सन्नाटे की दरारें
मुंबई शहर की बारिश अपनी एक अलग ही फितरत रखती है। जब यह बरसती है, तो ऐसा लगता है जैसे आसमान ने शहर की तमाम चीखों और भागदौड़ को अपने भीतर समेट लिया हो। रात के ठीक ढाई बज रहे थे। आउटर एरिया के इस शांत और सुनसान मोहल्ले में, जहां दूर-दूर तक गाड़ियों के हॉर्न की आवाज या इंसानी हलचल सुनाई नहीं देती थी, सिर्फ बारिश की बूंदों के टिप-टिप करने की एक एकरस और सुस्त आवाज गूंज रही थी।
नयना अपनी स्टडी टेबल के सामने लाचारी से बैठी थी। उसकी आँखें लाल थीं, जिन पर पिछले कई दिनों की अनसुनी थकावट और नींद की कमी साफ तैर रही थी। टेबल पर जलती हुई एक अकेली छोटी सी स्टडी लैंप की पीली और मद्धम रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जबकि कमरे के बाकी कोने गहरे और काले सायों के आगोश में डूबे हुए थे।
कमरे की दीवार पर टंगी पुरानी एंटीक घड़ी की सुई जैसे ही आगे बढ़ती, उसकी टिक-टिक की आवाज इस सन्नाटे में किसी हथौड़े की तरह नयना के कानों के परदों पर चोट करती।
उसके सामने लकड़ी की उस भारी टेबल पर कई सारी फाइलें, किताबें और पुराने नक्शे बेतरतीब फैले हुए थे। लेकिन उन सबके बीच उसका ध्यान सिर्फ एक ही चीज पर अटका हुआ था—एक पीला पड़ चुका पुराना लिफाफा, जो उसने आज शाम घर के स्टोर रूम में रखे उस लोहे के जंग लगे संदूक के सबसे निचले हिस्से से निकाला था।
लिफाफे पर कोई डाक टिकट नहीं था, कोई भेजने वाले का नाम नहीं था। उस पर सिर्फ एक अजीब सी लाल स्याही से उसका नाम लिखा था—नयना।
और सबसे ज्यादा डरावनी, रूह को कंपा देने वाली बात यह थी कि वह लिखावट हूबहू उसकी अपनी थी। उसके अपने हाथ के अक्षर, उसका वही घुमावदार स्टाइल, वही पेन का दबाव! लेकिन नयना के दिमाग पर जोर डालने पर भी उसे ऐसा एक भी पल याद नहीं आता था कि उसने कभी ऐसा कोई खत लिखा हो, या कभी किसी को भेजा हो। यह लिखावट ऐसी थी जैसे किसी ने उसकी नकल की हो—या फिर खुद उसके भीतर छुपे किसी अजनबी हिस्से ने उसे यह खत लिखा हो।
नयना की उंगलियां कांप रही थीं। उसने एक गहरी सांस ली, अपने दिल की बेहिसाब धड़कनों को काबू करने की कोशिश की, और धीरे से उस लिफाफे के मुंह को खुला।
उसके अंदर से एक मुड़ा हुआ पुराना कागज बाहर आया। जैसे ही उसने उसे खोलकर अपनी आँखों के सामने फैलाया, उसकी सांसें बीच में ही अटक गईं। कागज पर वही लाल स्याही से लिखे शब्द किसी जहरीले सांप की तरह उसे घूर रहे थे—
"तुम्हें क्या लगता है, नयना? कि तुम जो जी रही हो, वह तुम्हारी अपनी जिंदगी है? इस घर की इन दीवारों से लेकर तुम्हारे बगल में सो रहे उस इंसान तक... सब कुछ एक फरेब है, एक बहुत बड़ा झूठ! तुम जिस परछाई को अपनी परछाई समझती हो, वह तुम्हारा पीछा तब तक नहीं छोड़ेगी जब तक वह तुम्हें पूरी तरह से निगल न ले। होश में आओ... कल रात बारह बजे के बाद आईने के सामने खड़े होकर खुद से कोई सवाल मत करना, वरना जो चेहरा तुम्हें दिखाई देगा, वह तुम्हारा अपना नहीं होगा।"
कागज नयना के हाथ से छूटकर टेबल पर गिर गया।
उसका पूरा शरीर ठंडे पसीने से भीग चुका था। कमरे का तापमान अचानक कई डिग्री नीचे गिर गया था, या शायद यह उसके भीतर दौड़ते खौफ की ठंडक थी। उसके दिमाग में एक साथ कई सवाल चीखने लगे—यह खत किसने लिखा? क्या यह कोई घटिया मज़ाक है? या फिर... या फिर सचमुच इस घर में कुछ ऐसा है, जिससे वह पिछले कई सालों से अनजान बनी हुई है?
उसने अपनी नजरें उठाईं और कमरे के ठीक सामने दीवार पर लगे उस बड़े, चौड़े वॉल-मिरर की तरफ देखा।
कमरे की डिम पीली रोशनी में वह आईना बिल्कुल शांत, बिल्कुल सपाट नजर आ रहा था। उसमें सिर्फ स्टडी टेबल, लैंप और खुद नयना का सहमा हुआ चेहरा दिखाई दे रहा था। सब कुछ सामान्य था। उसने खुद को दिलासा देने की कोशिश की—"यह सिर्फ मेरा वहम है... मैं बहुत थक गई हूँ, इसलिए दिमाग अजीब चीजें दिखा रहा है।"
उसने उठकर सोने की कोशिश करने का फैसला किया। जैसे ही वह अपनी कुर्सी से उठी और मुड़ी, तभी... कमरे के उस बड़े आईने के भीतर, जहां उसकी परछाई दिखाई दे रही थी, नयना ने अपनी पलकें झपकाईं—लेकिन आईने के अंदर वाली परछाई की आँखें खुली की खुली रह गईं, और उसने अपनी पलकें एक बार भी नहीं झपकाईं! बल्कि इसके उलट, आईने के अंदर की परछाई ने धीरे से अपने होंठों पर एक भयानक और व्यंग्य भरी मुस्कान सजा ली।
नयना के गले से एक चीख निकलना चाहती थी, लेकिन उसके फेफड़ों में हवा जैसे जम चुकी थी। वह पागलों की तरह पीछे हटी और उसके पैर फर्श पर रखे कागजों पर फिसल गए।
तभी, घर के मुख्य हॉल में रखे उस पुराने ग्रैंडफादर क्लॉक ने रात के ठीक तीन बजने का ऐलान कर दिया—
डोंग... डोंग... डोंग...
हर एक भारी और गूंजती हुई आवाज के साथ, घर के लकड़ी के फर्श पर किसी के पैरों के भारी और सधे हुए कदम पड़ने की आवाज आने लगी—टैप... टैप... टैप...
वे कदम सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रहे थे, और सीधे उसी कमरे की तरफ आ रहे थे, जहाँ नयना अपनी सांसे रोके फर्श पर बैठी हुई थी।
वे कदम अब और पास आ चुके थे। टैप... टैप... टैप...
लकड़ी के फर्श पर पड़ रही हर एक ठोकर नयना के दिल की धड़कनों को चीरती हुई सीधे उसके दिमाग में गूंज रही थी। वे कदम किसी साधारण इंसान की तरह तेज और बेपरवाह नहीं थे, बल्कि उनमें एक ठहराव था—एक ऐसा खौफनाक सुकून, जैसे कोई शिकारी अपने जाल में फंसे शिकार के पास पूरी तसल्ली से चल कर आ रहा हो।
नयना फर्श पर बैठी हुई थी, उसकी उंगलियां ठंड से सुन्न पड़ चुकी थीं और आंखें फटी की फटी उस बंद दरवाजे पर टिकी थीं।
कदम रुक गए।
ठीक उसके बेडरूम के दरवाजे के बाहर।
कमरे के भीतर पसरा सन्नाटा इतना गहरा था कि बारिश की बूंदों की आवाज भी अब कोसों दूर सुनाई दे रही थी। नयना ने अपनी सांसों को रोक लिया, मानो अगर उसने एक लंबी सांस भी ली, तो बाहर खड़े उस साए को उसकी मौजूदगी का अहसास हो जाएगा।
तभी, दरवाजे के उस पार से किसी के नाखूनों के खुरचने की बहुत हल्की सी आवाज आई—ख्रर... ख्रर...—जैसे कोई बाहर से धीरे-धीरे यह जांच रहा हो कि दरवाजा अंदर से बंद है या नहीं।
और फिर, उस सन्नाटे को चीरती हुई एक बहुत ही शांत, जानी-पहचानी और ठंडी आवाज गूंजी:
"नयना... दरवाज़ा खोलो न, अंदर बहुत घुटन लग रही है।"
वह आवाज... वह हूबहू राहुल की आवाज थी! वही धीमी लेहज, वही शब्दों का उच्चारण, और वही अपनापन जो पिछले कई सालों से नयना की जिंदगी का हिस्सा रहा था। लेकिन उस आवाज में जीवन की गर्माहट नहीं थी; उसमें किसी मरे हुए इंसान के गले से आती हुई सूखी और बर्फ जैसी ठंडक थी।
नयना का दिमाग सुन्न हो गया। उसके होंठ कांपने लगे। वह अपनी जगह से हिला तक नहीं पा रही थी।
"राहुल...?" नयना के गले से एक बेहद बारीक और कांपती हुई फुसफुसाहट निकली। "तुम... तुम तो शहर से बाहर गए थे ना? तुम इतनी जल्दी... इतनी रात को कैसे लौट आए?"
