शोक की परछाईं और पत्थर का मौन
प्रिंस अल्बर्ट की मृत्यु के बाद बकिंघम पैलेस के वैभव पर जैसे किसी ने काली चादर डाल दी थी रानी विक्टोरिया ने खुद को बाहरी दुनिया से काट लिया और कोहिनूर वाला वह ब्रोच अब उनकी मेज पर धूल फांकने लगा महल के नौकर फुसफुसाते थे कि रानी जब भी उस हीरे को देखती हैं, उन्हें अल्बर्ट की मुस्कुराती हुई तस्वीर याद आती है कोहिनूर की वह नई, तीखी चमक अब उत्सव की नहीं, बल्कि एक श्मशान जैसी खामोशी की गवाह थी
रानी ने आदेश दिया कि पैलेस के सारे झंडे आधे झुका दिए जाएं और महल का हर कोना काले मखमल से ढक दिया जाए वह हीरा, जिसे दुनिया को दिखाने के लिए काटा गया था, अब अंधेरी तिजोरियों में फिर से कैद होने के लिए मजबूर था लंदन की ठंडी रातों में जब पहरेदार तिजोरी के पास से गुजरते, तो उन्हें धातु के टकराने की महीन आवाजें आतीं—जैसे वह पत्थर अपनी कटी हुई काया को समेटने की कोशिश कर रहा हो या शायद अपनी मातृभूमि की गर्मी मांग रहा हो विक्टोरिया का मानना था कि कोहिनूर ने उनसे उनका सबसे प्रिय इंसान छीन लिया है, फिर भी वह उसे छोड़ नहीं पा रही थीं यह एक अजीब सा प्रेम और घृणा का रिश्ता था जो एक साम्राज्ञी और एक गुलाम रत्न के बीच पनप रहा था इधर लंदन शोक में डूबा था और उधर सात समंदर पार भारत की जनता भूख और अकाल से लड़ रही थी पत्थर खामोश था, पर उसकी उपस्थिति मात्र से शाही परिवार के भीतर एक अनजाना डर घर कर चुका था
दलीप सिंह का जागता हुआ स्वाभिमान
दलीप सिंह अब जवान हो चुके थे, उनकी कद-काठी और आंखों की चमक में महाराजा रणजीत सिंह का अक्स दिखने लगा था वे लंदन के सबसे ऊंचे समाज में उठते-बैठते थे, पर अक्सर अकेलेपन में वे अपनी पगड़ी और ढाल को याद करते अंग्रेजी ट्यूटर्स ने उन्हें अपनी भाषा और तहजीब में ढालने की पूरी कोशिश की, पर उनके खून की गर्मी शांत नहीं हुई थी
एक रात दलीप ने अपनी पुरानी डायरी खोली और उन धुंधली यादों को कुरेदना शुरू किया जब वे लाहौर के तख्त पर थे उन्हें वह दिन याद आया जब कोहिनूर उनके नन्हे हाथों से छीनकर डलहौजी ने अपनी जेब में रख लिया था दलीप ने महसूस किया कि वे केवल एक 'शो-पीस' बनकर रह गए हैं, जिसका इस्तेमाल रानी अपनी उदारता दिखाने के लिए करती हैं उन्होंने बाइबिल पढ़ते हुए भी अक्सर अपनी मां, महारानी जिंदां के उन शब्दों को याद किया जो वे सोते समय कहती थीं: "दलीप, तू उस शेर का बेटा है जिसकी दहाड़ से अंग्रेज कांपते थे, अपनी जड़ें मत भूलना" उन्होंने चुपके से लंदन के पुस्तकालयों में जाकर पंजाब के इतिहास और कोहिनूर की असलियत को खोजना शुरू किया जितना वे पढ़ते, उतना ही उनका खून खौलता कि कैसे एक मासूम बच्चे के साथ दुनिया का सबसे बड़ा धोखा हुआ उन्हें लगने लगा कि जिस 'ब्लैक प्रिंस' को उन्होंने पालतू बनाया था, उसके भीतर का सोया हुआ शेर अब अंगड़ाई ले रहा है
लंदन की गलियों में भारतीय बगावत की गूँज
