बिकने दिजिए चश्मा-चरखा Ashok Mishra द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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बिकने दिजिए चश्मा-चरखा

बिकने दीजिए चश्मा—चरखा

अशोक मिश्र



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बिकने दीजिए चश्मा—चरखा

मैं सूनसान रास्ते से लंबे—लंबे डग भरता चला जा रहा था। अपने में कुछ खोया—खोया सा। कि पीछे से आवाज आई, श्बेटा! सुनो तो।

मैंने घूमकर देखा। अपनी पारंपरिक वेशभषा में बापू खड़े थे। बापू बोले तो अपने पूरे देश के बाप यानी राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी। अरे वही! जिसने गरीब किसानों की मामूली धोती को भी एक ब्रांड बना दिया था। अपने देश के ज्यादातर किसान तो वैसे भी ऐसे ही धोती पहनते हैं। आज भी सत्तर फीसदी किसान जाड़ा, गर्मी हो या बरसात, एक ही धोती में काम चला लेते हैं। यह उनका फैशन नहीं, मजबूरी है। और मजबूरी का नाम महात्मा गांधी शायद इसीलिए पड़ा क्योंकि गांधी जी के सामने आधी धोती पहनने और आधी ओढने की मजबूरी नहीं थी।

गांधी जी को सामने देखकर मैं भौंचक रह गया। मैंने सोचा कि कहीं मेरे दिमाग में कोई केमिकल लोचा तो नहीं पैदा हो गया है। मैं भी श्संजय दत्तश् तो नहीं हो गया हूं। खुदा न खास्ता ऐसा हुआ, तो अपनी वॉट लग जाएगी। जब फिल्म श्लगे रहो मुन्ना भाईश् में केमिकल लोचा के चलते संजय दत्त को बापू दिख सकते हैं, तो फिर मैं किस खेत की मूली हूं। उनका तो हृदय परिवर्तन हुआ और वे एक गुंडे से गांधीगीरी करने वाले समाज सेवक हो गए थे। मेरे साथ ऐसा हुआ, तो मैं भुने चने बेचने लायक भी नहीं रह पाऊंगा। मन ही मन मैंने दोहराया, श्जल तू..जलाल तू..आई बला को टाल तू।श् इसके बाद मैंने अपनी आंखें झपकाई, सिर को झटका, लेकिन बापू फिर भी दिखते रहे। बापू थोड़ा आगे बढ़े। मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए क्षीण स्वर में बोले, श्बेटा! सुनो तो। मैं तुमसे ही बात कर रहा हूं।

मैंने सोचा, चलो बापू से बात कर ही लेते हैं। बात कर लेने में कोई बुराई नहीं है। अगर वाकई बापू हुए, तो कोई बात नहीं। उनसे बात करने में एक फायदा यह होगा कि मैं अपने स्वर्गवासी अम्मा—बाबू जी का हाल—हवाल भी उनसे मालूम कर लूंगा। आखिर वे आए तो स्वर्ग से ही होंगे। और..अगर दिमाग में केमिकल लोचा हुआ, तो कल ही किसी हॉस्पिटल में जाकर चेकअप करवा लूंगा।

मैंने बापू से कहा, श्हां बताइए। मैं आपके किस काम आ सकता हूं। हां, एक बात पहले से बता दूं। अगर बहुरूपिये हो, तो फूट लीजिए यहां से। आपकी कोई दाल फिलहाल नहीं गलने वाली। आजकल जेब में बड़ी कड़की चल रही है। कला का प्रदर्शन करने पर भी दो—तीन रुपये से ज्यादा नहीं मिलेगा।

उन्होंने दीन स्वर में कहा, श्बेटा! मैं बहुरूपिया नहीं, वास्तविक गांधी हूं... मोहन दास करमचंद गांधी। पूरे देश का राष्ट्रपिता। नोटों पर छपने वाला गांधी। बेटा! मेरा चश्मा और चरखा बिक रहा है। उसे किसी तरह बिकने से बचा लो। उसे बिकने मत दो। अब तक मेरा सब कुछ बिक चुका है। बस, चश्मा और चरखा ही बचे हैं।