दरवाजे के बाहर कुछ सेकंड के लिए खामोशी छा गई। फिर अचानक, एक विकृत और अजीब सी हंसी उस दरवाजे के नीचे से अंदर की तरफ आने लगी—हिहिहि... वह हंसी धीरे-धीरे एक दहाड़ में बदलने लगी।
"शहर से बाहर? कौन सा शहर, नयना? और कौन सा राहुल?" बाहर से आवाज अब और ज्यादा कठोर हो चुकी थी, जिसमें गुस्से और धोखे की एक खौफनाक आग सुलग रही थी। "तुझे क्या लगता है, तू उस रात उस अंधेरी खाई में जिसे छोड़कर आई थी, वह सिर्फ एक इंसान था? वह मेरी जिंदगी थी, मेरा वजूद था! और तू... तू अपनी जान बचाने के लिए उस चलती गाड़ी से कूद गई थी, मुझे मौत के मुंह में धकेल कर!"
हर एक शब्द नयना के सीने पर किसी खंजर की तरह वार कर रहा था। उसके माथे पर ठंडे पसीने की बूंदें चमक उठीं। उसने अपने दोनों हाथों से अपने कानों को भींच लिया और चीख पड़ी—"नहीं! झूठ है यह सब! मैंने ऐसा कुछ नहीं किया था! वह... वह एक हादसा था, सिर्फ एक हादसा!"
"हादसा?" बाहर से आवाज दहाड़ी, और साथ ही दरवाजे की लकड़ी पर किसी भारी चीज के जोरदार प्रहार की आवाज गूंजी—धड़ाक!
दरवाजे का पल्ला अंदर की तरफ कांप उठा।
"तूने अपनी डायरी में खुद लिखा था, नयना... झूठ चाहे जितने भी परतों के पीछे छुपा लिया जाए, एक दिन उसे बाहर आना ही पड़ता है। आज पांच साल पूरे हो गए हैं, और हिसाब चुकाने का वक्त आ चुका है!"
धड़ाक!—एक और जोरदार धक्का दरवाजे पर लगा। इस बार दरवाजे के बीचों-बीच लगी लकड़ी चटक गई और एक दरार के जरिए बाहर का अंधेरा अंदर झांकने लगा।
नयना ने देखा कि उस दरार से बाहर कोई चेहरा नहीं, बल्कि सिर्फ एक घना, काला साया था, जिसके भीतर से दो जलती हुई लाल आँखें सीधे उसे घूर रही थीं!
धड़ाक!
एक और आखिरी जोरदार प्रहार, और बेडरूम के उस पुराने लकड़ी के दरवाजे की कुंडी अपनी जगह से उखड़कर दूर जा गिरी। दरवाजा अंदर की तरफ झटके से खुल गया।
बाहर कोई इंसान नहीं खड़ा था—वहाँ सिर्फ एक घना, बहुरूपिया अंधकार था, जिसका आकार धीरे-धीरे किसी लंबे, दुबले-पतले इंसान की शक्ल ले रहा था। उस साए के चेहरे पर आँखों की जगह केवल दो सुलगते हुए लाल अंगारे जल रहे थे, जो सीधे नयना की रूह को चीर रहे थे।
नयना भय से अवाक थी। उसके गले में आवाज अटक चुकी थी। वह उल्टे कदम पीछे हटती गई, जब तक उसकी पीठ सीधे उस बड़े वॉल-मिरर से नहीं जा टकराई। आईने का ठंडा कांच उसकी रीढ़ में सिहरन पैदा कर रहा था।
साया धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसके चलने पर फर्श से कोई आवाज नहीं आ रही थी, मानो वह हवा में तैर रहा हो। वह बिल्कुल नयना के सामने आकर रुक गया। उसकी ठंडी, बर्फीली सांसें नयना के माथे को छू रही थीं।
"क्या हुआ, नयना? डर गई?" वह साया अब राहुल की आवाज में नहीं, बल्कि कई सारी मिली-जुली आवाजों में एक साथ बोल रहा था—ऐसी आवाजें जिन्हें नयना ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी सुना था, या शायद जिन्हें उसने खुद अपने भीतर दबा कर रखा था। "तुझे लगा था कि समय बीतने के साथ सब कुछ दफन हो जाएगा? खून के धब्बे और गुनाह के साए कभी समय के साथ नहीं मिटते... वे सिर्फ इंतजार करते हैं कि तू खुद उन्हें याद करे।"
नयना ने अपनी आँखें भींच लीं और पागलों की तरह सिर हिलाने लगी—"नहीं... मैं कुछ नहीं सुनना चाहती! चली जाओ यहाँ से! तुम मेरा भ्रम हो... सिर्फ मेरा एक बुरा सपना!"
"सपना?" साए ने एक भयानक, गूंजती हुई हंसी हंसी। उसने अपना लंबा, काला और धूएँ जैसा हाथ आगे बढ़ाया और अपनी उंगलियों से नयना की कलाई को कसकर पकड़ लिया।
वह पकड़ इतनी मजबूत और लोहे जैसी ठंडी थी कि नयना की कलाई की हड्डियां चटकती हुई महसूस हुईं।
"अगर यह सपना है, तो अपनी कलाई पर इस दर्द को महसूस कर, नयना!" साए ने उसे अपनी तरफ खींचा। "चल... आज तुझे उस जगह ले चलता हूँ, जहाँ तूने मुझे छोड़ा था। उस अंधेरी खाई के किनारे... जहाँ से कोई वापस नहीं लौटता।"
जैसे ही उस साए ने नयना को आईने की तरफ खींचा, कमरे का वॉल-मिरर अचानक एक तरल पानी की तरह हिलने लगा। आईने का कांच गायब हो चुका था, और उसकी जगह एक गहरा, कोहरे से भरा हुआ पहाड़ी रास्ता दिखाई दे रहा था—वही पांच साल पुराना रास्ता, जहाँ बारिश हो रही थी, गाड़ियाँ फिसल रही थीं, और मौत की चीखें गूंज रही थीं।
नयना की चीख पूरे कमरे में गूंज उठी। उसने अपनी पूरी ताकत से उस साए के चंगुल से छूटने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जमीन पर ऐसे जम चुके थे जैसे सीमेंट सूख गया हो।
"नहीं! मुझे नहीं जाना... छोड़ दो मुझे!" उसने रोते हुए गिड़गिड़ाना शुरू किया।
लेकिन वह साया बिना किसी दया के उसे उस आईने के अंदर खींचता जा रहा था। उसका आधा शरीर उस तरल आईने के पार जा चुका था, और ठंडी हवा के झोंके उसके चेहरे को चीर रहे थे।
तभी, कमरे की स्टडी टेबल पर पड़ी वह लाल डायरी अचानक हवा में अपने आप खुली और उसका आखिरी पन्ना पलट गया। उस पन्ने पर हाथ से लिखी आखिरी लाइन चमक उठी—
“जो दूसरों को खाई में धकेलता है, रास्ता अंत में उसी की तरफ मुड़ता है।”
आईने का ठंडा और चिपचिपा तल जैसे ही नयना के सीने से लगा, उसकी सांसें हवा में ही जम गईं। वह कोई साधारण शीशा नहीं था, बल्कि किसी ठंडे, जमे हुए दलदल की तरह था जो धीरे-धीरे उसे अपने भीतर खींच रहा था।
चारों तरफ घना, सलेटी कोहरा छाया हुआ था। दूर-दूर तक कोई रोशनी नहीं थी, बस कानों को बहरा कर देने वाली हवा की सनसनाहट और एक ऐसी सूंघने योग्य महक थी—मिट्टी, सड़े हुए पत्तों और जंग लगी हुई लोहे की महक। वही महक, जो ठीक पांच साल पहले उस बारिश की रात उस पहाड़ी रास्ते पर थी।
नयना का आधा शरीर उस आईने के अंदर जा चुका था। उसने अपने दोनों हाथों से कमरे की लकड़ी के फर्श के किनारों को ऐसे जकड़ रखा था, जैसे उसकी उंगलियों के नाखून जमीन में गड़ गए हों।
"छोड़ दो मुझे... प्लीज, मुझे छोड़ दो!" उसकी आवाज़ उस कोहरे में कहीं खो कर रह गई।
वह काला साया, जिसने उसका हाथ पकड़ रखा था, अब पूरी तरह से एक आकार ले चुका था। वह राहुल का ही चेहरा था—वही बाल, वही आँखें, लेकिन उसके पूरे शरीर पर कांच के अनगिनत टुकड़े धंसे हुए थे और उन टुकड़ों से खून की जगह काली, चिपचिपी स्याही टपक रही थी।
"छोड़ दूं?" राहुल की वह सूखी और डरावनी आवाज़ गूंजी। उसने अपना दूसरा हाथ उठाया और नयना की उंगलियों पर रख दिया, जो फर्श के किनारों को पकड़े हुए थीं। "तूने मुझे जिस वक्त उस खाई में फेंका था, नयना... तब क्या तूने एक बार भी मुझसे पूछा था कि मुझे कितनी ठंड लग रही थी? क्या तुझे मेरी चीखें सुनाई नहीं दी थीं?"
राहुल के उन ठंडे हाथों के दबाव से नयना की उंगलियों की पकड़ कमजोर होने लगी।
"मैंने जानबूझकर... जानबूझकर नहीं किया था... गाड़ी का ब्रेक फेल हो गया था... सच कह रही हूँ!" नयना फूट-फूटकर रो रही थी, उसके आंसुओं से उसका चेहरा भीग चुका था।
"झूठ!" राहुल की दहाड़ से आईने के आसपास की हवा में कंपन पैदा हो गई। "ब्रेक फेल नहीं हुए थे, नयना! तेरी खुद की जिल्लत, तेरा डर और तेरा स्वार्थ उस स्टीयरिंग पर भारी पड़ा था। तूने मुझे इसलिए धक्का दिया ताकि तू खुद बच सके। और आज... आज वही सच तुझे खुद इस आईने के पार खींच रहा है।"
एक झटके के साथ, राहुल ने नयना की उंगलियों को फर्श से छुड़ा दिया।
छपाक!
