दिक्कत नहीं है। इस लोई में रात कट ही जाएगी। मैं तो सोच रहा हूं कि मैं इतने कपड़े पहन कर भी ठंड महसूस कर रहा हूं। उस महिला का क्या हाल होगा?’

‘आप तो बड़े दयालु लगते हैं। अपनी तकलीफ से ज़्यादा एक अनजान महिला, एक भिखारिन की चिंता ज़्यादा है।’

‘नहीं, चिंता वाली कोई बात नहीं है। मैं तो बस उसकी तकलीफ का अंदाजा लगाने का प्रयास कर रहा था।’मैं हल्के से हंसते हुए बोला-

‘विनायक जी आज के जमाने में इतनी दयालुता ऐसी सोच का कोई मतलब नहीं है। लोग इसे बेवकूफी समझते हैं। और यह भी कि ऐसे लोगों का लोग मिस यूज करते हैं। उनका फायदा उठाते हैं। इसलिए हमें प्रैक्टिकल होना चाहिए।’

‘अब चलिए जो भी है। मैं समझता हूं कि मैं प्रैक्टिकल हूं। इससे पहले यह कि जो आदत है, जो नेचर है मेरा वह तो मैं चेंज नहीं कर पाऊंगा।’

हमारी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि फिर एनाउंसमेंट हुआ। आने वाली तीन और ट्रेनों के कैंसिल होने की सूचना दी गई। जिसे सुन कर मैंने धीरज से कहा- ‘क्या बात है, एक के बाद एक ट्रेनें कैंसिल हो रही हैं। ऐसे में लेट तो खूब होती हैं। लेकिन इस तरह एक साथ कैंसिल नहीं।’ धीरज ने कहा-‘ठीक है, आप सब सामान देखिए। मैं इन्क्वारी से पता करके आता हूं। कोहरे के कारण ट्रेनें लेट हो रही हैं या कोई और बात है।’

लौट कर धीरज ने बताया आगे एक स्टेशन के करीब एक एक्स्प्रेस ट्रेन जबरदस्त हादसे का शिकार हो गई है। बहुत से यात्रियों की डेथ हो गई है। पूरा ट्रैक जाम है। क्षतिग्रस्त है। इसीलिए ट्रेनें कैंसिल की जा रही हैं। यह बताने के साथ ही उसने अपने मोबाइल पर एक न्यूज चैनल का लाइव प्रसारण ऑन कर दिया। चैनल पर वही न्यूज चल रही थी। हर तरफ उसमें हा-हा कार मचा दिख रहा था। एंकर, रिपोर्टर एक्सीडेंट के लिए कयास के आधार तरह-तरह के कारण बता रहे थे। जिसमें सिग्नल को कोहरे के कारण ना देख पाने, ठंड के कारण पटरियों में क्रैक, फिश प्लेट, मेंटिनेंस की कमी से लेकर देशद्रोही शक्तियों द्वारा ट्रैक को नुकसान पहुंचाने आदि तक की बातें थीं।

लोगों की चीख-पुकार, खून-खच्चर मुझसे ना देखा गया तो मैं धीरज के पास से अपनी जगह चला आया। फिर क्रोध में बोला ‘कितना बढ़िया विकास हुआ है अपने देश का। सबसे सुरक्षित कही जाने वाली ट्रेन जर्नी भी सुरक्षित नहीं है। बराबरी करने चले हैं चीन, जापान की। जापान में तो पिछले पचास साल में एक भी ट्रेन दुर्घटना नहीं हुई। जय हो ‘‘पगडंडी विकास’’ की।’ यह कह कर मैं फिर से खुद को लोई में लपेट कर बैठ गया, सुबह होने का इंतजार करते हुए।

धीरज ने भी चैनल बंद कर दिया। फिर से मुंह में तंबाकू दबा ली। इंक्वायरी पर जाते समय पिच्च से थूक कर गया था। कुछ देर वह चुप बैठा रहा। फिर मोबाइल ऑन कर अपने पैरों पर उसे टिका दिया। कंबल ओढ़े ही था। मोबाइल म्यूट मोड पर था। कुछ देर उसे ऐसे देख कर मैंने पूछ ही लिया- ‘क्या देख रहे हैं?’ इस पर उसने गहरी सांस लेकर छोड़ते हुए कहा- ‘टेंशन फ्री चैनल देख रहा हूं।’ जब वह बोल रहा था तो उसके मुंह से ढेर सारी भाप निकल रही थी। मेरे भी।

