अध्याय 16 — जब नियति ने पहचान कराई Rudra Rudrani द्वारा पौराणिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अध्याय 16 — जब नियति ने पहचान कराई

खाना खाने के बाद ज्ञान और रोशनी घर से बाहर टहलने के लिए निकल पड़े। चलते-चलते ज्ञान ने कहा, “आज हम कहीं दूर नहीं जाएँगे। बस ऐसी जगह चलेंगे, जहाँ मैं तुम्हें अपनी कहानी ठीक से समझा सकूँ और कुछ बातें सही दिशा में रख सकूँ।”

दोनों आगे बढ़ने लगे। कुछ देर बाद ज्ञान ने अपनी बात शुरू की।

“रोशनी, तुम्हें अक्टूबर 2026 याद है? उस समय पूरी दुनिया में कैसी-कैसी घटनाएँ हुई थीं! कहीं ज्वालामुखी फट रहे थे, कहीं भूकंप आ रहे थे, कहीं महामारी फैल रही थी। कहीं तूफान थे, तो कहीं समुद्र से उठने वाली विनाशकारी बाढ़। कुछ जगहों पर सूखा पड़ रहा था और कुछ जगहें बाढ़ से तबाह हो रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची हुई हो।

उस समय तुम दूसरे स्कूल में थीं और मैं अपनी पढ़ाई छोड़कर कोडिंग की दुनिया में आगे बढ़ चुका था। लेकिन एक बात समझो—जब हमारा पुराना समय और दुनिया की इतनी बड़ी घटनाएँ भी हमें अलग नहीं कर सकीं, तो अब हम कैसे अलग हो सकते हैं?”

ज्ञान कुछ पल रुका और फिर बोला, “मेरी नज़र में इन घटनाओं के पीछे इंसानों के अपने कर्म भी थे। इंसान ने जंगल काटे, पहाड़ काटे, धरती के भीतर खुदाई की। सोना, चाँदी, कोयला और हीरे निकालने के लिए धरती को मशीनों से खोदता चला गया। जिस धरती को माँ कहा जाता है, उसी के साथ इंसान ने ऐसा व्यवहार किया, जैसे उसका कोई मूल्य ही न हो। फिर जब प्रकृति ने अपना प्रभाव दिखाया, तो लोग भगवान को दोष देने लगे।

मैं उस समय घर पर बैठकर यही कहता था कि भगवान अच्छे हैं और अच्छा ही कर रहे हैं।”

इसके बाद ज्ञान ने रोशनी की ओर देखते हुए कहा, “मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अंदर नकारात्मकता नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानता हूँ, लेकिन दुनिया में कोई दूसरा तुम्हें उस तरह नहीं जानता। जिसे मैं अपना मानता हूँ, वह हर जन्म में मेरा मित्र रहेगा। और सच कहूँ तो मेरी ज़िंदगी में अब तक सिर्फ तुम ही मेरी मित्र हो।

मैं यह भी समझता हूँ कि अचानक इतने सारे सवाल, सपने, एक मिशन और साथ रहने की बात सुनकर तुम्हारे मन में बहुत कुछ चल रहा होगा। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम घर जाओ। अपने परिवार के साथ समय बिताओ। उन्हें इतना ज़रूर बता देना कि तुम सुरक्षित हो और सही जगह पर हो। उन्हें तुम्हारी चिंता नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस पूरी बात का रहस्य अभी किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है।

तुम पंद्रह दिन ले सकती हो। चाहो तो एक महीना भी ले सकती हो, लेकिन अभी मैं पंद्रह दिन का समय दे रहा हूँ। इस दौरान मैं अपना ऑफिस का काम करता रहूँगा। उसके बाद हम अपनी यात्रा और मिशन के बारे में आगे बढ़ेंगे।

मैं बाहर से कैसा हूँ, यह दुनिया देखती है। मेरे भीतर क्या है, यह मैं किसी को आसानी से नहीं बताता। इस दुनिया के बाहर माँ जगदंबा और भगवान शिव के अलावा हमारे बारे में कौन जानता है, यह भी एक अलग बात है।

तुम्हारे अंदर कुछ विशेष गुण हैं। तुम अपने विचारों को संभालना जानती हो। तुम्हें अपने इन गुणों के पीछे का कारण खोजना चाहिए। जिस मिशन के लिए हमें चुना गया है, उसकी शुरुआत अब होनी चाहिए।”

