सिस्टर रॉस का प्रेम Riya Sharma द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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सिस्टर रॉस का प्रेम

सिस्टर रॉस का प्रेम

उस दिन अस्पताल के पांचवें माले की खिड़की से बाहर की दुनिया को देखते हुए सैम अपनी नर्स, के लिए बहुत बेचैन था। सिस्टर रॉस के वापस आते ही वह नाराजगी दिखाते हुए उसे अपने आगोश में भरकर बोला था। " मुझे अकेला छोड़ कर मत जाया करो लिज़, एक सेकण्ड के लिए भी नहीं। तुम्हारे बगैर मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। तुम जानती हो न...फिर? लीज़ा माय डार्लिंग....."

अब यह सब कुछ रॉस की यादों का हिस्सा मात्र बन कर रह गया था। उस शहर से बहुत दूर आ जाने पर भी रह -रह कर वह सैम के शब्दों और उसके बारे में सोचने से अपने आप को रोक नहीं पा रही थी। अपने आप को समेटती और अपने अतीत से दूर ले जाने की कोशिश करती हुई वह महीने भर से इस नई जगह पर रह रही थी।

दो वर्ष पहले की बात है। अपनी नर्सिंग की ट्रेनिंग पूरी करते ही रॉस शहर के विख्यात अस्पताल में स्टाफ नर्स बन कर आई थी। बचपन से ही सेवा भाव उसकी नस -नस में भरा हुआ था। साधारण नैन नक्श वाली और माध्यम कद -काठी की वह बर्फ सी सफ्फाक आंग्ल लड़की तब चौबीस वर्ष की थी। अपनी सारी सादगी के साथ जिंदादिल, जीवन ऊर्जा से भरपूर और आकर्षक। उसके सहयोगी और डॉक्टर उसकी सौम्य और स्नेही हंसी को देख कर कहते थे।

"रॉस आधे मरीज तुम्हारी सेवा से ठीक हो जाते हैं और आधे तुम्हारी हंसी से।"

"और जो दवाईयां आप लोग देतें हैं उनका क्या?" वह अपनी जादुई हंसी बिखेर कर कह दिया करती थी।

"वो हम ऐसे ही मरीजों का मन बहलाने के लिए दे देते हैं। " इस बात पर सभी सम्वेत कहकहे लगा देते थे। रोगी उसे खूब चाहते थे और वह स्वयं भी उनकी सेवा करके अपने जीवन से संतुष्ट व प्रसन्न रहती थी।

मां इस दुनिया में उसे तब अकेला छोड़ गई थी जब वह अठारह वर्ष की थी। सात्विक विचारों वाले उसके संतोषी पिता तब जीवन के छह दशक पूरे कर चुके थे। उन्होंने रॉस को सेवा कर्म की तरफ प्रेरित करते हुए समझाया था। "रॉस जीवन में सच्ची खुशी जरुरतमंद व्यक्तियों की सेवा करने से ही मिलती है। मेरी प्रिय पुत्री तुम अपने जीवन में कुछ भी करो परन्तु समाज सेवा के लिए थोड़ा वक्त जरूर रखना।" बीमारी के दौरान अपनी मृत्यु से पहले मां करीब दो महीने तक अस्पताल में रहीं थीं। उनका ध्यान रखते हुए उसने अस्पताल में रोगी और स्टाफ के बीच के संबंधों को खूब करीब से देखा था। इसी दौरान रॉस को नर्सिंग पेशे के प्रति आदर हो गया था। उसने इसे अपनाने का निर्णय जब पिता के सामने रखा तब वे भी बहुत प्रसन्न हुए।

पिता को सम्मानित से वृद्ध आश्रम में उनके सहयोगियों और मित्रों के हाथों सकुशल सौंप कर वह इत्मिनान से अपनी नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए चली गई थी। वहां से अक्सर फ़ोन करके वह उनसे उनका कुशल क्षेम पूछती रहती थी और अपनी उपलब्धियां बताती हुई ट्रेनिंग को मन लगा कर पूरा करती रही।

