अस्पताल के उस आईसीयू के बाहर की ठंडी हवा भी जैसे आग बरसा रही थी। डॉक्टर की एक-एक बात आयरा के पैरों तले ज़मीन खिसका रही थी। कबीर की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, और अब मशीनों की बीप की आवाज़ कमज़ोर पड़ती धड़कनों का गवाह बन रही थी।
तभी डॉक्टर ने गंभीर चेहरे के साथ कहा, "देखिए, अब उन्हें अंदर रखना मुमकिन नहीं है, उनकी हालत बहुत नाज़ुक है... आपको बाहर जाना होगा।"
"नहीं, डॉक्टर साहब! मुझे उनके पास ही रहना है," आयरा की आँखों से सैलाब बह निकला। उसने कबीर की तरफ देखा। उस कमज़ोर और बेसुध जिस्म के बीच भी कबीर ने अपनी काँपती हुई उँगलियों से आयरा का हाथ इतनी कसकर पकड़ा हुआ था, मानो वह इस दुनिया की हर कमज़ोरी से लड़कर उसे हमेशा के लिए थाम लेना चाहता हो। उस गिरफ्त में बेइंतहा मोहब्बत थी, लेकिन उस जकड़न के पीछे का डर आयरा की रूह तक को कंपा रहा था।
डॉक्टर के कहने पर नर्स ने जैसे-तैसे कबीर की उँगलियों को आयरा के हाथ से छुड़ाया। आयरा को आंसुओं से धुंधली आँखों के साथ बाहर धकेल दिया गया, और वह दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो गया। कुछ ही पलों बाद वो मनहूस खबर आ गई, जिससे आयरा की दुनिया ही उजड़ गई। कबीर उसे इस बेरहम दुनिया में अकेला छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए जा चुका था।
वक्त किसी के लिए नहीं रुकता, लेकिन आयरा के लिए जैसे घड़ी की सुइयां उसी एक पल में थम गईं। कुछ दिन और हफ्ते बीत गए, पर आयरा के जिस्म में जान बाकी नहीं थी। वह पूरा-पूरा दिन बस आसमान की खाली छतों और बादलों की तरफ शून्य नज़रों से देखती रहती। किसी से कोई बात नहीं, कोई शिकायत नहीं। उसकी इस खामोश बेबसी को देखकर घरवाले भी अंदर से टूट जाते थे, वे सब समझते थे कि इस चुप्पी के पीछे कितना बड़ा तूफान छिपा है।
एक दिन, उसकी माँ ने प्यार और ज़बरदस्ती से समझाते हुए कहा, "आयरा, बेटा... कब तक इस कमरे के अंधेरे में खुद को समेटे रखोगी? थोड़ी देर के लिए बाहर जाओ, ताज़ा हवा में घूमो। ऐसे अकेले बैठे रहने से दिल और भारी होगा।"
आयरा का बाहर जाने का बिल्कुल मन नहीं था। उसे भीड़भाड़, लोगों का शोर-शराबा और चहल-पहल से अब नफ़रत सी हो गई थी। उसे तो बस अंधेरा, अकेलापन और खामोशी ही अच्छी लगती थी, जहाँ वह कबीर की यादों के साथ रह सके। लेकिन माँ के बहुत ज़ोर देने पर, वह अपनी ख़ामोशी को समेटकर कबीर की वही पुरानी डायरी लेकर घर से बाहर निकल पड़ी।
चलते-चलते उसके कदम खुद-ब-खुद उसी पुराने, सुनसान पार्क की तरफ मुड़ गए। वह उस शोर से दूर, पार्क के सबसे वीरान कोने में पहुँच गई। वहाँ वही पुरानी और सुनसान दीवार खड़ी थी।
यह वही दीवार थी जिस पर कभी आयरा ने खुद अपने हाथों से एक पेंटिंग बनाई थी—एक अधूरी पेंटिंग, जिसमें बाद में कबीर ने छुपके से आकर रंग भरे थे। उसी दीवार पर आयरा ने कुछ शेर भी उकेर रखे थे। आयरा सुस्त कदमों से उसी दीवार के पास जाकर बैठ गई। 1 2