आज़ादी के लड्डू Rishi Katiyar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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आज़ादी के लड्डू

आज़ादी के लड्डू

बीस साल का सफर

दृश्य एक: 15 अगस्त 1997, आदर्श माध्यमिक विद्यालय, सड़क

‘मेरे देश की धरती सोना उगले, ’ऐ मेरे वतन के लोगों’, और ‘ये देश है वीर जवानों का’ जैसे गानों के संगीत से परिपूर्ण माहौल में कक्षा ४ के सारे बच्चे लाइन लगा के खड़े हुए हैं| सबसे आगे वाले लड़के ने एक हाथ में झन्डा पकड़ रखा है, और दूसरे हाथ से नीचे खिसकती हुई पैंट को ऊपर खींचा और गुरुत्वाकर्षण सीखती नाक को तेजी से सुडक कर ऊपर की तरफ खींच लिया| अचारजी (आचार्यजी का बोलने लायक version) ने आते जाते वाहनों को इशारा कर बच्चों की पंक्ति को सड़क पार कराई, और नारे लगने शुरू हो गये|

‘भारत माता की’ ‘जय’ ‘भारत माता की’ जय ‘देश की रक्षा कौन करेगा!!!’हम करेंगेहम करेंगे हम करेंगे‘चाचा नेहरु’ अमर रहें ‘महात्मा गाँधी’अमर रहें

लाइन धीरे धीरे आगे रेंगने लगी और बच्चे आगे वाले की शर्ट पकडे पकडे आगे बढ़ने लगे| रस्ते में दूसरे स्कूल वालों की झांकी से रेस भी लग गई, और उन्हें ‘बिरा’ के चिढ़ा भी आये| झांकी लौटी और वो गोलू-मोलू सा लड़का ‘भार और वेग’ की व्युत्क्रमता को परे बता, जिस स्पीड से जाके लड्डू वाली में सबसे आगे लगा, उसे देख ‘बोल्ट’ के भी बोल्ट हिल जाएँ| लड्डू जेब में डाले, हर रोज की तरह सारे रस्ते नट-बोल्ट बीनते और ग्लूकोज की बोतल को लतियाते-धकियाते स्कूल से घर पहुँचा और लड्डू मम्मी के हाथ में पकड़ा के गोदी में जा चढ़ा| मम्मी को एक लड्डू खिलाने की कोशिश की, क्योंकि पता है कि मम्मी अपने हिस्से का लड्डू भी उसे ही दे देंगीं|

दृश्य 2: 15 अगस्त 2000, आवासीय विद्यालय (नवोदय), खुला मैदान

8 बजे प्रोग्राम शुरू हुआ था, परेड हो चुकी है, हॉस्टल वाइज बच्चे लाइन से बैठे हुए हैं| कक्षा 8 की लड़कियों की सरस्वती वंदना के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो चुके हैं| ’गोरी झुकी झुकी काटे रे धान’ के ग्रुप डांस में ‘मनीषा भट्ट’ को देख के टपकी हुई लार को पोंछते हुए कक्षा 9 के उस दुबले पतले लड़के ने घड़ी पर नज़र डाली| 10 बजने वाले हैं, .टीवी रूम की चाभी को उस उसने एक बार फिर जेब में टटोल के महसूस किया| साढ़े दस से ‘तिरंगा’ आनी है, ’प्रलयनाथ गैंडास्वामी’......’पहले लात, फिर बात और फिर जरूरत पड़े तो मुलाकात’… डायलाग याद कर के फिर से झुरझुरी छूट गई|

ओफ्फ, लो अब गोलू सर भी भाषण देने आ गये, कछुआ सर का भारत के गौरवशाली अतीत वाला भाषण बढ़िया था| फिर, अजगर सर के क्लिष्ट हिंदी वाले भाषण से सोती हुई जनता को ‘अपूर्वा’ के ‘देश मेरा रंगीला’ वाले डांस ने फिर से जगा दिया| सबको सिर्फ ‘लुपुर’ सर के छोटे और सबसे प्रभावशाली भाषण का इंतज़ार है| शायद इसके बाद आये, नही इस गीत के बाद, अब तो प्रिंसिपल सर भी आ गये भाषण के लिए| हाँ, लुपुर सर खड़े हुए है.सबने अपने सोते हुए पैरों को झटका देके जगाना शुरू कर दिया| लुपुर सर ने माइक पकड़ा “अब मिष्ठान वितरण शुरू होने वाला है| लड़के और लडकियाँ अलग अलग लाइन बना लें| हल्ला न मचाएं| कृपया लाइन तोड़ने की कोशिश न करें| ”

उस दुबले पतले लड़के ने मिठाई का लिफाफा हाथ में जोश के साथ पकड़ा और भागने को हुआ, फिर उसे याद आया, कि उसे भाग के जाने की कोई जल्दी नही हैं| मम्मी कहीं दूर घर पे हैं, वो हॉस्टल में!

