वास्को द गामा - प्रथम यात्रा Dholiya Mayur द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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वास्को द गामा - प्रथम यात्रा

वास्को द गामा

प्रथम यात्रा

Dholiya Mayur

८ जुलाई, १४९७ के दिन चार जहाज़ लिस्बन से चल पड़े और उसकी पहली भारत यात्रा आरंभ हुई।

साओ गैब्रिएल - इसके नाविकों में से प्रमुख थे: मुख्य चालक पेरो द अलेंकर, जो बर्तोलोमेउ डियास के साथ उत्तमाशा अंतरीप तक और फिर कांगो तक गया था। उसके अलावे गोंज़ालो अलवारेस जो डिएगो केओ की दीसरी यात्रा पर साथ था और डिएगो डियास जो बर्तेलोमेओ डियास का भाई था किरानी की भूमिका में था। ये रफ़एल से थोड़ा बड़ा था और वास्को द गामा इसी जहाज पर था।

साओ रफ़एल - चालक था जोआओ दे कोएंब्रा। इसके अलावे जोआओ दे सा किरानी की भूमिका में। इस जहाज का कप्तान गामा का भाई पाओलो द गामा था।

बेरियो - संचालक था पेरो दे एस्कोबार जो डिएगो केओ के साथ कांगो गया था और

अज्ञात नाम का एक भंडारण जहाज़ जिसका संचालन अफ़ोन्सो गोंज़ाल्वेस कर रहा था।

लगभग 170 लोगों के इस बेड़े के अन्य महत्वपूर्ण नामों में मार्तिम अफ़ोन्सो और फ़र्नाओ मार्टिन्स का नाम था। अफ़ोन्सो कांगो में रहा था और अफ्रीकी बोलियों को जानता था जबकि फ़र्नाओ मोरक्को के कारावास में रहने के कारण अरबी सझता था। दस से बारह अभियुक्त भी इस जहाजी बेड़े में राजा द्वारा रखे गए थे (पुर्तगाली में Degredados, यानि निष्कासित) जिनको ख़तरनाक स्थलों पर जानकारी और खोजी कामों को पूरा करने का काम दिया गया था। प्रत्याशित रूप से जहाज पर कोई महिला सवार नहीं थी।

अटलांटिक

चलने के एक सप्ताह बाद, 15 जुलाई को वो केनेरी तक पहुँचे और उसके बाद छाए धुंध की वजह से जहाज अलग हो गए। केप वर्डे में उनकी मुलाकात होनी तय थी लेकिन पाओलो द गामा को कोई और जहाज वहाँ नजर नहीं आया। हांलांकि बेरिओ और भंडारण जहाज कुछ घंटो के भीतर आ गए। गामा का जहाज अगले चार दिनों तक नहीं मिला। मिलने के बाद वो वहाँ एक सप्ताह तक रुके और फिर 3 अगस्त को रवाना हुए। अभी तक के सभी पुर्तगाली यात्राओं में नाविकों के जहाज अफ्रीका के तट के निकच से गुजरे थे - बार्तेलोमेयो डियास के भी। लेकिन एक तूफानी हवा, जो खुले अटलांटिक में बहती है नाविकों को उत्तमाशा अंतरीप तक तेजी से धकेल देती है -ऐसा वास्को द गामा ने सुन रखा था। उसके अपने नाविकों को पूर्व की ओर मुड़ कर अफ्रीका के तीरे चलने की बजाय खुले समुद्र में दक्षिण की ओर चलने को कहा। कई दिनों तक खुले समुद्र में चलने और कोई जमीन या आशा न देखने के बाद 1 नवम्बर वो जमीन के निकट आए। ये उत्तमाशा से कोई 150 किलोमीटर पहले रहा होगा। लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। जहाज की मरम्मती और अपने नक्शे देखने के बाद लोगों ने विश्राम किया। जहाज पर मौजूद वृत्तांतकार ने लिखा कि लोगों की चमड़ी का रंग भूरा है, वे सील, व्हेल या हिरण का मांस और वनस्पति की जड़ी खाते है। वे चमड़े के वस्त्र पहनते हैं और उनके साथ कुत्ते हमेशा चलते हैं। वहाँ से वो 16 नवम्बर को चले।

