गौरा एक हथकरघे पर बैठी थी, और सुबोध उसे देखकर खुश हुआ। उसने चाची से कहा कि दोनों तुरंत गली में चलें। सुबोध की खुशी स्पष्ट थी। कहानी प्रेम के धागे और रिश्तों की सुंदरता को दर्शाती है। स्वाभिमान - लघुकथा - 22 Janki Wahie द्वारा हिंदी लघुकथा 2.2k 1.2k Downloads 3.7k Views Writen by Janki Wahie Category लघुकथा पढ़ें पूरी कहानी मोबाईल पर डाऊनलोड करें विवरण हथकरघे पर बैठी गौरा को देख, सुबोध चहक कर बोला- चाची जी, दोनों गलीचे तुरन्त बिक गए। सुबोध, सच्ची ! आप सुंदर धागों और रंगों को बुनकर, जादुई डिज़ाइन का ऐसा ताना बाना बुनती हो कि देखते ही सबके मुख से 'वाह' निकलता है । ये लीजिये 20, 000 रूपये । More Likes This नेहरू फाइल्स - भूल-113 द्वारा Rachel Abraham प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम - 2 द्वारा Abantika हिकमत और कमाई द्वारा Devendra Kumar उड़ान (1) द्वारा Asfal Ashok नौकरी द्वारा S Sinha रागिनी से राघवी (भाग 1) द्वारा Asfal Ashok अभिनेता मुन्नन द्वारा Devendra Kumar अन्य रसप्रद विकल्प हिंदी लघुकथा हिंदी आध्यात्मिक कथा हिंदी फिक्शन कहानी हिंदी प्रेरक कथा हिंदी क्लासिक कहानियां हिंदी बाल कथाएँ हिंदी हास्य कथाएं हिंदी पत्रिका हिंदी कविता हिंदी यात्रा विशेष हिंदी महिला विशेष हिंदी नाटक हिंदी प्रेम कथाएँ हिंदी जासूसी कहानी हिंदी सामाजिक कहानियां हिंदी रोमांचक कहानियाँ हिंदी मानवीय विज्ञान हिंदी मनोविज्ञान हिंदी स्वास्थ्य हिंदी जीवनी हिंदी पकाने की विधि हिंदी पत्र हिंदी डरावनी कहानी हिंदी फिल्म समीक्षा हिंदी पौराणिक कथा हिंदी पुस्तक समीक्षाएं हिंदी थ्रिलर हिंदी कल्पित-विज्ञान हिंदी व्यापार हिंदी खेल हिंदी जानवरों हिंदी ज्योतिष शास्त्र हिंदी विज्ञान हिंदी कुछ भी हिंदी क्राइम कहानी