कोहिनूर: रोशनी के पहाड़ की अदृश्य सिसकियाँ और सदियों का प्रतिशोध - 4-5 sodha iqbal kasam द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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कोहिनूर: रोशनी के पहाड़ की अदृश्य सिसकियाँ और सदियों का प्रतिशोध - 4-5

शेर के बाद का सन्नाटा
27 जून 1839 की वह मनहूस शाम थी जब लाहौर के आसमान पर लालिमा नहीं, बल्कि शोक की काली घटा छाई थी पंजाब के शेर, महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी आखिरी सांस ली और इसके साथ ही खालसा राज की दीवारें दरकने लगीं महाराजा की आखिरी इच्छा थी कि कोहिनूर को जगन्नाथ पुरी के मंदिर में दान कर दिया जाए, ताकि वह भारत की पवित्र मिट्टी में रहे पर दरबारियों के स्वार्थ और अंग्रेजों की गुप्त साजिशों ने उस महान आत्मा की अंतिम पुकार को अनसुना कर दिया जैसे ही महाराजा की चिता की आग ठंडी हुई, लाहौर के महलों में षड्यंत्रों का धुआं उठने लगा
हर वजीर और हर सेनापति अब कोहिनूर को अपनी मुट्ठी में कैद कर सत्ता का मालिक बनना चाहता था अंग्रेजों के जासूसों ने लॉर्ड डलहौजी को खबर भेजी कि "शिकारी मर चुका है, अब पिंजरा तोड़ने का वक्त आ गया है" सिख सेना (खालसा) जो कभी अपराजेय थी, अब आपसी गद्दारी और नेतृत्व की कमी के कारण कमजोर होने लगी थी कोहिनूर को तोशाखाने के सबसे गहरे संदूक में बंद कर दिया गया, जैसे वह भी अपने रक्षक की मौत पर मातम मना रहा हो
महाराजा के उत्तराधिकारियों की एक-एक कर रहस्यमय तरीके से हत्याएं होने लगीं, और खून का सिलसिला शुरू हुआ खड़ग सिंह को जहर दिया गया, नौनिहाल सिंह पर पत्थर का दरवाजा गिरा दिया गया; मौत नाच रही थी कोहिनूर की चमक अब किसी जीत का जश्न नहीं, बल्कि महलों में होने वाले कत्ल की गवाह बन गई थी पूरा पंजाब अनाथ महसूस कर रहा था, और सतलुज के उस पार अंग्रेजों की तोपें अपना मुंह खोल चुकी थीं ब्रिटिश हुकूमत जानती थी कि कोहिनूर तक पहुँचने का रास्ता केवल खून और धोखे से होकर गुजरता है अब तख्त पर बैठने की बारी उस मासूम की थी, जिसकी उम्र अभी खिलौनों से खेलने की थी, तलवार उठाने की नहीं
महारानी जिंदां और मासूम दलीप
लाहौर के तख्त पर अब पांच साल का नन्हा दलीप सिंह बैठा था, जिसकी आंखों में दुनिया का कोई खौफ नहीं था उसकी मां, महारानी जिंदां, एक शेरनी की तरह अपने बेटे और कोहिनूर की हिफाजत के लिए दीवारों से टकरा रही थी जिंदां जानती थी कि महल के अंदर के गद्दार अंग्रेजों की गोद में जाकर बैठ चुके हैं और पंजाब का सौदा हो चुका है वह अक्सर दलीप को अपनी गोद में लेकर कोहिनूर की कहानियाँ सुनाती, उसे बताती कि यह पत्थर उसके पिता की रूह है
पर फिरंगी अफसर हेनरी लॉरेंस ने महलों की रसद काट दी और महारानी को अपने ही बेटे से जुदा करने की साजिश रची दलीप सिंह को कोहिनूर की चमक अच्छी लगती थी, वह उसे सूरज का एक टुकड़ा समझता था जो उसके बाजू पर बंधता था पर वह बच्चा यह नहीं समझ पा रहा था कि वही चमक उसकी बर्बादी और देश की गुलामी का सबसे बड़ा कारण बनने वाली है महारानी को कैद कर लिया गया और नन्हे राजा के इर्द-घिर्द अंग्रेजों ने अपने चाटुकारों का घेरा सख्त कर दिया
लाहौर के दरबार में अब 'वाहेगुरु जी का खालसा' की जगह अंग्रेजों की फाइलों और संधियों का शोर होने लगा था अंग्रेजों ने दलीप सिंह के बचपन को कुचलना शुरू किया ताकि वह अपनी विरासत और अपने धर्म को भूल जाए कोहिनूर अब तोशाखाने में धूल फांक रहा था, क्योंकि उसे पहनने वाला असली शेर अब मिट्टी में सो चुका था जिंदां ने जेल की सलाखों से चिल्लाकर कहा था कि "अंग्रेज मेरा हीरा छीन सकते हैं, पर पंजाब का गौरव नहीं" पर गद्दारी की जड़ें इतनी गहरी थीं कि पंजाब की बहादुरी भी अब उस तूफान को रोकने में नाकाम साबित हो रही थी लॉर्ड डलहौजी ने अब अपनी सबसे क्रूर योजना तैयार कर ली थी, जिसका नाम था 'डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स' कोहिनूर की विदाई का वक्त करीब था, और भारत की मिट्टी का एक और बेशकीमती कतरा छिनने वाला था
