मेरी जनहित याचिका - 9

मेरी जनहित याचिका

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग 9

मेरे आने के करीब तीन घंटे बाद शंपा ग्यारह बजे घर आई। अक्सर इतनी देर होती ही रहती थी इसलिए मैं निश्चिंत था। उसे फ़ोन नहीं किया। और करीब हफ्ते भर बाद मैंने फिर खाना भी बना लिया था। भूख लगी थी लेकिन शंपा का इंतजार करता रहा कि आएगी तो उसके ही साथ खाऊंगा। वह पोर्च में कार खड़ी कर अंदर आई तो उसके हाथ में कागज़ों के दो भारी भरकम बंडल थे। वह पैम्पलेट थे। उसके अभियान से संबंधित। जिसे लेने हम दोनों को साथ जाना था। लेकिन वह बताए बिना अकेली ही ले आई। मेरे दिमाग से उतर गया था कि सात बजे उसे कॉल करना था। बंडल उसने एक तरफ पटका। सोफे पर बैठ गई।

मैंने कहा बताया नहीं साथ ले आते। उसने बड़े बेरूखेपन से कहा ‘मैंने सोचा ले आते हैं। कौन सा बड़ा काम है, सम्मेलन के दो महीने बचे हैं। तैयारी ठीक से हो नहीं पा रही है।’ मैंने कहा चलो मैं कल से और समय निकालता हूं। नहीं होगा तो कॉलेज से कुछ दिन कि छुट्टी ले लूंगा। मेरी इस बात पर वह कुछ बोली नहीं। उठ कर बाथरूम में चली गई। मुझे यह बुरा लगा कि मैं तो बात कर रहा हूं। इसके काम के लिए छुट्टी लेने को तैयार हूं। लेकिन ये अभी तक ताव दिखा रही है। बेवजह तमाशा किया हुआ है। आखिर मुझे भी गुस्सा आ सकता है। मन ही मन कहा खाना बना दिया है। अब निकलूंगा नहीं। ऐसे ही सोचता हुआ मैं बैठा रहा। वह बाथरूम से बाहर आई किचेन में गई तो मुझे लगा इसे भूख लगी है।

उसके अंदर जाते ही बर्तनों की आवाज़ आने लगी। उन आवाजों में भी मुझे गुस्से की झलक दिख रही थी। बाहर आई तो दोनों हाथों में खाने की प्लेट लेकर आई। सामने रखते हुए कहा। ‘जब बना लिया था तो खा भी लेते। बेकार इंतजार करने की ज़रूरत क्या थी?’ उसे खाना लाते देखकर जो खुशी हुई थी। उसकी इस बात से मूड फिर खराब हो गया। मैंने कहा सोचा साथ खाते हैं। फिर वह कुछ ना बोली खाना उसने रोज की अपेक्षा दुगुनी तेज़ी से खत्म किया। फिर प्लेट ले जाकर किचेन में रख कर हाथ वगैरह धोकर बेडरूम में चली गई। हम रोज खाना एक साथ खत्म करके उठते थे। कभी बर्तन वो रख आती थी। कभी मैं।

उसकी इस हरकत ने मुझे फिर परेशान किया। उसे मैं उसी मेगा साइज टी-शर्ट में बेडरूम की तरफ जाते देखता रहा लेकिन कुछ कह नहीं सका। मैं माहौल को बेहतर बनाने की कोशिश में था। खाना खत्म कर मैंने भी बर्तन वगैरह किचेन में पहुंचाए और बेडरूम में पहुंच गया। शंपा ने लाइट ऑफ कर रखी थी। ड्रॉइंगरूम के दरवाजे की तरफ से वहां इतनी लाइट पहुंच रही थी कि चीजों को कुछ हद तक देखा जा सकता था।

