देह के दायरे
भाग - उनतीस
प्रातः काल पूजा रसोई में खाना बना रही थी | करुणा भी वहीँ उसका काम में हाथ बंटा रही थी | तभी उन्हें गली में से किसी की जोर-जोर से झगड़ने की आवाज सुनाई दी |
पूजा उत्सुकता के कारण आता-सने हाथों के साथ ही देखने के लिए कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयी | पंकज सामने गली में किसी से झगड़ रहा था | उसके चारों ओर भीड़ एकत्रित हो गयी थी और वह भीड़ में धिरा एक व्यक्ति को पकड़े हुए निर्दयता से पीट रहा था |
पूजा दौड़कर वहाँ पहुँची | भीड़ में किसी का भी साहस न था जो कि पंकज से उसे व्यक्ति को छुड़ा दे | पूजा ने भीड़ में घुसकर बड़ी कठिनाई से पंकज के हाथों उसे आदमी को मुक्त किया | ऐसा प्रतीत होता था जैसे पंकज के सिर पर खून सवार हो और यदि पूजा वहाँ न आती तो शायद वह उस व्यक्ति को जान से ही मार देता |
पूजा उसे पकड़कर कमरे में ले आयी |
“क्यों लड़ रहे थे उससे?” क्रोध से पूजा ने कहा |
“मैं तुम्हारे लिए किसी के मुँह से अपमान का एक शब्द भी नहीं सुन सकता |”
“ओह! तो यह बात थी | लेकिन क्या इससे उसकी आवाज रुक जाएगी? किस-किसको मारोगे तुम!” पूजा की आवाज में अनजाने ही व्यंग्य का पुट आ गया |
“जो भी तुम्हारे बारे में अपनी गन्दी जुबान खोलेगा, मैं उसे जान से मार डालूँगा |” क्रोध से चिल्लाकर पंकज ने कहा |
“इससे कुछ नहीं होगा पंकज, सिर्फ तुम अपराधी बन जाओगे | इस समाज को तुम नहीं समझते...इसमें रहने वालों से तुम नहीं टकरा सकते | हाँ, इस समाज का मुँह तुम्हें अवश्य ही बन्द करना होगा |” पूजा ने शान्त स्वर में कहा |
“कैसे...?”
“तुम अपनी शादी कर लो |”
“मेरी शादी |” हँसकर पंकज ने कहा |
“हाँ, तुम्हारी शादी | या तो तुम किसी लड़की को चुन लो अन्यथा मैं तलाश करती हूँ |”
“तो तुम ही करो यह काम |” कहकर पंकज ऊपर अपने कमरे में चला गया |
पूजा वापस लौटकर रसोईघर में आ गयी | करुणा वहाँ बैठी खाना बना रही थी |
पूजा ने करुणा के पास आकर कहा, “देखो, पंकज ने आज सुबह से नाश्ता भी नहीं किया है | तुम जाकर उसे गर्म-गर्म खाना दे आओ | यहाँ का काम मैं सम्भाल लूँगी |”
“मैं भाभी?” आश्चर्य से करुणा ने पूछा |
“हाँ तुम |”
“मगर...|”
“चली जाओ करुणा, संकोच न करो | पंकज अच्छा लड़का है |” पूजा ने कहा और खाना थाली में लगाकर करुणा को दे दिया |
करुणा जब खाने की थाली लेकर ऊपर पहुँची तो पंकज वहाँ बैठा अपने चित्रों की फाइल देख रहा था |
“करुणा जी आप?” करुणा को देखकर पंकज ने आश्चर्य से कहा |
“आपके लिए खाना लायी हूँ |”
“आपने कष्ट क्यों किया? मैं नीचे आकर भोजन कर लेता |” उसने आगे बढ़कर करुणा के हाथों से खाने की थाली ले ली |
“इसमें कष्ट की क्या बात है ? पूजा भाभी ने कहा तो मैं खाना ले आयी |”
“आपको पूजा ने भेजा है?”
“हाँ...|”
“ओह |” पंकज अभी थोड़ी देर पहले ही पूजा से हुई बात को याद करके कह उठा |
“क्या बात है?”
“कुछ नहीं, यूँ ही | आप बैठिए |”
“नहीं, चलती हूँ |”
“मेरे खाना खाने तक रुकिए अन्यथा मुझे पानी पीने नीचे जाना होगा |” हँसते हुए पंकज ने कहा |
करुणा को अपनी भूल का पता चला | वह खाने के साथ पानी लाना भूल गयी थी |
“मैं पानी लेकर आती हूँ |” कहते हुए वह नीचे चली गयी | जब वह वापस लौटी तो उसके हाथ में पानी का जग और दुसरे में गिलास था |
पंकज ने खाना समाप्त किया तो करुणा ने गिलास में पानी भरकर उसकी ओर बढ़ा दिया |
“करुणा जी, मैं आपका एक चित्र बनाना चाहता हूँ |”
“आप मेरा चित्र बनाएँगे, मैं इतनी सुन्दर तो नहीं हूँ |”
“आपको शायद अपनी सुन्दरता का ज्ञान नहीं है |”
“सुन्दर चाँद में कलंक भी होता है |”
“तो भी लोग उसे सौदर्य का प्रतिक मानकर उसकी पूजा करते हैं |”
“आपके लिए कुछ और लाऊँ?” कहकर करुणा ने बात को टाल देना चाहा | वैसे उसके मस्तिष्क में भी पूजा के शब्द उभर रहे थे, ‘जाओ संकोच न करो, पंकज अच्छा लड़का है |’
“आपने मेरी बात का उत्तर नहीं दिया |”
“मेरा चित्र बनाकर आप क्या करेंगे?” करुणा कह उठी |
“मैं प्रत्येक सुन्दर वस्तु को अपने चित्रों में उतार लेना चाहता हूँ |”
करुणा ने कुछ उत्तर नहीं दिया | खाने के बर्तन उठाकर वह नीचे जाने को मुड़ी | पंकज ने इसे उसकी स्वीकृति समझा और उसे जाते देख बोला, “मैं दोपहर को चित्र बनाने के लिए आपकी प्रतीक्षा करूँगा |”
“आज स्टूडियो नहीं जाओगे?”
“नहीं, आज घर पर ही काम करूँगा | वैसे यह ठीक भी नहीं होगा कि आप स्टूडियो आएँ |”
करुणा बिना कुछ कहे वहाँ से चल दी | उसकी चुप्पी ने पंकज को आश्वस्त कर दिया था और वह चित्र बनाने की तैयारी में लग गया |