उत्तमाशा अंतरीप

बर्तेलेमेओ डियास के दिए नक्शे से तट रेखा बुल्कुल मेल नहीं खा रही थी, लेकिन बे चलते रहे और 22 नवम्बर को उत्तमाशा अंतरीप पहुँचे। वहाँ पर डियास द्वारा स्थानीय लोगों के साथ हुए झड़पों की ख़बर उन्हें मिल चुकी थी, लेकिन उनके साथ भी वहाँ पर झड़प हो गई। जहाजों का मरम्मत के बाद 7 दिसम्बर को वो वहाँ से चले। 16 दिसम्बर को वो उस नदी के मुहाने पर पहुँचे जहाँ से बर्तेलोमेउ डियास के नाविकों ने उसे वापस जाने पर मजबूर किया था। उनको वहाँ डियास द्वारा स्थापित क्रॉस दिखा। इसके बाद के रास्तों पर आज तक कोई नहीं पहुँचा था - इसलिए पहले से बने मानचित्र बेकार हो गए और उन्हें नया मानचित्र बनाना पड़ा। तट के सहारे वे उत्तर चले। चूंकि वह क्रिसमस के आसपास का समय था, द गामा के कर्मीदल ने एक तट का नाम, जिससे होकर वे गुजर रहे थे, "नैटाल" रखा। इसका पुर्तगाली में अर्थ है "क्रिसमस" और उस स्थान का यह नाम आज तक इस्तेमाल में है (क्वाज़ुलु-नटाल)।

स्वहिली तट

जनवरी तक वे लोग आज के मोज़ाम्बीक तक पहुँच गए थे, जो पूर्वी अफ़्रीका का एक तटीय क्षेत्र है जिसपर अरब लोगों ने हिन्द महासागर के व्यापार नेटवर्क के एक भाग के रूप में नियंत्रण कर रखा था। उनका पीछा एक क्रोधित भीड़ ने किया जिन्हें ये पता चल गया की वे लोग मुसलमान नहीं हैं और वे वहाँ से कीनिया की ओर चल पड़े। कीनिया के मोम्बासा में भी उसका विरोध हुआ। पहुँचने के बाद उसे बताया गया कि मोम्बासा शहर में कई ईसाई रहते हैं। जहाज को तट से दूर रखने के बाद कुछ नाविक शहर के दौरे पर गए जहाँ उन्हें गोरे (पीले) ईसाईयों से मुलाकात हुई। बाद में पता चला कि मोज़ाम्बिक से खबर मिलने के बाद वहाँ के सुल्तान ने उन्हें फंसाने के लिए एक योजना तैयार कर रखी थी। गामा वहाँ से भाग निकला - पर उसे भारत पहुँचने के लिए दिशाओं के जानकार नाविकों या निदेशकों की जरुरत थी। उसने एक छोटी नाव पर आ रहे चार लोगों को पकड़ लिया। एक बूढ़े मुसलमान व्यापारी ने बताया कि पास के तट मालिंदी में भारतीय नाविक रहते हैं। कोई चारा न देख वास्को मालिंदी पहुँचा। भारतीयों को देशकर उसे लगा कि ये ईसाई है - कृष्णा के उच्चारण को वो क्राइस्ट समझ रहे थे। मालिंडि (3°13′25″S 40°7′47.8″E) में, द गामा ने एक भारतीय मार्गदर्शक को काम पर रखा, जिसने आगे के मार्ग पर पुर्तगालियों की अगुवाई की और उन्हें २० मई, १४९८ के दिन कालीकट (इसका मलयाली नाम कोज़ीकोड है), केरल ले आया, जो भारत के दक्षिण पश्चिमी तट पर स्थित है।