मैंने लाइट ऑन की तो मेरा मूड एकदम से खराब हो गया। कि ये क्या तरीका है गुस्सा दिखाने का? ये कोई तरीका नहीं हुआ। बातें सुबह ही बहुत हो चुकी थीं। और मैंने यही समझा था कि मामला खत्म। लेकिन इसने तो मामला जैसे का तैसा बना रखा है। जैसा सुबह कहा था वैसा ही किया। अपनी टी-शर्ट सच में निकाल दी है। बिना कपड़ों के ही करवट लिए लेटी है। टी-शर्ट वहां कहीं आस-पास भी नहीं दिख रही थी। जानबूझ कर उसे कहीं छुपाया हुआ था।

आखिर मैं भी अपने गुस्से को काबू में नहीं रख पाया। मैंने कहा शर्ट क्यों नहीं पहनी ये क्या तमाशा बना रखा। वह कुछ नहीं बोली लेटी रही तो मेरा गुस्सा और बढ़ गया। इस बार मैंने थोडी़ तेज़ आवाज़ में कहा इस तरह आखिर तुम कहना क्या चाहती हो। इतना तनाव मैं नहीं बर्दाश्त कर सकता। जो कहना चाहती हो साफ-साफ कहो।

‘मैं ना कुछ कहना चाहती हूं ना मैंने कोई तनाव फैला रखा है, ठीक है। मैं नहीं चाहती कि मेरा एक बार फिर रेप हो। इसलिए शर्ट नहीं पहनी। आगे भी नहीं पहनूंगी। आखिर सोते समय ज़रूरत ही क्या है इनकी। यहां हमारे बीच कोई तीसरा है ही नहीं और हमारे बीच कुछ छिपा नहीं है। ठीक है। अब सो जाओ मुझे नींद आ रही है। मैं बहुत थकी हुई हूं।’

उसके इस अजीबो-गरीब जवाब से मैं खीझ उठा। मगर चुप रहा। उलझन के कारण बहुत देर रात में सोया। सुबह उठा तो उसे कल ही की तरह फिर ड्रॉइंगरूम में काम करते पाया। चाय भी सामने रखी थी। मैं बैठ गया तो उसने बिना कुछ बोले जो एक और कप रखा था उसमें चाय भरकर मेरी तरफ खिसका दिया। वह जैसे पहले से सोचे बैठी थी कि मैं जब आऊंगा तो चाय इस तरह वह मुझे दे देगी। मैंने भी चाय ले ली। दो तीन शिप लेने के बाद मैंने कहा गुस्सा उतर गया। तो वह चुप रही। फिर रीपीट किया तो कुछ देर बाद बोली ‘मैं गुस्सा-वुस्सा नहीं थी। मैंने अपनी बात कही थी। अब भी वही कह रही हूं। मैं अपनी बात से पीछे नहीं हटी हूं।’

जब गुस्सा नहीं थी तो रात में क्यों किया वह सब।

‘देखो मैं फिर कह रही हूं कि तुम या तो बात को समझ नहीं रहे हो। या समझना नहीं चाह रहे हो। या फिर मैं समझा नहीं पा रही हूं। मैं रात में ही सब कह चुकी हूं। जब तुम उस टी-शर्ट के कारण आउट ऑफ कंट्रोल हो जाते हो तो मेरी सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। ऐसे में मुझे सही यही लगा कि कारण ही खत्म कर दूं। वैसे भी जब कोई चीज ढकी रहती है तो क्यूरीसिटी पैदा हो जाती है, जब क्यूरीसिटी ही नहीं होगी तो...।’

क्या ऊटपटांग बोलती जा रही हो। अगर औरतें लड़कियां कपड़े ना पहने तो क्या रेप नहीं होगा। ‘मेरी बात का मतलब यह नहीं है। तुम कुतर्क कर रहे हो। कपड़े का अपना महत्व है। बात मैंने अपने तुम्हारे इस घर के अंदर के दायरे की है। और तुम उसे समग्र में लिए जा रहे हो। रजनीश अगर कहते थे कि घर में किशोरवय होने तक बच्चों को निर्वस्त्र ही रखा जाए तो वह यूं ही तो नहीं कहते थे। बात मानसिकता के निर्माण की है। कपड़े से मुक्ति पा लेने की नहीं।’

