स्वाभिमान - लघुकथा - 37 Sangita Mathur द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

स्वाभिमान - लघुकथा - 37

खरी खरी

प्रोफेसर नरेन्‍द्र शर्माजी गांव बडे भाई के पास गए तो वहां उनकी पुश्‍तैनी खेती बाड़ी और दुकान जोरों से चलते देख अत्‍यंत प्रभावित हुए। वैसे तो नरेन्‍द्रजी अपना हिस्‍सा पहले ही लेकर अलग हो चुके थे, पर फिर भी बड़े भाई ने उनका खूब आदर सत्‍कार किया, लौटते में उनके साथ ढेर सारा घर का घी, सब्जियां, अनाज आदि भी बांध दिया। अभिभूत नरेन्‍द्रजी ने कृतज्ञतावश भाई के बेटे सुयश को शहर साथ ले जाने का प्रस्‍ताव रखा|

‘वहां अपने कॉलेज में बेहतर शिक्षा दिलाकर इसे अफसर बनवा दूंगा। इसके ठाठ बाट देखने लायक होगें।’

घरवाले और स्‍वयं सुयश भी बड़ी उम्‍मीद से चाचा के संग हो लिया।

सुयश घर में क्‍या आया, नरेन्‍द्रजी के बच्‍चों के लिए तो मानो कोई मनोरंजन का साधन आ गया। सुयश के खाने, पीने, बोलने, चलने, पहनावे आदि हर एक में ढलकते उसके देहाती लहजे का वे खुलकर मजाक बनाते। नरेन्‍द्रजी की पत्‍नी भी मुंह दबाकर हंसने से बाज नहीं आती थी। कई बार तो खुद नरेन्‍द्रजी को उसकी वजह से कॉलेज में शर्मिंदगी झेलनी पडी। पर अब न उगलते बन रहा था न निगलते। उड़ता तीर तो उन्‍होंने खुद गले लगाया था।

नरेन्‍द्रजी की लाचारी भांप घरवालों के हौसले बुलंद हो गए। अब वे उसे घर के काम भी बताने लगे। सब्‍जी लाना, कपड़े सुखाना, बगीचे में पानी देना तो उसका नित्‍य का काम हो गया। एक दिन महरी नहीं आई तो उसे झाडू भी थमा दिया गया। चाचा को मूक दर्शक बना देख सुयश के सब्र का बांध टूट गया। उसने गांव लौटने के लिए अपना बक्‍सा उठा लिया।

मन ही मन राहत महसूस करते हुए नरेन्‍द्रजी ने दिखावटी उसे रोकने का प्रयास किया। ‘अरे आइ आइ टी न सही आइ टी आइ तो मैं तुझे करवा ही दूंगा।’

‘पुश्‍तैनी फलता फूलता कारोबार छोड़कर मैकेनिक, प्‍लंबर बनना तो मूर्खता ही होगी न चाचा।’

कड़वा सच सुनकर नरेन्‍द्रजी तो मूक बने रह गए पर उनकी पत्‍नी से नहीं रहा गया।

‘बाप के पैसे का अभिमान तो देखो। कैसे खरी खरी सुना रहा है।’

‘अभिमान नहीं, इसे स्‍वाभिमान कहते हैं। क‍हकर सुयश बक्‍सा उठाकर निकल गया। सब हतप्रभ देखते रह गए।

***

प्राथमिकता

रिश्‍तेदारी में गृहप्रवेश के कार्यक्रम से लौटते हुए कृष्‍णा का मन बहुत भारी था। पति नितिन ने आदतन वहां भी नए घर की भव्‍यता की तारीफ में कशीदे काढकर अंत में ठंडी उसांस भरकर अपना चिरपरिचित पुछल्‍ला छोड ही दिया था। ‘हॉं भई, आप बना सकते हैं ऐसा भव्‍य मकान, आपकी बीवी जो कमाती है।

वैसे तो किसी के नई गाड़ी, नया ए सी, टीवी आदि कुछ भी लेने पर यहां तक कि बच्‍चे का अच्‍छे स्‍कूल कॉलेज में दाखिला कराने पर भी नितिन का ठंडी सांस भरते हुए उसका गृहिणी मात्र होने पर यह अप्रत्‍यक्ष ताना कसना उसे बेतरह खल जाता था। पर आज हंसी खुशी के वातावरण में सब मेहमानों, रिश्‍तेदारों के सामने उसका व्‍यंग्‍यात्‍मक लहजे में य‍ह कहना और फिर सबका कनखियों से उसका बुझ गया चेहरा देखकर मंद मंद मुस्‍कराना उसे रूला गया था। बड़ी मुश्किल से हवन के धुंए का बहाना कर उसने अपनी रूलाई रोकी थी।

उच्‍च शिक्ष्‍िात होने के कारण उसने शादी के तुरंत बाद पास ही के कॉलेज में पढाना चाहा था। उसे नौकरी मिल भी गई थी। लेकिन तब नई नई शादी के खुमार में नितिन ने उसे रोक लिया था।