1870 के दशक के आते-आते लंदन की सड़कों पर कुछ नए चेहरे दिखने लगे थे—पढ़े-लिखे और जागरूक भारतीय ये वे लोग थे जो केवल व्यापार के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजों की चालों को समझने के लिए विलायत आए थे गुप्त बैठकों में कोहिनूर की चर्चा अब केवल एक रत्न के रूप में नहीं, बल्कि भारत की लूट के प्रतीक के रूप में होती थी
एक रात दलीप सिंह की मुलाकात एक भारतीय क्रांतिकारी से हुई जिसने उन्हें बताया कि पंजाब आज भी उन्हें याद करता है उस मुलाकात ने दलीप के भीतर की बची-खुची ईसाईियत को हिलाकर रख दिया और उनके मन में विद्रोह का बीज बो दिया उन्होंने तय किया कि वे रानी से कोहिनूर का हिसाब मांगेंगे और पूछेंगे कि किस हक से उन्होंने उनकी विरासत छीनी इधर कोहिनूर की सुरक्षा और बढ़ा दी गई थी, क्योंकि सरकार को डर था कि कोई इसे चुराने की कोशिश कर सकता है लंदन टावर के भीतर एक विशेष लोहे का पिंजरा और भी मजबूत कर दिया गया पत्थर अब एक राजनीतिक हथियार बन चुका था, जिसकी चमक कूटनीति के अंधेरे गलियारों में खो रही थी
टावर ऑफ लंदन का लौह पिंजरा
कोहिनूर को बकिंघम पैलेस से हटाकर 'टावर ऑफ लंदन' के 'वेकफील्ड टावर' में शिफ्ट करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया यह जगह लंदन की सबसे पुरानी और सबसे डरावनी जेलों में से एक थी हीरे के लिए एक विशेष तहखाना बनाया गया जिसकी दीवारें पांच फीट मोटी थीं और खिड़कियों पर लोहे के मोटे जाल थे एक ऐसा यंत्र लगाया गया कि अगर कोई उस कांच को तोड़ने की कोशिश करे, तो पूरे टावर में घंटियां बजने लगें सफेद वर्दी वाले 'बीफईटर्स' चौबीसों घंटे संगीनें ताने उस तिजोरी की रखवाली करते थे
कोहिनूर अब एक शाही गहने से ज्यादा एक 'अति सुरक्षित कैदी' की तरह वहां रखा गया था हीरा वहां अंधेरे में भी अपनी एक अलग रोशनी छोड़ता था, जो पहरेदारों को अक्सर भ्रमित कर देती थी कई गार्ड्स ने दावा किया कि उन्होंने रात के सन्नाटे में हीरे के भीतर से घोड़ों की टापें और तलवारों की खनक सुनी है यह पत्थर का अपना तरीका था अपनी दास्तान सुनाने का टावर की ठंडी हवाएं और टेम्स नदी का पानी कोहिनूर को अपनी ओर खींचते थे, पर लोहे की जंजीरें बहुत मजबूत थीं यहीं कोहिनूर ने अपनी उम्र के कई दशक बिताए, अपनी चमक को धूल से बचाते हुए और अपनी मिट्टी का इंतज़ार करते हुए
भारत की साम्राज्ञी और कोहिनूर का पुनः उदय
1 जनवरी 1877 का वह दिन जब दिल्ली दरबार में महारानी विक्टोरिया को 'कैसर-ए-हिंद' (भारत की साम्राज्ञी) घोषित किया गया लंदन में इस खुशी को मनाने के लिए कोहिनूर को एक बार फिर तिजोरी के अंधेरे से बाहर निकाला गया रानी ने उस दिन अपनी सबसे भव्य पोशाक पहनी और कोहिनूर को अपनी छाती पर सजाया यह दुनिया को संदेश था कि अब भारत की पूरी जमीन और उसके सारे रत्न औपचारिक रूप से ब्रिटिश ताज के अधीन हैं
