हेप्पी न्यु यर Deepak Saxena द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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हेप्पी न्यु यर

ये उस दौर की बात है जब न लोगो के पास फोन हुआ करते थे और जिन इक्का दुक्का लोगो के पास फोन होते भी थे तो उनमे ये फेसबुक और watsapp जैसी चीजे नहीं हुआ करती थी इन सब चीज़ो की ही देन है की आज लोग करवाचौथ की बधाई भी अपनी पत्नी को छोड़कर बाकी सबको दे देते है रक्षाबंधन दिवाली सब कुछ फोन पर ही मना रहे है खैर छोडो ये सब बाते लिखकर मैं भी बाकियो की तरह रोना पीटना नहीं मचाऊंगा अब भैया सुविधा है तो मज़े ले रहे है परेशानी क्या है.
अब आते है अपने ज़माने की बात पे तो क्या जब ये फोन नहीं हुआ करते थे तो बाते नहीं होती थी जब फेसबुक नहीं था तो दोस्ती नहीं होती थी फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेजी जाती थी दोस्ती, प्यार ,बेस्ट फ्रेंड फॉरएवर जैसी चीज़े नहीं होती थी जनाब बिलकुल होती थी दुनिया तब भी उतनी ही रंगीन थी जितनी आज है और मैं तो ये कहूंगा दोस्ती और प्यार के पैगामों में फ़ॉरवर्ड करने जैसी घटिया चीज़ नहीं होती थी.उन पैगामों में कुछ था तो वो था थोड़ा डर,झिझक ,दिल की कुछ अनकही बाते ,दिमाग के ख्याली पुलाव और कुछ आज़मायी हुई शायरिया वगैरह वगैरह...जी हाँ वो ज़माने थे ग्रीटिंग कार्ड के...
अब इस ग्रीटिंग कार्ड शब्द को सुनकर अगर तुम अनायास ही मुस्कुरा रहे हो तो भैया बधाई हो हम तुम एक ही दौर के है...
मैं खुद इतना असमंजस में हूँ की बात बताना शुरू करू तो कहाँ से करू डर है की कुछ छूट न जाए खैर छोडो तो ग्रीटिंग कार्ड का दौर शुरू होता था १७-१८ दिसंबर के पास से गली मोहल्ले की दुकाने ,स्टेशनरी शॉप सब जगह अचानक ही आपको ग्रीटिंग कार्ड नज़र आने लगते थे उस समय सर्दियों की छुट्टिया २५ दिसम्बर से ५ जनवरी तक होती थी तो अपने चाहीतो को ग्रीटिंग कार्ड आपको हर हाल में २४ दिसम्बर तक दे देना होता था और आपकी दोस्ती का रिश्ता,प्यार की गुंजाइश और मोहब्बत की कशिश काफी मायनो में उस एक ग्रीटिंग कार्ड पर निर्भर करती थी.तो आप १०-११ दिन पहले से अपने रिश्तो का आंकलन करने लगते थे रिश्ते अक्सर ३ भागो में बांटे जाते थे जैसे विज्ञानं वाली मैडम ने साल भर पीटा है इन्हे २ रूपए वाला कार्ड देंगे,कंप्यूटर वाली मैडम बड़ी प्यारी है इन्हे ३ रूपए वाला दे देंगे ,जो मैडम कला सिखाती थी उनके केवल हाथ से बना हुआ ग्रीटिंग कार्ड देना मज़बूरी हो जाती थी ,प्रिंसिपल मैडम को कार्ड देना उतना जरूरी था जितना आज के दौर में GST देना.

दुसरे नंबर पर आते थे दोस्त भइया सबसे ज्यादा मगज़मारी इस केटेगरी में होती थी अगर आशीष को अच्छा कार्ड दिया तो सागर बुरा मान जाएगा सागर को अच्छा कार्ड दिया तो आशीष और अपनी दोस्ती फीकी न पड़ जाए तो कुल मिला के निर्णय ये होता था की इन दोनों को ५-५ रूपए के कटिंग वाले ग्रीटिंग कार्ड देंगे कटिंग वाले ग्रीटिंग कार्ड माने उस टाइम के gifs समझ लो वो कार्ड जिनका असली मज़ा बीच में छुपा होता था कार्ड खोलते ही एक आकृति आपके सामने उभर कर आती थी पैसा उसी में वसूल हो जाता था और दोस्त को भाव भी मिल जाता था.