चिलियांवाला की आग और विश्वासघात
1848 में जब पंजाब का सब्र टूटा, तो एंग्लो-सिख युद्ध की ज्वाला पूरे उत्तर भारत में फैल गई चिलियांवाला के मैदान में सिख योद्धाओं ने अंग्रेजों को ऐसी धूल चटाई कि लंदन के पार्लियामेंट में सन्नाटा पसर गया सिख वीरों ने अपनी जान की बाजी लगा दी, वे कोहिनूर और अपनी मिट्टी की लाज बचाने के लिए भूखे पेट लड़े पर युद्ध के मैदान में जो अंग्रेज नहीं कर पाए, वह महलों में बैठे 'लाल सिंह' और 'तेजा सिंह' जैसे गद्दारों ने कर दिया उन्होंने ऐन वक्त पर रसद रोक दी और सेना को गलत आदेश देकर जीत को हार में बदल दिया
गुजरात की लड़ाई के बाद पंजाब की किस्मत का फैसला हो गया, और खालसा फौज की तलवारें जमीन पर गिर गईं बुजुर्ग सिपाही अपनी दाढ़ी के बाल नोचकर रो रहे थे क्योंकि उन्होंने अपनी मां, पंजाब को बिकते देखा था अंग्रेजों ने लाहौर के किले पर अपना 'यूनियन जैक' फहरा दिया और सीधे तोशाखाने की ओर दौड़े लॉर्ड डलहौजी का सपना पूरा होने वाला था; वह हीरा जो नादिर शाह और अब्दाली ने लूटा था, अब इंग्लैंड जाने वाला था उसने आदेश दिया कि दलीप सिंह को एक कमरे में बंद कर दिया जाए और उसे किसी से मिलने न दिया जाए
कोहिनूर को एक मामूली पत्थर की तरह एक छोटे से लोहे के डिब्बे में डालकर डलहौजी ने अपनी जेब में रख लिया कहते हैं कि उस दिन लाहौर की गलियों में एक भी चूल्हा नहीं जला, हर आंख में आंसू और दिल में नफरत थी अंग्रेजों ने जीत का जश्न मनाया, पर यह जीत बहादुरी की नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े धोखे की थी कोहिनूर अब भारत की सीमाओं के भीतर अपनी आखिरी रातें गुजार रहा था, एक कैदी की तरह दलीप सिंह के सामने अब एक ऐसा कागज रखा जाने वाला था जो उसे राजा से भिखारी बनाने वाला था
ट्रीटी ऑफ लाहौर: एक मासूम के आंसू
29 मार्च 1849 का वह काला दिन, जब लाहौर के दरबार में इतिहास की सबसे दर्दनाक संधि पर हस्ताक्षर हुए नन्हे दलीप सिंह को ऊंचे सिंहासन पर बिठाया गया, पर उसके सामने सेना नहीं, बल्कि बंदूकों के साथ अंग्रेज खड़े थे लॉर्ड डलहौजी ने एक दस्तावेज सामने रखा जिसमें लिखा था कि पंजाब अब ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा है और सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि 'कोह-इ-नूर' हीरा इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को भेंट किया जाएगा
दस साल का दलीप, जिसने अभी ठीक से दुनिया नहीं देखी थी, उसे मजबूर किया गया कि वह अपनी विरासत पर दस्तखत करे कांपते हाथों से उस बच्चे ने कलम उठाई, और जैसे ही स्याही कागज पर फैली, पंजाब की आजादी का अंत हो गया दलीप की आंखों से एक आंसू टपका, जो शायद कोहिनूर की चमक से भी ज्यादा कीमती और दर्दनाक था डलहौजी ने बिना किसी शर्म के उस हीरे को दलीप के हाथ से छीनकर अपने पास रख लिया
उसने इसे 'भेंट' का नाम दिया, जबकि यह सरेआम की गई डकैती थी जो एक बेबस बच्चे के साथ हुई थी कोहिनूर ने अपने पूरे सफर में कई कत्ल देखे थे, पर एक बच्चे के बचपन की ऐसी हत्या उसने पहली बार देखी अंग्रेज अफसरों ने उस हीरे की चमक को परखा और उसे लंदन भेजने के लिए विशेष सुरक्षा का इंतजाम किया दलीप सिंह को ईसाई धर्म अपनाने और इंग्लैंड जाने के लिए मजबूर किया गया, ताकि वह कभी वापस न लौट सके हीरा अब एक जहाज, 'एच.एम.एस. मीडिया' पर लदने वाला था, जो सात समंदर पार की यात्रा पर निकलने वाला था भारत की धरती का वह अंश, जिसे करोड़ों लोगों ने अपनी जान देकर बचाया था, अब पराया होने जा रहा था महारानी जिंदां को देश से निकाल दिया गया, और वह अपनी बेबसी पर खून के आंसू रोती रही
बम्बई का तट और आखिरी विदाई