समारोह के दौरान अचानक एक तेज आंधी आई जिसने पंडाल के पर्दों को फाड़ दिया, जिसे कई लोगों ने अपशकुन माना कोहिनूर की चमक उस दिन बहुत तीखी और खतरनाक लग रही थी, जैसे वह किसी बड़े विस्फोट की चेतावनी दे रहा हो साम्राज्य अपने चरम पर था, पर कोहिनूर की रूह विद्रोह के नए रास्ते तलाश रही थी अब कहानी उस मोड़ पर पहुँचने वाली थी जहाँ दलीप सिंह अपनी पहचान के लिए सब कुछ दांव पर लगाने वाले थे
माँ की ममता और आंसुओं का सैलाब
1861 के उस ठंडे दिन की सुबह, दलीप सिंह कलकत्ता के एक सरकारी बंगले में अपनी माँ, महारानी जिंदां का इंतज़ार कर रहे थे वर्षों की जुदाई के बाद जब दरवाजा खुला, तो सामने वह शक्तिशाली शेरनी नहीं, बल्कि एक अंधी और जर्जर वृद्ध महिला खड़ी थी दलीप अपनी माँ को पहचान तक नहीं पाए, पर जिंदां ने अपनी कांपती उंगलियों से अपने बेटे के चेहरे को छुआ
जैसे ही माँ के हाथों ने दलीप के गालों को छुआ, माँ की ममता ने वर्षों की जमी हुई बर्फ को पिघला दिया जिंदां जोर-जोर से रोने लगीं, उनके आंसू दलीप के अंग्रेजी लिबास को भिगो रहे थे दलीप, जो अब तक खुद को एक अंग्रेज राजकुमार समझते थे, अपनी माँ की गोद में सिर रखकर फूट-फूट कर रो पड़े जिंदां ने सिसकते हुए पूछा, "मेरे लाल, तूने अपनी पगड़ी कहाँ छोड़ दी? तेरी ढाल और तलवार कहाँ हैं?" उस एक वाक्य ने दलीप के भीतर सोए हुए पूर्वजों के गौरव को जगा दिया यह मिलन केवल एक माँ-बेटे का नहीं था, बल्कि एक सोए हुए इतिहास के दोबारा जागने का शंखनाद था
कोहिनूर की याद और सोया हुआ गौरव
महारानी जिंदां ने दलीप को अपनी कोठरी में बिठाया और रात भर उन्हें महाराजा रणजीत सिंह की वीरता के किस्से सुनाए उन्होंने बताया कि कैसे कोहिनूर उनके पिता के बाजूबंद पर चमकता था और कैसे वह पूरे पंजाब की खुशहाली का प्रतीक था जिंदां ने पूछा, "उस हीरे का क्या हुआ? क्या उन फिरंगियों ने उसे भी अपनी रानी के सीने पर टांग दिया है?"
जब दलीप ने बताया कि कोहिनूर को काटकर छोटा कर दिया गया है, तो जिंदां ने अपना माथा पीट लिया उनके लिए यह केवल पत्थर का कटना नहीं था, बल्कि पंजाब की आत्मा का अपमान था जिंदां की आँखों की रोशनी जा चुकी थी, पर उनकी रूह में वह आग आज भी थी जिसने कभी डलहौजी की नींद उड़ाई थी दलीप को पहली बार अपनी असलियत का अहसास हुआ कि वे लंदन में केवल एक सजावटी खिलौने की तरह रह रहे थे वे अब अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए बेचैन थे, पर उनके चारों ओर अंग्रेजों का एक अभेद्य जासूसी जाल बिछा हुआ था
ईसाईियत का त्याग और 'सिंह' का उदय
जिंदां की बातों ने दलीप के भीतर ऐसा मंथन शुरू किया कि उन्होंने चर्च जाना और बाइबल पढ़ना धीरे-धीरे कम कर दिया वे चोरी-छिपे गुरुमुखी सीखने लगे और उन प्रार्थनाओं को याद करने लगे जो उन्होंने बचपन में अपनी माँ से सुनी थीं एक सुबह उन्होंने अपने अंग्रेजी कोट को उतार फेंका और उस पगड़ी की याद में सिर झुकाया जो कभी उनके पिता का मान थी