नयना का पूरा शरीर उस तरल आईने के अंदर समा गया। कमरा अचानक शांत हो गया। स्टडी टेबल पर जल रही वह छोटी सी लैंप बुझ गई, और बेडरूम का वह वॉल-मिरर फिर से एक साधारण, बेजान कांच में बदल गया—लेकिन इस बार उस पर नयना की कोई परछाई नहीं दिखाई दे रही थी।
आईने के उस पार गिरते ही नयना का सिर किसी सख्त चट्टान से टकराया। उसके मुंह से एक हल्की सी चीख निकली, लेकिन वह आवाज उस अंतहीन सन्नाटे में कहीं गुम हो गई।
जब उसने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने खुद को एक बेहद डरावनी और परिचित जगह पर पाया। यह वही पहाड़ी रास्ता था—वही घुमावदार सड़क जिसके दोनों तरफ हजारों फीट गहरी काली खाई थी, और आसमान से मूसलाधार बारिश बरस रही थी। लेकिन अजीब बात यह थी कि बारिश की बूंदें पानी की नहीं, बल्कि ठंडे पसीने और खून की मानिंद उसके जिस्म को चीर रही थीं।
उसके ठीक सामने, उस बारिश और कोहरे के बीच, वही पुरानी लाल रंग की कार रुकी हुई थी। उसके दोनों दरवाजे खुले हुए थे, और आगे का हिस्सा पूरी तरह से चकनाचूर था।
नयना ने घबराकर पीछे हटना चाहा, लेकिन उसके पैर उस कीचड़ में धंसे जा रहे थे। तभी, उस टूटी हुई कार के अंदर से एक साया बाहर निकला। वह राहुल था—वही राहुल, जिसकी आँखें शून्य में देख रही थीं और जिसके कपड़ों से लगातार पानी और खून टपक रहा था।
वह धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए नयना की तरफ बढ़ने लगा।
"कहाँ भागेगी, नयना?" राहुल की आवाज इस बार किसी गूंजती हुई गुफा की तरह चारों तरफ से आ रही थी। "यही वह जगह है जहाँ तूने मुझे छोड़ा था। आज हिसाब पूरा करने का वक्त आ गया है।"
नयना कांपते हुए पीछे हटती गई, जब तक उसकी एड़ी उस खाई के बिल्कुल आखिरी कगार पर नहीं आ टिकई। उसके पीछे मीलों गहरा काला अंधकार था, जहाँ से ठंडी और डरावनी हवाओं के थप्पड़ उसे अपनी तरफ खींच रहे थे। उसने मुड़कर नीचे देखा—वहाँ सिर्फ अनंत शून्य था।
राहुल उसके बिल्कुल करीब आ चुका था। उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए, ठीक वैसे ही जैसे पांच साल पहले उस रात नयना ने उसे धक्का देने के लिए उठाए थे।
"नहीं... राहुल, मुझे मत फेंको! मुझे माफ कर दो!" नयना खाई के कगार पर घुटनों के बल बैठ गई और उसके पैरों से लिपटकर रोने लगी।
राहुल रुका। उसने नीचे झुककर नयना का चेहरा अपनी ठंडी उंगलियों से ऊपर उठाया। उसकी सूनी और डरावनी आँखों में अब एक अजीब सी शांति थी।
"माफी? माफी का हक उसे मिलता है, नयना, जो अपने गुनाह को मान ले और सच के साथ जीना सीखे। लेकिन तू तो अपनी ही बनाई हुई झूठी दुनिया में कैदी बनकर जी रही थी।" राहुल ने धीरे से अपना हाथ पीछे खींचा और मुस्कुराया—एक ऐसी मुस्कान, जिसने उस डरावने माहौल में भी एक अजीब सा ठहराव ला दिया। "अब तुझे इसी खाई में अपनी परछाई के साथ रहना होगा... जब तक कि कोई दूसरा शख्स इस सच को ढूंढता हुआ यहाँ तक न आ जाए।"
इससे पहले कि नयना कुछ समझ पाती, राहुल का एक हल्का सा धक्का उसके सीने पर पड़ा।
नयना का संतुलन बिगड़ गया और वह उस हजारों फीट गहरी खाई में हवा में तैरती हुई नीचे की तरफ गिरने लगी। उसके कान में हवा की सनसनाहट और उसकी अपनी ही चीख गूंज रही थी, जो धीरे-धीरे उस अनंत अंधेरे में विलीन हो गई।
मुंबई के बाहरी इलाके के उस सुनसान मोहल्ले में बारिश अभी भी थमी नहीं थी। सुबह की पहली सुस्त किरणें जब बादलों को चीरकर जमीन पर उतरीं, तो उस दो मंजिला पुराने बंगले पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। घर के बाहर मुख्य गेट पर ताला लटका था, और अंदर के कमरों में केवल ठंडी हवा की सरसराहट गूंज रही थी।
नयना के कमरे में सब कुछ वैसा ही था—स्टडी टेबल पर बिखरे कागज, टूटी हुई लैंप, और दीवार पर टंगा वह बड़ा सा वॉल-मिरर, जिस पर अब नयना की कोई परछाई नहीं दिखती थी। वह कमरा अब पूरी तरह से खाली और बेजान लग चुका था, मानो वहाँ कभी कोई रहता ही न हो।
लेकिन शहर के दूसरे छोर पर, रेलवे स्टेशन के पास बने एक छोटे से कमरे में एक अलग ही हलचल चल रही थी।
कबीर अपनी लकड़ी की पुरानी डेस्क पर झुका हुआ था। उसके सामने कई सारी पुरानी फाइलें, अखबारों की कटिंग्स और पुलिस रिकॉर्ड्स फैले हुए थे। कबीर एक स्वतंत्र खोजी पत्रकार (इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट) था, जो पिछले कई महीनों से उन गुमशुदा मामलों की तह तक जाने की कोशिश कर रहा था, जिन्हें पुलिस ने या तो 'हादसा' या 'आत्महत्या' कहकर फाइल बंद कर दी थी।
उसके हाथ में एक अखबार की कटिंग थी, जिसकी हैडलाइन थी—
“पाँच साल पहले खोया हुआ इंजीनियर राहुल और अब रहस्यमय तरीके से गायब हुई उसकी पत्नी नयना—क्या यह महज इत्तेफाक है?”
कबीर की उंगलियों ने उस कटिंग पर थपथपाया। उसकी तेज और विश्लेषणात्मक आँखें उस केस की हर एक छोटी से छोटी डिटेल को खंगाल रही थीं। उसे यह बात शुरू से ही कचोट रही थी कि कैसे पाँच साल पहले एक साधारण कार दुर्घटना में गायब हुए राहुल का शरीर आज तक नहीं मिला था, और अचानक कल रात से नयना का फोन भी पूरी तरह से स्विच ऑफ हो चुका है।
उसने अपनी कुर्सी पीछे धकेली, अपनी लेदर जैकेट उठाई और मन में ठान लिया कि उसे आज ही उस सुनसान बंगले पर जाकर खुद छानबीन करनी होगी। उसे यह अच्छी तरह महसूस हो रहा था कि इस घर की दीवारों के पीछे कोई बहुत बड़ा राज दफन है, जिसे ये शहर हमेशा के लिए छुपाना चाहता है।
दोपहर ढलते-ढलते आसमान पर काले बादलों की परतें और गहरी हो गईं। हल्की, सुस्त बूंदाबांदी के बीच कबीर की बाइक उस सुनसान मोहल्ले की तंग सड़क पर आकर रुकी। उसके सामने वही पुराना, खामोश और वीरान दो मंजिला बंगला खड़ा था, जिसके बारे में अखबारों और स्थानीय लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं थीं।
कबीर ने अपनी जैकेट की कॉलर ऊपर की और बाइक को साइड स्टैंड पर लगाकर मेन गेट की तरफ बढ़ा। लोहे के जंग लगे गेट पर एक भारी ताला लटका हुआ था, जिस पर बारिश के पानी की वजह से लाल-लाल जंग की परत जम चुकी थी।
उसने आसपास नजर दौड़ाई। आसपास के मकानों के दरवाजे और खिड़कियां बंद थीं, मानो इस घर के पास आने से हर कोई कतराता हो।
कबीर ने दीवार पर हाथ रखा और थोड़ी सी मशक्कत के बाद आसानी से उस कम ऊंचाई वाली दीवार को फांदकर अंदर कंपाउंड में उतर गया। नीचे का आंगन पूरी तरह से सूखे पत्तों और कीचड़ से भरा हुआ था। बरामदे में रखी एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर धूल की मोटी परत जमी थी, जिससे साफ पता चलता था कि पिछले कई दिनों से यहाँ कोई इंसानी कदम नहीं पड़ा था।
वह मुख्य दरवाजे के सामने आकर रुका। दरवाजे की कुंडी पर उसने हाथ लगाया—हैरानी की बात यह थी कि दरवाजा अंदर से बंद नहीं था, बल्कि हल्का सा धक्का देते ही वह क्रीक... की एक लंबी आवाज के साथ थोड़ा सा खुल गया।
कबीर अंदर दाखिल हुआ।