मैं उनकी बात सुनकर भौंचक रह गया। क्या ये वही बापू हैं जिन्होंने अपनी अहिंसा नीति और लाठी—लंगोटी के बल पर ब्रिटिश सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया था। मैंने कहा, श्बापू! देश का मैं एक अदना—सा आम आदमी हूं। मेरे जेब में सिर्फ बारह रुपये पड़े हैं। घरैतिन के आदेशानुसार, इन्हीं पैसों से तंबाकू, हरी मिर्च और धनिया खरीदकर घर ले जाना है। मैं भला आपके चश्मे और चरखे को बिकने से कैसे बचा सकता हूँ ? कोई धन्ना सेठ या मंत्री, सांसद तो हूं नहीं कि घर में करोड़ों रुपये की रेल—पेल हो। आपको अगर चश्मा—चरखा बिकने का इतना ही दर्द है, तो आप सत्ता के गलियारे में गुहार लगाइए। हो सकता है कि आपकी गुहार काम आ जाए। अगर आप सचमुच बापू हैं, तो आप इस एशिया ही नहीं, बल्कि यूरोपियन कंट्री में भी बहुत पॉवर फुल पर्सन माने जाते हैं। आप चाहें, तो प्रधानमंत्री क्या, उनकी पूरी फौज—फाटा मिनटों में आपके सामने सिर झुकाकर खड़ी हो जाएगी। संसद में ये नेता, मंत्री तो आपकी ही फोटो के सामने सत्य और ईमानदारी की कसमें खाते हैं। इतना भी नहीं करेंगे आपके लिए? लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये लोग बहुत शक्तिशाली हैं। इनकी मर्जी न हो, तो आपका चश्मा और चरखा क्या, देश का एक तिनका भी नहीं बिक सकता। खरीद—फरोख्त का धंधा भी तो यही करते हैं। कभी ईमान बेचते हैं, तो कभी किसी का ईमान खरीदते हैं।

बापू बोले, श्मैं गया था सबके पास गुहार लगाने, लेकिन मेरी कोई सुनता ही नहीं है। कई नेताओं के तो दरबान ने ही झिड़ककर भगा दिया। मंत्रियों से मिलने की कोशिश की, तो पता चला कि पहले से टाइम लिए बिना कोई उनसे मिल ही नहीं सकता। पहले गेट पर गार्ड पूरा मामला दरियाफ्त करता है, मानो वही सांसद, विधायक हो। फिर सांसद, विधायक का ओएसडी पूरी तसल्ली करता है। वहां भी अगर समझा पाने में सफल रहे, तो इन महारथियों से मिलाने ले जाते समय उनका आर्डरली (अर्दली) जल्दी—जल्दी पूछताछ करता है। फिर इन महानुभावों से बातचीत हो पाती है। वह भी कान में फोन लगाए सिर्फ श्हूं ..हांश् करते रहते हैं। अब इस लोकतंत्र में आम आदमियों से ही उम्मीद बची है।

श्तो फिर बापू, आप एक काम कीजिए। राजघाट पर जाकर अनशन पर बैठ जाइए। मैंने बचपन में किताबों में पढ़ा था, अनशन और अहिंसा आपका फेवरेट हथियार है। आप जब अनशन पर बैठ जाते थे, तो यहां देश में वायसराय और उधर लंदन में महारानी विक्टोरिया की गद्दी हिलने लगती थी। ठीक वैसे ही जैसे धार्मिक फिल्मों में दिखाया जाता था। जब कोई असुर, राक्षस या दानव त्रिदेवों में से किसी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करता था, तो उसके तपोबल से अलकापुरी में देवराज इंद्र का सिंहासन डोलने लगता था। देवराज को तार—बेतार से सूचना मिल जाती थी कि मर्त्‌यलोक में कोई उनका कंप्टीटर पैदा हो गया है, जो उनकी भट्ठी बुझाने पर तुला हुआ है। राजगद्दी तो हथियाएगा ही, इंद्राणी के साथ—साथ रंभा, मेनका, उर्वशी से भी हाथ धोना पड़ेगा। दर—दर भटकना पड़ेगा, सो अलग। बस, फिर क्या था? वे उस तपस्वी की तपस्या भंग करने चल देते थे। उनका वश नहीं चला, तो मेनका, उर्वशी, रंभा तो हैं ही। भला, सुंदर नारी को देखकर किसका मन नहीं डोलेगा। वैसे बापू.. एक बात बताऊं। देवराज ह्यूमन सायकोलजी का बहुत बड़ा ज्ञाता रहा होगा। तभी वह ऐसे—ऐसे तरीके खोजकर लाता था तपस्या भंग करने के कि दैत्य, दानव, राक्षस ही नहीं, मानव भी उसके जाल में फंस जाते थे।श् मैंने अपना ज्ञान बघारने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