लंदन का समाज इस बदलाव को देख कर हैरान था, उन्हें लगा कि उनका 'सभ्य राजकुमार' अब वापस 'जंगली' हो रहा है पर दलीप के लिए यह 'जंगली' होना ही उनका असली पुनर्जन्म था कोहिनूर की याद अब उनके लिए एक बोझ नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी थी उन्होंने ठान लिया कि वे कोहिनूर को वापस नहीं पा सके तो कम से कम अपना आत्मसम्मान तो वापस पाकर रहेंगे यह विद्रोह खामोश था पर बहुत गहरा था, जो ब्रिटिश हुकूमत की जड़ों को हिलाने वाला था
लंदन दरबार में बढ़ती नफरत और तनाव
दलीप सिंह और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच अब खुलकर टकराव होने लगा था दलीप ने अपनी पेंशन और अपनी जायदाद का पूरा हिसाब मांगना शुरू कर दिया उन्होंने सीधे तौर पर रानी विक्टोरिया को पत्र लिखा कि कोहिनूर को 'उपहार' कहना इतिहास का सबसे बड़ा झूठ है अधिकारियों ने दलीप को धमकाया, पर दलीप अब उस मोड़ पर थे जहाँ उन्हें मौत का डर भी अपनी आजादी के आगे छोटा लग रहा था
लंदन की ठंडी शामों में दलीप अब अकेले नहीं थे, उनके साथ उनकी माँ का साहस था अंग्रेजों ने दलीप को मानसिक रूप से बीमार घोषित करने की कोशिश की, पर दलीप की दलीलें इतनी तार्किक थीं कि अंग्रेज वकीलों के पास भी उनका कोई जवाब नहीं था कोहिनूर अब एक बार फिर विवादों के घेरे में आने वाला था, और इस बार दावेदार उसका असली मालिक था
पंजाब लौटने का संकल्प और पहला अवरोध
दलीप सिंह ने घोषणा कर दी कि वे अब अपनी माँ के साथ वापस पंजाब जाना चाहते हैं यह सुनते ही ब्रिटिश सरकार के हाथ-पांव फूल गए, क्योंकि उन्हें डर था कि दलीप के पहुँचते ही सिख सेना फिर से खड़ी हो जाएगी दलीप के पंजाब प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया दलीप ने हार नहीं मानी और अपनी माँ को साथ लेकर जहाज की ओर कूच किया
अदन के बंदरगाह पर जब उनका जहाज रुका, तो वहां के अंग्रेज गवर्नर ने उन्हें वहीं नजरबंद करने का आदेश दे दिया दलीप ने विरोध किया, "एक कैदी को अपनी माँ के साथ अपने घर जाने का हक भी नहीं है क्या?" पर साम्राज्य की राजनीति में हक की कोई जगह नहीं थी दलीप की आँखों में उस दिन वही नफरत थी जो कभी कोहिनूर की विदाई के समय पंजाब की जनता की आँखों में थी कोहिनूर लंदन में सुरक्षित था, पर उसका सबसे बड़ा वारिस अब समंदर के बीचों-बीच अपनी जंजीरें तोड़ रहा था
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अदन की तपिश और माँ की अंतिम विदा
अदन के बंदरगाह पर सूरज आग उगल रहा था, और उस तपती रेत के बीच एक जहाज पर महारानी जिंदां की साँसें उखड़ रही थीं दलीप अपनी माँ का सिर अपनी गोद में रखे बैठे थे, जहाँ बाहर की गर्मी से ज्यादा उनके भीतर की तड़प उन्हें जला रही थी अंग्रेजों ने उन्हें पंजाब जाने से रोक दिया था, और जिंदां का सपना अपनी मिट्टी को दोबारा छूने का अब अधूरा ही रहने वाला था
1 अगस्त 1863 की वह काली शाम, जब माँ ने दलीप के हाथ को अपनी अंतिम ताकत से भींचा और धीरे से बुदबुदाई— "बेटा, मेरी अस्थियाँ पंजाब की सतलुज में ही बहाना, इन फिरंगियों की ज़मीन पर मुझे चैन नहीं मिलेगा" उस आखिरी वाक्य के साथ पंजाब की वह शेरनी हमेशा के लिए खामोश हो गई, जिसने डलहौजी के माथे पर पसीना ला दिया था