6 अप्रैल 1850 की वह काली सुबह, जब बम्बई के बंदरगाह पर सन्नाटा किसी गहरे मातम जैसा था कोहिनूर को एक लोहे के भारी संदूक में मखमल के बिस्तर पर लिटाया गया था, जैसे कोई शव हो लॉर्ड डलहौजी ने खुद उस संदूक पर अपनी मुहर लगाई, मानो वह भारत की किस्मत को सील कर रहा हो कैप्टन लॉरियर और उनके हथियारबंद सिपाही जहाज 'एच.एम.एस. मीडिया' के चारों ओर घेरा बनाकर खड़े थे
जहाज के लंगर जैसे ही पानी से ऊपर उठे, तट पर खड़ी भीड़ की आंखों में नमी और दिल में गुस्सा था कोहिनूर की चमक उस लोहे की दीवारों के पीछे कैद थी, पर उसकी रूह भारत की मिट्टी को पुकार रही थी जैसे-जैसे किनारा दूर होता गया, लहरों का शोर बढ़ता गया और आसमान का रंग अचानक बदलने लगा हिंद महासागर की लहरें उस दिन किसी खूंखार जानवर की तरह जहाज से टकराने लगीं, जैसे वे रास्ता रोकना चाहती हों
चालक दल के मन में डर था कि यह पत्थर अपने साथ कोई बहुत पुराना और भयानक श्राप लेकर आया है जहाज के अंदर कैद वह हीरा अपनी शीतलता छोड़ चुका था, और संदूक के भीतर से अजीब सी आवाजें आ रही थीं सैनिकों ने कानाफूसी शुरू कर दी कि यह जहाज शायद कभी लंदन के किनारे को नहीं देख पाएगा डलहौजी के वफादार अफसर रात भर जागकर उस संदूक की रखवाली करते, पर उन्हें चैन की नींद नहीं आती थी उन्हें लगता था कि अंधेरे में कोई साया कोहिनूर के पास खड़ा होकर उसे वापस मांग रहा है भारत की सरहदें अब ओझल हो चुकी थीं, और कोहिनूर एक अंतहीन अंधेरे सफर पर निकल पड़ा था पर नियति ने अभी समुद्र के बीच में मौत का एक खौफनाक मंजर तैयार कर रखा था
एच.एम.एस. मीडिया पर हैजे का कहर
जहाज अभी मॉरीशस के करीब पहुँचा ही था कि एक अनजानी बीमारी ने सिपाहियों को जकड़ना शुरू कर दिया एक-एक करके तंदुरुस्त नाविक खून की उल्टियां करने लगे और जहाज पर मौत का सन्नाटा पसर गया जहाज के डॉक्टर को समझ नहीं आ रहा था कि यह हैजा है या उस पत्थर का कोई रूहानी प्रहार लोग सिसक रहे थे और कप्तान को डर था कि अगर जहाज को बंदरगाह पर रोका गया, तो लोग बगावत कर देंगे
कोहिनूर का वह संदूक अब एक मनहूस साया बन चुका था, जिससे हर कोई दूर भागना चाहता था जो सिपाही कल तक हीरे की सुरक्षा पर गर्व कर रहे थे, आज वे उसे समुद्र में फेंकने की बातें करने लगे लाशों को बिना किसी कफन के समुद्र में बहाया जाने लगा, और शार्क मछलियां जहाज का पीछा करने लगीं हवाओं की दिशा बदल गई थी और जहाज कई दिनों तक एक ही जगह फंसा रहा, मानो समुद्र ने उसे जकड़ लिया हो बीमारों की चीखें आधी रात को कोहिनूर के संदूक से टकराकर वापस लौटती थीं, जो बेहद डरावनी थीं
कैप्टन ने सख्त आदेश दिया कि कोई भी उस संदूक के पास नहीं जाएगा, पर डर की कोई सीमा नहीं थी जहाज पर रसद खत्म होने लगी थी और पीने का पानी अब सड़ने लगा था, पर हीरा अंदर सुरक्षित था उसकी चमक अब उन मरते हुए लोगों की आंखों में आखिरी रोशनी की तरह कौंध रही थी अंग्रेजों का घमंड अब समुद्र की उन लहरों के सामने पूरी तरह टूटकर बिखर चुका था पर तभी एक ऐसी लहर उठी जिसने जहाज को लगभग पलटने के कगार पर खड़ा कर दिया जहाज का मस्तूल टूट गया और कोहिनूर अब मौत के सबसे करीब वाले खेल का हिस्सा बन गया था
तूफान का तांडव और कुदरत की चेतावनी
आसमान बिजली की कड़वाहट से फट पड़ा और समुद्र ने अपनी पूरी ताकत जहाज पर झोंक दी लहरें पहाड़ जितनी ऊंची थीं और 'एच.एम.एस. मीडिया' किसी तिनके की तरह पानी पर नाच रहा था कप्तान ने अपनी डायरी में लिखा कि आज हम शायद इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे, पर कोहिनूर नहीं बचेगा संदूक फर्श पर इधर-उधर लुढ़क रहा था, जैसे हीरा खुद उस लोहे की कैद को तोड़ना चाहता हो
सिपाहियों ने घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना शुरू कर दी, पर प्रकृति का कोप शांत नहीं हो रहा था तभी एक विशाल लहर जहाज के डेक पर आई और कई वफादार संतरी पानी में बह गए ऐसा लग रहा था कि समुद्र कोहिनूर की बलि मांग रहा है ताकि वह उसे वापस अपनी गहराई में ले जा सके जहाज के पाल फट चुके थे और इंजन ने भी साथ छोड़ दिया था, अब सब कुछ खुदा के भरोसे था पूरे बारह घंटों तक मौत का यह नाच चलता रहा, और कोहिनूर की चमक संदूक की दरारों से बाहर आ रही थी
