हिम स्पर्श 45

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“हाय अल्लाह। मुझे आश्चर्य है कि मैं इन अनपेक्षित गलियों में कैसे भटक गई? मैं उद्देश्य को भूल गई और अज्ञात-अनदेखे मार्ग पर चलती रही। जीत, मैं भी कितनी मूर्ख हूँ।“ 

“वफ़ाई, ज्ञात एवं पारंपरिक मार्ग पर चलने से तो अज्ञात–अनदेखे मार्ग पर चलना अच्छा है। इसका भी अपना सौन्दर्य है।“

“मुझे किसी नए मार्ग पर मत ले चलना। मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दे दो कि मैं किसका चित्र बनाऊँ। शब्दों से खेले बिना मेरा मार्गदर्शन करो।“

“मुझे थोड़ा विचार करने दो।“

“अनुमति है। किन्तु अधिक समय मत लेना। और हाँ, इस जगत को छोडकर कहीं और चले मत जाना।“

जीत विचार करने लगा। वफ़ाई जीत से प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा करने लगी।

“तुमने कभी पर्वत का चित्र नहीं रचाया। वही बनाओ।“ जीत ने सुझाया।

“उत्तम विचार। मैं अभी रचती हूँ।“ वफ़ाई उत्साह और आनंद से भरी केनवास के पास गई, तूलिका उठाई तथा रंगों के साथ व्यस्त हो गई। जीत झूले पर झूलता रहा। 

कुछ क्षणों के पश्चात वफ़ाई के केनवास पर पर्वत प्रकट हो गया। वफ़ाई प्रसन्न हो गई।

“जीत, यहाँ देखो। तुमने सुझाया और मैंने पर्वत रच दिया।“ वफ़ाई ने जीत को आमंत्रित किया। जीतने झूला रोका, उठा और वफ़ाई के समीप गया।

“सुंदर, अति सुंदर पर्वत।“ जीत के अधरों पर स्मित था, वफ़ाई के अधरों पर भी।

“गुरु जी, कोई सुझाव हो तो कहो।“ वफ़ाई ने कहा।

कुछ क्षण पश्चात जीत ने कहा,” पर्वत की चोटियों पर तथा घाटियों में हिम होता तो?”

“वाह। वह तो मैं भूल गई। मैं अभी इन चोटियों को हिम से भर देती हूँ।“

वफ़ाई के पर्वत हिमाच्छादित हो गए।

“अब ठीक है?” वफ़ाई ने पूछा।

“बिलकुल। किन्तु अभी भी कुछ चित्रित किया जा सकता है।“

“जैसे?”

“पर्वत पर झरने, नदी एवं प्रपात हो तो? पर्वत हरे भरे हो तो?”

वफ़ाई जीत के सुझावों पर काम करने लगी। चित्र पूर्ण हो गया।

“अब? कैसा लग रहा है यह पर्वत?”

“अभी भी कुछ और।“ जीत ने कहा।

“क्या है वह?।“

“कुछ घर, मार्ग, भवन भी तो होने चाहिए।”

“ठीक है, मैं प्रयास करती हूँ किन्तु मैं नहीं कर पाऊँगी। तुम मेरी सहायता करोगे?”

“प्रयास तो करो। मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ।“ जीत ने मन ही मन पूछा,”किन्तु कब तक?” उसके मन ने कोई उत्तर नहीं दिया।

वफ़ाई ने घर, मार्ग तथा भवन भी चित्रित कर दिये। केनवास को छोड़ कर अपने ही नवीन चित्र को निहारने लगी।

पर्वत, उस पर हिम, झरने, जल प्रपात, मार्ग, नदी, घर, भवन। सब कुछ उस चित्र में था। उसे चित्र पसंद आया।

जीत वफ़ाई के चित्र को रस पूर्वक देख रहा था। किसी विचार में था। उस के मन में कुछ चल रहा था। वह जीत के प्रतिभाव की प्रतीक्षा करने लगी।