दलीप की चीख उस अदन के वीरान तट पर गूँज उठी, जहाँ लहरें भी उनकी बेबसी पर आंसू बहा रही थीं अंग्रेजों ने माँ की मौत पर भी पहरा लगा रखा था, वे डरते थे कि माँ की लाश भी पंजाब में क्रांति न ला दे दलीप ने महसूस किया कि कोहिनूर को खोने के बाद आज उन्होंने अपनी आखिरी जड़ भी खो दी है अदन की उस बेनाम कब्रगाह में माँ को अस्थायी रूप से सुपुर्द-ए-खाक करना दलीप के लिए किसी नरक से कम नहीं था उन्होंने उस दिन अपनी माँ की ठंडी हथेली पर कसम खाई कि अब वे अंग्रेजों के दिए हुए 'प्रिंस' के खिताब को मिट्टी में मिला देंगे माँ की विदाई ने दलीप को वह फौलादी इरादा दिया जिसकी कमी उन्हें अब तक एक कमज़ोर राजकुमार बनाए हुए थी लंदन की ठंडी दीवारों के पीछे रखा कोहिनूर जैसे उस दिन अपनी चमक खो बैठा, क्योंकि उसकी सबसे बड़ी संरक्षक चली गई थी
अमृत की बूंदें और 'सिंह' का पुनर्जन्म
माँ की मौत के बाद दलीप सिंह के भीतर का ईसाई राजकुमार हमेशा के लिए मर चुका था और एक खालसा योद्धा जाग उठा था वे वापस लंदन पहुँचे, पर इस बार उनकी आँखों में वह चमक थी जो तलवार की धार पर होती है उन्होंने गुप्त रूप से पंच प्यारों को बुलाया और उसी मर्यादा के साथ 'अमृत' छकने का फैसला किया जो गुरु गोविंद सिंह ने शुरू की थी
जब अमृत की बूंदें उनके गले से उतरीं, तो उन्हें महसूस हुआ कि दशकों का मैल और गुलामी की परतें धुल गई हैं उन्होंने अपना सिर फिर से गर्व से ऊंचा किया और अपनी दाढ़ी और बालों को फिर से गुरु की अमानत मानकर संजोना शुरू किया लंदन के चर्चों के पादरी हैरान थे कि जिस 'भेड़' को उन्होंने पाला था, वह अब वापस 'शेर' बन चुका है दलीप ने घोषणा कर दी कि वे अब 'सर दलीप सिंह' नहीं, बल्कि खालसा राज के असली महाराजा दलीप सिंह हैं उन्होंने अपनी बाजू पर वह जगह देखी जहाँ कभी कोहिनूर बंधा था, और उन्हें अपनी ताकत का अहसास हुआ
अंग्रेजी हुकूमत के लिए यह एक बहुत बड़ा कूटनीतिक तमाचा था रानी विक्टोरिया को लिखे अपने पत्र में उन्होंने साफ़ कहा कि "मैं अब आपका गुलाम नहीं, बल्कि एक आज़ाद सिख हूँ" बकिंघम पैलेस में इस खबर से खलबली मच गई, और दलीप की जासूसी के लिए चौबीसों घंटे जासूस तैनात कर दिए गए कोहिनूर अब उनके लिए केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि उनके धर्म और देश की वह रूह थी जिसे वापस लाना उनका धर्म बन गया था
जार का दरबार और खैबर की ओर नज़र
दलीप सिंह समझ चुके थे कि केवल प्रार्थनाओं से कोहिनूर और पंजाब वापस नहीं मिलेगा, इसके लिए बड़ी ताक़त चाहिए उन्होंने गुप्त रूप से रूस के जार से संपर्क साधने की योजना बनाई, जो उस वक्त अंग्रेजों का सबसे बड़ा दुश्मन था वे जानते थे कि अगर रूस उत्तर की ओर से हमला करे, तो पंजाब की जनता विद्रोह कर देगी और कोहिनूर की बेड़ियाँ टूट जाएंगी
