सपनों की ट्रेन Manjari Shukla द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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सपनों की ट्रेन

मज़ेदार कहानियों की पुस्तक पढ़ते हुए शिवांगी की नज़र चमकती हुई लाल रंग की ट्रेन के चित्र पर ठहर गईI
उसने सोचा-"कितना अच्छा होता अगर मेरे पास अपनी एक ट्रेन होती जो मुझे दूर देश तक ले जाती और खूब मज़े करातीI"
तभी कमरे में गुलाबी रंग का धुआँ भर गया और उस धुएं के बीच सुर्ख लाल रंग की ट्रेन खड़ी चमचमा रही थीI
शिवांगी की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गईI वो कुछ बोल पाती तभी ट्रेन बोली-"छुक छुक...छुक छुक ..."
शिवांगी ने खुद को चिकोटी काटी और चीखी-"अरे, ये तो सपना नहीं है, ट्रेन तो सच में हैI"
ट्रेन ने पूछा-बोली—"क्या तुम मेरे साथ घूमने चलोगी?"
"हाँ...पर तुम तो इतनी छोटी होI" कहते हुए शिवांगी खिलखिलाकर हँस दी
ट्रेन हँसते हुए बोली —"क्या तुम भी गुड़िया की तरह छोटी सी बनना चाहोगीI"
"क्यों नहीं, मेरी बचपन से इच्छा है कि मैं अपनी नीली आँखों वाली गुड़िया की तरह बन जाऊंI"
ट्रेन मुस्कुराई और बोली-"तुम्हें छोटा बनने की जरुरत नहीं है मैं ही बड़ी बन जाती हूँI"
और ट्रेन पल भर में ही इतनी बड़ी बन गई कि उसका इंजन खिड़की के बाहर चला गयाI
शिवांगी हँसते हुए ट्रेन में चढ़ गई।
पहला स्टेशन था– "चॉकलेट की दुनिया"
ट्रेन के रुकते ही शिवांगी ट्रेन से कूद गईI
हर तरफ़ चॉकलेट के पेड़ थे जिन पर रंगबिरंगी टॉफियाँ लटकते हुए हवा में झूल रही थीI हरी, पीली, लाल टॉफ़ी देखकर शिवांगी का मन ललचा गया और उसने झट से कुछ टॉफ़ी तोड़कर अपनी जेब में रख लीI वहाँ पर छोटे-छोटे बिस्किट के घर बने थे जो लड्डुओं थेI
शिवांगी ने ख़ुशी से चीखते हुए ट्रेन से कहा-"अब तुम यहाँ से चली जाओI मैं यहीं पर रहूंगीI"
ट्रेन सब समझ गई और बोली-"ठीक है, पर तुम सामने खेल रहे बच्चों से दोस्ती तो कर लो फिर मैं चली जाउंगीI"
शिवांगी दौड़ते हुए उन बच्चों के पास पहुंची और बोली-"क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे?"
“हाँ! क्यों नहींI" कहते हुए वे बच्चे हँस दिए
शिवांगी की चीख निकल गईI सभी बच्चों के दाँत काले और सड़े हुए थेI"
शिवांगी ने तुरंत अपनी जेब से टॉफ़ियाँ निकाल कर फेंक दी और ट्रेन में चढ़ गईI
मुस्कुराती हुई ट्रेन चल पड़ी-"छुक छुक...छुक छुक
दूसरा स्टेशन था – बोलने वाला जंगल
जंगल में रसीले फलों से लदे हुए हरे भरे पेड़ों को देखकर शिवांगी का मन ख़ुशी से झूम उठाI
तभी एक तोता उसके पास आया और बोला-"अरे इंसान कब से इस जंगल में आने लगे?
शिवांगी हँसते हुए बोली—“जादुई ट्रेन से घूमने आई हूँ!”
तभी एक पेड़ बोला—"कहीं तुम हमें काटने तो नहीं आई हो?"
"हमारे सारे जंगल खत्म करके तुम इंसानों का मन नहीं भरा जो हमें यहाँ भी काटने चली आईI" पीपल के पेड़ ने कहा
शिवांगी का मन भर आयाI उसने धीरे से कहा-"हम बच्चे तो पेड़ों को बहुत प्यार करते हैं पर बड़े आप सबको काट देते हैंI"
"तो तुम उन्हें समझाओ ना कि अगर हम ही नहीं रहेंगे तो वो साँस कैसे लेंगे?" आम का पेड़ बोला
"मैं उन्हें ज़रूर समझाउंगी और अब खूब सारे पेड़ भी लगाउंगीI" शिवांगी ने प्यार से कहा
आम ने ख़ुशी से झूमते हुए ढेर सारे पीले रसभरे आम टपका दिएI
इतना प्यार देखकर शिवांगी की आँखों में आँसूं आ गएI
सबसे विदा लेकर वो वापस जाकर अपनी ट्रेन में बैठ गईI
ट्रेन बोली-"अब क्या और आगे चले?"
"नहीं...अब मैं घर जाकर ये सारे आम खाउंगी और सोऊंगीI मुझे बहुत जोरों से नींद आ रही हैI शिवांगी ने जम्हाई लेते हुए कहा
ट्रेन कुछ बोली पर शिवांगी को सुनाई नहीं दिया क्योंकि वो तो सपनों के देश में जा पहुँची थीI
तभी शिवांगी को माँ की आवाज़ सुनाई दीI वो हड़बड़ाकर उठ बैठीI
माँ ने कहा-"नींद में ट्रेन-ट्रेन क्या कह रही थी, कोई सपना देखा था क्या?"
शिवांगी ने हड़बड़ाकर आस पास देखाI पास ही कहानियों की किताब पड़ी हुई थी जिस पर लाल ट्रेन का चित्र बना था और ट्रेन के ऊपर रखा था एक पीला आमI
शिवांगी मुस्कुरा दीI
तभी मम्मी फिर बोली-"किसी ट्रेन का सपना देखा था क्या?"
"हाँ मम्मी, सपना तो था पर सच्चा वाला सपनाI" कहते हुए शिवांगी मम्मी के गले लग गई और खिलखिलाकर हँस दीI
और देखा तो किसी ने भी नहीं पर लाल ट्रेन भी शिवांगी की ख़ुशी देखकर मुस्कुरा रही थीI