घर के अंदर दाखिल होते ही हवा में एक अजीब सी घुटन और पुरानी नमी की महक उसके नथुनों से टकराई। चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था, सिवाय इसके कि हॉल में रखे एक पुराने ग्रैंडफादर क्लॉक की सुइयों के रुक जाने की टिक-टिक जैसी आवाज उसके दिमाग में गूंज रही थी।
उसने अपनी पॉकेट टॉर्च निकाली और उसकी रोशनी दीवारों और फर्नीचर पर डाली। सोफे पर धूल जमी थी, और सेंटर टेबल पर पानी के कुछ पुराने सूखे हुए धब्बे थे।
"कोई है?" कबीर ने अपनी भारी आवाज में पूछा। उसकी आवाज उस खाली घर में गूंजकर वापस लौट आई, लेकिन जवाब में सिर्फ उसकी अपनी ही सांसों की आवाज सुनाई दी।
वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। लकड़ी के हर एक स्टेप पर उसके जूतों की आवाज गूंज रही थी। ऊपर पहुँचकर उसने कॉरिडोर के आखिरी कोने वाले कमरे की तरफ देखा—वही कमरा, जो नयना का बेडरूम था।
कमरे का दरवाजा आधा खुला हुआ था। अंदर से कोई रोशनी नहीं आ रही थी, बस खिड़की के शीशों से छनकर आती बाहर की मद्धम सी रोशनी फर्श पर फैल रही थी।
कबीर ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और दरवाजे को पूरा धकेल दिया।
कमरे के अंदर का नजारा देखकर कबीर के कदम वहीं ठहर गए। फर्श पर कागजात बिखरे हुए थे, एक टूटी हुई स्टडी लैंप कोने में पड़ी थी, और सामने दीवार पर एक बड़ा सा वॉल-मिरर टंगा था।
कबीर आगे बढ़कर उस आईने के सामने गया। उसने टॉर्च की रोशनी उस आईने पर डाली। कांच पर धूल की एक परत थी, लेकिन बीच में एक अजीब सी खरोंच का निशान था, मानो किसी ने बहुत गुस्से में उसे नोचा हो। और सबसे अजीब बात यह थी कि उस आईने के सामने खड़े होने पर कबीर को ऐसा महसूस हुआ जैसे कांच के अंदर से कोई बेहद ठंडी हवा का झोंका सीधे उसके चेहरे से टकरा रहा हो—जबकि खिड़कियां पूरी तरह बंद थीं।
तभी, उसकी नजर स्टडी टेबल पर पड़ी एक खुली हुई लाल डायरी पर गई, जिसका आखिरी पन्ना हवा के एक हल्के झोंके से खुद-ब-खुद पलट गया।
कबीर ने आगे बढ़कर उस स्टडी टेबल पर रखी लाल डायरी को उठाया। पन्ने पलटते ही उसकी नजर उन हाथों से लिखे अक्षरों पर पड़ी। लिखावट बहुत तेजी से और घबराहट में लिखी गई थी—
"वह आ गया है। परछाई अब सिर्फ आईने में नहीं, मेरे कमरे में टहल रही है। राहुल कह रहा है कि हिसाब चुकाने का वक्त आ गया है। अगर कोई यह डायरी पढ़ रहा है, तो समझ लो कि मैं अब इस दुनिया में नहीं हूँ... और वह साया अब अगला शिकार ढूंढेगा।"
कबीर की भौंहें सिकुड़ गईं। उसने डायरी को बंद किया और अपनी पॉकेट से फोन निकालकर उस तारीख और समय को नोट करने लगा। तभी, कमरे के उस बड़े वॉल-मिरर में कुछ ऐसा हुआ जिसने कबीर के रोंगटे खड़े कर दिए।
आईने में अब सिर्फ कबीर की परछाई नहीं दिख रही थी—उसके ठीक पीछे एक लंबा, धुंधला और काला साया खड़ा था, जिसकी लाल आँखें सीधे कबीर की पीठ को घूर रही थीं!
कबीर ने चौंककर पलक झपकते ही पीछे मुड़कर देखा।
कमरे में उसके अलावा कोई नहीं था। हवा का एक हल्का सा झोंका खिड़की से आया और बुझी हुई लैंप का तार हल्का सा हिल गया। कबीर का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने महसूस किया कि इस घर में कुछ तो ऐसा है, जो इंसानी समझ से परे है। वह उस डायरी को अपनी जैकेट की जेब में रखता है और तभी कमरे के बाहर कॉरिडोर में किसी के हंसने की एक धीमी सी आवाज गूंजती है—हिहिहि...
कबीर ने बिना एक पल गंवाए अपनी टॉर्च ऑन की और कमरे से बाहर निकल आया। वह आवाज सीढ़ियों की तरफ जा रही थी।
"कौन है वहाँ? सामने आओ!" कबीर ने अपनी आवाज में दृढ़ता लाते हुए कहा।
लेकिन जवाब में कोई इंसानी आवाज नहीं आई, बस सीढ़ियों से नीचे उतरने के भारी कदमों की गूंज सुनाई दी। कबीर तेजी से नीचे उतरा। लिविंग रूम पूरी तरह शांत था, लेकिन हॉल के एक कोने में, जहां एक पुराना भारी लकड़ी का शोकेस रखा था, फर्श पर बिछा हुआ कालीन थोड़ा सा हटा हुआ था।
कबीर ने आगे बढ़कर उस भारी शोकेस को थोड़ा सा सरकाया। उसके पीछे फर्श पर लकड़ी का एक गुप्त दरवाजा (Trapdoor) छुपा हुआ था, जिस पर एक बड़ा सा लोहे का कुंडा लगा था और उस पर धूल की मोटी परत थी।
उसके भीतर से एक अजीब सी घुटन भरी और पुरानी सड़े हुए पत्तों की महक आ रही थी—वही महक, जो उसने नयना के कमरे में महसूस की थी।
कबीर ने अपनी जेब से एक रुमाल निकाला, हाथ से धूल साफ की और उस लोहे के कुंडे को पकड़कर अपनी पूरी ताकत से खींच दिया।
क्रीक... की एक दर्दनाक आवाज के साथ वह गुप्त दरवाजा खुल गया। अंदर से सिर्फ घना, स्याह अंधकार और ठंडी हवा का एक झोंका बाहर आया, मानो जमीन के नीचे कोई और ही दुनिया आबाद हो।
कबीर ने टॉर्च की रोशनी उस अंधेरे में नीचे की तरफ डाली। नीचे ईंटों की बनी हुई सीढ़ियां एक गुप्त तहखाने की तरफ जा रही थीं, और उन सीढ़ियों पर खून के सूखे हुए कुछ पुराने धब्बे साफ दिखाई दे रहे थे!
कबीर ने अपनी टॉर्च की बीम को मजबूत किया, गहरी सांस ली और उन पुरानी, सीलन भरी ईंटों की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा। हर एक कदम के साथ हवा और ज्यादा ठंडी और भारी होती जा रही थी। सीढ़ियों के खत्म होते ही उसका जूता किसी नरम और अजीब चीज पर पड़ा। उसने टॉर्च नीचे की तरफ झुकाई—वहाँ जमीन पर कुछ पुरानी, फटी हुई किताबें और जंग लगे हुए टूटे हुए औजार बिखरे पड़े थे।
वह तहखाना आकार में काफी छोटा था, जिसकी दीवारें नमी के कारण काली पड़ चुकी थीं। कमरे के ठीक बीचों-बीच एक भारी-भरकम लोहे का संदूक रखा था, जिस पर एक बड़ा सा पासवर्ड वाला ताला लटका हुआ था।
कबीर उस संदूक के पास गया और उसने उसे हिलाकर देखा—वह अंदर से पूरी तरह भरा हुआ था। तभी उसकी नजर संदूक के ढक्कन पर चिपके हुए एक छोटे से कागज के टुकड़े पर पड़ी, जिस पर पेंसिल से कुछ नंबर लिखे थे—‘24-05-01’।
कबीर का दिमाग तेजी से दौड़ा। उसने उन नंबरों को उस रोटेटिंग लॉक में सेट किया—क्लिक की एक आवाज हुई और भारी ताला अपने आप खुलकर अलग गिर गया।
उसने कांपते हाथों से संदूक का ढक्कन उठाया। अंदर का नजारा देखकर उसकी सांसें थम गईं।
उस लोहे के संदूक के अंदर कोई खजाना नहीं था, बल्कि वहाँ पांच साल पहले गायब हुए राहुल की लेदर की जैकेट, उसका टूटा हुआ कैमरा, और एक मोटी पर्सनल डायरी रखी थी।
कबीर ने बिना देर किए उस डायरी को उठाया और टॉर्च की रोशनी में उसके पन्ने पलटने लगा। जैसे ही उसने पहला पन्ना पढ़ा, उसके माथे पर पसीना आ गया। उस डायरी में राहुल ने अपनी और नयना की जिंदगी का वो काला सच लिखा था जिसे दुनिया से छुपाया गया था।
डायरी के पन्नों में लिखा था:
"नयना अब बदल चुकी है। वह उस एक्सीडेंट को सिर्फ एक हादसा नहीं मानती, बल्कि उसे लगता है कि मैं उसकी तरक्की के रास्ते का कांटा हूँ। आज हम पहाड़ी रास्ते पर हैं, और मुझे डर है कि वह कोई बहुत बड़ा कदम उठाने वाली है..."