कालीकट

वहाँ के राजा (समुदिरी, पुर्तगाली इसे ज़ामोरिन कहने लगे) ने उन्हें कालीकट के पत्तन पर आने का न्यौता दिया लेकिन गामा के राह में इतनी बाधाएँ आईं थीं कि उसे लगा कि ये भी दुश्मन ही होंगे। लेकिन वो मिलने के लिए वली (अरबी में शासक) से मिला और फिर संगीत के साथ कालीकट में ज़ामोरिन (सामुदिरी) ने गामा का स्वागत किया। वहाँ पर राज-दरबार में आने से पहले उसे एक मंदिर मिला जहाँ अंदर में उसे एक देवी की मूर्ति मिला। पुर्तागलियों को लगा कि ये मरियम की मूर्ति है और उसे भरोसा हो गया कि ज़मोरिन एक ईसाई शासक है। वो मूर्ति शायद मरियम्मा देवी की थी जिसे वो ईसामसीह की माँ मरियम समझ रहे थे। वृत्तकार जो गामा के साथ उस दल में शामुल था जिनको जामोरिन ने स्वागत किया था, लिखा - "इस देश के लोग भूरे हैं, छोटे कद के और पहले देखने से ईर्ष्यालु और मतलबी लगते हैं। मर्द कमर के उपर कुछ नहीं पहनते (शायद धोती, या वेष्टी)। कुछ बाल बड़े रखते हैं जबकि कई सर मुंडवा लेते हैं। महिलाएँ सामान्यतया सुन्दर नहीं दिखती हैं। " फर्नाओ मार्टिन्स ने ज़ामोरिन से मुलाकात में गामा का अरबी अनुवाद किया।

दरबार में मुस्लिम सलाहकारों ने उसे व्यापार की बात करने में कई अड़चने पैदा की। उन्होंने गामा के लाए उपहार की खिल्ली उड़ाई और उसे राजा से मिलाने में देरी की। इसके अलावे उसके पास राजा (सामुदिरी) के लिए उचित कोई उपहार भी नहीं था। ऐसे कारणों से उसे ज़मोरिन से लड़ाई हो गई। ज़ामोरिन के मुस्लिम मंत्रियों ने उससे (अलग में) व्यापार का कर मांगा। ज़ामोरिन ने उसके द्वारा आग्रह किए गए स्तंभ (संभवतः क्रॉस या मरियम की मूर्ति) को भी खड़ा करवाने से मना कर दिया। सुलह और फिर लड़ाई चलती रही। राजा के मुस्लिम मंत्रियों ने उसके दल से कई लोगों को अगवा कर लिया। लेकिन समुद्र मे उनके जहाज पर आए ग्राहकों को गामा ने बंदी बना लिया। अंत में उसे जाने की अनुमति मिली और अगस्त के अंत में वो रवाना हुआ - राजा ने उसको मलयालम में लिखा प्रशस्ति पत्र भी दिया जिसमें पुर्तगाल के राजा जॉन के नाम संदेश था कि वॉस्को यहाँ आया था।

लेकिन अगले ही दिन कोई 70 अरबी जहाज वहाँ आक्रमण के लिए आते दिखे। इसके जवाब में उसने गोली-बारी की। कुछ भारतीय बंधकों के साथ सितंबर 1498 में वापस पुर्तगाल के लिए लौट गया। जनवरी में वो स्वाहिली तट पर दुबारा पहुँचा। जहाज पर कोई 500 दिन गुज़र गए थे - लोग थक और बीमार हो चले थे। पश्चिम अफ्रीकी तट पर घर से कोई 2 सप्ताह की दूरी पर रहने के समय उसका भाई -और दल के तीन जहाजों में से एक का कप्तान, पॉलो द गामा - बीमार पड़ गया और मारा गया। उसने बाक़ी जहाजों को लिस्बन लौट जाने का आदेश दिया और भाई को दफ़नाने के बाद अपने दल से पीछे लिस्बन पहुँचा। वहाँ उसका भयंकर स्वागत हुआ।