अंतत: जीत आगे बढ़ा, तूलिका ली, रंगों में डुबोया; चित्र में हिम से ढंके मार्ग पर कुछ रेखाएँ खींची। वहाँ चौदह पंद्रह वर्ष की लड़की का चित्र उभर आया। उसने केनवास छोड़ दिया वफ़ाई के लिए।

वफ़ाई ने उसे देखा, देर तक देखती रही। वह कुछ नए भाव अनुभव कर रही थी, परिचित से भाव। उसने चित्र को बार बार देखा।

यह स्थान नया नहीं है। मैं इसे जानती हूँ। समय के किसी बिन्दु पर मैं वहाँ रह चुकी हूँ। यह स्थान है कहाँ? मुझे स्मरण क्यों नहीं हो रहा?

जीत ने कहा,” वफ़ाई, इस स्थान को तुम भली भांति जानती हो। याद करने का प्रयास करो।“  

“किन्तु मेरे स्मरण में नहीं आ रहा। कहाँ है यह स्थान? यदि तुम जानते हो तो बताओ ना।“

“ओह छोकरी, कितनी शीघ्रता से तुम भूल जाती हो? यह तुम्हारा गाँव है। तुम्हें याद नहीं आ रहा?”

वफ़ाई ने चित्र को पुन: देखा। अपने ही गाँव को याद करने में जुट गई।

वफ़ाई को सब कुछ स्मरण आ गया।

वफ़ाई प्रसन्न होते हुए बोली,”वाह जीत। केनवास के माध्यम से मुझे मेरे गाँव का स्मरण कराने के लिए धन्यवाद। इस स्थल को तुम कैसे जानते हो? तुम कभी वहाँ रहे हो?”

“नहीं। कभी नहीं। मुझे तुम्हारे गाँव का नाम तथा ठिकाना भी नहीं पता।“

“तो यह कैसे संभव हुआ?”

“मैंने तुम्हारे गाँव की तस्वीरें देखि है जो तुमने अपने केमरे जानु से खींची थी।“

“ओह, क्या बात है? किन्तु, मेरे केमरे का नाम जानु है वह तुम कैसे जानते हो?”

“उसे भी रहस्य ही रहने दो। मैंने कहा था ना कि रहस्यों के अंदर सौन्दर्य छिपा होता है।“ जीत अपने ही शब्दों पर हंस पड़ा, वफ़ाई भी।

“जीत, मुझे मेरे गाँव की याद आ रही है। मैं पर्वत को देखना चाहती हूँ। वह घाटी, वह नदी, वह हिम। मेरे गाँव के लोग मुझे याद आ रहे हैं।“

“यह स्वाभाविक है।“

“किन्तु तुम्हारे साथ कुछ दिवस रहने से मैं पूरी तरह से भूल गई कि मैं पर्वत के उस गाँव की छोरी हूँ। उल्टा मुझे ऐसा लगता है कि मैं यहीं जन्मी हूँ, यहीं बड़ी हुई हूँ और यह मरुभूमि ही मेरा वतन है। जैसे मैं मरुभूमि की छोकरी हूँ। जीत, मैं मरुभूमि सुंदरी हूँ।“

‘ऐसा कैसे हो गया?’

“इसका कारण तुम हो श्रीमान चित्रकार।“

“यह प्रशंसा है अथवा अभियोग?”

“मैं क्या जानूँ? समझ लो यह प्रशंसा भी है, अभियोग भी है।“

“दोनों स्थिति में मैं प्रसन्न हूँ। मैं दोनों का स्वीकार करता हूँ।“ जीत ने सस्मित कहा।

‘यही तो कारण है। तुम मेरे साथ ऐसे प्रस्तुत होते हो कि मैं सब कुछ भूल जाती हूं। तुम कितने अच्छे हो, जीत।“ वफ़ाई ने कहा और मन ही मन बोली, तुम स्नेह से भरे हो। मैं कहना चाहती हूँ कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। किन्तु मेरे अधरों पर यह शब्द कैसे लाऊं?