कहते हैं कि उस रात नाविकों ने पानी के ऊपर एक चमकता हुआ अक्स देखा जो जहाज को बचाने की कोशिश कर रहा था क्या वह महाराजा रणजीत सिंह की रूह थी या भारत के उन पूर्वजों का आशीर्वाद जो हीरे को बचाना चाहते थे? धीरे-धीरे तूफान शांत हुआ, पर जहाज एक खंडहर बन चुका था जो अब केवल तैर रहा था बचे हुए लोग अधमरे हो चुके थे, पर वे इस बात से हैरान थे कि हीरा अब भी उनके पास है पर यह शांति केवल अगले तूफान से पहले की खामोशी थी, क्योंकि लंदन की धरती अभी बहुत दूर थी कोहिनूर ने अपनी पहली बड़ी परीक्षा ले ली थी, और अब वह इंग्लैंड की ठंडी हवाओं की ओर बढ़ रहा था
पोर्ट्समाउथ की जमीन और सफेद साये
30 जून 1850 को, जब जहाज पोर्ट्समाउथ के तट पर लगा, तो कोहिनूर को ले जाने वाले अधिकारी कांप रहे थे वह हीरा अब केवल एक रत्न नहीं था, वह उन दर्जनों मौतों का गवाह था जो रास्ते में हुई थीं लंदन की धुंध भरी सुबह में कोहिनूर को एक विशेष ट्रेन से विक्टोरिया स्टेशन ले जाया गया पूरे रास्ते भारी घुड़सवार सेना तैनात थी, जैसे किसी बड़े अपराधी को पेशी पर ले जाया जा रहा हो लंदन के लोग सड़कों पर खड़े थे, पर उनकी आंखों में वह सम्मान नहीं था जो भारत में इस हीरे के लिए था
कोहिनूर को पहली बार बकिंघम पैलेस के भीतर लाया गया, जहाँ की दीवारें सोने से मढ़ी थीं पर हीरे की चमक के सामने वे दीवारें भी फीकी और बेजान लग रही थीं, जैसे उनमें कोई रूह न हो महारानी विक्टोरिया के सामने जब वह संदूक खुला, तो कमरे का तापमान अचानक कई डिग्री गिर गया रानी ने उस पत्थर को देखा जो अभी अपनी कच्ची और बेतरतीब 'मुगल कट' शक्ल में था उन्हें उम्मीद थी कि वह किसी जलती हुई मोमबत्ती जैसा होगा, पर वह तो एक शांत बर्फ के टुकड़े जैसा था
डचेस ऑफ वेलिंगटन ने हीरे को छूने की कोशिश की, पर उनके हाथ कांप गए और उन्होंने हाथ पीछे खींच लिया पूरे महल में यह खबर फैल गई कि भारत का 'शापित पत्थर' आखिरकार लंदन पहुँच गया है लंदन के अखबारों ने इसे "अजीब और डरावना" करार दिया, जिससे रानी की चिंता बढ़ने लगी कोहिनूर अब अपनी मिट्टी से हजारों मील दूर, एक पराई भाषा और पराए मजहब के बीच खड़ा था उसे सजाने की तैयारी शुरू हुई, पर कोहिनूर ने अपनी पहली रात लंदन में एक भारी सन्नाटे के साथ बिताई
रानी का दरबार और दलीप सिंह की याद
महारानी विक्टोरिया ने फैसला किया कि इस हीरे को आधिकारिक रूप से 'ब्रिटिश क्राउन' का हिस्सा बनाया जाएगा पर उनके मन के किसी कोने में उस मासूम बच्चे दलीप सिंह की तस्वीर बार-बार कौंध रही थी उन्होंने आदेश दिया कि दलीप सिंह को भी इंग्लैंड लाया जाए, ताकि कोहिनूर का 'उपहार' कानूनी रूप से पक्का हो सके लंदन के अभिजात वर्ग ने कोहिनूर को एक 'युद्ध की लूट' के रूप में देखना शुरू किया, जो उनके साम्राज्य का गौरव था
प्रिंस अल्बर्ट ने हीरे की चमक बढ़ाने के लिए उसे रोशनी के विशेष एंगल्स पर रखने की योजना बनाई पर हीरा जैसे जिद पर अड़ा था, वह लंदन की कृत्रिम रोशनी में अपनी असल खूबसूरती नहीं दिखा रहा था रानी को सलाह दी गई कि वे इसे सार्वजनिक रूप से पहनें, पर ज्योतिषियों ने उन्हें चेतावनी दी उसी दौरान खबर आई कि पंजाब में अब भी विद्रोह की चिंगारियां सुलग रही हैं, जो हीरे की जुदाई से जुड़ी थीं
कोहिनूर अब बकिंघम पैलेस की एक मेज पर रखा था, और उसकी गहराई में भारत का नक्शा धुंधला पड़ रहा था दलीप सिंह के आने का इंतजार हो रहा था, जो अपनी ही अमानत को रानी को सौंपने का नाटक करने वाला था इतिहास की यह सबसे बड़ी विडंबना थी कि एक राजा को उसके अपने ही हीरे के सामने झुकना था कोहिनूर ने महलों के उन सफेद पर्दों और कड़क मिजाज अफसरों को देखा और उसे अपनी गोलकुंडा की गर्मी याद आई वह अब एक कैदी था, जिसके चारों तरफ संगीनों का पहरा था और रूह पर गुलामी की जंजीरें क्या लंदन की यह चकाचौंध उसे कभी अपना पाएगी, या वह यहाँ भी विनाश की कहानी दोहराएगा? कहानी अब उस मोड़ पर थी जहाँ एक राष्ट्र का स्वाभिमान एक पत्थर के रूप में नीलाम हो रहा था