कुछ दिन बाद, पिछली बार की तरह, इस बार भी मम्मी के हिस्से की मिठाई बक्से में रखी-रखी ही सूख गई|

दृश्य 3 : 15 अगस्त 2008, इंजीनियरिंग कॉलेज होस्टल , कानपुर

पड़ोस के विद्यामंदिर से सुबह सुबह लाउडस्पीकर का शोर शुरू हो गया, ’ ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम खूब लगा लो नारा’......, लगाओ सालों, पर 10 बजे के बाद, ये नही कि सुबह 9 बजे से ही चीखना शुरू कर दिया| छुट्टी के दिन चरस बो रखी है| बस एक ही दिन है क्या हमें देश पे गर्व करने को| और वैसे भी किस बात पे गर्व करें| साले रिसेशन ने बैंड बजा रखी है, ये 7वीं कंपनी प्लेसमेंट के लिए आते आते पोस्टपोन कर चुकी है| जॉब लग नही रही है| करप्शन ने देश को खोखला कर रखा है, नेता लूट रहे हैं | और ये जय हो, येगाँधी, नेहरु इन्होने ही इस देश को बरबाद किया है, घंटा जय हो| चोर है साले सब| और ये साला, ’अमर रहें’, हमेशा मरे हुए लोगों के लिए ही क्यों यूज़ करते हैं|

फ़ोन की घंटी बजी, ’कहाँ हो बाबू, ’’अभी तक सो रहे थे, हम्म’, कॉलेज नहीं आना है, क्यूं क्या, भूल गये, जल्दी आओ”

जल्दी से मुँह पर गीला कपड़ा पोंछ के ड्राई क्लीन करके फाइनल इयर के उस लौंडे ने अपनी बाइक उठाई, और कॉलेज के अन्दर बने गर्ल्स हॉस्टल के बाहर जाके जैसे ही बाइक खड़ी कर फ़ोन लगाने की कोशिश की, कि गेट की गार्ड ने जोर से सीटी बजाई ‘नही, नही, यहाँ नही रुक सकते, आगे जाओ| गरियाते हुए बाइक आगे घसीट ही रहा था, तब तक ‘बाबू’ की ‘शोना’ आ गई और लपक के पीछे बाइक पर बैठ गई, ’चलो, साढ़े दस वाला शो देखना है, तो जल्दी चलो, और फिर ‘मैक-डी’ में ब्रेकफास्ट भी करना है| कॉलेज गेट पे ही सर मिल गये, डीन झंडा फहराने वाले है, इसके बाद ही जाना है | शिट, क्या बकवास है ये झंडा-वंडा| खैर, झंडा फहराया गया, और जबरदस्ती मिले लड्डुओं को उसने आधा खा के कुत्ते को फेंके, और ‘शोना’ के साथ पिज़्ज़ा खाने के लिए बाइक दौड़ा दी|

दृश्य 4: 15 अगस्त 2017, सुदूर दक्षिण के किसी किराये के फ्लैट में

15 अगस्त है आज, वह थोड़ा सा पेट निकला हुआ 28 साल का लड़का परेशान सा है| कुछ तो करना है, फेसबुक और ट्विटर पे चमकने, लाइक्स और followers बटोरने के यही मौके होते हैं| इस गलाकाट तकनीकी युग में खुद को सबसे बड़ा देश भक्त कैसे सिद्ध किया जाए| whatsapp पिक में आलरेडी झंडा लगा दिया है| फिर, गूगल इमेज में जाके कुछ शहीदों की फोटोज डाउनलोड की, कौन सी चिपकाई जाये, सुबह से दो चार बढ़िया बढ़िया आज़ादी टाइप quote वो आलरेडी चिपका चुका है| चाणक्य, चरक, वेद, जीरो की खोज से लेके, सचिन तेंदुलकर और सुंदर पिचाई और गूगल आदि की महिमा वाला बड़ा सा आर्टिकल भी चिपकाया, पर साला आजकल लम्बा पढता कौन है....क्या किया जाए?क्यों ना गाँधी, नेहरु को गाली देके लाइक्स बटोरे जाए, या पाकिस्तान को उड़ा देंगे, खत्म कर देंगे टाइप कुछ डाल के देशभक्ति जगाई जाये| आजकल इसका भी खूब ट्रेंड है| कल झंडा सिग्नल पे ख़रीदा था, उस गरीब बच्चे के साथ ‘फीलिंग प्राउड’ वाली फोटो तो कल ही अपलोड कर दी थी, फिर आज क्या?

आज लड्डूओं का डब्बा नही है, विदेशी ‘कैडबरी सेलिब्रेशन’ का चॉकलेट का बड़ा सा डब्बा सामने बिस्तर पे पड़ा हुआ है, उसी अखबार के पास, जिसमे झंडे और मोदी की तस्वीर के साथ ‘मेक इन इंडिया’ का बड़ा सा स्लोगन लिखा हुआ है| चॉकलेट का डब्बा ऑफिस में कल ही बाँट दिया गया था, चपरासी सबकी सीट पे ही दे गया था, कल छुट्टी है, इसलिए एक दिन पहले ही दे दिया गया| 15 अगस्त माने, छुट्टी| जिनके पास में घर है, वो घर चले गए, बाकी रह गये| क्या करे, कोई आईडिया भी नही आ रहा| अचानक, उसके बड़े से दिल में बड़ा सा खयाल आया| वैसे भी पूरी चॉकलेट वो अकेले तो खा नही सकता, बहुत सुगर होती है, फैट बढती है| और वो डब्बे में से सिल्क वाली बड़ी चॉकलेट निकाल के ‘5 स्टार’ भर के काम करने वाली बाई के बच्चों को देने और ‘फीलिंग इमोशनल’ वाली सेल्फी लेने चल दिया|

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