मैंने कहा ये ‘कौन सा चैनल है जो टेंशन फ्री कर देता है।’ ‘ऐसे बहुत चैनल हैं। ये देखिए।’ उसने मोबाइल थोड़ा मेरी ओर घुमा दिया। एक नजर डालते ही मैंने कहा ‘ओह, तो ये है टेंशन फ्री चैनल।’ धीरज पॉर्न साइट देख रहा था। उसने कहा ‘विनायक जी कुछ भी कहें, कम से कम ये साइट्स मेरा टेंशन तो दूर कर ही देती हैं। इसीलिए इन साइट्स को मैं टेंशन फ्री चैनल कहता हूं।’

मैंने कहा ‘पता नहीं आपने सही कहा या गलत। मेरी समझ में ये नहीं आता कि ये टेंशन फ्री करते हैं या टेंशन फुल। जो चीज मुझे समझ में नहीं आती उसकी तरफ मैं देखता भी नहीं। आप ये देखकर टेंशन फ्री होते हैं तो होइए। मैं तो आराम करूंगा।’ कह कर मैंने अपनी टोपी आंखों के करीब खींच ली। मन में चलता रहा कि कैसे जल्दी घर पहुंचूं। शादी में टाइम से पहुंच पाऊंगा कि नहीं। ऐसे मौसम में सवेरे दस-ग्यारह बजे से पहले बस भी नहीं मिल पाएगी। रात भर जागना अलग है। नहीं कोई सामान ही लेकर खिसक गया तो और मुश्किल। मगर मेरी सारी कोशिश बेकार गई। पता नहीं कब नींद आ गई। मैं वैसे ही बैठे-बैठे सो गया।

नींद तब खुली जब एक चाय वाला चाय-चाय करता सामने से निकल गया। टाइम देखा तो सुबह के सात बज रहे थे। धीरज पर नजर डाली तो वह जागता मिला। चाय पी रहा था। उसी ने चाय वाले को बुलाया था। नजर मिलते ही बोला ‘विनायक जी आप तो खूब सोए, बहुत थके हुए लग रहे थे।’ मैंने कहा हां ‘पता नहीं कब नींद आ गई।’ तभी मेरा ध्यान लोई पर गया। यह देख कर कि मेरी लोई के ऊपर एक और लोई पड़ी है, मैंने उसे उठाया कुछ समझता कि तभी धीरज बोला-

‘मैंने ही ओढ़ा दिया था। देखा कि आप सोते हुए भी कांप रहे हैं, तो मैंने सोचा कैसे व्यक्ति हैं, दूसरे को आराम देने के लिए खुद को तकलीफ में क्या बल्कि अपनी जान ही खतरे में डाल रखी है। ऐसे व्यक्ति के लिए कुछ करने का कर्त्तव्य तो मेरा भी बनता है। लेकिन भाई मैं आपकी तरह महान नहीं हूं, इसलिए कंबल खुद ओढे़ रहा कि मुझे ठंड ना लगे। लोई खाली थी तो वह आपको ओढ़ा दी। फिर कुछ देर बाद आपका कांपना बंद हुआ। आप गहरी नींद सो गए।’ इसी बीच धीरज ने चाय वाले को इशारा कर मुझे भी चाय दिलवाई। मैंने उसे चाय, लोई दोनों के लिए धन्यवाद कहा। बोला- ‘भाई आपने तो परिवार के सदस्य की तरह मेरा ध्यान रखा। मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा।’

गरम-गरम चाय बड़ी राहत दे रही थी। प्लेटफॉर्म पर अब कुछ ज़्यादा लोगों की आवा-जाही भी शुरू हो गई थी। तभी मेरा ध्यान उस महिला की तरफ फिर गया कि देखूं उसका क्या हाल है? उठी कि नहीं। मगर उधर देखते ही मुझे तेज़ झटका लगा। उसे मैंने जो कंबल, शॉल ओढ़ाई थी वह सब गायब थे। महिला उसी तरह अब भी पड़ी थी। खाने का जो सामान मैंने उसके सिराहने रखा था वह भी गायब था।