और आखिरी पन्ने पर स्याही बहुत ज्यादा फैली हुई थी, मानो लिखते वक्त कुछ बहुत भयानक घटा हो:
"उसने मुझे धक्का दे दिया है... गाड़ी की लाइटें बुझ चुकी हैं, और मैं इस गहरी खाई में गिर रहा हूँ। अगर मैं जिंदा बचा, तो यह परछाई उसका पीछा कभी नहीं छोड़ेगी।"
कबीर की उंगलियां सुन्न पड़ गईं। उसने डायरी बंद की और तभी तहखाने के उस अंधेरे कोने से—जहाँ टॉर्च की रोशनी नहीं पहुंच रही थी—एक सिसकने की बहुत धीमी और दर्दनाक आवाज गूंजी—“बचाओ...”
कबीर ने तुरंत अपनी टॉर्च उस कोने की तरफ घुमाई। वहाँ कोई बैठा था, जिसके बाल बिखरे हुए थे और शरीर पर धूल और कीचड़ की परत जमी हुई थी। जैसे ही उस शख्स ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई—वह कोई और नहीं, खुद नयना थी! लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह खाली और डरावनी हो चुकी थीं, मानो उसके भीतर की जिंदगी पूरी तरह खत्म हो चुकी हो।
नयना फर्श पर बेसुध सी बैठी थी। उसकी आँखें लाल थीं और उनमें किसी तरह की कोई चमक या होश नहीं बचा था। उसके कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे और उन पर वही सूखी हुई मिट्टी और जंग लगी महक चिपकी थी, जो उस आईने के पार वाली दुनिया की पहचान थी।
कबीर ने तेजी से आगे बढ़कर अपने घुटनों के बल बैठकर उसे सहलाने की कोशिश की। "नयना! होश में आओ... मैं कबीर हूँ, एक पत्रकार। तुम यहाँ इस तहखाने में कैसे पहुँची? और पिछले दो दिनों से तुम्हारा फोन क्यों बंद था?"
नयना ने अपनी खाली और डरावनी आँखें ऊपर उठाईं। उसने कबीर की तरफ देखा, लेकिन उसकी नज़रों में पहचान का कोई भाव नहीं था। उसके होंठ कांपे और बहुत ही धीमी, सूखी आवाज़ में उसने फुसफुसाया—
"वह आ गया है... वह हमें कभी माफ नहीं करेगा। तुमने यहाँ आकर बहुत बड़ी गलती कर दी, कबीर... यह घर सिर्फ एक मकान नहीं, एक दलदल है।"
इससे पहले कि कबीर उससे कुछ और पूछता, तहखाने के उस छोटे से एकमात्र रोशनदान से बाहर की तरफ आसमान में एक अजीब घटना घटी। बाहर दोपहर का वक्त था, लेकिन अचानक आसमान में छाए काले बादल और ज्यादा घने हो गए, और एक तेज गड़गड़ाहट के साथ चारों तरफ अंधेरा छा गया।
तभी, तहखाने की दीवार पर टंगे एक पुराने लोहे के हैंगर पर लटकी राहुल की वह पुरानी जैकेट अपने आप हिलने लगी, मानो उसके अंदर कोई हवा का झोंका न हो, बल्कि कोई अदृश्य शरीर उसमें आकर समा रहा हो।
कबीर ने तुरंत अपनी पोजीशन संभाली। उसके अंदर का खोजी पत्रकार और उसका साहस उसे बता रहा था कि यहाँ कुछ तो ऐसा घट रहा है जो भौतिक विज्ञान के नियमों से परे है। उसने नयना को अपने कंधे का सहारा देकर खड़े करने की कोशिश की।
"नयना, उठो! हमें इस घर से तुरंत बाहर निकलना होगा। यहाँ कुछ ठीक नहीं है।"
लेकिन नयना अपनी जगह से हिली तक नहीं। उसने कबीर का हाथ जोर से पकड़ लिया। उसकी उंगलियों की पकड़ में किसी लोहे की जकड़ जैसी ताकत थी।
"देर हो चुकी है, कबीर... दरवाजा बंद हो चुका है," नयना ने एक विकृत मुस्कान के साथ कहा, और उसकी आवाज़ अचानक बदलते हुए किसी पुरुष की भारी और डरावनी आवाज़ में बदल गई—वही राहुल की आवाज़! "जो इस तहखाने में उतरता है, उसकी परछाई यहीं कैद हो जाती है।"
कबीर का दिल एक पल के लिए थम गया। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा। तहखाने की सीढ़ियों के ठीक ऊपर, जहाँ से वे नीचे उतरे थे, वह लकड़ी का गुप्त दरवाजा (Trapdoor) अपने आप तेजी से नीचे गिर गया और एक भारी ‘धड़ाम’ की आवाज के साथ बंद हो गया।
कबीर ने आगे बढ़कर उस दरवाजे को धक्का दिया और ऊपर से कुंडा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह किसी अदृश्य ताकत से ऐसा लॉक हो चुका था कि हजार कोशिशों के बाद भी अपनी जगह से एक इंच नहीं हिला।
तहखाने के कोने में जल रही टॉर्च की मद्धम पीली रोशनी अब टिमटिमाने लगी। उस रोशनी की परछाई में, दीवार पर राहुल और नयना की नहीं, बल्कि किसी एक ही संयुक्त, विकृत और बड़े आकार के साए की आकृति उभरने लगी, जो धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ रही थी।
तहखाने का तापमान तेजी से गिर रहा था। कबीर की सांसें अब हवा में सफेद धुएं की तरह जमने लगी थीं। उसने गुप्त दरवाजे को खोलने की अपनी सारी ताकत झोंक दी थी, लेकिन वह लकड़ी का पल्ला जैसे लोहे की चट्टान में बदल चुका था।
नीचे जमीन पर बैठी नयना अब अचानक उठी। उसकी चाल बदल चुकी थी—वह किसी कटी हुई कठपुतली की तरह झटके से खड़ी हुई, और उसकी गर्दन एक अजीब से एंगल पर मुड़ी हुई थी। उसके गले से हंसी और रोने की मिली-जुली एक भयानक आवाज निकल रही थी।
"कबीर... तुम यहाँ क्यों आए? तुम्हें किसने बुलाया था इस कैदखाने में?" नयना ने पूछा, लेकिन उसकी आवाज के साथ-साथ दीवार के उस पार से सैकड़ों लोगों की फुसफुसाहट गूंजने लगी—मानो इस मकान की ईंटों के भीतर कई और रूहें भी कैद हों।
कबीर ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और सिग्नल देखने की कोशिश की। स्क्रीन पूरी तरह खाली थी—‘No Service’, और बैटरी का आइकॉन अपने आप तेजी से कम होते-होते शून्य पर आ गया और फोन ब्लैक हो गया।
तभी, उस तहखाने की नम दीवारों से पानी की जगह गाढ़ा, लाल रंग का तरल पदार्थ रिसने लगा। वह खून जैसी चिपचिपी चीज धीरे-धीरे फर्श पर फैलने लगी।
कबीर पीछे हटा, उसकी पीठ ठंडी ईंटों से जा लगी। उसने अपनी टॉर्च को उस लाल फैलते हुए दायरे पर डाला। टॉर्च की आखिरी बची हुई रोशनी में उसने देखा कि फर्श पर फैले उस लाल पानी में कई सारे इंसानी चेहरे उभर रहे हैं, जो उसे घूर रहे हैं और अपने हाथ हवा में ऊपर की तरफ उठा रहे हैं—मानो वे उसे भी अपने साथ खींचना चाहते हों।
नहीं... यह सब सिर्फ मेरे दिमाग का भ्रम है। कोई भूत-प्रेत नहीं होता!" कबीर ने खुद को दिलासा देने के लिए जोर से चिल्लाकर कहा। उसने अपने पास रखा वह लोहे का भारी औजार उठाया और सीधे उस गुप्त दरवाजे के कोने पर पूरी ताकत से वार करना शुरू कर दिया।
धड़... धड़...
हर एक वार के साथ लकड़ी चटक रही थी, और उसके साथ ही तहखाने की छत से धूल और सीमेंट के टुकड़े कबीर के सिर पर गिर रहे थे।
नयना धीरे-धीरे उसके करीब आ रही थी। उसके चेहरे पर एक सूखी और डरावनी मुस्कान थी। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कबीर के कंधे पर रख दिया। उसका हाथ बर्फ की तरह ठंडा था, और उस स्पर्श से कबीर के पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया।
"तुम दरवाजे पर वार कर रहे हो, कबीर... लेकिन असल दरवाजा तो तुम्हारे अपने भीतर बंद है," नयना ने राहुल की आवाज में फुसफुसाया। "तुम सच की तलाश में आए थे ना? लो, अब पूरा सच तुम्हारे सामने है।"
तभी, कबीर के हाथ से वह लोहे का औजार छूटकर फर्श पर गिर गया। उसके दिमाग में अचानक पिछले पांच सालों की वह सारी फाइलें, वो अनसुझे केस, और उस आधी रात की बारिश की घटनाएं एक फिल्म की तरह तेजी से घूमने लगीं। उसे अहसास हुआ कि नयना और राहुल की यह कहानी सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक ऐसा शाप थी जो हर उस शख्स को अपनी चपेट में ले लेता है जो इस सच को उजागर करने की कोशिश करता है।
धड़ाक!
आखिरकार कबीर के एक जोरदार वार से गुप्त दरवाजे का कुंडा टूट गया और ऊपर का पल्ला खुल गया। ताजी हवा का एक झोंका और बाहर की मद्धम रोशनी अंदर आई।
कबीर ने बिना एक पल गंवाए, अपनी आखिरी ताकत बटोरी और उस खुले हुए रास्ते की तरफ छलांग लगा दी। वह सीधे लिविंग रूम के फर्श पर जा गिरा। हांफते हुए, उसने पीछे मुड़कर देखा।
तहखाने का वह गुप्त दरवाजा अपने आप धीरे-धीरे बंद हो चुका था, और उस पर अब कोई कुंडा या निशान नहीं था—वहाँ सिर्फ एक सादा, ठोस लकड़ी का फर्श था, मानो कभी वहाँ कोई दरवाजा था ही नहीं!
