हिम स्पर्श- 57

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अचानक जीत झूले से उठा और वफ़ाई की तरफ भागा। जाती हुई वफ़ाई के हाथ पीछे से पकड़ लिए। वफ़ाई के बढ़ते चरण रुक गये। वफ़ाई का शरीर आगे तथा दोनों हाथ जीत के हाथो में पीछे की तरफ हो गए। जीत की ऐसी क्रिया वफ़ाई को अनपेक्षित थी। वह स्तब्ध हो गई। जीत के स्पर्श से वफ़ाई के पूरे शरीर में एक अनाम प्रवाह प्रवाहित हो गया।

आँखें बंध करके, गहरी सांस लेते हुए वफ़ाई स्थिर हो गई। जीत अब क्या करेगा उसकी प्रतीक्षा करने लगी।

जीत के सामने वफ़ाई की पीठ थी। वफ़ाई के वस्त्र के रंग जीत की आँखों में छाने लगे। रंगों का एक समुद्र लहराने लगा। 

वफ़ाई की पीठ पर उसके खुले बाल थे जो मंद मंद हवा के कारण उसके कंधे पर लहरा रहे थे। उन बालों की कुछ लटें नटखट थी जो वफ़ाई के शरीर की सीमा का उल्लंघन करती हुई जीत को स्पर्श कर रही थी। जीत उस लटों में खो गया, उसके मृदु स्पर्श का अनुभव करने लगा।

जीत ने वफ़ाई को स्नेह से पीछे खींचा। वफ़ाई ने विरोध ना करने के आशय से विरोध किया। उसने अपने शरीर को आगे की तरफ खींचा, जैसे वह जीत के हाथों से छुटना चाहती हो। सत्य तो यह था कि वह जीत के आलिंगन में रहना चाहती थी, उसके स्पर्श की ऊष्मा को अनुभव करना चाहती थी। किन्तु छूटने का अभिनय कर रही थी। वह नहीं कर सकी।

जीत ने धीरे से वफ़ाई को अपनी तरफ खींचा। वफ़ाई के चरण धीरे धीरे पीछे आने लगे। वफ़ाई ने स्वयं को जीत की तरफ खींचने दिया। जीत तक पहोंचने में वफ़ाई ने कुछ समय लिया। कुछ ही क्षणों में वफ़ाई की पीठ ने जीत की छाती को छु लिया।

एक विशाल तरंग खड़क से टकरा गई। तरंग ऊपर उठी, गगन को छूने लगी। वह वर्षा बनकर दोनों पर बरसने लगी। वह वर्षा उत्कटता की थी, भावनाओं की थी, अपेक्षा की थी, स्नेह की थी, एक दूसरे को समर्पित होने की थी।

जीत ने दोनों हाथों से वफ़ाई को घेर लिया। वफ़ाई जीत के आलिंगन में आ गई। वफ़ाई ने दोनों हाथ स्वयं की छाती पर रख दिये। जीत ने उन हाथों को भी घेर लिया।

वफ़ाई के मन में विचार चलने लगे।

जीत, मैं तेरे बाहुओं में बंदी हूँ। क्या यह हाथ ही है जो मुझे बंदी बना रहे हैं? अथवा कुछ और भी है? अथवा मैं ही चाहती हूँ इन हाथों के बंधन को?  

वफ़ाई उसी अवस्था में स्थिर हो गई।

मैं इसी बंधन में रहना चाहती हूँ, जीत। इन क्षणों को जीना चाहती हूँ। तुम्हारे हाथों के कारावास में रहना मुझे अच्छा लगता है। मेरी पीठ तुम्हारी छाती का स्पर्श अनुभव कर रही है। तुम्हारी साँसे मुझे छु रही है। इन साँसों की उष्णता मुझे उत्तेजित कर रही है।

जीत, मेरे साँसों की गति तीव्र हो रही है। तुम भी आँखें बंध कर लो। तुम भी मेरे साँसों को सुन लो। जीत, तुम्हारे हाथ मेरी छाती की पहाड़ियों को छु रहे हैं। मेरी इन पहाड़ियों के साथ तुम्हारे हाथ भी आंदोलित हो रहे हैं। मेरी छाती को घेर रहे तुम्हारे हाथ कंपन कर रहे हैं। प्रत्येक कंपन तरंग रच रहे हैं। क्या यह तरंगे तेरे हाथों को छूकर तेरे हृदय तक जाते हैं? तेरे हृदय का द्वार कहीं बंध तो नहीं, जीत। इन तरंगों के लिए तुम ह्रदय के द्वार खोल दो। मैं तुम्हारे ह्रदय में आ रही हूँ, जीत।

वफ़ाई के बाल जीत को स्पर्श कर रहे थे। जीत भी उस स्पर्श से विचलित था। वह भी स्वयम से कह रहा था -