ब्लैक प्रिंस का लंदन आगमन
1854 की एक धुंधली सुबह, पोर्ट्समाउथ के बंदरगाह पर एक और जहाज लगा, जिससे नन्हा दलीप सिंह उतरा वह अब 'महाराजा' नहीं था, बल्कि अंग्रेजों का एक 'ब्लैक प्रिंस' था जिसे अपनी ही पहचान से दूर किया गया था लंदन की ठंडी हवाओं ने जब दलीप के चेहरे को छुआ, तो उसे लाहौर की वह सुनहरी धूप याद आई जो अब छीन चुकी थी उसे सीधे बकिंघम पैलेस ले जाया गया, जहाँ महारानी विक्टोरिया उसका बेसब्री से इंतजार कर रही थीं
दलीप ने सफेद रेशमी कपड़े पहने थे, पर उसके दिल पर गुलामी का वह काला साया था जो कोहिनूर की विदाई से शुरू हुआ था रानी ने उसे देखते ही अपने गले से लगा लिया, जैसे वह कोई जीता हुआ खिलौना हो जिसे अब सहेज कर रखना था दलीप की आंखों में एक अजीब सा सूनापन था, वह उस महल की भव्यता में अपना खोया हुआ तोशाखाना ढूंढ रहा था उसे बताया गया कि उसका सबसे प्यारा हीरा, कोहिनूर, अब इसी महल की दीवारों के पीछे सुरक्षित है
दलीप ने चाहा कि वह एक बार उसे देख सके, पर अंग्रेजों ने उसे अभी दूर रखने का फैसला किया था उसे ईसाई धर्म की शिक्षा दी जा रही थी, ताकि वह अपने खालसा होने के गर्व को पूरी तरह भुला दे महल के बगीचों में दलीप अकेला घूमता और सोचता कि क्या वह पत्थर भी उसकी तरह ही यहाँ अकेला महसूस करता होगा? रानी उसे पेंटिंग्स बनाना सिखा रही थीं, पर दलीप की हर तस्वीर में पंजाब के उजड़े हुए किले उभर कर आते थे इतिहास की यह सबसे मार्मिक तस्वीर थी—एक लूटा हुआ राजा और उसका लूटा हुआ हीरा, एक ही छत के नीचे पर मीलों दूर लंदन का समाज इस 'विदेशी राजकुमार' को देखने के लिए पागल था, पर कोई उसके भीतर के दर्द को नहीं पढ़ सका
क्रिस्तल पैलेस की तैयारी
1851 की 'ग्रेट एग्जीबिशन' के लिए लंदन के हाइड पार्क में एक विशाल काँच का महल, 'क्रिस्तल पैलेस' खड़ा किया गया लॉर्ड डलहौजी और प्रिंस अल्बर्ट के बीच गुप्त पत्राचार चल रहा था कि कोहिनूर को दुनिया के सामने कैसे पेश किया जाए प्रिंस अल्बर्ट चाहते थे कि यह हीरा ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्चता का सबसे बड़ा विज्ञापन बने कोहिनूर को रखने के लिए एक विशेष तिजोरीनुमा पिंजरा बनाया गया, जिसमें रात-दिन रोशनी की व्यवस्था की गई
हजारों कारीगर दिन-रात उस काँच के महल को सजा रहे थे, पर कोहिनूर अभी बकिंघम पैलेस की तिजोरी में बंद था वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि हीरे के नीचे एक घूमने वाला स्टैंड लगाया जाए ताकि वह हर तरफ से चमके पर जौहरी डरे हुए थे; उन्हें पता था कि कोहिनूर अपनी 'मुगल कटिंग' की वजह से वैसे नहीं चमकता जैसे यूरोपीय हीरे लंदन के अखबारों में लेख छपने लगे कि "भारत का सूरज अब लंदन के काँच के नीचे कैद होने वाला है"
सुरक्षा का ऐसा घेरा तैयार किया गया कि एक परिंदा भी बिना इजाजत उस पिंजरे की ओर पर न मार सके कोहिनूर के चारों ओर लाल मखमल का पर्दा लगाया गया, जो किसी वेदी की तरह लग रहा था रानी विक्टोरिया ने खुद जाकर तैयारियों का मुआयना किया, उन्हें लगा कि यह उनके शासन का सबसे महान दिन होगा पर कोहिनूर की रूह जैसे उस काँच के महल के भीतर घुट रही थी, उसे खुली हवा और अपनी मिट्टी की याद आ रही थी पूरी दुनिया से राजा-महाराजा और अमीर लोग लंदन पहुँच रहे थे, सिर्फ उस एक पत्थर की चमक देखने के लिए तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, पर नियति ने पहले ही दिन के लिए एक भयानक सन्नाटा लिख रखा था
पिंजरे की सुरक्षा और खौफ
एग्जीबिशन के उद्घाटन से एक रात पहले, कोहिनूर को एक कड़े सुरक्षा घेरे में क्रिस्तल पैलेस पहुँचाया गया छह हथियारबंद सिपाही हर वक्त उस लोहे के पिंजरे के चारों ओर संगीनें ताने खड़े रहते थे पिंजरे के भीतर एक ऐसा तंत्र लगाया गया था कि अगर कोई उसे छूने की कोशिश करे, तो वह फौरन जमीन के नीचे धंस जाए लंदन की पुलिस, 'स्कॉटलैंड यार्ड', के सबसे बेहतरीन जासूस सादे कपड़ों में भीड़ के बीच तैनात किए गए थे