ट्रेनिंग समाप्त होते ही उसे शहर के बड़े और ख्याति प्राप्त अस्पताल से नौकरी का प्रस्ताव आ गया था जिसे उसने खुशी से स्वीकार कर लिया। पिता और पुत्री एक साथ प्रसन्नता से दिन व्यतीत कर रहे थे। समय बीतता रहा। उम्र, बीमार रहते पिता पर अपना प्रभाव दिखाने लगी थी। पैंसठ वर्ष की वय में छह माह पहले एक रात ईश्वर के बुलावे पर वे भी रॉस को इस संसार में अकेला छोड़ गए। परन्तु वे उसे खुश रहने का हुनर सिखा गए थे।

रॉस चौबीसवें वर्ष में थीं परन्तु फिर भी उसके दिल में वह हलचल अभी तक नहीं हुई थी जो हर जवां लड़की में किसी लड़के को देख कर होती थी। कभी कोई प्रस्ताव रखता भी था तो वह मुस्कराते हुए उसे सिस्टर होने का महत्त्व बता देती थी। कोई भी नौजवान उसे इस कदर प्रभावित नहीं कर सका था कि वह थोड़ा रूमानी होती। अपने पेशे और मरीजों के साथ समय बिताना उसका एकमात्र मकसद होता था। इसी में अपनी समस्त खुशियां ढूंढती हुई वह संतुष्ट रहती थी। उसने अपना सारा ध्यान सिर्फ सेवा को समर्पित कर रखा था इसलिए प्रेम के लिए उसके दिल के दरवाजे बंद थे।

करीब दो महीने पहले सैम को एक खतरनाक बाइक हादसे के बाद उस अस्पताल में लाया गया था। उस रात को रॉस जब ड्यूटी पर आई तो साथी सिस्टर ने उसे इस नए मरीज के बारे में जानकारी देते हुए कहा। "रॉस ये उलझा हुआ केस है इसलिए बहुत सावधानी रखनी होगी।" ऑपरेशन के बाद उसे उस कक्ष में रखा गया था और चौबीस घंटे की देख-रेख की जिम्मेदारी रॉस जैसी काबिल नर्स को दी गई थी। बेहोश सैम के होश में आते ही डॉक्टर जैकब को तुरंत बुलाना था क्योंकि मरीज़ के सर पर गहरी चोट थी और उसकी याददाश्त बनी रहेगी इस बात को लेकर उन्हें शक था।

रात दो बजे डॉक्टर जैकब अपना आखिरी राउंड लेने आए। मरीज तब तक भी बेहोश था। सिस्टर ने दो कप कॉफी के बनाए और एक कप डॉक्टर जैकब की तरफ बढ़ाया। कॉफ़ी पीते हुए वह गौर से मरीज के चेहरे को देख रहे थे मानों उसके भावों को पढ़ने की कोशिश कर रहे हों।

"रॉस तुमने इसकी रिपोर्ट्स देखी? तुम्हे क्या लगता है? न्यूरॉन्स कितने डैमेज हुए होंगे?......यदि....." कॉफी समाप्त होने तक दोनों मरीज की हालत पर चर्चा करते रहे। फिर उसे बराबर हिदायत देकर डॉक्टर जैकब चले गए। रॉस ने दया और चिन्तावश देर तक मरीज के चेहरे की तरफ देखा। ऐसा लग रहा था मानो वह चैन की नींद सो रहा हो। भोलापन लिए साफ़ -संदली रंग का चेहरा जो हादसे से कुम्हला कर पीला पड़ चुका था। घने काले बाल, खूंट सी निकल आई दाढ़ी जो उसके चेहरे की साफ़ रंगत को नीली आभा प्रदान कर रही थी और सूखे पपड़ाए हुए गुलाबी होंठ। अचानक ही जीवन में पहली बार उसके दिल ने क्षणिक अंगड़ाई ली। तुरंत सर झटक कर वह अपने आप में वापस आई और मरीज की तीमारदारी करती हुई उसके जीवन को बचाने की हर संभव कोशिश करने लगी। पेशे की गरिमा बनी रही।