गांधी जी मेरी बात सुनकर लगा कि ऊब रहे हैं या फिर कोई पुराना दर्द उभर आया है। उन्होंने गंभीर आवाज में कहा, श्मैं गया था न राजघाट। वहां तो पुलिस का जबरदस्त पहरा लगा हुआ है। पुलिस वाले आपस में बतिया रहे थे, आज गांधी जयंती पर श्रद्धांजलि देने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री आने वाले हैं। मैं अंदर जाने लगा, तो एक पुलिस वाले ने झिड़क दिया। मैं उस पुलिस वाले से लाख कहता रहा, अरे बेवकूफों! जिसे श्रद्धांजलि देने लोग आने वाले हैं, वह मैं ही हूं। मुझे अंदर जाने दो, लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। एक सिपाही ने तो मेरा हाथ पकड़कर इतनी जोर से सड़क पर ढकेला कि मैं गिर पड़ा। गिरते ही मुझ पर लाठियां बरसाईं। यह देखो, गिरने से दो—तीन जगह चमड़ी छिल गई है। खून निकल रहा है। अपनी धोती का एक टुकड़ा फाड़कर बांधा, तभी खून बहना बंद हुआ।

मेरी समझ में नहीं आया कि जब गांधी जी के हत्यारे को फांसी तक दी जा चुकी है, तो फिर यह सदेह कैसे मेरे सामने खड़े हैं? मैंने अपनी जिज्ञासा जाहिर की, तो गांधी जी बोले, श्हां..तुम्हारी बात सही है। मेरी भौतिक देह मिट चुकी है। मेरी ही नहीं, गांधीवाद की भी हत्या हो चुकी है। तुम जानते ही हो, मेरी मौत के साथ ही लाठी, चश्मा, लंगोट सब यहीं रह गया था। जब भगवान के यहां चश्मे और चरखे के बिकने की खबर पहुंची, तो मैं बेचौन हो गया। इनसे मेरा लगाव तो जगजाहिर है। चश्मा दृष्टि और चरखा सिद्धांत का प्रतीक है। जब यही बिक जाएगा, तो फिर गांधी और गांधीवाद में रह ही क्या जाएगा। सो, मैंने प्रभु से विनती कि मुझे मर्त्‌यलोक पर आकर गांधीवाद को बचाने का एक प्रयास करने का मौका दिया जाए। काफी रोया—गिड़गिड़ाया उनके सामने, तब जाकर कहीं पसीजे। फिर देह की समस्या आई। प्रभु ने अपने तपोबल का कुछ भाग व्यय करके मेरी देह बनाई और कहा, सिर्फ बारह घंटे का समय दिया जाता है गांधीवाद को बचाने का। नौ घंटे तो खर्च हो चुके हैं। कोई यह मानने को ही तैयार नहीं है कि मैं ही गांधी हूं।श्

गांधी जी की भोली—भाली बातें सुनकर मुझे हंसी आ गई। मैंने हंसते हुए कहा, श्बापू! आपके ये चेले—चपाटे बहुत बदमाश हो गए हैं। आपके चेले तो दुनिया भर में आपको ब्रांड बनाकर बेच रहे हैं। आपने जिंदगी में कभी टोपी पहनी, नहीं पहनी। यह मैं नहीं जानता। लेकिन जहां तक मुझे मालूम है, आपके चेले—चपाटे आपको जिंदा रहते टोपी पहनाते रहे। आपके मरने के बाद देश की जनता को टोपी पहनाते रहे। आजादी के बाद से तो श्गांधी टोपीश् एक बेहद पॉपुलर इंटरनेशनल ब्रांड बन चुकी है। इसके ब्रांड एंबेसडर बने कांग्रेसी मौज कर रहे हैं।

