मेहनत रंग लाएगी amalesh prasad द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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मेहनत रंग लाएगी

मेहनत रंग लाएगी

अक्‍सर युवा जिस क्षेत्र में पढ़ाई करते हैं, सफलता भी उसी क्षेत्र में चाहते हैं। लेकिन जब उनको उस क्षेत्र में सफलता नहीं मिलती है, तब वे निराश और हताश हो जाते हैं। हर हाल में अपने ड्रीम कैरियर को हासिल करना चाहते हैं। इसके लिए वे कुछ भी करने की जिद्द करने लगते हैं। इससे वे फ्रसटेशन के शिकार हो जाते हैं और तनाव में अपने आपको गुमराह कर देते हैं। जबकि जीवन का गणित ऐसा नहीं है। आनंद बख्‍शी फिल्‍मी दुनिया के मशहूर गीतकार रहे हैं। जब वे फिल्‍मी दुनिया में आए थे। उनका सपना कुछ और था। उनकी दिल्‍ली ख्‍वाहिश सिंगर बनने की थी। तबला और गायन का उन्‍होंने ट्रेनिंग लिया था। बस उनकी ख्‍वाहिश थी कि एक गीत आकाशवाणी केंद्र, मुंबई के लिए रिकार्ड हो जाए। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए वे बेटिकट ही मुंबई आ गए थे। लेकिन वे गायक बनने में असफल रहे। उन्‍हें निराशा हाथ लगी। फिर क्‍या था? मेहनत रंग लाई। तबला वादन और गायकी के ज्ञान और अनुभव को उन्‍होंने गीत लिखने में इस्‍तेमाल किया। और वे एक सफल गीतकार बन गए। हिंदी फिल्‍मों में उन्‍होंने पांच हजार से अधिक हिट सुपरहिट गीत लिखे हैं। वे कभी ऐसा नहीं सोचे थे। जो उन्‍होंने हासिल किया। अपने जीवन के अंतिम समय तक वे एक से एक गीत लिखते रहे।

आप जिस क्षेत्र में मेहनत कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि सफलता भी उसी क्षेत्र में मिले। उस क्षेत्र से जुड़े दूसरे प्रोफेशन में भी सफलता मिल सकती है। इसके लिए आपको अपने को और अपने स्‍किल को मल्‍टी परपस बनाने की जरूरत है। राकेश रौशन और सुभाष घई की कहानी तो और दिलचस्‍प है। दोनों ने फिल्‍म इंस्‍टिट्यूट, पुणे से एक्‍टिंग का कोर्स किया था। इन दोनों ने बतौर एक्‍टर एक दो फिल्‍मों में काम भी किया। लेकिन सफलता नहीं मिली। वे दोनों भी निराश हो गए। लेकिन इनकी भी मेहनत रंग लायी। अपने अभिनय स्‍किल को इनलोगों ने डायरेक्‍शन में इस्‍तेमाल किया। आज वे दोनों सफल निर्माता निर्देशक हैं। एक्‍टिंग कोर्स का उपयोग इनलोगों ने डायरेक्शन में किया और कामयाब रहे।