अब आती है तीसरी सबसे पेचीदा लेकिन सबसे इम्पोर्टेन्ट केटेगरी जी हाँ वही वाली केटेगरी जिसके कार्ड सबसे साफ़ सुथरे होते थे जिसकी ड्रेस पी.टी. वाली क्लास में सबसे ज्यादा सफ़ेद होती थी,जिसकी राइटिंग पूरी क्लास में सबसे ज्यादा अच्छी होती थी,जिसकी कॉपिया हमेशा कम्पलीट और चेक होती थी,जिसका क्लास में आना मनो फुलवारी में फूलो का आना ,वो जो सर्दियों में भी रोज़ नहायी धोयी सी लगती थी अब इस लड़की के बारे में मैं थोड़ा और बता देता हूँ इसे हम लोगो को होने वाली खांसी जुखाम जैसी गरीब बीमारिया नहीं होती इसके हमेशा २० नम्बर की मासिक परीक्षा में १८ या उससे ज्यादा नंबर आते है वैसे तो ये क्लास के ज्यादातर लड़को से बात नहीं करती पर मदद हर किसी की कर देती है.
तो अपनी औकात से बाहर की लड़कियों को रिझाने का मौका होता था हैप्पी न्यू ईयर तब लोग इतने भले मानस हुआ करते थे की नए साल की ओट में इज़हार ऐ इश्क़ जैसी शैतानियों की भनक तक न मालूम पड़ती थी.अच्छा ग्रीटिंग कार्ड watsapp से इसलिए भी अच्छा है क्योंकि इसमें आप ब्लॉक नहीं होते है ज्यादा से ज्यादा नो रिप्लाई मिल सकता है बस.वो कार्ड जो इन केटेगरी को दिए जाते थे उनको सेलेक्ट करने का भी अपना तरीका होता था जैसे कार्ड में सब होना चाहिए गुलाब के फूल,सीनरी,चाँद तारे,कुछ भी ऐसा लिखा हुआ जिसका मतलब भले ही हमें न पता हो पर उसमे लव शब्द का इस्तेमाल हुआ हो दूसरा चरण होता था २-४ अच्छी अच्छी शायरी लिखने का "चम्मच में जीरा मेरा दोस्त हीरा,डब्बे में डब्बा उसमे केक ,दोस्त मेरा लाखो में एक",ऐसी घिसी हुई शायरी इस कार्ड में नहीं लिखी जाती थी इसमें कुछ गैर परंपरागत शेर लिखे जाते थे वो भी अलग २ रंग की स्केच पेन से जितना रंगीन कार्ड उतनी ज्यादा उम्मीद.हाँ और इतनी मेहनत तब ही मुकम्मल मानी जाती थी जब वो भी आपको २४ से पहले ग्रीटिंग कार्ड देदे वरना आप not now वाले हिस्से में है और अगला मौका फि एक साल बाद ही आएगा...

ऐसा ही एक ग्रीटिंग कार्ड एक सुन्दर से लिफाफे के साथ चेहरे पे मुस्कान के साथ जब मेरा दिल सामान्य से ज्यादा तेज़ धड़क रहा था और वो अकेले खड़ी थी मैंने भी उसे दे दिया था और डर के मरे मेरे मुँह से सिर्फ हैप्पी न्यू ईयर ही निकल पाया था और उसके बाद मैं अपने ग्राउंड में उतनी दूर तक भागते रहा जब तक उसकी और अपनी दोनों की निगाह से ओझल न हो गया...
आधी जनता के लिए कहानी यही ख़तम होती है बाकियो के लिए ये कहानी जारी...
