अल्फाज़ ए इश्क amjadaara द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अल्फाज़ ए इश्क

कबीर और आयरा एक-दूसरे से बेहद मोहब्बत करते थे, लेकिन वक्त के फेर और हालात ने उन्हें अलग-अलग रास्तों पर चलने के लिए मजबूर कर दिया था। वे दोनों एक-दूसरे से जुदा हो चुके थे और उनके बीच फासले आ गए थे, लेकिन उनके दिलों के तार उस डायरी और उनकी रूहानी मोहब्बत से हमेशा के लिए बंधे हुए थे। ज़माने ने भले ही उन्हें दूर कर दिया था, पर उनके दिल इस बात पर यकीन रखते थे कि यह जुदाई हमेशा के लिए नहीं है। यह तो बस वक्त का एक ऐसा इम्तिहान था, जिससे गुजरकर उनकी मोहब्बत को और भी अधिक पाक होना था। वे दोनों अपनी-अपनी डायरियों के पन्नों पर अपने मिलन के हसीं ख्वाब और बिछड़ने का दर्द लिखा करते थे।

एक दिन, आयरा का दिल बहुत बेचैन था। उस घुटन और तन्हाई से थोड़ी राहत पाने के लिए और ताज़ी ठंडी हवा खाने के लिए वह शहर के एक सुनसान पार्क की तरफ निकल पड़ी। चलते-चलते उसकी नज़र पार्क के एक कोने में बनी एक पुरानी और एकदम शांत दीवार पर पड़ी, जो चारों तरफ से बिल्कुल सुनसान और वीरान थी। उस सुनसान दीवार को देखकर आयरा के कदम अचानक वहीं रुक गए। उसके मन में न जाने क्या आया, उसने अपने पास मौजूद पेन से उस साफ दीवार पर अपनी डायरी के ख्यालों से जुड़ी एक अधूरी शायरी के दो लाइनें लिख दीं:

> "तलाश जिसकी थी, वो सफर में ही छूट गया,
> ख्वाबों का सिलसिला बीच भँवर में ही टूट गया..."

शायरी के ये दो अधूरे शेर लिखकर और उसके पास ही एक छोटी सी अधूरी पेंटिंग बनाकर आयरा अचानक से वहाँ से चली गई, क्योंकि हवा तेज़ी से चलने लगी थी। 

कुछ समय बाद, इत्तेफाक से कबीर भी उसी सुनसान रास्ते और पार्क के पास से गुजर रहा था। अचानक उसकी नज़र उस पुरानी दीवार पर पड़ी, जिस पर आयरा ने लिखा था। कबीर के कदम ठिठक गए और उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा। उस लिखावट और अधूरी शायरी को देखते ही कबीर समझ गया कि यहाँ किसी अपने ही के होने का एहसास है। आयरा द्वारा लिखे गए उन दो लाइनों के शेरों को देखकर, कबीर ने आगे बढ़कर अपनी डायरी और पेन के सहारे उस शायरी के थोड़े से हिस्से को खुद पूरा किया और उसके आगे के दो शेर जोड़ दिए:

> "...फासले चाहे जितने भी बढ़ा ले ये दुनिया,
> हमारी रूह का रिश्ता कभी टूटेगा नहीं।"

शायरी पूरी करने के बाद और उस पेंटिंग में थोड़ा सा रंग भरने के बाद, जब और तेज़ ठंडी हवा का झोंका आया, तो कबीर भी फौरन वहाँ से चला गया। 

इस तरह, कबीर और आयरा भले ही आमने-सामने नहीं आ पाए और एक बार फिर मिलने से चूक गए, लेकिन उस सुनसान दीवार और उन अधूरे-पूरे शेरों ने उनकी मोहब्बत को अमर कर दिया था। वह दीवार उनके बेइंतहा इश्क की मूक गवाह बन चुकी थी, जहाँ वे एक-दूसरे से मिले बिना भी एक-दूसरे के बेहद करीब होने का एहसास कर रहे थे। दोनों की यह अधूरी मुलाकात और खामोश संवाद इस बात का पक्का सबूत था कि जब दिल सच्चे हों, तो दूरियां भी मोहब्बत को कम नहीं कर सकतीं। वे दोनों अब भी यही मानते थे कि आने वाले किसी नए सवेरे में उनकी किस्मत उन्हें ज़रूर आमने-सामने लाएगी और उनकी अधूरी कहानी एक दिन पूरी तरह मुकम्मल होगी।