कबीर का दिल पागलों की तरह धड़क रहा था। उसने मुड़कर मुख्य दरवाजे की तरफ भागा और उसे खोलकर सीधे बाहर आंगन में आ गया। जब वह मेन गेट से बाहर सड़क पर पहुंचा और पीछे मुड़कर उस पुराने बंगले को देखा, तो उसकी रूह कांप उठी—उस पूरे मकान की खिड़कियों और दरवाजों पर अब लकड़ी के तख्ते जड़े हुए थे, और उस पर एक पुराना, जंग लगा हुआ ताला लटका था, जिस पर धूल की ऐसी परत थी मानो वह सालों से बंद पड़ा हो!
शहर के शोरगुल और मूसलाधार बारिश के बीच, कबीर अपने छोटे से किराए के कमरे में वापस लौट आया था। उसके हाथ अभी भी हल्के-हल्के कांप रहे थे। उसने अपनी लेदर जैकेट उतारी और सीधे अपनी स्टडी टेबल पर रखी उस लाल डायरी को सामने रख दिया, जिसे वह उस तहखाने से अपने साथ लेकर आया था।
बाहर बिजली कड़क रही थी, और कमरे में जलती हुई टेबल लैंप की पीली रोशनी उस पुरानी डायरी के पन्नों पर पड़ रही थी।
कबीर ने अपनी कुर्सी खींची और बैठ गया। उसने एक लंबी सांस ली और अपने पसीने से भीगे माथे को पोंछा। उसके दिमाग में अभी भी उस वीरान बंगले का सन्नाटा, तहखाने की दीवारों से रिसता हुआ लाल तरल और नयना की वो खाली, डरावनी आँखें घूम रही थीं।
"यह कोई वहम नहीं था..." कबीर ने खुद से फुसफुसाते हुए कहा। "तहखाने में राहुल की जैकेट और उसकी डायरी सचमुच वहीं रखी थी। इसका मतलब नयना झूठ नहीं बोल रही थी... या फिर... या फिर मैं भी उस परछाई के जाल में फंस चुका हूँ।"
उसने कांपते हाथों से उस लाल डायरी का पहला पन्ना पलटा। पन्नों के बीच राहुल की लिखी हुई वे बातें दर्ज थीं जो उसने हादसे से ठीक पहले दर्ज की थीं। लेकिन जैसे ही उसने पन्ने को और आगे पलटा, आखिरी पन्नों पर कुछ ऐसी तस्वीरें चिपकी हुई मिलीं जिन्हें देखकर कबीर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
वे तस्वीरें पांच साल पुरानी थीं। उन तस्वीरों में वही पहाड़ी रास्ता दिखाई दे रहा था, लेकिन फ्रेम के ठीक कोने में एक और शख्स खड़ा नजर आ रहा था—एक ऐसा इंसान जिसका चेहरा कोहरे और साये की वजह से पूरी तरह धुंधला था, लेकिन उसके हाथ में वही लाल डायरी थी जो आज कबीर के पास थी।
कबीर ने उन तस्वीरों को और करीब से देखने के लिए अपनी टेबल लैंप की रोशनी उनके ठीक ऊपर की।
"यह आदमी कौन है?" कबीर ने मन में सोचा। क्या राहुल के अलावा उस दुर्घटना के समय कोई और भी वहाँ मौजूद था? क्या वह कोई तीसरा शख्स था जिसने इस पूरी कहानी को एक साजिश का रूप दिया था?
तभी, कबीर के फोन की स्क्रीन अचानक अपने आप जगमगा उठी।
जबकि कुछ देर पहले उस वीरान बंगले में फोन की बैटरी पूरी तरह शून्य हो चुकी थी और डिवाइस डेड हो गया था, अब स्क्रीन पर एक इनकमिंग कॉल फ्लैश हो रही थी। कॉलर आईडी पर कोई नाम नहीं था—सिर्फ एक नंबर लिखा था, और वह नंबर वही था जो उस पांच साल पुराने पुलिस केस की रिपोर्ट में दर्ज था: राहुल का पर्सनल मोबाइल नंबर!
कबीर का दिल एक पल के लिए रुक गया। उसने मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा, जो अंधेरे कमरे में नीली रोशनी बिखेर रही थी। फोन लगातार बज रहा था—रिंग... रिंग...
उसने कांपते हुए हाथों से कॉल रिसीव करने के लिए अपनी उंगली स्क्रीन पर बढ़ाई।
फोन की स्क्रीन नीली रोशनी बिखेर रही थी। कबीर ने कुछ सेकंड के लिए सांस रोक ली। उसकी उंगली फोन के रिसीव बटन पर आकर ठिठक गई। कमरा पूरी तरह शांत था, सिवाय बाहर बरस रही तेज बारिश की टिक-टिक और उसके अपने दिल की धड़कनों के।
उसने बिना एक पल गंवाए कॉल रिसीव कर ली और फोन अपने कान के पास ले गया।
शुरुआत में कुछ सेकंड तक सिर्फ सन्नाटा छाया रहा—एक ऐसा गहरा और भारी सन्नाटा, जिसमें सांस लेने की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी। और फिर, फोन के उस पार से एक बेहद ठंडी, सूखी और जानी-पहचानी आवाज गूंजी:
"तुमने उस तहखाने का दरवाजा खोलकर बहुत बड़ी गलती कर दी, कबीर... कुछ राज ऐसे होते हैं जिन्हें दफन ही रहने देना चाहिए था।"
वह आवाज... वह राहुल की ही आवाज थी, जिसे कबीर ने थोड़ी देर पहले उस तहखाने में नयना के गले से निकलते हुए सुना था!
कबीर के हाथ कांप उठे। उसने फोन को कान से थोड़ा दूर करके स्क्रीन पर देखा—नंबर वही था। उसने तुरंत खुद को संभालते हुए कड़क आवाज में पूछा—"तुम कौन हो? राहुल या वह साया? और इस खेल से तुम क्या साबित करना चाहते हो? सामने आओ!"
फोन के उस पार एक भयानक और गूंजती हुई हंसी गूंजी—हिहिहि...
"सामने ही तो हूँ, कबीर। बस फर्क इतना है कि तू अभी तक अपनी दुनिया की रोशनी में जी रहा है, और हम उस अंधेरे का हिस्सा बन चुके हैं। तूने नयना को बचाने की कोशिश की थी ना? अब जा... जाकर देख ले कि तेरे अपने कमरे में क्या हो रहा है।"
टूट!—कॉल अपने आप कट गई।
कबीर ने झटके से फोन अपनी टेबल पर फेंका और कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। उसने बिना एक सेकंड गंवाए अपने कमरे के दरवाजे की तरफ देखा, जो अंदर से बंद था।
कबीर तेजी से अपने कमरे के कोने में टंगे उस पुराने वॉल-मिरर की तरफ बढ़ा—वही आईना, जिसे वह हमेशा से अपनी शेविंग और तैयार होने के लिए इस्तेमाल करता आया था।
जैसे ही वह उस आईने के सामने पहुंचा, उसकी सांसें बीच में ही अटक गईं।
आईने पर धूल की कोई परत नहीं थी, लेकिन कांच के ठीक बीचों-बीच लाल स्याही से एक नया वाक्य लिखा हुआ था—
“खेल अब शुरू हुआ है, कबीर।”
और उस लिखे हुए वाक्य के ठीक नीचे, आईने के कांच में कबीर की अपनी परछाई के कंधे पर किसी दूसरे शख्स का हाथ रखा हुआ दिखाई दे रहा था—वह राहुल का हाथ था, जिसकी कलाई पर वही पुरानी घड़ी बंधी थी!
कबीर ने घबराकर तुरंत पीछे पलटकर देखा। उसके कमरे में उसके अलावा कोई नहीं था, उसकी स्टडी टेबल पर वही लाल डायरी रखी थी, और खिड़की के बाहर वही अनंत अंधेरी रात पसरी हुई थी। लेकिन जब उसने दोबारा आईने की तरफ देखा, तो उस परछाई ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई और कबीर की तरफ देखकर एक खौफनाक मुस्कान दी।
कबीर को अहसास हो गया कि वह जिस तहखाने से बचकर भागा था, वह कोई साधारण मकान का कमरा नहीं था—वह साया अब उसके अपने वजूद के साथ इस शहर में दाखिल हो चुका था।
कमरे का तापमान एक बार फिर तेजी से नीचे गिर गया था। कबीर की नजरें उस आईने पर टिकी थीं, जहां उसकी अपनी परछाई के साथ वह भयानक साया खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसने बिना कोई वक्त गंवाए अपनी लेदर जैकेट की जेब से टॉर्च निकाली और उसे कसकर पकड़ लिया।
"मुझे डराने की कोशिश मत करो," कबीर ने खुद को मजबूत करते हुए तेज आवाज में कहा। उसकी आवाज उस छोटे से कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौट आई। "अगर तुम कोई सबूत हो, कोई अनसुलझा सच हो, तो सामने आकर बात करो! छिपकर इस तरह खेल खेलने से क्या मिलेगा?"