Happy new year... final part
...अब तक आपने पढ़ा कि कैसे डरते हुए मैंने नए साल का कार्ड उसको यानि श्वेता को थमा दिया था.हाँ श्वेता हमारे क्लास की टॉपर लड़की,एक आदर्श लड़की जिसका काम हमेशा पूरा रहता जिसे हर अच्छे काम के लिए उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता था, लेकिन उसके साथ भी वही परेशानी थी जो हिंदुस्तान की हर पढ़ाकू लड़की को होती है वो परेशानी थी "लड़के" श्वेता को लड़को से उतनी ही परेशानी थी जितनी भारत को पाकिस्तान से... अच्छा, एक बात और क्लास की अगर इस लड़की को किसी लड़के से परेशानी होती है और वो अपनी परेशानी किसी भी टीचर को बता दे तो बगैर किसी जांच पड़ताल के लड़के की तबियत से कुटाई हो जाती है.
खैर हम वापस कहानी पर आते है कहानी का नायक यानि मैं भाग रहा था तब तक जब तक वो श्वेता की आँखों से ओझल नहीं हो जाता.थोड़ी देर बाद मैंने अपने कदम थामे मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था ऐसा लग रहा था पता नहीं क्या कर दिया जो भी मैंने किया था वो सही था या गलत मुझे नहीं मालूम था और सही मायनो में ज़िंदगी का असली मज़ा उन कामो को करने में होता है जिसमे आप काम करने के बाद सोचते हो कि जो भी मैंने किया वो सही था या गलत.पर न जाने क्यों मुझे अपराधबोध हो रहा था.वो एक पढ़ाकू लड़की मैं ठहरा मनमौजी आदमी ,वो स्कूल रोज़ जाने वाली मैं महीने में गिन के २० दिन जाने वाला,उसके एक विषय में जितने नंबर उतने मेरे २-३ विषयो के नंबर मिला के बनते थे ,उसे हमेशा A + मिलता था मैंने B + से आगे का मुँह नहीं देखा था वो कार से स्कूल आती थी मैं पापा के स्कूटर से... कुल मिलाकर हम दोनों के बीच काफी सामजिक,आर्थिक और बौद्धिक अंतर था मुझे दोस्ती के इस प्रस्ताव के स्वीकार होने की संभावना पानी में मिलती नज़र आ रही थी खुद को कोस भी रहा था कि ये सब चीज़े जो मैं अब सोच रहा हूँ पहले नहीं सोच सकता था क्या? मैंने कही सुना था कि दुःख बांटने से कम होता है तो मैंने भी ये सारी बाते आशीष को बताई.मेरा सभी लोगो से ये अनुरोध है कि अपनी किसी भी गिरी हुई हरकत के बारे में भगवान को बताओ ,माता पिता को बताओ पर अपने दोस्त को न बताओ क्योकि आपका दोस्त आपकी मदद करे न करे पर वो आपको बताएगा कि आपकी गिरी हुई हरकत कितनी गिरी हुई है इसके क्या क्या भयावह परिणाम हो सकते है,आप कितना पिट सकते है,किस किस से पिट सकते है,कितनी बदनामी हो सकती है वगैरह वगैरह ...तो आशीष ने भी पूरी बात पहले तो ध्यान से सुनी फिर मेरी तरफ देखा... वैसे तो मुझे चेहरे पढ़ने नहीं आते थे पर उस दिन मैं बता सकता था की उसके हाव भाव एक ही बात बोल रहे थे कि भाई ये तूने क्या कर डाला अच्छी खासी ज़िंदगी चल रही थी ये बैठे बिठाये कैसी आफत मोल ले ली तूने ?अब तो थर्ड डिग्री होगा तेरे साथ .साथ ही मुझे कुछ नयी बाते पता चली जैसे
श्वेता हर बात अपनी मम्मी को बताती है.
मैथ्स वाली मैडम श्वेता के घर के बगल में रहती है
श्वेता की मम्मी हर बात मैथ्स वाली मैडम को बताती है.
मेरी मैथ्स बहुत बेकार है.
और मैथ्स वाली मैडम को मैं और मुझे मैथ्स वाली मैडम फूटी आँख नहीं सुहाते है.