वफ़ाई, तुम्हारे बालों में यह कैसी सुगंध है? यह सुगंध किसी पुष्प की नहीं, किसी अत्तर की भी नहीं। यह सुगंध कृत्रिम नहीं है, वास्तविक है। अन्य सभी सुगंध से भिन्न है। यह शुध्ध है। यह पवित्र है। यह कुंवारी है। यह उत्तम है। यह अनन्य है। तुम्हारी लटें मेरे गालों को स्पर्श रही है, जैसे किसी पंखी के मृदु पंख हो। कितना मधुर लगता है जब तुम्हारी लटें मेरे गालों से खेलती है, वफ़ाई।

यह लटें हवा में शृंगारिक रस घोल रही है। इन हवाओं का सामना मैं कैसे करूँ? मैं इन की शरण में हूँ, वफ़ाई। यह लटें ऐसे ही उड़ती रहे, मेरे गालों को छूती रहे। कितने मधुर क्षण है यह।

मैं तुम्हारी लटों से, तुम्हारे कानों से कुछ कर बैठूँ तो मुझे क्षमा करना।

जीत के अधर आशा में, लालसा में हिलने लगे। 

वफ़ाई के कानों में काले कर्ण-फूल थे। वह ऊपर से लंबे थे। उसके नीचे के हिस्से में चक्र लगे थे जो  वफ़ाई के कंधो को स्पर्श कर रहे थे। कर्ण-फूल आकर्षक थे। जीत ने देखा कि बालों की कुछ लटें कर्ण-फूल के चक्र में जाकर बस गई है। वह उसे देखता रहा।

हे लटों, तुम मनोहर हो। मोहक हो। मादक हो। अपने साथ खेलने के लिए तुम मुझे आमंत्रित कर रही हो। तुम कुछ संकेत दे रही हो। मैं उन संकेतो को समजने लगा हूँ।  

जीत अपने अधरों से उन लटों पर मंद मंद फूँक मारने लगा। लटें आंदोलित हो गई। लटें वफ़ाई के कंठ को स्पर्श करने लगी। स्थिर खड़ी वफ़ाई, लटों के स्पर्श से तथा जीत की फूँक की उष्णता से प्रवाहित हो गई। जीत के अस्तित्व का, जीत की निकटता का अनुभव करने लगी। वफ़ाई का तन रोमांचित हो गया।

तन का रोम रोम उत्तेजित हो गया। वह रोमांच नसों के माध्यम से ह्रदय तक प्रवाहित हो गया। उस रोमांच में जीत की सुगंध थी।

जीत की एक फूँक ने वफ़ाई को पूर्ण रूप से बदल दिया। वफ़ाई बिखर गई। उस फूँक को समर्पित हो गई।

बांध आँखों से ही वफ़ाई जीत की तरफ घूम गई। वह अभी भी जीत के आलिंगन में थी। उसने धीरे से आँखें खोली, सामने जीत को पाया। दोनों ने एक दूसरे को देखा। चार आँखें मिली। दोनों ने गहरी सांस ली। दोनों की छाती एक साथ गति में आई। दोनों छातियों ने उस गति का अनुभव किया। दोनों के बीच एक सेतु रच गया जिस पर मुक्त रूप से संवेदन प्रवाहित होने लगे।

कुछ कहने के लिए जीत के अधर हिले। वफ़ाई ने उन अधरों को देखा। उसने जीत के अधरों पर अपनी उंगली रख दी, जैसे कह रही हो कि,

शब्दों से इस मौन का भंग ना करो, इन क्षणों को ना तोड़ो। इस समय शब्दों की आवश्यकता नहीं है। कुछ कहने के लिए स्पर्श ही पर्याप्त है।

दोनों के स्पर्श एवं संवेदनों ने अनेक बातें कर ली, जो अधरों से निकले शब्द कभी कह ना पाते।

वफ़ाई ने अपने बंध हाथ खोल दिये। उन हाथों से जीत को घेर लिया। जीत वफ़ाई के आलिंगन में था। दोनों एक दूसरे के आलिंगन में थे। अधूरा आलिंगन पूर्ण हो गया। वह आलिंगन अत्यंत उत्कट थे। दोनों भिन्न विश्व में खो गए।

सब कुछ स्थिर हो गया, शांत हो गया। पवन स्थिर थी। गगन स्थिर था। बादल स्थिर थे। झूला स्थिर था। रंग सभी स्थिर थे। केनवास स्थिर था। तूलिकायेँ स्थिर थी। भीत स्थिर थी। कक्ष स्थिर था। घर स्थिर था। रेत स्थिर थी। सब कुछ स्थिर हो गया। सागर की सभी तरंगे तट पर जाकर स्थिर हो गई थी। इस घटना को निहारने के लिए समय भी स्थिर हो गया। एक पंखी ने गीत गाया। एक काला बादल सूरज को ढँक गया। अकेले गगन में अब बादल भी थे और सूरज भी। अब कोई अकेला नहीं था।

 

 

 

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Hetal Thakor 6 महीना पहले

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Avirat Patel 6 महीना पहले

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Nikita 6 महीना पहले

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Bharati Ben Dagha 9 महीना पहले

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Amita Saxena 9 महीना पहले