उन्होंने लंदन के अपने आलीशान घर को गिरवी रखा और उन गुप्त एजेंटों को पैसे दिए जो उन्हें मॉस्को पहुँचा सकें वे भेष बदलकर पेरिस की गलियों में भटके, जहाँ हर मोड़ पर ब्रिटिश जासूस उनकी परछाईं की तरह पीछे थे दलीप ने जार को पत्र लिखा— "मैं पंजाब का महाराजा हूँ, मुझे मेरी धरती वापस दिलाओ और मैं अंग्रेजों का नामोनिशान मिटा दूंगा"
यह एक बहुत बड़ा वैश्विक जुआ था, जहाँ एक अकेला महाराजा पूरी ब्रिटिश सल्तनत को चुनौती दे रहा था रूस के गलियारों में दलीप की चर्चा होने लगी, और अंग्रेजों को डर सताने लगा कि कहीं इतिहास फिर से न दोहराया जाए लंदन टावर में कोहिनूर की सुरक्षा और बढ़ा दी गई दलीप अब 'भिखारी महाराजा' बन चुके थे, जिनके पास पैसे नहीं थे, पर इरादे कोहिनूर से भी ज्यादा सख्त थे
पेरिस का एकांत और ठुकराया हुआ वैभव
दलीप सिंह अब पेरिस के एक छोटे से होटल के कमरे में रह रहे थे, जहाँ कभी वे महलों में सोया करते थे वहाँ की दीवारों पर उन्होंने पंजाब का नक्शा बना रखा था और वे घंटों कोहिनूर की उन पुरानी यादों में खोए रहते ब्रिटिश दूतावास ने उन्हें संदेश भेजा कि अगर वे माफ़ी मांग लें, तो उन्हें वापस लंदन बुलाकर सारी सुख-सुविधाएँ दी जाएंगी
दलीप ने उस प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा— "मुझे तुम्हारा सोना नहीं चाहिए, मुझे मेरा कोहिनूर और मेरी मिट्टी वापस चाहिए" उनकी हालत अब ऐसी थी कि कभी-कभी उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था पर उनके माथे पर वह शिकन नहीं थी जो एक भिखारी के पास होती है, बल्कि वह तेज़ था जो एक संत-सिपाही के पास होता है
उन्होंने पेरिस के बुद्धिजीवियों को इकट्ठा किया और उन्हें भारत की लूट और कोहिनूर की डकैती की कहानियाँ सुनाईं यूरोप के अखबारों में अब अंग्रेजों की पोल खुलने लगी थी दलीप सिंह को खत्म करने के लिए गुप्त षड्यंत्र रचे जाने लगे, क्योंकि एक ज़िंदा बागी महाराजा उनके लिए ज़हर के समान था कोहिनूर जैसे पेरिस की उन गलियों तक अपनी रोशनी पहुँचाना चाहता था जहाँ उसका असली वारिस भूखा सो रहा था
पंजाब की टीस और उड़ती हुई अफवाहें
इधर पंजाब में यह खबर आग की तरह फैल गई कि उनका 'महाराजा' फिर से सिख बन गया है और वापस आ रहा है पिंड-पिंड (गाँवों) में लोग गुरुद्वारों में अरदास करने लगे कि "सच्चे पातशाह, हमारे राजा को सही-सलामत वापस लाओ" सिखों के भीतर दोबारा वही जोश जागने लगा जो महाराजा रणजीत सिंह के समय में था
अंग्रेजों ने पंजाब में धारा 144 जैसे सख्त कानून लगा दिए और दलीप सिंह का नाम लेना भी अपराध घोषित कर दिया पर हवाओं को कौन रोक सकता था; लाहौर की गलियों में लोग दबी जुबान में कहते कि "कोहिनूर फिर से चमकेगा" लाहौर के किले के तोशाखाने के पुराने कर्मचारी रात को रोते थे क्योंकि वे उस खाली जगह को देखते थे जहाँ कभी हीरा था अफवाह उड़ने लगी कि दलीप सिंह रूस की सेना के साथ खैबर दर्रा पार कर रहे हैं इस डर ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी कोहिनूर अब केवल एक आभूषण नहीं रहा था, वह एक आने वाली क्रांति का झंडा बन चुका था