देर रात तक सभी औपचारिकताएं पूरी करके वह वहीं उसके बेड से लगी हुई कुर्सी पर बैठ कर किताब से हेड इंजरीज़ के बारे में जानकारी लेती रही। रह -रह कर उसकी नज़र मरीज पर चली जाती थी। उसमें जरा सी भी हरकत हो तो वह तुरंत कोई कार्यवाही करे। मामूली सी देर भी मरीज के लिए घातक सिद्ध हो सकती थी। कुछ देर बाद उसने उठ कर खिड़की के परदे को हटा कर बाहर झांका। स्याह अंधियारी रात थी। सुबह के उजास की कोई आहट नहीं थी। शाम से ही बारिश की बौछारें लगातार शहर को भीगा रहीं थीं। न जाने कितनी देर तक वह बौछारों के संगीत को सुनती रही। मरीज का ध्यान आते ही उसने पलट कर फिर उस की तरफ देखा। वह तब भी उसी तरह बेहोशी की गहरी नींद में समाया हुआ था। रॉस ने दीवार पर लगी घड़ी की तरफ देखा। ठीक चार बज रहे थे। वापस कुर्सी में बैठ कर वह फिर से किताब में डूब गई। अचानक अपने सर पर हाथ का स्पर्श पाकर वह चौंक उठी। कब कुर्सी पर बैठे ही नींद में उसका सर मरीज के बेड पर टिक गया था उसे याद नहीं। घबरा कर उसने फिर से घड़ी की तरफ देखा। चार बजकर तीन मिनिट हुए थे। इसका मतलब उसे पूरे तीन मिनिट की झपकी आ गई थी। यदि इस बीच उसकी नींद नहीं खुलती और मरीज को कुछ हो जाता तो? ग्लानि और पश्चाताप से उसकी आंखें भर आईं।

उसके सर को छूते हुए मरीज के नीचे लटक आए दाहिने हाथ को उसने धीरे से वापस बेड पर रखा और उसके चेहरे को गौर से देखने लगी। बहुत ही धीमी और टूटी हुई आवाज में वह कुछ बुदबुदा रहा था। उसने झटपट डॉक्टर जैकब को फ़ोन पर इस बात की जानकारी दी और ध्यान से मरीज को सुनने लगी आखिर वह क्या कहना चाह रहा था। वह फिर बुदबुदाया। "मुझे छोड़ कर.....मत जाओ....लिज़....डोंट गो...लीज़ा।"

डॉक्टर जैकब ने आते ही उसका मुआयना करना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद वह लगभग होश में आ चुका था। टेस्ट, दवाईयां, इंजेक्शन, रिपोर्ट्स सब कुछ फिर से शुरू होने लगा। सुबह रिपोर्ट्स आने पर डॉक्टर जैकब ने अफ़सोस जताते हुए कहा। " गहरी अंदरूनी चोट लगने की वजह से इसका दिमागी संतुलन थोड़ा डगमगा गया है। सिस्टर इस पर पूरा ध्यान रखना होगा। दिमाग में किसी भी तरह की जरा सा ठेस लगने से इसकी याददाश्त हमेशा के लिए भी जा सकती है। रॉस तुम सबसे काबिल नर्स हो इसलिए मैं इस मरीज की जिम्मेदारी तुम्हें सौंप रहा हूँ। यह हैं दवाइयों और इंजेक्शन की सूची और कब कैसे क्या करना है, वह मैं तुम्हें समझा चुका हूँ।" इसी बीच मरीज की बड़ी बहन आ चुकी थी।

"ये लीज़ा कौन है?" सिस्टर रॉस ने उनसे पूछा।

"लीज़ा उसकी मंगेतर थी, जिसे सैम बेइंतहा प्यार करता था। रात तेज गति से मोटर साइकिल चलाते हुए जब ये हादसा हुआ था, उस समय लीज़ा भी उसके साथ थी। घायल सैम के होश खोने से पहले ही बुरी तरह जख्मी लीज़ा ने उसकी बांहों में दम तोड़ दिया था। शायद उसी सदमें में वह बड़बड़ा रहा हो। सैम का उसी शहर में एक शानदार रेस्त्रां है। वक्त मिलते ही तफ़रीह के लिए उसे दोस्तों के साथ हवा से बातें करते हुए बाइक चलाने का शौक़ था। खुश मिज़ाज़ और मस्ती से भरा सैम बेपरवाह जीवन जीता था। परन्तु जीवन थोड़ा अनुशासन भी मांगता है न सिस्टर। लापरवाही का अंजाम अक्सर बुरा होता है और देखो वही हुआ न ?" उन्होंने दुखी होकर आंसू पोंछते हुए रॉस को बताया। सैम बुरी तरह घायल था और उसे अलग रूम में रखा गया था। रॉस पूरे समर्पण से उसकी सेवा में लग गई।