आईने के अंदर उस साए ने कोई जवाब नहीं दिया। बस, कांच पर लाल स्याही से लिखे शब्द—“खेल अब शुरू हुआ है, कबीर”—धीरे-धीरे पिघलने लगे और खून की बूंदों की तरह नीचे फर्श की तरफ टपकने लगे।
कबीर समझ चुका था कि इस कमरे में रुकना अब खतरे से खाली नहीं था। उसने अपनी स्टडी टेबल पर रखी वह लाल डायरी उठाई, उसे अपनी जैकेट के अंदर मजबूती से खोंसा, और दरवाजे की कुंडी खोलकर सीधे बाहर कॉरिडोर में निकल आया।
रात के तीन बज रहे थे। कबीर का पूरा अपार्टमेंट ब्लॉक गहरी नींद में डूबा हुआ था। कॉरिडोर की पीली मद्धम लाइट टिमटिमा रही थी। कबीर तेजी से सीढ़ियों की तरफ बढ़ रहा था, तभी उसके कानों में एक अजीब सी आवाज गूंजी—उसके पीछे-पीछे किसी के नंगे पैरों के चलने की आवाज आ रही थी—छप... छप... छप...—मानो कोई गीले पैरों से उसके बिल्कुल पीछे आ रहा हो।
कबीर रुका और उसने झटके से पीछे मुड़कर टॉर्च की बीम उस खाली कॉरिडोर पर डाली।
वहाँ कोई नहीं था। सिवाय इसके कि फर्श पर पानी के कुछ ताजा और ठंडे निशान बने हुए थे, जो सीधे उसके अपने कमरे के दरवाजे से शुरू होकर आगे बढ़ रहे थे।
कबीर का दिल एक पल के लिए जोर से धड़का। उसने बिना पीछे देखे सीढ़ियां उतरनी शुरू कर दीं। उसे अच्छी तरह समझ आ गया था कि यह साया सिर्फ उस वीरान बंगले तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उसके साथ-साथ चल रहा है। इस पहेली को सुलझाने का अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा था—उस पांच साल पुराने पुलिस थाने की रिकॉर्ड रूम तक पहु पहुँचना, जहाँ राहुल की गुमशुदगी की असली और अधूरी फाइल आज भी धूल फांक रही होगी।
रात के ठीक साढ़े तीन बज रहे थे। शहर का सेंट्रल पुलिस स्टेशन इस वक्त पूरी तरह खामोश था। ड्यूटी पर तैनात संतरी अपनी कुर्सी पर सर झुकाए गहरी नींद में डूबा हुआ था, और स्टेशन के गलियारों में केवल एक पुरानी दीवार घड़ी की टिक-टिक गूंज रही थी।
कबीर ने अपनी जैकेट की ज़िप ऊपर तक खींची और अंधेरे का फायदा उठाते हुए पिछले दरवाजे से चुपचाप स्टेशन के अंदर दाखिल हो गया। उसका मकसद साफ था—ग्राउंड फ्लोर के कोने में मौजूद वह पुराना 'रिकॉर्ड रूम', जहाँ पांच साल से भी ज्यादा पुराने अनसुलझे मामलों की फाइलें धूल फांक रही थीं।
वह दबे पांव चलता हुआ उस भारी लोहे के दरवाजे के सामने पहुँचा। दरवाजे पर लगा ताला पुराना और जंग खाया हुआ था। कबीर ने अपनी जेब से एक मजबूत लोहे की पिन निकाली और उस ताले के भीतर डालकर हाथ आजमाने लगा। उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे, क्योंकि उसे डर था कि कहीं कोई संतरी या पुलिसकर्मी उसे इस हालत में न देख ले।
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एक हल्की सी आवाज के साथ ताले का मैकेनिज्म खुला और वह भारी दरवाजा अंदर की तरफ सरक गया। कबीर ने तेजी से अंदर कदम रखा और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
रिकॉर्ड रूम के भीतर फाइलों की गंध और पुरानी सड़ती हुई कागजों की महक भरी हुई थी। उसने अपनी टॉर्च ऑन की और उसकी पीली रोशनी को रैक पर सजी फाइलों पर घुमाने लगा।
कबीर की नजरें उन पुरानी फाइलों के बंडल पर दौड़ रही थीं—2021... 2022... और आखिरकार उसकी उंगलियां उस रैक पर ठहर गईं जहाँ साल 2021 के गुमशुदगी के मामले रखे थे।
उसने तेजी से फाइलें खंगालनी शुरू कीं। और तभी उसकी उंगलियों के नीचे एक मोटी नीली फाइल आई, जिसके कवर पर बड़े अक्षरों में लिखा था—‘केस फाइल: राहुल वर्मा - गुमशुदगी और दुर्घटना (Case No. 404)’।
कबीर ने तुरंत उस फाइल को खोला और टॉर्च की रोशनी में उसके पन्ने पलटने लगा। पन्नों के बीच राहुल की पुलिस इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट, उसकी पोस्ट-मॉर्टम की अधूरी रिपोर्ट (जो कभी पूरी नहीं हो पाई क्योंकि शरीर नहीं मिला था), और घटनास्थल की तस्वीरें थीं।
लेकिन जैसे ही कबीर ने पन्नों को और गहराई से पलटा, उसे एक ऐसा दस्तावेज मिला जिसने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी।
उस रिपोर्ट में लिखा था:
"घटना की रात गाड़ी चलाने वाला राहुल नहीं था। गाड़ी की स्टीयरिंग पर ड्राइवर की सीट पर फिंगरप्रिंट्स और फोरेंसिक जांच से साबित हुआ है कि उस गाड़ी को नयना चला रही थी। और सबसे चौकाने वाली बात यह है कि उस कार के ब्रेक फेल नहीं हुए थे, बल्कि उन्हें जानबूझकर काटा गया था।"
कबीर की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने पन्ने पर आगे पढ़ा—
"राहुल ने हादसे से ठीक तीन दिन पहले पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी जान को उसकी पत्नी नयना से खतरा है, क्योंकि नयना किसी और के साथ मिलकर उसकी करोड़ों की संपत्ति हड़पना चाहती थी।"
कबीर का दिमाग सन्न रह गया। अब तक वह जिसे बेकसूर और पीड़ित समझ रहा था—वह नयना—असल में इस पूरी खौफनाक कहानी की मास्टरमाइंड थी!
तभी, रिकॉर्ड रूम के उस बंद और सन्नाटे से भरे कमरे में पीछे से किसी के हंसने की बहुत धीमी और भयानक आवाज गूंजी—हिहिहि...
कबीर ने झटके से पीछे मुड़कर अपनी टॉर्च की रोशनी उस कोने की तरफ डाली। रैक के ठीक बीचों-बीच, फाइलों के साए के पीछे कोई खड़ा था। जैसे ही उस शख्स ने अपनी परछाई से बाहर कदम रखा, कबीर के गले से चीख निकलते-निकलते रह गई—वह नयना थी! लेकिन उसके हाथ में कोई डायरी नहीं, बल्कि एक चमकती हुई खूनी छुरी थी, और उसकी आँखें पूरी तरह बेरहम और लाल थीं।
टॉर्च की पीली और कमजोर रोशनी में नयना का चेहरा किसी भूतिया साये की तरह भयानक लग रहा था। उसके हाथों में पकड़ी हुई वह लोहे की छुरी से पानी की जगह गाढ़ी लाल बूंदें टपक कर फर्श पर गिर रही थीं—टिप... टिप... टिप...
कबीर ने एक कदम पीछे हटाया, उसकी पीठ सीधे पीछे रखी लोहे की फाइल रैक से जा टकराई। फाइलें ऊपर से नीचे तक हिल गईं और कुछ पुरानी फाइलें उसके पैरों पर आकर बिखर गईं।
"नयना... तुम?" कबीर की आवाज कांप गई। उसके माथे पर ठंडे पसीने की बूंदें चमक उठीं। "तुम तो उस तहखाने में... उस बंगले में थीं! यहाँ... इस पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड रूम तक तुम कैसे पहुँची?"
नयना ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके होंठों पर एक अजीब सी, खिंची हुई और क्रूर मुस्कान तैर रही थी। वह बिना पलक झपकाए धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ने लगी। उसके चलने की आवाज फर्श पर ऐसी गूंज रही थी, मानो कोई भारी चट्टान घिसट रही हो।
"तुम सच्चाई की तलाश में आए थे ना, कबीर?" नयना की आवाज इस बार उसकी अपनी नहीं, बल्कि कई सारी डरावनी आवाजों का एक भयानक मेल लग रही थी। "लो, अब पूरा सच तुम्हारे सामने है। लेकिन जो सच जान लेता है, उसे इस दुनिया में जिंदा रहने का हक नहीं रहता!"
कबीर का दिमाग तेजी से दौड़ रहा था। उसने अपनी जैकेट के भीतर हाथ डाला और राहुल की उस लाल डायरी को कसकर पकड़ लिया। उसे अहसास हो गया कि नयना अब इंसानी रूप में नहीं है—वह उस शापित परछाई और उस पुरानी खौफनाक रात का जीता-जागता चेहरा बन चुकी है।
जैसे ही नयना ने अपनी छुरी हवा में उठाकर कबीर के सीने की तरफ झटके से वार किया, कबीर ने अपनी पूरी ताकत से खुद को बाईं तरफ झुका दिया!
सर्रक!