मैं नहीं मानता कि ऐसा कुछ होने वाला है। यदि ऐसा होता तो स्पेन, या सारे यूरोपियन देशों, पश्चिमी देशों में रेप या सेक्सुअल हैरेसमेंट की घटनाएं होनी ही नहीं चाहिए। या नाममात्र को होनी चाहिए। वहां तो घर क्या बाहर भी न्यूडिटी हावी रहती है। ‘अफसोस तुम्हारे इस तर्क पर मैं यह कह सकती हूं कि तुम्हारे फार्मूले से भी तो बात बनती नहीं दिख रही। यदि कपड़े पहन कर इनसे बचा जा सकता है तो मुस्लिम देशों में या मुस्लिमों में तो औरतें सिर से पैर तक कपड़ों की कई तहों में ढकी-मुंदी रहती हैं। लेकिन रेप उनके यहां भी बराबर होते रहते है।

सेक्सुअल हैरेसमेंट वहां भी बराबर बना हुआ है। जब कि मौत तक की सजा दी जाती है। इस लिए सच यह है कि मानसिकता के निर्माण की बात होनी चाहिए। ऐसी मानसिकता का निर्माण कि लोग रेप या महिलाओं के शोषण की बात सोचे ही ना। क्यों कि ऐसा किए बिना ना ये रुका है ना रुकेगा। चाहे लोगों को मौत की सजा दो , उनके टुकड़े-टुकड़े कर दो कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला।

निर्भया कांड के बाद वर्मा आयोग ने कानून सख्त किए लेकिन कोई फ़र्क पड़ा क्या? उससे भी वीभत्स कांड बराबर होते जा रहे हैं। केरल में ही लो जहां उच्च साक्षरता दर है। स्टूडेंट का रेप जिस बर्बरता से किया गया उस के सामने निर्भया के साथ हुई बर्बरता कुछ नहीं थी। केरल में लड़की के शरीर में ना जाने कैसी-कैसी भयानक चीजें इंसर्ट की गईं। उन्हें अंदर ही भयानक तरीके से मूव करा कर ऐसे खींचा गया कि उसके अंग क्षत-विक्षत हो गए। सारी आंतें बाहर आ गईं। इसके कुछ ही दिन बाद लॉ स्टूडेंट के साथ यही किया गया। उसके शरीर पर अड़तीस घाव थे। इस समस्या को रोकने के लिए जो तरीके अपनाएं जा रहे हैं वे वैसे ही हैं जैसे कोई पानी की टंकी बुरी तरह जंग खा गई है। उसे बदलने के बजाय लीकेज को बंद कर-कर सड़ चुकी टंकी का समाधान ढूंढ़ा जाए।’

तुम जैसे चाह रही हो उस हिसाब से तो ऐसी मानसिकता डेवलप करने के लिए दो-तीन पीढ़ियां चाहिए। उसके बाद भी गारंटी नहीं है। ‘यदि दो-तीन पीढ़ियों में टंकी बदली जा सकती है तो कोशिश होनी ही चाहिए। आखिर सदियों से लीकेज बंद कर-कर के देख लिया गया। समस्या जस की तस है। जब यह तरीका फेल हो चुका है तो नया तरीका क्यों ना आजमाया जाए?’