वह निस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करती रही और मरीज होश संभालने के बाद से ही विचलित मनोदशा की वजह से उसे अपनी मंगेतर लीज़ा समझ कर उसके साथ प्यार मोहोब्बत से पेश आता रहा। एक बार वह बोला। "लिज़ आजकल तुम मुझसे कम क्यों बोलने लगी हो ? मैंने तुम्हे बाइक से गिरा दिया था इसलिए? मैं गंदा हूँ न लिज़ ? अच्छा सॉरी.....कहा न.....आई ऍम सॉरी लीज़।"

" नहीं सैम तुम बहुत प्यारे हो। अभी तुम पूरी तरह से ठीक नहीं हो न इसलिए। जब तुम एकदम ठीक हो जाओगे तब हम दोनों खूब बातें करेंगे। चलो अब दवाई लो और आराम करो।" रॉस मुस्कुरा कर उसके बालों को सहलाते हुए बोली।

"तब फिर से नदी किनारे जाकर बैठेंगे। देखो न अभी तो मैं ठीक से चल भी नहीं सकता।" उसने अपने प्लास्टर लगे दोनों पैरों की तरफ देख कर मायूसी से कहा। सैम, सिस्टर रॉस के अलावा किसी और नहीं पहचानता था और अपने सभी कार्यों के लिए उसी पर आश्रित रहता था। पहचानता तो वह रॉस को भी नहीं था। नर्स न समझ कर वह उसे अपनी मंगेतर लीज़ा ही समझता था। डॉक्टर ने रॉस से कहा फिलहाल वह लीज़ा बनकर ही उसकी सेवा करती रहे। मरीज के लिए यही ठीक रहेगा। कर्तव्य का निर्वाह बखूबी करना रॉस की आदत और पेशे की जरुरत थी।

रॉस को यदि किसी कारणवश उसके पास आने में देर हो जाती तो वह न तो किसी और को अपने पास आने देता था और न ही खाना व दवाईयां लेता था। डॉक्टर जैकब कहते । " रॉस आ जाएगी माय बॉय, वह तुम्हारे लिए फूल लेने गई है।" उनके इस तरह बताने पर भी वह उसी तरह नाराज़गी से बेजार होता हुआ चुपचाप बैठा रहता और उसके आने की बेसब्री से राह देखता रहता था। रॉस के आने पर वह उससे ढेरों शिकायतें करता और प्रेमवश उसे अपने आगोश में भरकर चूम लेता था। रॉस के लिए यह एकदम नया अनुभव था। वह भीतर तक एक अलग सी अनुभूति से सिहर जाती थी। परन्तु साथ ही हमउम्र पुरुष की बांहों में सिमटना उसे सुखद भी लगने लगा था। समय के साथ - साथ ठीक होते सैम से उसे हमदर्दी के अलावा प्रेम भी होने लगा था। वह जी -जान से उसकी सेवा करते हुए अतिरिक्त प्रसन्नता से भरी रहती थी। वह स्वयं भी सैम को एक पल के लिए छोड़ना नहीं चाहती थी। वह एक समर्पित नर्स थी इसलिए स्नेह उसे अपने सभी मरीज़ों से होता था फिर सैम से ये अतिरिक्त लगाव कैसा ? उसे आश्चर्य होता कि उसे हो क्या रहा है ? धीरे -धीरे इस तरह के नए अनुभवों से गुजरना उसे अच्छा लगने लगा और वह सैम के प्रेम में भीगने लगी।

महीने भर बाद जब सैम थोड़ा ठीक होने लगा तब उसने सोचा कि अब समय आ गया है। अब वह सैम को बता देगी कि वह उससे प्रेम करने लगी है। बहुत प्रेम, जिसके रहते वह एक नई में दुनिया में जीने लगी थी। उस दिन सुबह घर से आते वक्त वह दुआ मांगने गिरिजाघर गई। वापसी में उसकी पसंद के फूलों का गुलदस्ता बनवाया और खुशी से छलकते हुए अस्पताल पहुंचीं। सैम कमरे में नहीं था। करीने से बना हुआ खाली बिस्तर देख कर उसने चिंतित होकर साथी सीनियर नर्स से पूछा। "सिस्टर इस कमरे के मरीज को कहीं और शिफ्ट कर दिया क्या ? उसके साथ सब ठीक तो है न ?"