अब मेरे चेहरे की हवाइयां उड़ चुकी थी आम तौर पर हमारे टाइम के बच्चे तीन चीज़ो से डरते थे माँ के हाथ की पिटाई ,बाप के हाथ से सुताई और मैथ्स की मैडम के हाथ से कुटाई और मुझे इन तीनो चीज़ो का डर एक साथ सता रहा था खैर बड़ी मिन्नतें करने पर आशीष ने बोला मैं तेरी मदद करूँगा पर बात अगर पिटने तक पहुंच जाती है तो तू अकेले झेलेगा खैर मरता क्या न करता?
योजना बनायीं गयी कि मामला आपस में सुलझा लेंगे अकेले में जाके श्वेता से माफ़ी मांग लेंगे पैरो में गिर जाएंगे,रो जाएंगे २-४ दिन तक पेटीज खिला देंगे पर मामला सुलटा लेंगे पर इन सब के लिए श्वेता को अकेले में मिलना ज़रूरी था तो उस दिन हम दोनों ने कोशिश कि जैसे ही वो अकेले मिलेगी उसके पास चले जाएंगे पर कम्बख्त हिंदुस्तान में लड़की कभी अकेले होती ही नहीं है हम लोग लंच ख़त्म होने के १० मिनट पहले ही क्लास में आ गए ताकि उसके आते ही उससे बात कर सके पर वो आने का नाम ही नहीं ले रही थी कुछ देर बाद वो क्लास में आयी उसके हाथ में ग्रीटिंग कार्ड था जैस ही मैं आगे बढ़ा पीछे से मैडम आ गयी और उन्होंने सबको बैठने का इशारा कर दिया उस दिन ३० मिनट कि क्लास ३० घंटे जितनी बड़ी लगी क्लास ख़त्म होते ही आशीष और मैं श्वेता के पास गए और श्वेता मेरे कार्ड के अंदर लिखे हुए मेरे अरमान पढ़ रही थी और उसके साथ ही उसकी दोस्त "पायल".आशीष और मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी पायल को पता चलना मतलब जो बात मैडम को बताने वाली न हो वो प्रिंसिपल मैडम तक पंहुचा दे.अगले ही पल पायल ने मेरी ओर देखा और बोली क्या है ये सब... मैंने आँखों आँखों में उसे समझाने कि कोशिश की कि बहन माफ़ करदे पहली बार ऐसी गलती की है ये तो सिर्फ पहला सीन था...
...अगले सीन में पायल कार्ड के अंदर की शायरी और बाते पूरी क्लास को जोर जोर से पढ़कर सुना रही थी टीचर किसी भी वक़्त आ सकते थे पूरी क्लास में हल्ला हो रहा था हल्ले की वजह थी वो कार्ड उस कार्ड की वजह था मैं आशीष ने फिर मेरी ओर देखा और कहा भाई ये तो लम्बा केस हो गया अब तेरे पिटने की संभावना बहुत बढ़ गयी है श्वेता भावशून्य थी क्लास के बच्चे उत्साहित, पायल अतिउत्साहित,आशीष हतोत्साहित और मैं अपमानित.पायल ने ये तो बता दिया था कि ये कार्ड श्वेता को दिया गया है पर किसने दिया है ये नहीं बताया था.छुट्टी तक न तो श्वेता न पायल हमसे बात करने को कोई राज़ी ही नहीं था.
अगले दिन २४ दिसंबर था यानी छुट्टियों से पहले का दिन और मैं उस दिन पिटना नहीं चाहता था सुबह प्रार्थना से पहले मैंने एक और कोशिश की पायल से बात करने की पर जवाब सिर्फ इतना मिला अब हम नहीं रेनू मैडम बताएंगी तुझे महाशय को बड़ी आशिकी चढ़ रही है बड़ी शायरी निकल रही है जब शाम को इसकी मम्मी तेरी सारी कारिस्तानी बताएंगी रेनू मैडम को.क्यों श्वेता बताएंगी न? श्वेता ने भी हामी में सर हिला दिया.