दूसरी यात्रा

भारत में गामा की यात्रा

गामा ने वापस आकर अपना वृत्तांत राजा मैनुएल को सुनाया। अपने पूर्वाग्रहों के विपरीत उसे भारत के ईसाई अलग लगे और वे पुर्तगाल को पहचान न सके - जिससे उसे अचरज हुआ। भारत में (मालाबार तट पर) मुस्लिमों की उपस्थिति से भी उसे दुविधा हुई। अफ्रीका में हर जगह मुस्लिम शासन और अरब सागर में मुस्लिम (मूर और अरब) व्यापारियों की तादाद को देखकर उसको अपने "ईसाई कर्तव्य" की याद आई और उसने दो सालों के अन्दर दो और मिशन भेजे।

जनवरी 1500 इस्वी का समय बहुत ही शुभंकर लगा, पर मिशन भेजने में 2 महीनों की देरी हो गई। मार्च 1500 में पेद्रो आल्वारेज़ काब्राल की अगुआई में 13 जहाज लिस्बन से चले। उनका लक्ष्य अफ्रीका और भारत में व्यापार के आधार (फैक्टरी और उपनिवेश) लगाने के अलावे जामोरिन को मुस्लिम व्यापारियों को भगा देने का आग्रह भी था। लेकिन कई जहाज उत्तमाशा अंतरीप पर पहुँचने के गामा के बताए दक्षिण-पश्चिम और फिर पूर्व जाने के छोटो रास्ते पर जाने के क्रम में खो गए। काब्राल कालीकट पहुँचा - नए जामोरिन ने यूरोपीय जहाजों का व्यापार स्वीकार किया और सुरक्षा का आश्वासन दिया। लेकिन उस साल के लिए अरब व्यापारी पत्तन में पहुँच चुके थे। केब्राल ने अरब जहाज को पकड़ लिया - ये कहकर कि ये जामोरिन के साथ हुई व्यापार संधि का उल्लंघन है। इसके जवाब में उन्होंने पुर्तगाली फैक्ट्री के सभी 70 लोगों को मार दिया। लेकिन काब्राल की यात्रा पूर्ण असफलता नहीं थी - उसने आते वक़्त सोफाला और किल्वा के राजाओं से संपर्क स्थापित किया। वो भारत में कुन्नूर भी गया और कुछ जहाज जो 'खो गए थे" - दक्षिण अमेरिका पहुँच गए थे।

इससे पहले के कब्राल लौट पाता, मैनुएल प्रथम ने होआओ द नोवा के नेतृत्व में 4 जहाजों के साथ निकला। काब्रल के छोड़े एक संदेश को अफ्रीका के तट पर एक पुराने जूते में टंगा पाया और कालीकट पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने कई मुस्लिम जहाजों पर आक्रमण किया। कुन्नूर में एक फैक्टरी लगार वापस पुर्तगाल लौट गया।

इस प्रकार पुर्तगाल के जहाजों ने अगले 20 सालों के लिए उसने कालीकट के शासकों से दुश्मनी मोल ले ली। सन् 1502 में वास्को को दुबारा भेजा गया। उसकी अगली यात्रा १५०2 में हुई, जब उसे ये ज्ञात हुआ की कालीकट के लोगों ने पीछे छूट गए सभी पुर्तगालियों को मार डाला है। अपनी यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले सभी भारतीय और अरब जहाज़ो को उसने ध्वस्त कर दिया और कालीकट पर नियंत्रण करने के लिए आगे बढ़ चला और उसने बहुत सी दौलत पर अधिकार कर लिया। इससे पुर्तगाल का राजा उससे बहुत प्रसन्न हुआ। वो कोचीन, कुन्नुर और गोवा भी गया। कोचीन के दक्षिण में उसे सदियों से रह रहे ईसाईयों (संत थॉमस, सन् 54 से) का पता चला। गामा ने कुछ पुर्तगालियों को वहीं छोड़ दिया और उस नगर के शासक ने उसे भी अपना सब कुछ वहीं छोड़ कर चले जाने के लिए कहा, पर वह वहाँ से बच निकला ।