जीत ने वफ़ाई के अनकहे भावों को पढ़ा। मैं जानता हूँ कि समय के साथ तुम मुझ से प्रेम करने लगी हो। किन्तु मैं इस मार्ग पर नहीं चलूँगा। तुम्हारी भावनाओं से अंतर ही रखूँगा। तुम्हें कभी यह अनुभव नहीं होने दूंगा। तुम्हारे भावों से अज्ञात ही प्रस्तुत होता रहूँगा। इस के लिए मेरे अपने कारण है। जीवन का मेरा अपना मार्ग है जिस पर मेरे साथ कोई नहीं चल सकता। इस पथ को कोई नहीं जानता। प्रत्येक क्षण मैं अपने लक्ष्य के समीप जा रहा हूँ। प्रत्येक श्वास उस लक्ष्य को निकट ला रहा है। मैं जनता हूँ कि मेरा लक्ष्य दूर नहीं है। शीघ्र ही मैं लक्ष्य प्राप्त कर लूँगा, अकेला ही। कोई मेरे साथ नहीं होगा। वफ़ाई तुम भी नहीं। मैं चलता ही रहूँगा, किसी अकेले यात्री की भांति।

“जीत, तुम कहाँ हो? किन विचारों में खो गए हो?” वफ़ाई ने जीत के सामने ताली बजाई। जीत विचारों से जागा।

“मैं यहीं हूँ।“ 

“मेरे गाँव की, मेरे पर्वत की मुझे तीव्र याद आ रही है। मैं उसे एक बार पुन: देखना चाहती हूँ।“

“तो सामान बांधो और निकल पडो अपने गाँव।”

वफ़ाई का मन करने लगा कि वह भाग कर चली जाय अपने गाँव, किन्तु कुछ तो था जो उसे जाने से रोक रहा था।

जीत का साथ मन को शांत करता है, आनंद देता है, मन को भाता है। किन्तु जीत, तुमने कभी कोई संकेत नहीं दिये मुझे। मैं समझ नहीं पा रही हूँ तुम्हारा आशय। मैं क्या करूँ? एक तरफ मेरा गाँव, मेरा पर्वत मुझे पुकार रहा है तो दूसरी तरफ कोई मुझे वहाँ जाने से रोक रहा है। कोई है जिसने मुझे उस गाँव से दूर कर दिया है। किसके लिए मैं वह जाऊं? दूसरी तरफ यह जीत, जो मेरा कुछ भी नहीं है किन्तु मुझे उसका साथ प्रसन्न रखता है। जीत में कुछ बात तो है। किन्तु क्या बात है जीत में?

जीत, नहीं नहीं, श्रीमान कलाकार, श्रीमान चित्रकार। तुमने मुझे सहज ही प्रेम करना सिखाया है। यही कारण है कि मैं यहाँ से भाग नहीं जाना चाहती।

तुम मानती हो कि तुम प्रेम में हो, जीत के प्रेम में?

अवश्य। कोई संदेह है क्या?

किन्तु जीत को तुम्हारे प्रेम में कोई रुचि नहीं लगती।

मुझे तो लगता है कि जीत भी मुझ से प्रेम करता है।

प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जीत ने कभी यह दर्शाया नहीं। तो तुम कैसे मान बैठी?

मेरा प्रेम एक तरफा हो सकता है, तो क्या हुआ?

तुम मूर्ख तथा पागल छोकरी हो।

यह मूर्खता, यह पागलपन मुझे पसंद है।

ओह मूर्ख छोकरी।

“हाँ, मैं मूर्ख छोकरी हूँ।“वफ़ाई बोल पड़ी।

“नहीं, तुम मूर्ख छोकरी नहीं हो, वफ़ाई।“ जीत ने कहा।

“तो मैं क्या हूँ? कौन हूँ?”

“तुम पर्वत सुंदरी हो जो अपने ही पर्वत, बादल, गगन, पवन, हिम, गाँव तथा लोगों से स्नेह रखती है।“

“तुम ठीक कहते हो, जीत। मैं इन सभी से स्नेह करती हूँ। सब को याद करती हूँ। सब को देखना चाहती हूँ। सब को मिलना चाहती हूँ।“

“तो शीघ्रता से निकल पड़ो। किसकी प्रतीक्षा कर रही हो तुम?”