तो मैडम लीकेज बंद करने की कोशिश छोड़ कर मेरी मानसिकता बदलने की कोशिश करो। कल रात जो किया वह अब ना करना। मैंने यह बात प्यार से कहते हुए उसके गालों को ऐसे खींचा जैसे किसी छोटे बच्चे के खींचे जाते हैं। इस पर उसका जो जवाब आया उससे मुझे परेशानी हुई। उसने कहा ‘वह तुम्हारी मानसिकता बदलने के मैथड का ही एक हिस्सा है। इसलिए वह कंटीन्यू रहेगा।’ मुझे इस बात से गुस्सा लगी। लेकिन मैं कुछ बोला नहीं उठकर चल दिया दूसरे कमरे में।

उसका मेरी मानसिकता बदलने का प्रयोग चलता रहा। सम्मेलन की तैयारी होती रही। मगर जब सम्मेलन हुआ तो उसके साथ-साथ मेरे पैरों तले की भी जमीन खिसक गई। तैयारी के दौरान लोगों से मिल रहे रिस्पांस के आधार पर हमने अनुमान लगाया था कि कम से कम दस हज़ार लोग आएंगे। मीडिया भी अच्छा रिस्पांस देगी, कवरेज देगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मुश्किल से सौ लोग आए। मीडिया के गए गुजरे से दो चार पत्रकार आए चलते बने। जो सौ लोग आए वो भी आए और चल दिए। जिन लोगों को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था उनमें से सिर्फ़ दो आए।

जब वो आए तो पचास लोग भी नहीं बचे थे। तो वो इसे अपनी इंसल्ट समझ कर चल दिए। शंपा अपना वक्तव्य पढ़कर ही चुप हुई। चुप होने के बाद वह काफी देर तक मूर्ति बनी बैठी रही। उसे गहरा सदमा लगा था। उसे हर तरफ से धोखा मिला था। यहां ऐन टाइम पर बहुत से लोगों ने जो चंदा देने की बात कही थी वह भी गायब हो गए। जिससे कर्ज बहुत बढ़ गया। हारे जुआरी से जब हम घर पहुंचे तो एकदम चुप थे। मैं सबसे ज़्यादा इस बात से परेशान था कि अब हम दोनों लाखों रुपए का कर्ज कहां से भरेंगे।

होम लोन पहले ही गले को नापे रहता है। मगर इस परेशानी से ज़्यादा मुझे दुख इस बात का था कि सम्मेलन असफल नहीं बल्कि पूरी तरह उस पर पानी फिर गया था। शंपा आते ही बेड पर ऐसे निढाल होकर पड़ गई जैसे शरीर में जान ही ना हो। जैसे योग के शवासन में पड़ी हो। मैं भी बेड पर एक तरफ बैठा था। मैंने कुछ देर बाद देखा उसकी आंखों की कोरों से आंसू निकल-निकल कर उसके कानों तक जाकर उन्हें भिगो रहे थे। वह भीतर ही भीतर रो रही थी।

कुछ ही देर में मुझे लगा कि अब यह सिसक पड़ेगी। मुझसे उसकी हालत देखी नहीं गई। मैंने उसके चेहरे को दोनों हाथों से प्यार से पकड़ते हुए कहा शंपा ये क्या? तुमसे मुझे यह उम्मीद नहीं थी। तुम एक स्ट्रॉन्ग लेडी हो। मेरी नजरों में तुम किसी आयरन लेडी से कम नहीं हो। हम हारे नहीं हैं। हम फेल नहीं हुए हैं। हमने अपने उद्देश्य की तरफ पहला क़दम बढ़ा दिया है। हमारे क़दम अब पीछे नहीं हटेंगे।

शंपा दिल्ली जैसे शहर में सौ लोगों का आना भी बहुत बड़ी बात है। इस बार सौ हैं, आगे सौ हज़ार होंगे। शंपा याद रखो हर बड़ा काम छोटे से ही शुरू होता है। जीरो से ही शुरू हो कर आगे असंख्य नंबर बनते हैं। आगे हम बढ़ेंगे तो कारवां बनेगा ही। आज सौ आए हैं हमारी यह उपलब्धि नहीं है। यह हमारी उस महान उपलब्धि का बीज है जो हमें भविष्य में मिलने वाली है। विशाल वटवृक्ष एक सूक्ष्म से बीज से ही निकलता है। मेरे इतना कहते-कहते शंपा चुप होने के बजाय फ़फ़क कर रो पड़ी।