कोहिनूर को एक ऊंची वेदी पर रखा गया, जहाँ से वह पूरे काँच के महल की निगरानी कर सके पर उस मखमली गद्दी पर रखा वह पत्थर किसी गहने जैसा नहीं, बल्कि किसी युद्धबंदी जैसा लग रहा था प्रिंस अल्बर्ट ने खुद लैंप्स की दिशा तय की ताकि कोहिनूर की हर सतह पर रोशनी पड़े पर हीरा जैसे उस कृत्रिम रोशनी को सोख रहा था, वह अपनी चमक को बाहर नहीं निकलने दे रहा था
पहरेदारों ने बताया कि रात के अंधेरे में पिंजरे के भीतर से अजीब सी गुनगुनाहट सुनाई देती थी जैसे वह पत्थर उन लोगों को शाप दे रहा हो जिन्होंने उसे जबरदस्ती यहाँ लाकर तमाशा बना दिया था पूरे लंदन में यह बात फैल गई कि कोहिनूर को देखना खतरे से खाली नहीं है, फिर भी भीड़ बेकाबू थी टिकटों की मारामारी थी और लोग अपनी जान जोखिम में डालकर भी उस 'शापित रोशनी' को देखना चाहते थे वह पिंजरा ब्रिटिश साम्राज्य के लालच और लूट का सबसे बड़ा स्मारक बन चुका था सुबह की पहली किरण का इंतजार था, जब दुनिया पहली बार मुगलों और सिखों की उस रूह को देखने वाली थी
पहले दिन की निराशा और सन्नाटा
1 मई 1851 को जब क्रिस्तल पैलेस के दरवाजे खुले, तो हजारों की भीड़ सीधे कोहिनूर की ओर दौड़ी लोग अपनी गर्दनें ऊंची कर-कर के उस पिंजरे के भीतर झांक रहे थे, पर वहां पहुँचते ही सन्नाटा छा जाता उम्मीद थी कि हीरा किसी जलते हुए सूरज की तरह होगा, पर वह तो एक बड़े और धुंधले कंचे जैसा लग रहा था यूरोपीय लोग, जिन्हें तराशे हुए और चकाचौंध वाले हीरों की आदत थी, कोहिनूर की सादगी को समझ नहीं पाए
भीड़ में फुसफुसाहट होने लगी— "क्या यही वह महान हीरा है जिसके लिए भारत में खून की नदियाँ बहीं?" अखबारों के रिपोर्टर व्यंग्य से लिख रहे थे कि "डलहौजी ने हमें कांच का टुकड़ा लाकर थमा दिया है" कोहिनूर अपनी 'मुगल कट' में अपनी गहराई और पवित्रता छिपाए बैठा था, वह तमाशा बनने को तैयार नहीं था रानी विक्टोरिया को जब इस ठंडी प्रतिक्रिया का पता चला, तो वे बेहद आहत और शर्मिंदा हुईं
प्रिंस अल्बर्ट ने कोशिश की कि गैस के लैंप्स जलाकर उसकी चमक बढ़ाई जाए, पर सब बेकार था भारतीय जौहरी जानते थे कि कोहिनूर की चमक रूहानी होती है, वह भौतिक रोशनी की मोहताज नहीं है पर लंदन की भीड़ को तो केवल चमक चाहिए थी, उन्हें उस पत्थर के पीछे का खूनी इतिहास नहीं दिख रहा था पहले ही हफ्ते में कोहिनूर को लेकर लोगों का आकर्षण कम होने लगा और आलोचनाएं बढ़ने लगीं यह ब्रिटिश राजघराने के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और प्रतिष्ठा की हार जैसी स्थिति बन गई थी कोहिनूर जैसे उन अंग्रेजों का मजाक उड़ा रहा था, उनकी हर कोशिश को नाकाम कर रहा था इसी असफलता और गुस्से के बीच वह भयानक विचार पैदा हुआ जिसने कोहिनूर की देह को काट दिया
कसाई की मेज पर कोहिनूर
प्रिंस अल्बर्ट और ब्रिटिश जौहरियों की एक गुप्त सभा बकिंघम पैलेस के एक एकांत कमरे में हुई वहां तय किया गया कि कोहिनूर को 'सुधारना' होगा, उसे यूरोपीय स्वाद के अनुसार 'काटना' होगा यह खबर जब लीक हुई, तो भारत के पुराने इतिहास को जानने वाले कुछ लोगों ने चेतावनी दी उन्होंने कहा कि "कोहिनूर की देह पर चोट करना कुदरत के साथ खिलवाड़ करना है, यह विनाश लाएगा" पर अंग्रेजों का अहंकार अब सातवें आसमान पर था; उन्होंने एम्सटर्डम से वूर्सेंजर भाइयों को बुलवाया
वे दुनिया के सबसे बेरहम और माहिर हीरा तराशने वाले थे, जिन्हें 'हीरों का कसाई' कहा जाता था पैलेस के भीतर एक विशेष वर्कशॉप बनाई गई और एक भारी स्टीम इंजन वाली मशीन स्थापित की गई कोहिनूर को उस मशीन के नीचे रखा गया, जैसे किसी अपराधी को फांसी के तख्ते पर चढ़ाया जाता है हीरे के साथ उसकी पहचान, उसका वजन और उसका प्राचीन गौरव अब खतरे में था