पायल का इस तरह से बोलना और श्वेता का हामी में सर हिलना इस बात का प्रतीक था कि अब भगवान ही मेरा मालिक है.अब न तो मेरा मन और ज्यादा गिड़गिड़ाने का कर रहा था न किसी दूसरी तरह का कोई काम करने का.कभी कभी चुप चाप पिट जाने में ही भलाई होती है ज्यादा से ज्यादा क्या होता ४-५ टीचर हाथ साफ़ करते स्कूल क बच्चे ताने मारते, घर पर भी यही प्रक्रिया होती घनघोर बदनामी होती.फ़िलहाल लंच के बाद एक दूसरे को कार्ड देने का सिलसिला शुरू हुआ पूरी क्लास के बच्चे एक दूसरे की सीट पर जा जाकर कार्ड दे रहे थे हैप्पी न्यू ईयर ,सेम टू यू ,थैंक्स जैसे वाहियात शब्द पूरी क्लास में गूँज रहे थे उस साल न तो मैंने किसी को कार्ड दिया न किसी से लिया और लेता भी कैसे मैं क्लास से बाहर आ गया था मुझसे नए साल में खुश होने जैसा कुछ नज़र नहीं आ रहा था और ये जालिम दुनिया जश्न में पगलाई जा रही थी. पता नहीं कब कहाँ से बुलावा आ जाए और लोगो का नया साल और मसालेदार हो जाए.तक़रीबन ३०-४० मिनट बाद मैं अंदर गया तब तक मेल मिलाप का कार्यक्रम ख़त्म हो चुका था मैडम भी क्लास में आ चुकी थी चूँकि उस दिन कुछ पढ़ाना नहीं था तो मेरे लेट आने से किसी को कोई खासी दिक्कत नहीं हुई मैं पूरा दिन गुमसुम सा बैठा रहा....
वो सर्दियों कि छुट्टी सबसे ज्यादा टेंशन वाली थी हर पल मुझे बस ये ही लगता था कि आज श्वेता कि मम्मी ने रेनू मैडम को सब कुछ न बता दिया हो और रेनू मैडम मेरे घर पर न आ जाए मेरी सुबह दोपहर और शाम इसी चिंता में कट रहे थे उन सर्दियों में एक चीज़ अच्छी ये हुई कि मैंने पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना शुरू का दिया वैसे भी भारत में जब कोई लड़का खुद ही अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने लग जाए तो मूलतः २ बाते होती है या तो वो फेल हो गया है या उसने कोई बड़ा काण्ड कर दिया है और मेरे साथ तो दोनों थे कार्ड देकर काण्ड कर चुका था और मोहब्बत के प्री एग्जाम में फेल हो चुका था और घरवाले इस बात से संतुष्ट थे कि चलो अब लड़के को अक्ल आ रही है पर उन्हें क्या पता था ये सुनामी से पहले का सन्नाटा है.भगवान् का शुक्र है कि पूरी छुटियो में रेनू मैडम मेरे घर नहीं आयी.
५ जनवरी छुट्टियों के बाद पहला दिन और स्कूल के पहले दिन मुझे वो तीन शक्ल दिखाई दी जिन्हे ताउम्र देखने का मन नहीं था एक श्वेता, दूसरी पायल और तीसरी रेनू मैडम.साल २००६ मेरी ज़िंदगी का तब तक का सबसे ख़राब नया साल था वैसे उस दिन आमतौर पर कुछ कम बच्चे ही आते थे सब कुछ सामान्य चल रहा था बच्चे अपनी कॉपी चेक करवा रहे थे फिर दूसरे पीरियड के बाद कुछ अजीब हुआ पायल और श्वेता क्लास से बाहर गए श्वेता के हाथ में एक कॉपी थी और एक कार्ड... अरे बाप रे ये तो मेरा वाला ही कार्ड था पर ये दोनों जा कहाँ रही थी? मैं भी इनके पीछे चले गया और फिर ये दोनों घुस गए प्रिंसिपल मैडम के ऑफिस में अगर मैं दिल का मरीज़ होता तो पक्का इस दृश्य के बाद मेरा हार्ट फेल हो जाता.