एकदम उठकर मुझसे लिपट गई, मेरी छाती में सिर छिपाए बड़ी देर तक रोती रही। मैं उसे अपने में समेटे उसके सिर को सहलाता रहा। चुप कराने की कोशिश करता रहा। बड़ी देर बाद कहीं वह शांत हुई। मैंने कॉफी बनाई। उसे देते हुए कहा। जो हुआ उस पर सोचने के बजाय अब इस प्वाइंट पर सोचना शुरू करो कि आगे क्या करना है। मुझे पीछे मुड़कर देखना अपने पैरो में बेड़ियां डालने जैसा लगता है। उस रात हम दोनों ने ब्रेड, दूध से काम चलाया। खाना वगैरह कुछ नहीं बनाया।

अगले कई दिन हम दोनों ने भारी भरकम कर्ज से कैसे निपटें, इसकी योजना बनाने में निकाल दिए। मगर मेरी परेशानियां शंपा की परेशानियों से कहीं ज़्यादा थीं। सबसे ज़्यादा मैं इस बात से परेशान हो उठा कि शंपा ने अपने मिशन से हटने का डिसीजन ले लिया। उसने साफ कह दिया कि अब वह आंदोलन वगैरह खड़ा करने का प्रयास नहीं करेगी। लेखन के जरिए ही अपने विचारों को फैलाएगी। मुझे उसका यह निर्णय परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने जैसा लगा।

इधर मैं जी वर्ल्ड से अपने कनेक्शन के खुलने के भय से आतंकित होता रहा। इस बीच एक चीज मैंने और देखी कि शंपा अब और ज़्यादा मुझ पर ही डिपेंड होती जा रही है। वह जैसे मुझमें ही सिमट कर रह जाना चाहती थी। उसके पास बस इतना ही काम था पढ़ना-लिखना, सोना। घर के काम में बस थोड़ा बहुत ही हाथ बंटाती। मज़बूरन बाई लगानी पड़ी। एक काम जो रेगुलर था वह मेरे आने के बाद बस यूं ही गाड़ी से घंटे भर घूम आना। यही ज़िंदगी फिर कई साल चली। इस बीच मैंने कर्ज और जी वर्ल्ड के तनाव से मुक्ति पा ली थी।

शंपा की इंकम का भी अच्छा योगदान रहा। शंपा ने इसी दौरान अपनी एक बुक पूरी की। ‘इस दुनिया से उस दुनिया तक’ उसे मैंने फर्स्ट ड्रॉफ्ट से ही पढ़ना शुरू किया था। मेरे कुछ संशोधन शंपा ने स्वीकार भी किए थे। बड़ी कोशिशों के बाद एक नामी पब्लिशर उसे छापने को तैयार हुआ। यह संयोग ही था कि जिस दिन पब्लिशर को मैन्यूस्क्रिप्ट सौंपी उसके अगले ही दिन मुझे कॉलेज के एक ट्रुप के साथ बतौर मैनेजर अमरावती जाने का आदेश मिला। सीनियर प्रोफेसर अनुसुइया खरे के नेतृत्व में यह ट्रुप जा रहा था। उन्हीं के कहने पर मुझे भी जाने का आदेश मिला।

यह दल अमरावती संत परंपरा पर शोध करने वाले छात्रों का था। मैंने सोचा शंपा को भी लेता चलूं। उसका खर्च हम खुद उठाएंगे। वह अध्ययनशील विद्वान महिला है। साथ रहेगी तो अच्छा रहेगा। सीनियर प्रोफ़ेसर से भी बात कर ली। उन्होंने कहा नियमतः तो नहीं चल सकते लेकिन चलो मैनेज किया जाएगा। लेकिन शंपा ने मना कर दिया। लाख कहने पर भी नहीं मानी। एक ही तर्क कि ‘मैं रहूंगी तो तुम अपना काम ठीक से नहीं कर पाओगे यह तुम्हारे कॅरियर के लिए अच्छा नहीं। मेरा भी समय किल होगा। इतने समय तक घर को बंद छोड़ देना भी ठीक नहीं।’ उसकी दोनों ही बातें सही थीं। तो अकेले गया अमरावती।