1852 की वह सुबह जब मशीन का शोर शुरू हुआ, तो कोहिनूर की सतह से उसकी पुरानी कहानियाँ छिलने लगीं करीब 38 दिनों तक वह पत्थर उस मशीन की मार झेलता रहा, और उसका वजन आधा रह गया हर कट के साथ कोहिनूर की रूह जैसे कराह रही थी, वह छोटा होता जा रहा था पर चमकदार बनाया जा रहा था जब काम खत्म हुआ, तो वह 186 कैरेट का विशाल पत्थर केवल 105 कैरेट का एक आधुनिक रत्न बन गया था वह चमक तो रहा था, पर उसकी वह 'मुगलिया रूह' और 'खालसा गौरव' उस मशीन की धूल में मिल चुके थे
नई चमक और पुराना शोक
जब एम्सटर्डम के कारीगरों ने मशीन रोकी, तो वर्कशॉप के भीतर एक अजीब सा सन्नाटा छा गया कोहिनूर अब वह नहीं रहा था जो सदियों से हिंदुस्तान की आन, बान और शान हुआ करता था वह अब आधा रह चुका था, एक छोटा और चमकदार पत्थर जो किसी यूरोपीय गहने जैसा लग रहा था प्रिंस अल्बर्ट ने जब उसे अपनी हथेली पर लिया, तो उनके चेहरे पर एक अहंकारी मुस्कान थी उन्हें लगा कि उन्होंने प्रकृति की एक 'गलती' को सुधार दिया है और उसे आधुनिक बना दिया है
पर वहां मौजूद पुराने जौहरी देख रहे थे कि उस पत्थर की गहराई और उसका वह प्राचीन रहस्य अब खत्म हो चुका था हीरे की जो धूल मशीन की रगड़ से उड़ी थी, वह शायद उन राजाओं की आखिरी राख थी जिन्होंने इसके लिए जान दी थी रानी विक्टोरिया को जब यह 'नया' कोहिनूर दिखाया गया, तो उनकी आंखें उसकी चकाचौंध से चौंधिया गईं वह अब रोशनी को सैकड़ों टुकड़ों में बिखेर रहा था, पर उसकी वह शीतल चांदनी अब गायब थी
पूरे बकिंघम पैलेस में इस 'सफलता' का जश्न मनाया गया, पर कोहिनूर अपनी नई शक्ल में अनाथ लग रहा था वह अब एक ऐसा कैदी था जिसका चेहरा बदल दिया गया था ताकि वह अपनों को भी पहचान में न आए उस रात महल की तिजोरी में रखे उस पत्थर से एक ऐसी किरण निकली जो दीवारों को चीरती हुई आसमान की ओर गई जैसे वह पत्थर अपनी कटी हुई देह की शिकायत उस खुदा से कर रहा हो जिसने उसे बनाया था लंदन की मीडिया ने इसे "सभ्यता की जीत" कहा, पर भारत की आत्मा के लिए यह एक और बड़ा जख्म था
दलीप की खामोश चीख
एक दोपहर, रानी विक्टोरिया ने दलीप सिंह को अपने पास बुलाया और मेज पर वह तराशा हुआ कोहिनूर रख दिया दलीप सिंह, जो अब पूरी तरह एक अंग्रेज राजकुमार के लिबास में थे, उस पत्थर को देखकर सुन्न रह गए उन्होंने अपनी कांपती उंगलियों से उस रत्न को छुआ, जिसे वे कभी अपने बाजूबंद पर बांधते थे दलीप को याद आया कि लाहौर के तोशाखाने में यह पत्थर एक विशाल अंडे जैसा भारी और गरिमापूर्ण था
अब उनके सामने जो रखा था, वह एक छोटा, नुकीला और बनावटी चमक वाला टुकड़ा था दलीप की आंखों में आंसू भर आए, उन्हें लगा जैसे अंग्रेजों ने केवल पत्थर नहीं, उनके पिता की यादों को भी काट दिया है रानी ने गर्व से पूछा, "क्या अब यह पहले से बेहतर नहीं लग रहा, दलीप?" दलीप कुछ पल के लिए खामोश रहे, उनका दिल चीखकर कहना चाहता था कि "तुमने इसकी रूह निकाल ली है"
पर गुलामी की बेड़ियों ने उनकी जुबान को दबा दिया और उन्होंने बस अपना सिर झुका लिया दलीप ने महसूस किया कि जैसे उनकी अपनी पहचान को भी अंग्रेज इसी तरह धीरे-धीरे काट रहे हैं वह पत्थर अब उनके लिए पराया हो चुका था, क्योंकि उसकी वह देशी महक अब खत्म हो चुकी थी उन्होंने बिना कुछ बोले कोहिनूर को वापस मेज पर रख दिया और कमरे से बाहर निकल गए उस दिन दलीप सिंह को अहसास हुआ कि वे अब कभी उस पुराने गौरव को वापस नहीं पा सकेंगे कोहिनूर की नई चमक दलीप की आंखों में चुभ रही थी, जैसे वह उनकी बेबसी का मजाक उड़ा रही हो
लंदन में दबी हुई आवाजें
कोहिनूर को तराशे जाने की खबर जब लंदन के अखबारों में छपी, तो हर कोई खुश नहीं था कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों और कला प्रेमियों ने इसे "इतिहास की सबसे बड़ी सांस्कृतिक डकैती" करार दिया उन्होंने तर्क दिया कि कोहिनूर की असल कीमत उसकी चमक में नहीं, बल्कि उसके प्राचीन आकार में थी भारत से आए कुछ बुद्धिजीवियों ने, जो उस वक्त लंदन में थे, गुप्त बैठकों में इस पर गहरा दुख जताया