बापू की बातें सुनते ही पता नहीं क्यों, इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का कथित भाग्य विधाता किंतु हकीकत में सबसे निरीह आम आदमी का गुस्सा मुझमें समा गया। मैंने रोष भरे शब्दों में कहा, श्बापू जी! एक बात कहूं। बुरा मत मानिएगा। आज आपके और देश की पूरी जनता के साथ जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए आप ही दोषी हैं। यह आपकी ढुलमुल अहिंसा नीति का ही परिणाम है। आपकी भौतिक मृत्यु भले ही बहुत बाद में हुई हो, लेकिन दार्शनिक मौत तो आपके जीवित रहते ही हो गई थी। आपके जिंदा रहते हुए ही, जब आपके गांधीवादी चेले गांधी दर्शन को बेचकर कमाने—खाने का जरिया बना रहे थे, तब आपने कोई प्रतिरोध नहीं किया। इधर आपकी मौत हुई, उधर आपके अपनों ने ही गांधीवादी दर्शन का क्रिया—कर्म कर डाला। गांधी टोपी, खादी और चरखे को हुंडी की तरह भुनाकर अपनी तिजोरी भरने लगे। पहले ईमान बेचा, फिर देश बेचने लगे। एक दिन जब ईमान की कीमत दो कौड़ी की रह गई, तो ये आपका चश्मा, घड़ी, लाठी और लंगोट बेचने पर तुले हुए हैं। मैं धारा प्रवाह बोलता जा रहा था और बापू चुपचाप खड़े सुन रहे थे।

श्बापू! शायद आपको पता न हो। आपकी इन चारों वस्तुओं पर आपके चेले—चपाटों की नजर बहुत पहले से थी। कुछ समाजशास्त्रियों का कहना है कि आपका पूरा दर्शन अराजकतावादी था। आप दिल से तो इस देश की शोषित—पीड़ित जनता के साथ थे, लेकिन मस्तिष्क आपका टाटा, बिड़ला और डालमियां के यहां गिरवी था। इधर आपकी मौत हुई, उधर देश पूंजीपतियों ने आपकी घड़ी हथिया ली। आपकी घड़ी पर तो शुरू से ही पूंजीपतियों की निगाह थी। सो, वे ले गए।

मैं सांस लेने को पलभर रुका। फिर कहना शुरू किया, बापू! जब किसी बाजार या मेले—ठेले में लूट मचती है, तो जिसके हाथ में जो आता है, वह लेकर भाग लेता है। आपके उपभोग के वस्तुओं की जब लूट मची, तो उस समय कांग्रेसियों के हाथ में आपकी लाठी थी। सो, वे उसे उठा ले गए। पहले तो उनकी समझ में नहीं आया कि आखिर वे इसका उपयोग क्या करेंगे। काफी माथापच्ची की, लेकिन उन्हें इसका उपयोग नहीं सूझा। समस्या गंभीर थी, इसका कोई न कोई हल निकाला जाना जरूरी था। सो, इस मुद्दे पर कांग्रेसियों ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मीटिंग बुलाई, ताकि लाठी का उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। मीटिंग में कोई लाठी का उपयोग आत्मरक्षा में करने की सलाह देता, तो कोई इसे म्यूजियम में सजाकर रखने की। लाठी के उपयोग को लेकर काफी श्कउआ रोरश् मचा। तब एक पुराने और खुर्राट कांग्रेसी नेता ने कहा, इसका उपयोग भेड़—बकरियों को हांकने में किया जाए, तो शायद राष्ट्रपिता बापू जी की आत्मा को ज्यादा सुख मिलेगा। वे इसी लाठी से देश के क्रांतिकारी आंदोलन को जिंदगी भर हांकते रहे। अंग्रेजों उनसे हांकते रहे। अब अगर इसका उपयोग भेड़—बकरियों को हांकने में किया जाए, तो मेरे ख्याल से इसका सटीक उपयोग हो सकेगा।

मैंने गांधी जी की ओर देखा और पूछा, श्भेड़—बकरियों का मतलब समझे आप?