वहां वाकई मेरा मन नहीं लग रहा था। शंपा से मेरा कितना लगाव है। वह मेरे लिए कितनी जरूरी है। यह मैं सही मायने में वहीं महसूस कर रहा था। शुरू के कई दिन तो मैं सो ही नहीं सका। उठ-उठ कर उससे फ़ोन पर बातें करता। वह कहती ‘सो जाओ मेरे लाल। मेरे नीले। मेरे मुन्ने। मुझे भी सोने दो। दिन भर से कितनी बातें कर चुके हो। कितनी बार कर चुके हो। तुमने तो यंग कपल को भी मात कर दिया है।’ यह बात बिलकुल सही है कि हम किसे कितना चाहतें हैं, इसका सही अंदाजा तभी लगता है जब हम उससे दूर होते हैं। वहीं मुझे अहसास हुआ कि इसके बिना तो मेरा जीवन है ही नहीं।

वहां गए दस दिन हो गए थे, और मैं बस अपने को किसी तरह संभाल रहा था। ग्यारहवें दिन हम पूरी टीम करीब नौ बजे खाना खा रहे थे। तभी मोबाइल पर रिंग हुई। देखा शंपा का फोन था। रिंग के साथ उसकी खिलखिलाती हुई फोटो स्क्रीन पर आ जाती है। प्रोफेसर अनुसुइया ने व्यंग्य भरी मुस्कुराहट के साथ मुझे देखा फिर खाने में जुट गईं।

मैंने कॉल रिसीव कर जैसे ही हैलो कहा उधर से किसी जेंट्स की आवाज़ सुनते ही मेरा दिल एकदम घबरा उठा। कॉल करने वाले ने अपने को पुलिस इंस्पेक्टर बताया। पूछा ‘ये मैडम शंपा आपकी कौन हैं।’ मैंने बताया वाईफ तो उसने सिलसिलेवार एक स्वर में बता दिया कि इनकी कार का एक्सीडेंट हो गया है। यह सुनते ही मारे घबराहट के मैं पसीने से तर हो गया। मैं एक झटके में हकलाते हुए पूछ बैठा कहां? कैसे? वो ठीक तो हैं?

यह बोलते-बोलते मैं उठ खड़ा हुआ। खाना खाते बाकी लोगों के हाथ भी जहां के तहां ठहर गए। सब की प्रश्नवाचक दृष्टि मेरे चेहरे पर ठहर गई। इंस्पेक्टर ने उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती वगैरह कराने की बात बता दी। यह भी बताया कि हालत सीरियस है। तुरंत आएं मैंने कहा मैं अमरावती में हूं। उसने कहा यहां लोकल कोई हो तो उसे भेजिए। मैंने सीधे प्रोफे़सर साहब को फ़ोन कर के उन्हें सारी बात बताई। उनसे रिक्वेस्ट की तुरंत हॉस्पिटल पहुंचने के लिए। फिर कई और दोस्तों से भी बात की। अमरावती से मैं नागपुर पहुंचा। वहां से मुंबई की फ्लाइट मिली। वहां से अगले दिन दिल्ली पहुंचा। वहां से कोई सीधी फ्लाइट ना मिलने के कारण बड़ा टाइम लग गया।