"हाँ रॉस अब वह काफी ठीक हो गया था न इसलिए उसकी बहन ने डॉक्टर के साथ मश्वरा करके उसे घर ले जाने की अनुमति ले ली।"

वह सोचने लगी 'ऐसे कैसे जाने दिया डॉक्टर जैकब ने, अभी वह पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ था। विचलित होकर उसने फूल लेकर सैम के घर जाने का मन बना लिया। संकोच, मायूसी और उत्सुकता से उसने फिर पूछा।

"सिस्टर उसने मेरे लिए कुछ कहा? कोई संदेश दिया क्या ?"

"हर मरीज ठीक हो जाने के बाद हमें धन्यवाद के सिवा और क्या देगा रॉस? हमें सिखाया जाता है न निश्वार्थ भाव से सेवा करना। तुम्हारी सेवा से एक मरीज को जीवनदान मिला है यही तुम्हारे लिए सच्चा तोहफा है। अब बाकी मरीज तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। आज से तुम्हारी ड्यूटी वार्ड नंबर बारह में है।" उन्होंने स्नेह से रॉस की पीठ सहलाते हुए उसकी तरफ देख कर कहा।

इस तरह सब कुछ अचानक ख़तम हो जाने से वह अपने आप को बिखरा हुआ और बहुत तनहा महसूस करने लगी। सैम सब कुछ भुला कर इस तरह उसकी जिंदगी से अचानक चला जाएगा वह सोच नहीं सकी थी। निराशा और दुःख से टूट कर उसके हाथों से फूलों का गुलदस्ता नीचे गिर गया और वह हताश होती शिथिल क़दमों से बाहर जाने लगी। तभी इंचार्ज ने उसे एक हल्के नीले रंग का लिफाफा थमाते हुए कहा। "सिस्टर रॉस ये चार नंबर वाला मरीज आपके लिए दे कर गया था।" रॉस खुशी से भर उठी जैसे उसे जीने का एक और मौक़ा मिल गया हो। अपनी नम आंखों को झटपट पोंछतें हुए उसने धड़कते दिल से लिफाफा खोला और उसके अंदर रखा पत्र पढ़ने लगी। पत्र पढ़ते ही वह बुत की तरह संवेदनहीन हो गई। बर्फ की तरह सफ़ेद और पत्थर की तरह बेजान हो कर वह वहीं पर गिर पड़ी । पत्र उसके हाथ से छूटकर नीचे फर्श पर गिर गया। सीनियर सिस्टर ने उसे संभालते हुए फिर पत्र पढ़ा। वह एक शुक्रिया कार्ड था जिसमें लिखा था। 'आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सिस्टर। मेरी तरफ से ये भेंट स्वीकारें।' और लिफ़ाफ़े में कुछ सम्मानित सी रकम रखी थी।

उस दिन सीनियर सिस्टर के गले से लग कर वह बहुत देर तक रोती रही। उस रकम को वहीं दान खाते में डलवा कर उसने छुट्टी लेकर कुछ समय के लिए उस शहर से दूर चले जाना ही उचित समझा। प्रेम के उस दरवाजे को बंद करने के लिए जो उसके जीवन में अनायास ही खुल गया था। परन्तु अब भी सैम की आवाजें और यादें रह -रह कर लगातार उसका पीछा कर रहीं थीं।

"तुम मुझे कभी भी अकेला मत छोड़ा करो लिज़। मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरा दिल घबराने लगता है। ऐसा लगता है जैसे तुम मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गई हो। लिज माय डार्लिंग.....तुम जानती हो न मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ....तुम्हारे बिना मैं एक पल भी जी नहीं सकूंगा।" सैम उसे अपनी बांहों में समेटता हुआ कहता था।

'अब तुम मेरे बगैर कैसे जी पा रहे हो सैम?' वह अपने आंसुओं के अविरल प्रवाह को रोकने का असफल प्रयास करते हुए बुदबुदा रही थी।

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