एक ऊंटनी - ऊंटनी Mahendra Rajpurohit द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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एक ऊंटनी - ऊंटनी

( तेलीतोड री नायहठ)
गायों के रम्भाने की आवाज,और पक्षीयो की चहचहाहट के बिच, भानु का मारवाड़ के रेतिले धोरों के बिच में अदृश्य हो जाना,,और हमारे दिन भर के इंतजार के बाद बाबोसा के हाथ में कुल्हाड़ी लिए हुए घर तरफ चलते कदम,, बाबोसा आवे हैं,, इतना सुनते ही हम सब उनके सामने खेत की बाड़ तक चले जाते थे, बाबोसा आया बैर लाया,की रट लगाए हुए, मानों धोरो के उस पार भी आवाज जाती थी,हम अपने अपने हिस्से के बैर लेकर बाबोसा से पहले ही उनकी (कोटड़ी) “राजस्थान में बड़े बुजुर्गो के बेठने का स्थान” में पहुंच जाते थे| और फिर दादीसा, काका, पिताजी सब उस कोटड़ी में आ कर बैठ जाते थे, आज काफी दिनों से चल रही धुल भरी आंधी, थम गई थी। हम सब बैठै बंतल कर रहे थे, बाबोसा कहने लगे आज आबो (आसमान) चमके है  सवेरे जल्दी उठकर सुहड (खेत साफ करना) ढूक जाजो, हमके मेह घणेइ हुई,कहते हुए अपनी खाट पर लेट गये। रात में घनघोर घटाएं छाई और आंधी के साथ ही तेज बारिश शुरु हो गई,
, अब सवेरे आज बाबोसा जल्दी उठकर बाड़े में गया तो तेलीतोड ( ऊंटनी का एक प्रकार का नाम) वाली जगह ख़ाली पड़ी थी,,ओह तोडकी रात में इण आंधी री बावळ रे साथे लोपाय (भाग जाना) गई। घर आय अर जल्दी ही हाथ में डांग अर मोरी ( डांग एक प्रकार का डंडा, और मोरी एक रस्सी) ले कर नायहठ(किसी भी पशु को ढूंढने ने जाना) चल दिए। दिन भर घुम फिर कर घर आ गए, और कहने लगे, आज तो पुरी पाळौ ( रेतीले टीले) साण मारी पण इण रात वाले अंधड़ में कही भी तोडकी रा पग दिखिया कोनी। अब सवेरे देवजी बा( पशु ढुंढने माहिर) ने केस्यो, वे ढुंढ कर ले आई,, सवेरे होते ही, आवाज आई। ए रामा जा देवजी बा ने बुलाकर ला,,रामो देवजी बा ने जा कर कहा, बाबोसा बुलावे है,, देवजी बा-- काई के है, बाबोसा कहते हुए चल पड़े बाबोसा की कोटड़ी की और---,, राम राम सा  ,, 
बाबोसा राम-राम सा राम राम सा, बेगा आया थे तो ,,
देवजी,,--  काम बताऔ ,,
अरे देवजी इण रातो के अंधकार में मल्हारी तेलकी तोड लोपाय गई, है मैं काले पुरे दिन नायहठ की पर लादी कोनी ,,
देवजी-- ओ तो म्हाने ठा हुतो औ “बाळद धन” ( ऊंट पालन) थो सू को सम्भले नी,पर थे म्हारे राइका री बात कदे मानता, तोडकी रे खेण (“खैण” एक प्रकार का टैटू जो राजस्थान के रेतीले धोरों में दूर दूर तक पड़े रिणताल से अपने पशु को ढूंढने में मदद करता है उसे पशु के शरीर पर गर्म लोहे की रॉड से उकेरा जाता था,) है,,कि नही ,,
बाबोसा-- खैण तो कोनी ,,
तो किकर जोय ने लास्यू ,, खैर जोग है ज्यो होई,,थे टाबरो री ध्यान राखजो, म्हाने दो-चार दिन भी पा लागे,  कहते हुए सिधे रेतिले धोरों की और चल दिए…
इधर मेरे मन में वह उदासी,, “ क्यों कि उस  तेली तोड को लेकर तो हम गायों चराने जाते थे”और रेतीले धोरों पर उस तोड पर सवारी कर के,दुर दुर तक जाना और केइ बार तो वह तोड हमें रिणताल ( दुर दुर तक घर न हो ऐसा खेत) में पटक कर घर पहुंच जाती थी,, हम क्रोध से भर के घर पहुंचते आज तो उसे मारेंगे, पर उसका झुरख कर हमारे सामने आना,, हमे सब भुला कर एक ही बार मैं हमे उस पशु प्रेम में बांध देती थी ,, “काश आज भी वह दिन होते” रेतीले धोरों पर खैलना गांव के तालाब में ( जहां पानी कम हो) नहाना और बारिश मे ही गाना गाना,, “मेह मेह आउरो घी बाटी खा ले”(मारवाड़ी बच्चों का प्राचीन गीत) और डोरीया निकाल कर ( एक तरह के हरे पत्तों से रस्सी बनाना) पेड पर हिन्डा ( झुल्ला ) मांडना,, और उस का बार बार टुटना,, निचे गीरना मिट्टी साफ कर के वापस हिन्डै पर सवारी कर के हिन्डे खाना ,, गायों को चराते समय जो किसान खेत पर नहीं होता तो, उसके भलेई कितना ही नुकसान हो, हम गायों को चराते जरुर, केई बार तो किसान लठ्ठ ले कर पिछे भी आते थे केई बार पकड़े भी जाते थे, “पर मे देखियो आ गाय मल्हारी कोनी” कह कर जान बचाते थे ,,आज हमारा भी तोडकी के बिना गायों चराने का मन कम लग रहा था ,, जैसे तैसे दो चार दिन निकाले, शाम को हम गायों को ले कर घर जा रहे थे तब तक ,,पिछे से आवाज आई ए उ देख देवजी बा आ रहे हैं, देखा तो देवजी बा तेलीतोड को लेकर आ रहे हैं,, में भागा भागा चन्द मिनटों में ही देवजी के सामने,, दाता आ कठै लादी….. देवजी परेशान थे क्योंकि तोडकी हर किसी को पकड़ाती नहीं थी,, शायद उन्हें भी काफी परेशान किया होगा ,, इतने में बाबोसा भी बाड़े में आ गए,, और देवजी की तरफ मुस्कुराते हुए घणा दिन लागा, देवजी ,,
देवजी रहन दे, आतो बिन्जे बाबी री कृपा री की मिळगी बिना खैण अपो खने काई सबुत होवे कि आ अपोरी है,, कोई धणी बन जातो तो? बाबोसा ने देवजी की हां में हां मिलाई ,, और घर की और चल दिए,,
महेन्द्र सिंह राजपुरोहित