ज्ञान ने कुछ पल रुककर पूछा, “लेकिन रोशनी, तुम अभी तक चुप क्यों हो? तुमने अब तक यह क्यों नहीं बताया कि तुम्हारा जवाब हाँ है या नहीं? अगर तुम्हें कुछ समय चाहिए तो घर जाओ। जब मन करे, वापस आ जाना। मैं अपना काम करता रहूँगा।”

अब तक रोशनी शांत होकर ज्ञान की बातें सुन रही थी। फिर उसने पहली बार अपनी बात रखी।

“ज्ञान, मुझे इन सब बातों के बारे में पता है। मैं तुम्हारे बारे में भी बहुत कुछ जानती हूँ।”

यह सुनकर ज्ञान चौंक गया। वह अब तक लगातार बोल रहा था और रोशनी चुपचाप उसकी बातें सुन रही थी।

रोशनी ने आगे कहा, “मैं इस समय का इंतज़ार कर रही थी। मुझे बस यह नहीं पता था कि वह व्यक्ति तुम हो। मैं भी तुम्हें तब देखा करती थी, जब तुम मेरे घर के सामने से निकलते थे। कई बार हमारी नज़रें मिलती थीं, लेकिन हम दोनों ही अपनी नज़रें हटा लेते थे, ताकि किसी को शक न हो।

हमारे सपने, हमारा लक्ष्य और हमारा रास्ता एक जैसा है। मैं भी अपने जीवन के कई सवालों के जवाब खोज रही हूँ।

तुमने मेरे स्वभाव के बारे में जो कहा, वह सही है। मैं बहुत शांत रहती हूँ। मुझे लगभग गुस्सा आता ही नहीं। मैंने माँ काली की उग्रता नहीं ली है, बस उनका रंग लेकर आई हूँ—साँवला रंग।

और तुम्हारी बात करूँ तो तुम भगवान शिव के हर रूप से परिचित हो। उनके क्रोध से भी और उनकी शांति से भी। मेरी नज़र में सृष्टि में ऐसा कुछ नहीं है, जो तुम्हारे भीतर न हो।”

ज्ञान कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर उसने पूछा, “तो तुम यह सब पहले से जानती थीं और फिर भी चुप थीं?”

रोशनी ने जवाब दिया, “हाँ, मैं बहुत कुछ जानती थी। लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि वह व्यक्ति तुम हो। मैं बहुत समय से उस चेहरे को खोज रही थी, लेकिन मुझे तुम्हारा स्पष्ट चेहरा नहीं मिला था।”

फिर रोशनी ने पूछा, “लेकिन तुमने मुझे कैसे पहचान लिया?”

ज्ञान ने कहा, “जब हम एक ही स्कूल में थे, तब मुझे तुम्हारी अहमियत समझ नहीं आई थी। उस समय तुम रोज़ मेरे सामने होती थीं, लेकिन मैं तुम्हें उस नज़र से नहीं देखता था। जब मैं दूसरे स्कूल में चला गया, तब धीरे-धीरे तुम्हारी कमी महसूस होने लगी।

इसके बाद मैंने तुम्हारे चलने के तरीके, तुम्हारे रहन-सहन, तुम्हारी बात करने के ढंग, तुम्हारी शांति, तुम्हारी आँखों और तुम्हारी मुस्कान को समझना शुरू किया। धीरे-धीरे मेरे मन में उठ रहे सवालों के जवाब मिलने लगे।

मैं कई वर्षों से जिस सवाल का जवाब खोज रहा था, तुम्हारी मौजूदगी ने उसका उत्तर दे दिया।”

रोशनी उसकी बातें सुनती रही।

ज्ञान ने फिर कहा, “अब जब हम दोनों एक-दूसरे को समझ चुके हैं, तो हमें अपने मिशन की शुरुआत कर देनी चाहिए।”

रोशनी ने तुरंत कहा, “नहीं, अभी नहीं। सबसे पहले मुझे अपने माता-पिता को बताना है। मैं उन्हें बताए बिना कोई बड़ा कदम नहीं उठाना चाहती।”

ज्ञान ने उसकी बात समझते हुए कहा, “ठीक है। तुम्हारे पास पंद्रह दिन हैं। परिवार को पूरी कहानी बताने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें इतना बता देना कि तुम सुरक्षित हो और अपने जीवन के लिए कुछ अच्छा करने जा रही हो। उन्हें तुम्हारी चिंता नहीं होनी चाहिए।”