गांधी जी के चेहरे पर द्विविधा का भाव पैदा हुआ। उन्होंने नकारात्मक सिर हिलाते हुए कहा, श्नहीं बेटा। चलो, तुम्हीं बता दो।

श्भेड़—बकरियों का मतलब देश की गरीब और शोषित—पीड़ित जनता। कांग्रेसी नेता के भेड़—बकरियों का यही अर्थ था। आप देखें। आजादी के बाद, खास तौर पर आपकी मृत्यु के बाद से लेकर आज तक जनता आपकी ही लाठी से हांकी जा रही है। आपकी लाठी का सबसे अच्छा उपयोग इन कांग्रेसियों ने किया। वे आपकी लाठी के सहारे अपनी लडखड़ाती राजनीति को सहारा देने लगे। इसमें सहायक की भूमिका में थी आपकी टोपी और आपका दर्शन। गांधीवादी दर्शन की आड़ में गरीब और अकालग्रस्त जनता को दिखा—दिखाकर इन कांग्रेसियों ने खूब रबड़ी—मलाई खाई। जिसने भी विरोध किया, वह पिटा। जरा सा भी असंतोष पैदा हुआ, तो लाठी का उपयोग आपके श्वैष्णव जनश् यानी आम जनता की पीठ पर बरसाने में होने लगा। इसके साथ ही कांग्रेसियों ने एक काम और बड़ा मार्के का किया। पीठ पर बरसती लाठी को किसी दिन कोई आम आदमी छीनकर उसका उलटा उपयोग न करे, गरीबी, बेकारी, भुखमरी और अपमान से बेजार जनता इस पूरी व्यवस्था के खिलाफ बगावत न कर दे, इसीलिए सन सैंतालिस से ही आपके चहेतों ने श्गांधीवादी चश्माश् देश की जनता को पहना दिया था। बापू! अगर आप गौर करें, तो लंगोट भी आपकी नहीं रह गई थी। लंगोट तो इस देश के लंपटों ने पहन रखी थी। वे गांधी लंगोट पहन कर दुनिया का हर दुष्कर्म करने पर उतारू हैं। अब तो वॉलीवुड ने भी आपको सेलेबल बना दिया है। गांधीवादी दर्शन को यदा—कदा फिल्मी दुनिया वाले बिकाऊ माल की तरह जनता में बेच रहे हैं। बेचकर काफी मोटा माल कमा रहे हैं। ऐसे में अगर नेता आम जनता की आंखों पर चढ़ा चश्मा और इस औद्योगिक युग में बेकार हो चुके चरखे को आपके चेले—चपाटे बेच देना चाहते हैं, तो उन्हें बेच देने दीजिए। इन भौतिक वस्तुओं को बचाकर आप करेंगे भी क्या? यह तो न आपके किसी काम की है और न ही इस देश की जनता के। वैसे भी ये चीजें रखी—रखी सड़—गल ही जाएंगी, किसी काम की नहीं रहेंगी। जैसे आपका गांधीवादी दर्शन अब बहुसंख्यक के किसी काम का नहीं रहा। बहुसंख्यक के काम का तो वह पहले भी नहीं था, लेकिन आपके चेलों ने इसका प्रचार—प्रसार इतना किया था कि देश की जनता को थोड़ी बहुत आशा थी इससे। अब आपके दर्शन और आपके गांधीवादी चेलों की कलई खुल चुकी है।

मैं बड़बड़ाता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। गांधी जी भी कभी साथ—साथ, तो कभी पीछे—पीछे चले आ रहे थे। पीछे—पीछे चले आ रहे बापू मेरी बात गौर से सुन रहे हैं या नहीं, यह जानने के लिए मुड़कर देखा। पता चला कि मेरे आसपास तो कोई है ही नहीं। मैं अकेला ही बड़बड़ाता चला जा रहा हूं। मुझे पहली बार लगा कि मेरे दिमाग में कोई केमिकल लोचा पैदा हो गया है। मैं कहीं पागल तो नहीं हो गया हूं। आपका क्या ख्याल है!Ashok Mishra

ashok1mishra@gmail.com