उसकी दूसरी यात्रा पुर्तगाली राजा के मिशन के हिसाब से बहुत सफल रहा क्योंकि उसने अरब व्यापारियों के कड़ी लड़ाई की - जामोरिन को व्यापार के लिए मजबूर किया और भारत में रह रहे ईसाईयों का पता लगाया।

बाद की यात्रा

सन् 1524 में वह अपनी अंतिम भारत यात्रा पर निकला। उस समय पुर्तगाल की भारत में उपनिवेश बस्ती के वाइसरॉय (राज्यपाल) के रूप में आया, पर वहाँ पहुँचने के कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।

महत्व

पुर्तगाली राजकुमार और अन्वेषक हेनरी के बाद वास्तो द गामा सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक खोजकर्ताओं में था। तीन महादेशों और दो महासागरों को पार करने के बाद भी अरब सागर में अरब व्यापारियों और अफ्रीकी साम्राज्यों से लड़ने और फिर भारत आकर अपने साथ लाए पुर्तगाली राज-संदेश तथा उसकी हिफाजत के लिए राजा (ज़ामोरिन) से युद्ध और सफलता उसके दृढ़-निश्चय को दिखाती है। वास्को को वापस पहुँचने के बाद पुर्तगाल में एक सफल सैनिक की तरह नवाजा गया। अपने समकालीन कोलम्बस के मुकाबले उसकी लम्बी यात्रा में भी बग़ावत नहीं हुई और थकने के बाद भी अपने लक्ष्य पर जमे रहा।

वास्को द गामा के भारत पहुँचने पर अरब और मूर व्यापारियों के मसाले के व्यापार को बहुत धक्का लगा। इस व्यापार को हथियाने के लिए वास्को द गामा ने न सिर्फ खतरनाक और परिश्रमी यात्रा की, बल्कि कई युद्ध भी लड़ा। अपने बेहतर बंदूकों (या छोटे तोपों) की मदद से वो अधिकांश लड़ाईयों में सफल रहा। इससे अदन (अरब)-होरमुज (ईरान)-कालीकट जल-व्यापार मार्ग टूट या कमज़ोर पड़ गया। उसकी सफलता को देखते हुए पुर्तगाल के राजा मैनुएल ने भारत और पूर्व के कई मिशन चलाए। अल्बुकर्क, जो उसकी तासरी यात्रा से पहले पुर्तगाल से भेजा गया था, ने अरब सागर में अरबों के व्यापार और सामुद्रिक सेना और संपत्ति को तहस-नहस कर दिया और खोजी मलेशिया (मलाका) और फिर चीन (गुआंगजाउ, पुर्तगालियों का रखा नाम - कैंटन) तक पहुँच गए। सोलहवीं सदी के अत तक अरबी भाषा की जगह टूटी-फूटी पुर्तगाली व्यापार की भाषा बन गई।

इस समय पुर्तगाल एक सामुद्रिक शक्ति बन गया। भारत में जहाँ वो एक बार पहुँचा था उसका नाम उसके सम्मान में वास्को-डि-गामा (गोवा में) रखा गया है। चाँद के एक गढ्ढे का और पुर्तगाल में कई सडकों का नाम वास्को के नाम पर रखा गया है। 2011 में बनी मूलतः मलयालम फिल्म उरुमि में उसको एक खलनायक की तरह दिखाया गया है, निर्देशक - संतोष शिवन।

The END