मुकेश, किशोर कुमार, मो. रफी फिल्‍मी दुनिया के मशहूर गायक हैं। सभी लोग इनका नाम बहुत ही प्रेम और श्रद्धा से लेते हैं। आज गायकी में इनके बराबर कोई नहीं है। लेकिन इनकी शुरूआती जिंदगी ऐसी नहीं थी। फिल्‍मों में गाया इनका पहला गीत आप सुनेंगे तो आश्‍चर्य करेंगे। आपको विश्‍वास ही नहीं होगा कि इतने महान गायक इस गीत को गा रहे हैं। आपको लगेगा कि इन तीनों महान गायकों ने के. एल. सहगल का कॉपी किया है। ये तीनों कोई साधारण पैरोडी और मिमिक्री आर्टिस्‍ट हैं। इनके गाने का अंदाज और आवाज बिल्‍कुल के. एल. सहगल से मिलती जुलती है। मुकेश का गाया पहला गीत ‘दिल जलता है तो जलने दो’ (फिल्‍म : पहली नजर, 1945) है। यह गीत सुनने पर लगता है कि के. एल. सहगल गा रहे हैं। अभिनेता बनने गए मुकेश ने अपनी आवाज को तराशा-खराशा और एक महान प्‍लेबैक सिंगर बन गए। मो. रफी का गाया पहला गाना ‘इक बार उन्‍हें मिला दे फिर मेरी तौबा मौला (फिल्‍म : पहले आप, 1944) है। यह गीत भी के. एल. सहगल की टू कॉपी लगता है। के. एल. सहगल का कॉपी करते-करते मो. रफी अपने दिल से अपनी आवाज निकालने लगे। और एक महान गायक के रूप में पूरी दुनिया में मशहूर हो गए। किशोर कुमार का गाया पहला गीत ‘मरने की दुआएं क्‍यों मांगू, जीने की तमन्‍ना कौन करे (फिल्‍म : जिद्दी, 1948) है। किशोर कुमार का गाया यह गीत सुनकर संगीतकार एस. डी. बर्मन ने किशोर कुमार से कहा था कि अपने अंदर से के. एल. सहगल को बाहर निकालो। फिर क्‍या था? मेहनत और मेहनत। किशोर कुमार ने अपने सिंगिंग स्‍किल को निखारा और अपनी अलग पहचान बनायी। फिल्‍मी दुनिया की मशहूर गायिका लता मंगेशकर की भी यही कहानी है। लता का गाया पहला गाना नूर जहां का पैरोडी लगता है। उनका गाया पहला हिंदी गीत ‘पा लागूं, कर जोरी, श्‍याम मोसे न खेलो होरी (फिल्‍म : आपकी सेवा में, 1947) है। उस समय सभी लोग कहते थे कि यह गाना नूर जहां ने गाया है। लेकिन लता ने मेहनत की और उनकी मेहनत रंग लाई। इन महान गायकों की ये कहानियां यह सिद्ध करती हैं कि पहली असफलता पूरे जीवन की असफलता नहीं हो सकती है। पहली असफलता अपने आप को और डेवलप करने का सबक हो सकता है। एक-एक सीढ़ी चढ़त-चढ़ते आदमी कई मंजीलें इमारत पर चढ़ जाता है।

सलमान खान के पिता सलीम खान फिल्‍मी दुनिया में हीरो बनने आए थे। ‘प्रिंस’ फिल्‍म में बतौर हीरो काम भी किया। लेकिन असफल रहे। और उन्‍होंने अपनी असफल अभिनय प्रतिभा को एक लेखक के रूप में कन्‍वर्ट कर दिया। आज वे एक सफल लेखक के रूप में जाने जाते हैं। उन्‍होंने जंजीर, शोले, दीवार जैसी फिल्‍मों के लिए लिखा है। प्रकाश झा ने फिल्‍म इंस्‍टिट्यूट से विडियो एडिडिंग का कोर्स किया था। एक इंटरव्‍यू में वे कहते हैं कि अपनी फिल्‍मों के अलावा कभी दूसरे लोगों की फिल्‍मों में एडिटर का काम नहीं किया। लेकिन उन्‍होंने अपनी और अन्‍य प्रोडक्‍शन हाउस की फिल्‍मों में डायरेक्‍शन किया है। और वे आज एक सफल निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, विडियो एडिटर के रूप में नहीं। विडियो एडिटिंग का कोर्स करने के बावजूद उन्‍होंने अपने डायरेक्‍शन में गंगाजल, आरक्षण, दामूल, अपहरण जैसी सुपरहिट फिल्‍में दीं। अपने एडूकेशन से रिलेटेड अन्‍य कामों पर भी नजर रखना चाहिए। और कैरियर के रूप में आजमाते रहना चाहिए। हो सकता है आपका क्रिएटिव स्‍किल और प्रतिभा वहां कमाल कर जाए। जैसा इन लोगों के साथ हुआ।

अमलेश प्रसादपता : 204, डीए9, एनके हाउस, मेन विकास मार्ग, शकरपुर,

लक्ष्‍मीनगर, दिल्‍ली-92 मोबाइल : 9716314047