मॉस्को की बर्फ और जार का मौन
1887 की एक हड्डियां कपा देने वाली सर्द रात में, दलीप सिंह मॉस्को के रेलवे स्टेशन पर उतरे उनके पास न तो राजसी ठाठ था और न ही अंगरक्षकों की फौज, बस आँखों में एक जलता हुआ प्रतिशोध था रूस का जार अलेक्जेंडर तृतीय अंग्रेजों का कट्टर दुश्मन था, और दलीप को लगा कि यही कोहिनूर की वापसी का रास्ता है
मॉस्को के शाही महल 'क्रेमलिन' के चक्कर काटते हुए दलीप ने अपने जूते घिस दिए, पर रूसी अफसर उन्हें टालते रहे अंततः जार के मंत्री के साथ एक गुप्त कमरे में मुलाकात हुई, जहाँ दलीप ने पंजाब का नक्शा मेज पर बिछा दिया उन्होंने अपनी कांपती उंगलियों से वह जगह दिखाई जहाँ कोहिनूर को अंग्रेजों ने अपनी मुट्ठी में दबा रखा था
रूसियों ने दलीप की बातों को गौर से सुना, पर उनके लिए दलीप अब एक 'बिना मुकुट का राजा' थे जिनकी सत्ता खत्म हो चुकी थी जार की राजनीति में केवल फायदा देखा जाता था, जज्बात नहीं दलीप को अहसास हुआ कि ठंडी बर्फ केवल बाहर नहीं है, बल्कि उन लोगों के दिलों में भी है जिनसे वे मदद मांग रहे थे कोहिनूर लंदन में चमक रहा था, और उसका असली वारिस रूस की बर्फीली सड़कों पर एक कंबल लपेटे भटक रहा था उस रात दलीप ने मॉस्को के एक साधारण सराय में बैठकर अपनी डायरी में लिखा— "दुनिया केवल ताक़त को सलाम करती है"
प्याले में ज़हर और फिरंगी साया
ब्रिटिश खुफिया एजेंसी 'स्कॉटलैंड यार्ड' दलीप की रूस में मौजूदगी से इतनी घबरा गई थी कि उन्होंने उनके अंत का फैसला कर लिया दलीप जिस होटल में ठहरे थे, वहां एक नया बैरा भर्ती हुआ जो असल में एक ब्रिटिश जासूस था एक शाम, जब दलीप अपनी थकान मिटाने के लिए चाय का इंतज़ार कर रहे थे, उस बैरे ने प्याले में 'आर्सेनिक' की कुछ बूंदें मिला दीं
जैसे ही दलीप ने प्याला होठों से लगाया, उन्हें उस तरल में एक अजीब सी कड़वाहट महसूस हुई शायद यह उनकी माँ जिंदां की दुआ थी या कोहिनूर का वह अदृश्य रक्षा कवच, कि उन्होंने पहला घूँट लेते ही प्याला नीचे रख दिया अगले कुछ घंटों तक दलीप का शरीर आग की तरह तपने लगा और उन्हें भयानक मरोड़ उठने लगे वे फर्श पर गिरकर तड़पने लगे, पर कमरे में कोई नहीं था जो उनकी पुकार सुन सके
सुबह जब सराय का मालिक कमरे में पहुँचा, तो दलीप बेहोश पड़े थे पर उनके दिल की धड़कनें अब भी चल रही थीं अंग्रेजों की यह पहली नाकाम कोशिश थी, पर इसने दलीप को यह समझा दिया कि वे अब कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं हीरा तो अंग्रेजों ने छीन लिया था, अब वे उस लहू को भी पीना चाहते थे जो उस हीरे का असली वारिस था
वफ़ादारी की महक और मॉस्को का मिलन
मॉस्को की एक संकरी गली में, जहाँ दलीप अपनी बीमारी से उबर रहे थे, तीन अजनबी लोग उनसे मिलने पहुँचे ये लोग फटे-पुराने कंबल ओढ़े हुए थे, पर उनकी पगड़ियों का सलीका बता रहा था कि वे पंजाब की माटी से आए हैं ये वे वफादार सिख सिपाही थे जो भेष बदलकर, महीनों का सफर तय कर अपने 'महाराजा' को ढूंढने रूस पहुँचे थे
