बड़ी इच्छा थी, श्रीरामलला के दर्शन करूँ। ट्रेन से उतरते ही अयोध्या में कदम रखा। सुबह होने में वक्त था, इसलिए पहले से बुक कमरे में चला गया।आराम करके दस बजे दर्शन के लिए निकला। रास्ते भर अयोध्या की विशालता आंखों में भरता रहा। हर प्रतिमा, हर कोना याद दिला रहा था हम श्रीराम जन्मभूमि में हैं। लगा सच में श्रीरामराज्य आ गया है।लंबी कतार के बाद एक पल ऐसा आया जब स्वयं को श्रीराम जी के सम्मुख पाया। आंखें सजल हो उठीं। कुछ कहा नहीं, बस देखता रहा।शाम को सरयू घाट की ओर चल पड़ा। हरिद्वार की तरह यहाँ भी शाम को नदी किनारे सुकून मिलता है। सोचा था तीन दिन हूँ, हर शाम किसी अजनबी से मिलकर श्रीराम के बारे में बात करूँगा।घाट पर भीड़ कम थी। लोग छोटे ग्रुप में बैठे थे, कुछ भजन गा रहे थे। मैं शोर से दूर जाकर बैठ गया। थोड़ी दूर एक बाबा पोथी के सामने भजन गा रहे थे।मैं पास गया, बोला - बाबा जी, राम राम।उन्होंने कहा - राम राम।बैठने की इजाजत ली तो मुस्कुराकर हामी भरी। पूछा कहां से आए हो, मैंने परिचय दिया।आप यहीं से हो?बोले - पास के गांव से आता हूँ, दो-चार दिन यहीं रहता हूँ, फिर लौट जाता हूँ। गांव में मन नहीं लगता। पत्नी कहती है श्रीराम का भजन करो।परिवार?बोले - पत्नी है, बच्चे नहीं।काम?बोले - जवान था तब करता था, अब हम श्रीराम को भजते हैं, बाकी श्रीराम जी जानें।मैंने बात शुरू की - मंदिर बनने में काफी दिन लग गए न?मुस्कुराए और बोले - जो श्रीराम को नहीं जान पाए, वे विवाद करते हैं और करते रहेंगे।मैंने अचरज से देखा - मतलब?इशारा करके बोले - वहाँ देखो।एक महिला नदी में पूजा कर दिया विसर्जित कर रही थी।बोले - वह दिया किस धर्म का है?अगर वही दिया तुम्हारे घर रख दूँ तो क्या तुम्हारे धर्म का हो जाएगा? और दूसरे धर्म वाले के घर रखूँ तो क्या उसका प्रकाश बदल जाएगा?मैंने ना में सिर हिलाया।तब बोले - श्रीराम वही दिया हैं, जो सबको प्रकाश देता है। श्रीराम सबके हैं। अनंत ब्रह्मांड बनाने वाले को हम जात-पात, धर्म की चार दीवारों में कैसे बंद कर सकते हैं?हजारों ग्रह अपनी कक्षा में घूम रहे हैं, उनमें एक छोटा ग्रह है पृथ्वी। पूरे ब्रह्मांड के स्वामी मेरे भक्त-वत्सल श्रीराम हैं, उन्हें हम तुच्छ बुद्धि से कैसे समझें?फिर मेरी ओर देखकर बोले — क्या करते हो?मैंने कहा — अध्यापक हूँ।वे बोले — तुम्हारी कक्षा में भी अलग-अलग जाति के छात्र होंगे। क्या तुम उन्हें शिक्षा देने में भेदभाव करते हो?मैंने ना में सिर हिलाया।वे मुस्कुराकर बोले — बस, श्रीराम भी वही प्रकाश देने वाला दिया हैं, जिसका प्रकाश सबके लिए है। हर धर्म के लिए है।तभी आरती की सूचना हुई। वे उठकर चलने लगे और बोले — मेरे प्रभु की आरती का समय हो गया है।मैंने कहा — बाबा, आपसे बात करके बड़ी शांति मिली। कल यहीं मिलोगे?उन्होंने मुस्कुराकर कहा — श्रीराम जी की इच्छा, देखते हैं कल।और वह उठकर मंदिर की ओर चल दिए।मैं वही घाट पर बैठा रहा , मेरे मन में एक दिया जल रहा था जो सबके लिए है