ऊखल में जब सर दिया तो मूसल का क्या डर ? मैं प्रिंसिपल मैडम के ऑफिस के बाहर ही खड़ा हो गया कि यही से यही पिट लेंगे क्लास तक बात नहीं जाने देंगे पता नहीं अंदर क्या क्या बाते चल रही थी रोने से पहले मेरी नाक में दर्द शुरू हो जाता है वो भी शुरू हो गया था इतने में दोनों बाहर निकल कर आयी.
पायल ने मेरी ओर देखा और बोली "तू यहाँ क्या कर रहा है?"
मैंने उससे पूछा "तूने कर दी मेरी शिकायत?"
उसपर दोनों ने मेरी तरफ देखा और फिर एक दूसरे की ओर देखकर हसने लगी श्वेता बोली "हम क्यों करेंगे तेरी शिकायत?"
मैंने कहा " वो उस कार्ड के चक्कर में..."
श्वेता बोली "पागल है क्या न्यू ईयर पर तो सब कार्ड देते है उसमे शिकायत कैसी?''
मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा था मैंने कहाँ और जो तू मेरा कार्ड लेकर अभी अंदर गयी वो....
"वो तेरा नहीं मेरा कार्ड था प्रिंसिपल मैडम लास्ट दिन आयी नहीं थी तो आज दिया है तुझे हर कार्ड अपना वाला ही नज़र आता है..." श्वेता ने मेरी बात बीच में काटते हुए कहा.
समझ नहीं आ रहा था कि खुश हुआ जाए ,रोया जाए या कुछ न किया जाए पर आँखे जरूर भर आयी थी सो मैं वहां से चला आया.ऐसा लग रहा था शरीर का बोझ हल्का हो चला हो बीते १०-१२ दिनों बाद राहत कि सांस ली वैसे राहत की सांस क्या होती है ये भी उस दिन पता चला.
क्लास के टॉपर लोग इसलिए टॉपर नहीं होते क्योकि वो ज्यादा अच्छे नंबर लाते बल्कि इसलिए होते है क्योंकि वो हमसे ज्यादा अच्छे से ज़िंदगी जीते है ज्यादा अच्छा सोचते है ,ज्यादा अच्छे निर्णय लेते है यही सब बाते मैं अपनी सीट पे बैठा हुआ सोच रहा था कि इतने में आवाज़ आयी हैप्पी न्यू ईयर नज़रे उठा के देखा तो श्वेता खड़ी थी हाथ में कार्ड लेकर...
"मुझे तो उस दिन ही देना था पर लंच के बाद न जाने तू कहाँ गायब हो गया था मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो बोल पड़ी और मैं लड़को से उतनी नफरत भी नहीं करती जितना तुम सोचते हो.मैंने भी कार्ड में कुछ लिखा है पर तुम्हारे जितना अच्छा नहीं हो शायद.दीपक तुम अच्छा लिखते हो कभी मौका मिले तो मेरे बारे में भी लिखना कुछ मुझे अपने बारे में पढ़ना अच्छा लगता है और मुझे ज़रूर पढ़वाना."ऐसा कहते हुए उसने कार्ड मेरे हाथो में थमा दिया .
साल २००६ में ज़िंदगी का अब तक का बेस्ट न्यू ईयर रहा और शायद अभी तक है.आज जब ऑफिस से छुट्टी लेकर अपने स्कूल आया हूँ और प्रिंसिपल मैडम के ऑफिस के बाहर खड़ा हूँ तो सब कुछ फिर से याद आ गया..
अब श्वेता पढ़ने में अच्छी थी तो वो दिल्ली में दिल्ली मेट्रो में सरकारी नौकरी करती है आशीष भी दिल्ली में ही है मैं थोड़ा कम अच्छा था तो मैं भी प्राइवेट नौकरी कर के अपने गुज़ारा कर लेता हूँ हम दोनों की आज भी फेसबुक ,व्हाट्सप्प पर कभी कभार बात हो जाती है और मौका मिलते ही मैं उस पर कुछ न कुछ लिख ही देता हूँ....और शायद वो पढ़ लेती होगी क्योकि उसे अपने बारे में पढ़ना अच्छा लगता है...

By,
Deepak Saxena