मैं एयरपोर्ट से सीधा हॉस्पिटल पहुंचा तो वहां मुझे प्रोफे़सर साहब और कई दोस्त मिले। सब गेट पर ही मिल गए। मैं हांफता-कांपता उनके पास पहुंचा सबके चेहरे अजीब से बुझे-बुझे लटके हुए थे। उन सबको ऐसे देख कर किसी अनहोनी की आशंका से मैं कांप उठा। प्रोफ़ेसर साहब से मैंने पूछा तो उन्होंने कंधे को पकड़ कर ढांढ़स बंधाते हुए कहा ‘समीर हिम्मत से काम लो’ इसके बाद मुझे समझते देर नहीं लगी। मेरे आंसू बह चले, मेरे मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी। मैं जहां खड़ा था वहीं बैठ गया। मेरी दुनिया एकदम अचानक ही उजड़ गई थी। शंपा मुझे छोड़कर चली गई थी। उसकी डेड बॉडी पोस्टमार्टम के लिए भेजी जा चुकी थी।

मेरे दोस्त मुझे अपने घर लेते गए। अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद शंपा का पार्थिव शरीर मिला। मैंने शाम तक अपने मित्रों के साथ उसका अंतिम संस्कार कर दिया। घर लौटा तो लगा जैसे शरीर में जान ही नहीं रही। दोस्तों ने संभाला। अगले तीन दिन में बाकी संस्कार पूरे कर दिए। जब तक इन सब कामों में बिजी रहा तब तक तो अहसास उतना नहीं हुआ लेकिन उसके बाद जब रात में लेटा तो मैं खुद को रोक ना सका। बेड पर एक तरफ उसके होने की आदत पड़ गई थी। बार-बार मेरा हाथ उस हिस्से को छू रहा था जिस पर शंपा रहती थी। लगता जैसे शंपा आकर लेटने ही वाली है। मैं उसका अहसास करते हुए फ़फ़क कर रो पड़ा। पूरे घर में मेरी आवाज़ पहुंच रही थी।

मगर मेरा अपना कोई होता तब तो मेरे पास आता। मैं रोते-रोते पस्त हो गया। खुद को कोसने लगा कि आखिर मैं उसे अकेले छोड़ कर गया ही क्यों? ना मैं जाता। ना वह बाहर शराब पीकर गाड़ी ड्राइव करती। मैं होता तो उसके इस काम के लिए खुद चला जाता। मैं इस बात का सख्ती से पालन करता था कि ड्रिंक के बाद बाहर जाना ही नहीं है। उससे मैंने आधे घंटे पहले ही फ़ोन पर जब बात की थी तब कहा भी था रात हो गई है, अब मत जाओ। मगर अपने काम के जुनून में वह खुद को ना रोक पाई। मैं यह जान भी नहीं पाया था कि उस समय उसने ड्रिंक कर रखी है। नहीं तो चाहे जैसे हो उसे रोकता।

मैंने सोचा खुद तो चली गई। इतना बड़ा काम जो छोड़ गई है अब वह कैसे होगा? कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि जब वह अपने को रेगिस्तान से बाहर खुश पा रही थी, अपने सपनों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रही थी तो एक छोटी सी गलती कर अपना सब कुछ क्षण भर में खो दिया। अपनी ड्रीम बुक भी पब्लिश हुई ना देख पायी। सारी मेहनत पर पानी पड़ गया। और जो मुझे अकेला छोड़ गई, मेरा क्या होगा? अब कौन रहा मेरा इस दुनिया में? भाई बहन सब ना जाने कितने बरसों से एक दूसरे को भूल चुके हैं। अब क्या करूं?

यह ‘क्या’ ही मुझे अब तक जीवन में बार-बार उठ खड़े होने की ताकत देता रहा है। मैं हर बार आगे बढ़ने में सफल रहा हूं तो इस बार भी मेरी आत्मा की आवाज़ ने मुझे शंपा के सपने जो कि मेरा भी सपना हैं, को पूरा करने के लिए उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। उस स्थिति में भी मैंने तय कर लिया कि किताब छप कर आते ही मैं आगे बढूंगा। उसका बाकी लिटरेचर भी छपवाऊंगा और अब प्रोफे़सर आयशा को शामिल करूंगा।