रोशनी ने कहा, “मैं पंद्रह दिन बाद ज़रूर आऊँगी। चाहे कुछ भी परिस्थिति हो, मैं अपना वादा पूरा करूँगी।”

ज्ञान मुस्कराया और बोला, “मुझे लगा था कि शायद हम दोस्त बनने के योग्य नहीं हैं, क्योंकि तुम इतने समय से चुप थीं। लेकिन अब जब हम दोनों एक-दूसरे को समझ चुके हैं, तो मुझे लगता है कि हम दोस्त हैं।”

उसने फिर वही पुराना सवाल पूछा, “क्या हम दोस्त बन सकते हैं?”

रोशनी ने मुस्कराकर कहा, “हाँ, बिल्कुल। शायद यही वजह थी कि हम दोनों ने अब तक किसी और को अपना दोस्त नहीं बनाया।”

ज्ञान ने कहा, “मैंने आज तक किसी को अपना दोस्त नहीं बनाया। मेरी दोस्त सिर्फ तुम हो। तुमने उस समय हाँ कहा होता या ना, इससे मेरे मन में तुम्हारी जगह नहीं बदलती। इतने वर्षों से तुम मेरे लिए मित्र ही थीं।”

इसके बाद दोनों को कई साल पुरानी वह फोन कॉल याद आ गई।

रोशनी ने कहा, “तुमने उस समय बहुत मुश्किल समय पर मुझे फोन किया था। वह भी शिक्षक के फोन से। मैं अचानक तुम्हारी आवाज़ सुनकर घबरा गई थी। मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या जवाब दूँ।”

ज्ञान ने हँसते हुए कहा, “अगर तुमने उस दिन ‘पागल हो क्या’ नहीं कहा होता, तो शायद आज मैं यहाँ तक नहीं पहुँचता। मैं तुमसे सिर्फ हाँ या ना की उम्मीद कर रहा था, लेकिन तुम्हारे जवाब ने मुझे एक साथ जवाब भी दिया और नहीं भी दिया। शायद जो होना होता है, वह होकर ही रहता है।”

दोनों ने तय किया कि अब पंद्रह दिन बाद मुलाकात होगी और फिर मिशन की शुरुआत की जाएगी। यात्रा कहाँ से शुरू करनी है, इसका निर्णय रोशनी कर सकती थी, क्योंकि वह भी उन बातों को जानती थी जिन्हें ज्ञान जानता था।

उस दिन दोनों ने साथ में समय बिताया। वे टहले और कुछ जगहों पर गए। अब उनके बीच दोस्ती का एक ऐसा रिश्ता बन चुका था, जिसे सामान्य दोस्ती के शब्दों में समझाना आसान नहीं था।

उनकी दोस्ती शिव और माता पार्वती की मित्रता जैसी थी—एक ऐसा साथ, जिसमें प्रेम था, विश्वास था, धर्म और नियति का भाव था, लेकिन विवाह का बंधन नहीं। उनके लिए यह मित्रता ब्रह्मांड में एक अनोखी मित्रता थी।

धीरे-धीरे शाम हो गई। लगभग रात के आठ बजे दोनों ज्ञान के घर पहुँचे। दरवाज़ा ज्ञान की माँ ने खोला। दोनों अंदर आए और बैठकर नाश्ता करने लगे।

ज्ञान ने रोशनी से कहा, “तुम चाहो तो आज रात यहीं रुक सकती हो। कल घर जाना हो तो बताना। फ्लाइट से जाना है या ट्रेन से? मैं टिकट बुक करवा दूँगा।”

ज्ञान की माँ यह सब सुनकर हैरान थीं। उन्होंने पूछा, “यह लड़की कौन है? और तुम इससे इतनी बातें कैसे कर रहे हो? इसके लिए टिकट भी बुक करवाओगे?”