जब उन्होंने दलीप को एक टूटे हुए पलंग पर बीमार देखा, तो वे उनकी चरणों में गिरकर जार-जार रोने लगे दलीप ने जब अपनी भाषा 'पंजाबी' सुनी, तो उनकी आँखों में जान आ गई उन सिपाहियों ने अपनी पगड़ियों में छिपाकर लाई हुई पंजाब की मिट्टी और कड़ा प्रसाद दलीप के हाथों में रखा उस मिट्टी की खुशबू ने दलीप को वह ताकत दी जो दुनिया की कोई दवा नहीं दे सकती थी
सिपाहियों ने बताया कि "महाराजा, पंजाब आपकी राह देख रहा है, कोहिनूर की खाली जगह आज भी हमें काटती है" दलीप ने उन योद्धाओं को गले लगाया और महसूस किया कि वे अब भी 'महाराजा' हैं रूस की उस अंधेरी कोठरी में एक बार फिर 'जो बोले सो निहाल' की गूँज सुनाई दी, जो कोहिनूर की वापसी का संकल्प थी
पेरिस की तन्हाई और टूटी हुई तलवार
रूस से निराश होकर दलीप वापस पेरिस लौटे, पर अब उनका शरीर और आत्मा दोनों बुरी तरह छलनी हो चुके थे पैसे पूरी तरह खत्म हो चुके थे, और वे पेरिस के 'होटल डी ला विले' के एक बेहद साधारण और ठंडे कमरे में रहने को मजबूर थे उनकी तलवार, जिसे वे हमेशा अपने साथ रखते थे, एक दिन गलती से हाथ से गिरकर दो टुकड़ों में टूट गई
दलीप के लिए वह तलवार का टूटना एक बुरा संकेत था; उन्हें लगा कि अब कोहिनूर और उनकी वापसी की उम्मीदें भी टूट गई हैं वे अब अकेले घंटों कोहिनूर की उन यादों से बातें करते, जैसे वह पत्थर उनके सामने खड़ा हो वे दीवारों पर अपनी उंगलियों से कोहिनूर का वही आकार उकेरते जो उन्होंने बचपन में देखा था दलीप ने अपने बच्चों और परिवार को भी खो दिया था, वे अब पूरी तरह से इतिहास के एक लावारिस पन्ने बन चुके थे पेरिस की जगमगाती रोशनी में दलीप सिंह एक ऐसा अंधेरा कोना थे जिसे दुनिया भूल चुकी थी
अंतिम सांस और कोहिनूर का विलाप
22 अक्टूबर 1893 की वह सर्द रात, जब पेरिस के उस छोटे से कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि मौत की आहट साफ सुनी जा सकती थी दलीप सिंह बिस्तर पर लेटे थे, उनकी साँसें भारी थीं और आँखों के सामने लाहौर का वह तोशाखाना घूम रहा था मरने से ठीक पहले उनके होंठों ने आखिरी शब्द कहे— "मेरा कोहिनूर... मेरी माँ... मेरा पंजाब"
कहते हैं कि ठीक उसी पल, हजारों मील दूर लंदन टावर के भीतर रखे कोहिनूर की चमक अचानक मद्धम पड़ गई जैसे उस पत्थर ने अपने आखिरी और सबसे सच्चे मालिक की रूह को शरीर छोड़ते हुए देख लिया हो दलीप सिंह का निधन एक गुमनाम मौत थी, पर वह एक साम्राज्य के खिलाफ सबसे बड़ा नैतिक विद्रोह था अंग्रेजों ने उनकी लाश को वापस पंजाब नहीं जाने दिया उन्हें इंग्लैंड के 'एल्वेडेन' में एक ईसाई कब्रगाह में दफना दिया गया कोहिनूर अब पूरी तरह से लावारिस हो चुका था, उसका कोई भी असली वारिस अब इस दुनिया में नहीं बचा था पर दलीप की मौत ने उस पत्थर के चारों ओर एक ऐसी रूहानी दीवार खड़ी कर दी कि अंग्रेज उसे कभी चैन से नहीं पहन पाए इतिहास का एक अध्याय खत्म हुआ, पर कोहिनूर की आँखों में अब प्रतिशोध की एक नई चमक जागी थी