वह शंपा के समय से ही इच्छुक हैं। आयशा मुस्लिम महिलाओं की तलाक समस्या का समाधान ढूढ़ने के लिए शंपा जैसी महिला का साथ चाहती थीं। क्यों कि वह भी इस दंश का शिकार हैं। उस वक्त ना जाने क्या हुआ कि मेरा दिमाग कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हो उठा। अचानक ही यह ख़याल भी मन में आया कि सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करूंगा कि ऐसे सारे कानूनों में संशोधन किया जाए जो किसी भी स्त्री-पुरुष या संस्था के खिलाफ किसी भी पक्ष के लिए एक तरफा कार्यवाई करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जरूरत हुई तो और भी क़दम उठाऊंगा। जिससे मंझली जैसी शख्सियत किसी कानून का दुरुपयोग न कर सके।

ऐसे ही सोचते रोते सिसकते देर रात किसी समय नींद आ गई। सुबह करीब नौ बजे नींद खुल गई। कॉल बेल बार-बार बजे जा रही थी। बड़ा बुरा लग रहा था। पूरा बदन टूट रहा था। किसी तरह अपने को खींचते-खांचते जाकर दरवाजा खोला। सामने प्रोफ़ेसर आयशा खड़ी थीं। पिछले कई दिन की तरह बड़े से हॉट पॉट में फिर वो नाश्ता, खाना-पीना ले कर आई थीं। मैं उन्हें नमस्कार कर अंदर ले आया।

प्रोफ़ेसर से कॉलेज में ही परिचय हुआ था। वह कॉलेज में भी मेरे लिए कुछ ना कुछ लाती ही रहती हैं। कॉल बेल की आवाज़ से जो गुस्सा आया था वह उन्हें देखते ही खत्म हो गया। उन्होंने मुझसे कहा ‘तैयार हो जाओ समीर। संभालो अपने को। जाने वाले को तो लाया नहीं जा सकता। जीने के लिए समय बहुत कम भी है। बहुत ज़्यादा भी। दुनिया बहुत छोटी भी है और बहुत बड़ी भी। यह दोनों हमारे सामने कैसी होंगी यह हम पर डिपेंड करता है।’

आयशा मेरे इतने करीब थीं कि उनकी गर्म सांसों को मैं महसूस कर रहा था। अचानक लगा जैसे ठीक उनके पीछे ही मंझली खड़ी है। फिर अगले ही पल मन में कहा पता नहीं कहां होगी? कैसी होगी? जैसी भी हो एक बार अपने लालच का परिणाम आकर देख ले। उस कानून की विध्वंसक शक्ति से हुई तबाही के परिदृश्य पर एक नजर तो डाल ले।

इसके साथ ही दिमाग में यह आया कि छोटे-छोटे मामलों में भी स्वतः संज्ञान लेकर क़दम उठाने वाली देश की सर्वोच्च न्याय पालिका भी ऐसे विध्वंसक समस्त क़ानूनों से उत्पन्न परिणामों का गहराई से अध्ययन करे, फिर निकले निष्कर्षों के आधार पर संशोधन के लिए क़दम उठाए। जिससे कोई भी क़ानून किसी के हाथ का हथियार ना बन जाए। सच में आखिरी व्यक्ति तक को न्याय मिले। वह सिर्फ़ होता हुआ दिखे ही नहीं ऐसा वास्तव में हो भी।

[ समाप्त ]

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रेट व् टिपण्णी करें

S Nagpal 2 महीना पहले

Ashok Kumar 4 महीना पहले

बहुत ही अच्छी और शानदार स्टोरी थी मैं इसमें इतना जुड़ गया कि पता ही नहीं लगा कि कब पूरी हो गयी। बहुत ही शानदार लेखन है आपका आगे भी यूँ ही लिखते रहो सर जी।

Bhayani Alkesh 4 महीना पहले

Om Vaja 4 महीना पहले