ज्ञान ने सहजता से जवाब दिया, “माँ, आज हम दोनों दोस्त बने हैं। यह मेरी यात्रा में मेरे साथ रहेगी। हमारे सपने और हमारा लक्ष्य एक ही है। साथ यात्रा करने से खर्च भी कम होगा और हम दोनों एक-दूसरे के साथ रहेंगे।”

कुछ देर बाद ज्ञान की माँ खाना बनाने के लिए रसोई में चली गईं। वहाँ उन्होंने ज्ञान को बुलाया और कहा, “बेटा, लड़की बहुत अच्छी है। इससे शादी कर लो।”

ज्ञान ने तुरंत कहा, “माँ, अभी तो हमारी दोस्ती शुरू हुई है। और तुम जानती हो कि मैंने बचपन से ही कहा है कि मैं इस जन्म में शादी नहीं करूँगा। फिर भी तुम बार-बार यही बात क्यों कहती हो?”

माँ ने मज़ाक में कहा, “अभी साथ घूमोगे, साथ रहोगे, फिर देखना, तुम्हारा मन बदल जाएगा।”

ज्ञान ने साफ कहा, “नहीं माँ, इस जन्म में ऐसा बिल्कुल नहीं होगा।”

बाद में ज्ञान रोशनी के पास जाकर बैठ गया। तभी उसकी माँ ने रोशनी को रसोई में बुलाया।

माँ ने उससे पूछा, “बेटी, क्या तुम ज्ञान से प्रेम करती हो? क्या तुम उससे शादी करोगी?”

रोशनी ने शांति से जवाब दिया, “नहीं माँ, हम सिर्फ दोस्त हैं और इस जन्म में दोस्त ही रहेंगे। हम दोनों शादी नहीं करेंगे।”

ज्ञान की माँ ने कहा, “मुझे आंटी मत कहो, माँ कहो।”

रोशनी ने कहा, “मैं आपको माँ कहूँगी और माँ की तरह ही मानूँगी। लेकिन मैं आपकी बहू नहीं बन सकती। ज्ञान के अपने नियम हैं और मेरे भी अपने नियम हैं। ज्ञान इस जन्म में शादी नहीं करेगा। अगले जन्म में भी हम दोस्त ही रहेंगे। समय और परिस्थितियाँ भी हमारी दोस्ती को नहीं बदल पाएँगी। हम राधा-कृष्ण की तरह प्रेम कर सकते हैं, लेकिन विवाह नहीं करेंगे।”

माँ ने उसकी बातें सुनीं। आखिरकार उन्होंने उसकी बात स्वीकार कर ली, लेकिन उनके मन में अभी भी यही था कि जब दोनों साथ रहेंगे, साथ यात्रा करेंगे और साथ खाना खाएँगे, तो उनके बीच प्रेम हो ही जाएगा।

माँ को यह नहीं पता था कि ज्ञान और रोशनी वास्तव में कौन हैं और उनके जीवन में आगे क्या होने वाला है।

कुछ देर बाद खाना तैयार हो गया। सभी ने साथ बैठकर खाना खाया। रात को रोशनी एक कमरे में सो गई और ज्ञान अपने कमरे में चला गया। घर में ज्ञान के पिता और उसका छोटा भाई भी थे, जो मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था। परिवार में सब कुछ सामान्य और खुशहाल था।

अगली सुबह रोशनी ने ज्ञान से कहा, “मैं घर ट्रेन से जाना चाहती हूँ। मेरे लिए टिकट बुक कर दो। पंद्रह दिन बाद मैं वापस आ जाऊँगी। उसके बाद हम अपने मिशन की शुरुआत करेंगे।”

ज्ञान ने बिना देर किए ऑनलाइन एसी ट्रेन का टिकट बुक कर दिया। उसने केवल जाने का टिकट ही नहीं, बल्कि पंद्रह दिन बाद लौटने का टिकट भी बुक कर दिया।

ज्ञान को रोशनी पर पूरा भरोसा था। उसे विश्वास था कि वह अपना वादा ज़रूर निभाएगी।

और ज्ञान का भरोसा कभी खाली नहीं गया।

रोशनी अपने घर जाने के लिए निकल पड़ी। अब दोनों की अगली मुलाकात पंद्रह दिन बाद होनी थी। उसके बाद उनका मिशन शुरू होने वाला था।

लेकिन वह मिशन क्या था? उसकी शुरुआत कहाँ से होनी थी? और नियति ने ज्ञान और रोशनी को आखिर किस उद्देश्य से एक साथ लाकर खड़ा किया था?

अब आगे क्या होगा? ज्ञान और रोशनी का मिशन कहाँ से शुरू होगा और पंद्रह दिनों बाद उनकी ज़िंदगी में क्या नया मोड़ आएगा? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़िए कहानी का अगला अध्याय।

जारी रहेगा...