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने भारत की एक ऐसी विरासत को नष्ट कर दिया है जो दोबारा कभी नहीं बन सकती लंदन की गलियों में यह अफवाह फैलने लगी कि हीरा छोटा होने के साथ-साथ और भी ज्यादा शापित हो गया है ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि अब इस पत्थर का गुस्सा ब्रिटिश राजघराने की अगली पीढ़ी पर गिरेगा रानी विक्टोरिया को मिलने वाले गुमनाम पत्रों में चेतावनी दी गई कि वे इस पत्थर को अपने शरीर से दूर रखें
पर रानी के लिए कोहिनूर अब उनकी सबसे प्रिय संपत्ति बन चुका था, जिसे वे दुनिया को दिखाना चाहती थीं जौहरियों ने सुझाव दिया कि इसे अब 'ब्रोच' (कपड़ों पर लगाने वाला गहना) के रूप में ढाला जाए सोने और प्लैटिनम का एक सांचा तैयार किया गया, जिसमें कोहिनूर को जड़ा जाना था हर बार जब सांचे में हीरा फिट किया जाता, तो वह किसी न क्योंकि वजह से ढीला पड़ जाता ऐसा लगता था जैसे कोहिनूर उस सांचे में बैठने से इनकार कर रहा हो, वह गुलामी का हिस्सा नहीं बनना चाहता था पर अंततः, इंसानी जिद ने उस पत्थर को एक तुच्छ गहने के रूप में जकड़ ही लिया
ब्रोच की चमक और शाही अहंकार
आखिरकार, कोहिनूर को रानी विक्टोरिया के लिए एक भव्य 'ब्रोच' के रूप में तैयार कर लिया गया जब रानी ने उसे अपनी छाती के पास लगाया, तो पूरा दरबार उसकी रोशनी से जगमगा उठा यह केवल एक गहना नहीं था, यह इस बात का सबूत था कि अब भारत की पूरी संपत्ति रानी की मुट्ठी में है रानी विक्टोरिया कोहिनूर पहनकर जब सार्वजनिक समारोहों में जातीं, तो दुनिया भर के राजा उनसे ईर्ष्या करते
अखबारों ने लिखा कि "महारानी अब उस सूरज को पहनती हैं जो कभी पूर्व में उगता था" पर उस चमक के पीछे रानी की सेहत और उनके परिवार में छोटी-छोटी परेशानियां शुरू होने लगी थीं प्रिंस अल्बर्ट, जिन्होंने कोहिनूर को तराशने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी, अचानक बीमार रहने लगे महल के नौकरों ने बताया कि जिस कमरे में कोहिनूर रखा जाता था, वहां रात को तापमान अचानक गिर जाता था
रानी को अक्सर सोते समय ऐसा महसूस होता जैसे कोई अदृश्य हाथ उनकी छाती से वह ब्रोच खींच रहा हो कोहिनूर अपनी नई और कटी हुई देह के साथ अंग्रेजों के सुकून को धीरे-धीरे सोख रहा था पर शाही अहंकार इतना बड़ा था कि उन्होंने इन संकेतों को महज वहम कहकर टाल दिया दलीप सिंह अब पूरी तरह से उपेक्षित किए जा रहे थे, क्योंकि उनका काम अब खत्म हो चुका था कोहिनूर ने अपने नए मालिकों को वह सब कुछ दिया जो वे चाहते थे, पर वह भी एक बहुत बड़ी कीमत पर
पहले श्राप की आहट
1861 का वह साल आया जब कोहिनूर के नए रूप का 'अंधेरा' पहली बार खुलकर सामने आया प्रिंस अल्बर्ट, जो रानी विक्टोरिया के जीवन का आधार थे, केवल 42 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गए पूरी सल्तनत सदमे में थी, और रानी विक्टोरिया का दिल हमेशा के लिए टूट गया महल की गलियारों में दबी जुबान में लोग कहने लगे कि यह कोहिनूर को 'काटने' की सजा है
रानी ने शोक में काले कपड़े पहन लिए और वे कई सालों तक जनता के सामने नहीं आईं अजीब बात यह थी कि जब अल्बर्ट की मृत्यु हुई, तो वह कोहिनूर वाला ब्रोच उनके बिस्तर के बहुत करीब रखा था ज्योतिषियों की वह बात सच साबित हो रही थी कि यह पत्थर पुरुषों के लिए काल बनकर आता है रानी विक्टोरिया ने फैसला किया कि अब वे कोहिनूर को कभी किसी पुरुष उत्तराधिकारी को नहीं देंगी
उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा कि यह हीरा केवल और केवल इस देश की रानियां ही पहनेंगी कोहिनूर अब एक विधवा रानी के एकांत का साथी बन गया था, उसकी चमक में अब दुख की मिलावट थी भारत में जब यह खबर पहुँची, तो वहां के लोगों ने इसे "न्याय" माना, क्योंकि अंग्रेजों ने उनके राजा का बचपन छीना था कोहिनूर अब लंदन के उस उदास माहौल में कैद था, जहाँ हर तरफ केवल काला रंग और सन्नाटा था उसने एक साम्राज्य के राजकुमार को खो दिया था, और अब वह अपनी अगली चाल चलने के लिए तैयार था