मैं जल्दी से उठ कर उसके पास गया। करीब से उसे देखा तो मेरे होश उड़ गए। महिला के चेहरे पर मक्खियां लग रही थीं। मुझे समझते देर नहीं लगी कि उस बेसहारा, बेचारी के प्राण पखेरू उड़ चुके हैं। शायद रात में उसी वक्त उड़ गए थे जब मैं उसे कंबल वगैरह ओढ़ा कर कुछ देर बाद यह समझ बैठा था कि अब वह ठंड से राहत मिलने के बाद आराम से सो रही है।

मुझे बहुत दुख हुआ। अपने को दोषी मानते हुए मैंने सोचा कि जब पहली बार इसे ठंड से कांपते हुए देखा था तभी इसे हॉस्पिटल भिजवाने का प्रयास करना चाहिए था। इसे ट्रीटमेंट मिल जाता तो यह बेचारी बेमौत ना मरती। साथ ही मुझे बेहद आश्चर्य और गुस्सा आ रही थी कि इंसानियत क्या दुनिया से बिल्कुल खत्म हो गई है कि एक मरते हुए प्राणी के तन पर से भी कपड़ा उठा ले गए।

मैं मूर्तिवत खड़ा एकटक उसके चेहरे को देख रहा था। मुझे बड़ी आत्मग्लानि महसूस हो रही थी। कि बेचारी मेरी नादानी से मर गई। मैं इतना मूर्ख हूं कि कब मुझे क्या करना चाहिए यह भी तय नहीं कर पाता। तभी धीरज मेरी बगल में आकर खड़ा हो गया। उसने उसे देखते ही कहा-

‘अरे ये तो मर गई है।’

‘हां... लेकिन उस आदमी को क्या कहूं जो इसका कंबल, शॉल भी उठा ले गया। कैसे-कैसे निष्ठुर लोग हैं इस दुनिया में।’

‘निष्ठुर क्या, वह भी इसी के जैसा रहा होगा। उसे भी जरूरत रही होगी, तो ले गया। चलिए आइए। पुलिस आ गई तो दुनिया भर की पूछ-ताछ हम लोगों से करेगी।’

मैंने सोचा इसे बचा तो नहीं सका लेकिन कम से कम इसके अंतिम संस्कार का तो कुछ इंतजाम कर ही दूं। मैंने धीरज से कहा ‘पुलिस क्या आएगी। अभी तो कहीं ठंड में दुबकी सो रही होगी।’ फिर मैंने जी. आर. पी. को सूचना दी। धीरज का मन नहीं था कि मैं यह सब करूं। जी.आर.पी. ने मेरा मोबाइल नंबर, नाम सब नोट कर लिया।

उन्हीं से पता चला कि कई महिने पहले एक ट्रेन से इसे लेकर कुछ लोग उतरे। फिर इसे यहीं छोड़ कर चले गए। यह कुछ विक्षिप्त सी थी। कुछ बता नहीं पा रही थी। पूछ-ताछ करने पर बस रोती थी। बहुत कोशिश की गई, लेकिन कुछ पता नहीं चला। फिर इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया। यहीं मांगती-खाती पड़ी रहती थी। उसकी व्यथा-कथा सुन कर मेरा हृदय रो पड़ा। बड़ा क्रोध आया उसके परिवार वालों पर कि कैसे कमीने लोग थे जो ऐसी हालत में बेचारी को बोझ समझ कर यहां लावारिस छोड़ गए।

बड़े भारी मन से मैं धीरज के साथ स्टेशन से बाहर आ गया। उसके ढेर सारे सामान को बाहर लाने में मैंने पूरी मदद की थी। उसने अपनी आदत के विपरीत अपनी यात्रा कैंसिल कर दी थी। और घर चला गया था। हम दोनों ने एक दूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया था। हम दोस्ती की राह पर चल पड़े थे। मैं बस स्टेशन की तरफ चल दिया कि कुछ तो साधन मिले। जिससे मैं घर अपने परिवार के पास पहुंचूं। रात में कई घंटे सो लेने से मैं राहत महसूस कर रहा था। धीरज की तरह पस्त नहीं था।