छुति हवा को चीरती हुई कबीर की जैकेट की बाजू को फाड़ती हुई सीधे पीछे लोहे के रैक में जा धंसी। चिंगारियां उड़ीं। कबीर ने मौके का फायदा उठाया और नीचे झुककर नयना के पैरों पर एक जोरदार लात जड़ दी।
संतुलन बिगड़ने से नयना लड़खड़ाकर पीछे की तरफ गिरी और बिखरी हुई फाइलों के ढेर पर जा धंसी।
कबीर बिना एक सेकंड गंवाए जमीन से उठा, उस नीली केस फाइल को अपनी जैकेट में दबाया, और रिकॉर्ड रूम के खुले हुए दरवाजे की तरफ पागल की तरह भागा।
कबीर दौड़ता हुआ रिकॉर्ड रूम से बाहर निकला और सीधे थाने के मुख्य हॉल में आ गया। लेकिन यह क्या था?
थोड़ी देर पहले जो पुलिस स्टेशन खामोश और वीरान लग रहा था, वह अब पूरी तरह बदल चुका था। संतरी की कुर्सी खाली थी, दीवारों पर टंगे घड़ियों के कांटे उल्टे घूम रहे थे, और पूरे थाने में बाहर से आती हुई उस मूसलाधार बारिश की आवाज की जगह किसी गहरी खाई की हवाओं की सनसनाहट गूंज रही थी।
पूरे हॉल में घना कोहरा भर चुका था।
कबीर ने मेन गेट की तरफ दौड़ लगाई और उसके भारी लोहे के हैंडल को पकड़कर अपनी पूरी ताकत से खींच दिया।
क्रीक... की एक चीखती हुई आवाज के साथ दरवाजा खुल गया।
कबीर ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा और सीधे बाहर सड़क पर छलांग लगा दी। बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन सड़कों पर पानी की जगह काला कोहरा छाया हुआ था। उसकी अपनी सांसें फूल चुकी थीं। उसने अपनी जैकेट के अंदर हाथ डालकर उस नीली केस फाइल को टटोला—वह सुरक्षित उसके पास थी।
लेकिन तभी, उसके कान में एक बेहद ठंडी फुसफुसाहट गूंज उठी—सीधे उसके कंधे के पास:
"तुम फाइल बचा लोगे, कबीर... लेकिन अपनी परछाई कहाँ छुपाओगे?"
कबीर ने कांपते हुए अपनी नजरें सड़क के किनारे लगे एक बड़े कांच के शोकेस पर डालीं। उस कांच में उसकी अपनी कोई परछाई नहीं दिख रही थी—वहाँ सिर्फ राहुल और नयना का वह संयुक्त, डरावना साया खड़ा होकर उसे देखकर मुस्कुरा रहा था।
सुबह की पहली पीली धूप भी इस शहर के आसमान पर गहरी धुंध और कोहरे को चीर नहीं पाई थी। कबीर की आँखें लाल थीं और चेहरे पर पिछले चौबीस घंटों की थकान साफ झलक रही थी। उसने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और शहर की सीमाओं को पार करते हुए उस पहाड़ी रास्ते की तरफ निकल पड़ा, जिसके बारे में उस नीली केस फाइल और राहुल की डायरी में जिक्र था।
सड़कें सुनसान थीं और दोनों तरफ खड़े ऊंचे चीड़ के पेड़ उस सन्नाटे को और गहरा कर रहे थे। हवा में अजीब सी ठंडक और मिट्टी की सोंधी महक के साथ वही पुरानी जंग लगी लोहे की गंध घुली हुई थी—वही महक, जो उस तहखाने और पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड रूम में भी थी।
कबीर को अब अच्छी तरह समझ आ गया था कि यह सफर सिर्फ सच की तलाश का नहीं, बल्कि उसके अपने वजूद की आखिरी लड़ाई था। अगर वह उस तीसरे शख्स तक नहीं पहुँचा, जिसने पांच साल पहले इस पूरी साजिश की पटकथा लिखी थी, तो वह इस परछाई के जाल से कभी बाहर नहीं निकल पाएगा।
दो घंटे की थका देने वाली ड्राइव के बाद कबीर की बाइक उस खतरनाक और घुमावदार मोड़ पर आकर रुकी—वही घाटी, जहाँ पाँच साल पहले राहुल की कार खाई में गिरी थी।
वहाँ सड़क के किनारे लोहे की टूटी हुई रेलिंग आज भी वैसी ही मुड़ी हुई थी। कबीर ने अपनी बाइक साइड में लगाई, गहरी सांस ली और उस टूटी हुई रेलिंग के पास जाकर नीचे गहरी खाई में झांका। नीचे घना कोहरा तैर रहा था, जहाँ से किसी के रोने और आहें भरने की बहुत धीमी आवाजें हवा के साथ तैरती हुई ऊपर आ रही थीं।
तभी, कबीर के ठीक पीछे सड़क पर किसी के जूतों के कंकड़ पर पड़ने की आवाज आई—कड़... कड़... कड़...
कबीर ने चौंककर झटके से पीछे पलटकर देखा।
कोहरे की धुंध के बीच एक लंबा कद का इंसान खड़ा था। उसने एक लंबी ब्लैक ओवरकोट पहन रखी थी, और उसके चेहरे पर एक परछाई सी छाई हुई थी, जिससे उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था। उसके हाथ में वही पुरानी लाल डायरी थी, और वह धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ रहा था।
"तुम बहुत देर से आए, कबीर..." उस शख्स की आवाज भारी, शांत और बेहद डरावनी थी। "मैंने पांच साल से इस घड़ी का इंतजार किया था कि कोई तो हो जो इस डायरी और इस केस के आखिरी पन्ने तक पहुंचे।"
कबीर ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं और कड़क आवाज में पूछा—"तुम कौन हो? राहुल? या इस खेल का असली मास्टरमाइंड?"
उस शख्स ने अपने चेहरे से को कोट का कॉलर थोड़ा हटाया और एक खौफनाक मुस्कान के साथ अपने चेहरे पर जमी वह धुंधली परछाई हटाई—और उसे देखकर कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई!
उस शख्स ने धीरे से अपना सिर उठाया और अपनी कोट की कॉलर नीचे की। कोहरे के बीच से जो चेहरा सामने आया, उसे देखकर कबीर का कलेजा मुंह को आ गया।
वह कोई और नहीं... खुद कबीर का अपना चेहरा था!
वही आंखें, वही बाल, और वही लेदर जैकेट—बस फर्क सिर्फ इतना था कि उस दूसरे कबीर की आँखों में जीवन की कोई चमक नहीं थी, बल्कि वे पूरी तरह सूखी और बेरंग थीं। उसके सीने पर ठीक उसी जगह एक गहरा जख्म था, जहाँ से खून की जगह काली स्याही रिस रही थी।
कबीर एक कदम पीछे हटा, उसका सिर चकराने लगा। "यह... यह कैसे मुमकिन है? तुम... तुम मैं कैसे हो सकता हूँ?"
दूसरा कबीर धीरे से हँसा—एक ऐसी खोखली और गूंजती हुई हंसी, जो उस पूरी पहाड़ी पर गूंज उठी। "तू हैरान क्यों है, कबीर? क्या तुझे सच में लगता था कि तू इस कहानी का सिर्फ एक बाहरी पत्रकार है? तूने इस केस को सुलझाने की कोशिश नहीं की... तू इस दलदल में खुद उतरने के लिए खींचा चला आया था, क्योंकि यह कहानी शुरू ही तब होती है जब तूने पांच साल पहले इस सच को दबाने में मदद की थी।"
कबीर का दिमाग सुन्न हो गया। उसके सिर में तेज दर्द होने लगा। पांच साल पुरानी धुंधली यादें उसके दिमाग के किसी कोने से बाहर निकलने लगीं—वह रात, वो खून से सने हाथ, और वो भयानक फैसला जो उसने एक अनजान डर के साए में लिया था।
राहुल और नयना दोनों तो सिर्फ इस साजिश के मोहरे थे... इस खेल का असली साया और कोई नहीं, खुद कबीर का अपना अतीत था!
"अब हिसाब चुकाने का वक्त आ गया है, कबीर," उस दूसरे कबीर ने आगे बढ़ते हुए कहा। उसके हाथ में वह लाल डायरी और एक पुरानी छुरी चमक रही थी। "तू कब तक अपने ही गुनाहों से भागता फिरेगा? या तो इस सच को स्वीकार कर ले, या फिर इस खाई में हमेशा के लिए कूद जा।"
कबीर ने अपने दोनों सिरों को पकड़ लिया। वह उस खाई के बिल्कुल कगार पर आ चुका था। उसके पीछे अनंत गहरा अंधकार था, और सामने उसका अपना ही दूसरा रूप खड़ा था।
तभी, उस खाई से अचानक नयना और राहुल की मिली-जुली आवाज़ गूंजी—
"झूठ चाहे जितनी परतों के पीछे छुप जाए, आईना कभी सच छुपा नहीं सकता।"
कबीर ने एक लंबी सांस ली। उसके अंदर का डर अब धीरे-धीरे एक अजीब सी शांति में बदल रहा था। उसने समझ लिया था कि वह इस परछाई से भाग नहीं सकता, क्योंकि वह परछाई उसका अपना ही हिस्सा थी।
उसने अपनी आँखें बंद कीं, एक कदम आगे बढ़ाया, और सीधे उस खाई के उस पार छलांग लगा दी—जहाँ न तो कोई कोहरा था, न कोई डर, बल्कि केवल एक खामोश और अनंत सच्चाई थी।
... और पहाड़ी के उस रास्ते पर, हवा का एक तेज झोंका आया। टूटी हुई रेलिंग के पास अब कोई नहीं था—सिर्फ जमीन पर वह लाल डायरी खुली हुई पड़ी थी, जिसका आखिरी पन्ना हवा में फड़फड़ा रहा था, और पास ही लगे एक छोटे से रोड-साइन के कांच में किसी की कोई परछाई नहीं दिख रही थी।
समाप्त।