‘दोनों चले जाएगें तो घर कौन देखेगा कल को बच्‍चे होगें तो वे भी उपेक्षित रह जाएगें। पति की इच्‍छा का मान रखते हुए कृष्‍णा ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे। और अब शादी के इतने साल बाद तक कदम कदम पर ऐसे ताने, उपालंभ……

आज तो उसका स्‍वाभिमान बुरी तरह आहत हुआ था। कृष्‍णा ने सोच लिया था अब वह नहीं दबेगी। अगले दिन से ही अपने संपर्कसूत्रों से उसने कुछ बच्‍चों को टयूशन देना आरंभ कर दिया। अपने विषय में पारंगत तो वह थी ही जल्‍द ही उसके पास कोचिंग के लिए बैच पर बैच आने लगे। पैसा आता देख आरंभ में तो नितिन खुश हुआ लेकिन कृष्‍णा की बढती व्‍यस्‍तता और लोकप्रियता साथ ही घर की चरमराती व्‍यवस्‍था ने उसके पौरूष को आहत किया तो आखिरकार वह एक दिन टोक ही बैठा। ‘तुम्‍हारे लिए घर प्राथमिक है या कोचिंग?’

कृष्‍णा ने उचटती सी नजर पति पर डाली और बोली, ‘अब मेरी प्राथमिकता एक सुख सुविधा संपन्‍न ‘मकान’ जुटाना है। जिसके लिए शायद एक बैच और बढाना होगा। नितिन के रंग उड़े चेहरे को नजरअंदाज करते हुए वह मोबाइल पर व्‍यस्‍त हो गई।

***

ब्रेनडेन

प्रिंसीपल सर जब से बेटे से विदेश में मिलकर आए हैं, उनके सुर ही बदल गए थे। लाखों का पैकेज, साफ सुथरा शहर, अनुशासित और सभ्‍य नागरिक, उन्‍नत तकनीक, शिष्‍टाचार आदि आदि… उनके मुंह से विदेश और विदेशियों की प्रशंसा सुन सुनकर मुझ सहित सभी साथी अध्‍यापकों के कान पक गए थे। प्रशंसा सुनना बुरा नहीं लगता था लेकिन साथ साथ अपने देश और देशवासियों से तुलना कर उन्‍हें असभ्‍य, नीच, गंदा, भिखारी, लालची आदि कहना बेतरह खल जाता था। पर कोई कुछ कहने सुनने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।

आज भी प्रिंसीपल सर ने मीटिंग बुलाई थी। हम सब उनका भाषण और बीच बीच में विदेश की तारीफ और अपने देश की आलोचना सुनने के लिए बेमन से तैयार थे। अभी मीटिंग आरंभ ही हुई थी कि कॉलेज का चपरासी मदन पानी की ट्रे के संग मिठाई का एक डिब्‍बा लेकर उपस्थित हो गया। प्रिंसीपल सर ने मिठाई लाने की वजह पूछी।

‘सर मेरी बेटी की मुंबई में बहुराष्‍ट्रीय कंपनी में बहुत अच्‍छे पैकेज पर नौकरी लगी है। उसने सी ए प्रथम प्रयास में उत्‍तीर्ण किया है। मैंने सोचा सबका मुंह तो मीठा करा दूं। खुशी से मदन का स्‍वर कंपकंपा रहा था।

‘अरे वाह यह तो बहुत खुशी की बात है। सबने बधाई देते हुए एक एक लड्डू उठा लिया।

‘अब तो साब बस उसके लिए अच्‍छा घर वर मिल जाए तो उसके हाथ पीले करके जिम्‍मेदारी से मुक्‍त होऊं। मदन अतिउत्‍साहित था।

‘अब तो तुम्‍हें उसके लिए एन आर आइ वगैरह ढूंढना पडेगा प्रिंसीपल सर ने कहा।

‘नहीं साब, विदेश में बसने की न तो मेरी बेटी की इच्‍छा है न मैं ऐसा चाहता हॅूं। मदन ने सरलता से कहा।

‘क्‍यूँ प्रिंसीपल सर की त्‍यौंरियां चढ गई थी और एक बार फिर हमें विदेश का प्रशंसा पुराण सुनना पडा।

‘साब, पडौसी का घर कितना भी अच्‍छा क्‍यों न हो, हम वहां जाकर रह तो नहीं सकते न वैसे भी मुझे और मेरी बेटी को तो अपने देश और उसकी संस्‍कृति पर बहुत गर्व है। सहजता और निश्‍छलता से अपना मत रखते हुए मदन का चेहरा स्‍वाभिमान से उद्दीप्‍त हो उठा था। हम सभी प्रशंसात्‍मक नजरों से उसे ताक रहे थे। हां, प्रिंसीपल सर के मुंह में लडडू का स्‍वाद अवश्‍य कसैला हो गया था।

संगीता माथुर