बड़ी मसक्कत के बाद मुझे ग्यारह बजे प्रयाग के लिए बस मिली। वहीं से मुझे किशनगंज के लिए ट्रेन मिलनी थी। बस स्टेशन से बस जब बाहर निकलने लगी तो मेरी नजर स्टेशन में यात्रियों के बैठने के लिए बरामदे में बने सीमेंटेड बेंच पर चली गई। जो कंबल मैंने महिला को ओढ़ाया था वही ओढ़े एक अधेड़ सा व्यक्ति बैठा था। उसके ही बगल में उसी की हमउम्र एक महिला बैठी थी जिसने वही शॉल ओढ़ रखी थी जो मैंने रेलवे स्टेशन वाली महिला को ओढ़ाया था। मगर इस महिला को मैं इस मामले में अभागी नहीं कह सकता था। क्योंकि उसका पति या जो भी हो, कोई तो था जो उसके साथ था।

बस रेंगती हुई और आगे बढ़ रही थी। और मेरी नजर बस की खिड़की से बराबर उन दोनों पर लगी थी। धूल से गंदे उनके चेहरे, आदमी की धूल में सनी बरसों से ना बनाई गई उलझी हुई करीब-करीब पूरी ही पक चुकी दाढ़ी। वह दोनों भी भीख से अपनी ज़िन्दगी गुजर-बसर करने वाले लग रहे थे। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि यह दोनों उस महिला के मरने के बाद कपड़े उठा लाए थे या उसके जीते जी, जिसके कारण ठंड से वह मर गई। उनको मैं ओझल होने तक देखता रहा। बस अब तक स्टेशन से निकल कर मेन रोड पर आ चुकी थी। तभी मोबाइल पर पत्नी का फ़ोन आ गया। सवेरे आठ बजे जब उसका फ़ोन आया था तब मैंने उसे यहां जो कुछ हुआ वह नहीं बताया था। बस इतना कहा था कि टाइम से कुछ घंटे देर से पहुंचूंगा ।

फ़ोन रिसीव करते ही वह सुबुकते हुए बोली। ‘बड़ा गजब हो गया।’ फिर उसने विस्तार से पूरी कहानी बता दी। कि मेरे साले की जिस लड़की से शादी होनी थी उसके चाचा अपने तीन बच्चों, पत्नी के साथ आ रहे थे। जिस ट्रेन का एक्सीडेंट हुआ उसमें उनकी परिवार सहित डेथ हो गई। लड़की वालों के यहां हा-हा कार मचा हुआ है। उसके परिवार के लोग डेड बॉडीज के लिए रवाना हो चुके हैं। शादी का होना तो अब मुश्किल ही लग रहा है। उसके परिवार वालों को जब फ़ोन किया गया तभी उन्होंने खुद ही कह दिया कि इस डेट में तो शादी नहीं होगी। सारे रिश्तेदारों को फ़ोन कर करके मना किया जा रहा है। पत्नी को मैंने शांत रहने को कहा। वह उस समय अपने मायके पहुंच चुकी थी। मैंने सास-ससुर, साले से बात की। उन्हें धैर्य रखने को कहा।

पत्नी को बता दिया कि अब इस समय मेरे आने का कोई मतलब नहीं रह गया है। इसलिए मैं बाद में आऊंगा। मैंने धीरज की तरह अपनी यात्रा कैंसिल कर दी। बस स्टेशन से करीब दो-तीन किलो मीटर आगे निकल चुकी थी। मैं उसे वहीं रुकवा कर उतर लिया। और वापस घर को चल दिया। रास्ते भर यही सोचता रहा कि इन सत्तर सालों में देश ने ना जापान, चीन से आगे विकास किया होता कम से कम उसके करीब तो होते। और तब देशवासी ऐसी दुर्घटनाओं, ठंड, गरीबी, भूख, गर्मी, से यूं ही बेमौत में ना मर रहे होते। ऐसे परिवार के परिवार तबाह बर्बाद ना हो रहे होते। हे ईश्वर इस देश का भाग्य कब बदलोगे? देश के इन कर्ता-धर्ताओं से तो उम्मीद रही नहीं। अब तुम्हीं कुछ क़दम क्यों नहीं उठाते? मेरी यात्रा की तरह देश का विकास क्यों कैंसिल कर रखा है। हे ईश्वर, हे ईश्वर कुछ तो बोलो।

[ समाप्त ]

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