“यहाँ से भाग जाना इतना सरल नहीं है। तुम जानते हो कि मैं एक अभियान पर हूँ, और उस अभियान पूर्ण करने से पहले मैं यहाँ से नहीं जा सकती।“

“भूल जाओ उस अभियान को और भाग चलो। यह मार्ग तुम्हें आमंत्रित कर रहा है।“

“मुझे इस बात पर बात नहीं करनी है। मैं जाना भी चाहती हूँ और नहीं भी।“ कुछ क्षण वफ़ाई मौन हो गई। फिर बोली,”जीत, तुम मेरा साथ दोगे?’

“क्यों ऐसा पूछती हो? मैं सदैव तुम्हारा साथ दूंगा।“

“तो पहाड़ों पर मेरे साथ चलो। कुछ ही दिवस में मेरा अभियान सम्पन्न हो जाएगा फिर हम दोनों हिम से ढंके पहाड़ों पर जाएंगे। तुम मेरे साथ आओगे ना?”

जीत ने वफ़ाई को स्मित दिया, वफ़ाई ने जान लिया कि यह स्मित सहज नहीं था। उस स्मित में कुछ मिश्रित था। उस स्मित में पीड़ा थी।

“जीत, तुमने प्रतिभाव नहीं दिया। मैंने कुछ प्रस्ताव रखा था तुम्हारे लिए।“

क्या यह प्रेम का प्रस्ताव है? जीत ने स्वयं से पूछा।

“मैं उसको स्वीकार नहीं करूंगा।“

“तो तुम मेरे साथ नहीं चल रहे हो?”

“हाँ, यह स्पष्ट है।“

“क्या तुम पर्वतों को देखना नहीं चाहते? झरनों को, जल प्रपात को देखना नहीं चाहते?”

“पहाड़, हिम, प्रपात, झरने मुझे अत्यंत पसंद है, मुझे आकृष्ट करते हैं। मेरी इच्छा रही है कि मैं सदैव पहाड़ों की चोटियों पर रहूं।“

“तो तुम्हें कौन रोकता है पहाड़ो पर दौड़ जाने को? अपने पिंजरे से मुक्त हो जाओ, पहाड़ों पर दौड़ जाओ।“

“मुझे प्रेरणा देने के लिए धन्यवाद, वफ़ाई जी। किन्तु मैं इतना समर्थ नहीं हूँ कि मेरे इस पिंजर को तोड़ सकूँ।“

“क्या है वह? उसे कह दो। उसे रहस्य में मत रखो। कभी कभी मुझे लगता है कि तुम स्वयं ही एक रहस्य हो जो अभी तक खुला नहीं है। आज उस रहस्य को खोल दो। अभी ही खोल दो।“ वफ़ाई ने जीत को उकसाया।

“मैं फिर से कहुंगा, रहस्य को अप्रकट ही रहने दो। अप्रकट रहस्य में सौन्दर्य छिपा हुआ होता है।“ जीत ने स्मित करने का प्रयास किया किन्तु वह स्मित निस्तेज था।

पश्चिम मे सूरज अस्त हो गया।

वफ़ाई अपने गाँव के चित्र को तृषातुर आँखों से देखती रही। उस रात वह सो नहीं पाई। जीत ने उस रात वफ़ाई को केनवास के समीप तीन बार देखा था। जीत समझ चुका था कि वफ़ाई के मन में उसके गाँव जाने की तीव्र अभिलाषा जन्म ले चुकी थी। फिर भी वह किसी विवशता से मरुभूमि में रह रही है।

जीत ने योजना बना ली। वह सूर्योदय की प्रतीक्षा करने लगा।

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Hetal Thakor 4 दिन पहले

Avirat Patel 3 सप्ताह पहले

Nikita 4 सप्ताह पहले

Nita Shah 1 महीना पहले

Amita Saxena 5 महीना पहले