जग्गू - द डिटैक्टिव - 1 Rakesh Kumar Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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जग्गू - द डिटैक्टिव - 1

‘‘हे भगवान इसको भी अभी टूटना था’’ - हाथ से पुराना शिशा गिरने पर जग्गू बड़बड़ाया। टेबल पर रखा शिशा उसके हाथ लगने से नीचे गिरकर चकनाचूर हो गया। ‘‘पता नहीं मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है’’ दुखीः मन से जग्गू ने लम्बी सांस भरी। कानपुर जैसे बड़े शहर में रहने वाले जगरूप सिंह उर्फ जग्गू जी पेशे से एक विख़्यात जासूस है (ऐसा ये समझते हैं, पर जब भी ये कुछ करने जाते हैं अर्थ का अनर्थ हो जाता है)। इनका नाम सुनकर एक तगड़े रौबदार व्यक्त्वि का आभास होता है परन्तु वास्तव में ये हैं उसका ठीक उलट, एक दुबले पतले ककड़ी जैसे शरीर के मालिक। कद तो लम्बा है परन्तु शरीर में मांस का लोथड़ा तक नहीं है। गली के बच्चे भी अक्सर इनका मज़ाक उड़ाते हैं। ये अक्सर अपने पूज्य पिता को कोसते पाए जाते हैं जिन्होंने इनका नाम जगरूप सिंह रख दिया। पिताजी तो चले गये पर इन बेचारों को दूसरों के मजाक का पात्र बनने के लिए छोड़ गये। शहर के एक सभ्य इलाके की गली जहां लगभग खत्म होती है वहीं पर इनका एक पुश्तैनी मकान है जिसके बाहर एक बोर्ड टगां रहता है - ‘‘जग्गू जासूस एण्ड कंपनी’’ और ठीक उसके नीचे छोटे अक्षरों में लिखा है ‘‘हर समस्या का समाधान गारंटी के साथ पर पैसे पहले देने होंगे’’। यह लिखने का महत्वपूर्ण कारण यह है कि अक्सर इनकी मूर्खताओं के कारण लोग बिना पैसे दिये ही चले जाते हैं। पहले ये अपनी शादी को लेकर बड़े उत्साहित रहते थे, अच्छे कपड़े पहनते थे, बालोें को करीने से सवांरते थे पर इनको देखते ही लड़की मना कर देती थी तो इनका दिल टुकड़ो में बिखर जाता था। बार-बार इस तरह के परिणामों से दुखी होकर इन्होंने अब विवाह का इरादा ही त्याग दिया है। अब घर पर ये और इनका एक असिस्टेंट रतन रहता है। वैसे तो रतन जग्गू का असिस्टेंट है परन्तु पैसे की किल्लत होने के कारण घर का काम जैसे खाना बनाना, साफ सफाई इत्यादि भी यही करता है। कपड़े ये दोनों लान्ड्री मे देकर अपनी जान बचा लेते है। रतन भी प्रकृति की बड़ी ही मज़ेदार देन है। गुरू तो गुरू चेला उससे भी दो कदम आगे है। रतन का काम था जग्गू की गलतियों को नोट करना और फिर अगली गलती में उसका साथ देना। दोनों की साझेदारी कुछ ऐसी थी जैसे एक आदमी कुएँ में गिरा हो और दूसरा उसे निकालने की बजाय ऊपर से सलाह दे रहा हो। जब भी कोई केस इनको मिलता है ये दोनों मिलकर उसका ऐसा सत्यानाश करते है कि केस देने वाला अपना सर पकड़ कर रो देता है। ये दोनों मशहूर इसलिए नहीं कि उसने बहुत सारे केस सुलझाए हैं, बल्कि इसलिए कि पूरे शहर में इनके जितने केस बिगड़े थे, उतने किसी और जासूस के नहीं बिगड़े होंगे। उनकी एजेंसी को खुले हुए करीब तीन साल से ज्य़ादा का समय हो चुका है और इन तीन सालों में उन्हें कुल मिलाकर चार केस मिले हैं। पहला केस था एक गाय घर से गायब हो गई थी। जग्गू ने तीन दिन की जासूसी के बाद पता लगाया कि गाय को पड़ोसी ने चुरा कर अपने खेत में छुपा रखा है पर बाद में मालूम हुआ कि गाय खुद ही वहाँ चली गई थी। दूसरा केस था एक महिला की सोने की अंगूठी गायब हो गई थी। जग्गू ने पूरे मोहल्ले से पूछताछ की, तीन लोगों पर शक किया, कई बार लोगो से अपने हाथ-पैर भी तुड़वाए पर बाद में अंगूठी महिला के अपने ही पर्स से मिली। तीसरे केस में किसी का छाता चोरी हुआ तो जग्गू ने छाता चोर पकड़ने के चक्कर में पूरे मोहल्ले में यह अफवाह फैला दी कि शहर में कोई अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय है जो छाते चुरा कर चोरी जैसी घटना को अंजाम देता है। और चैथे केस में... खैर, उस केस के बारे में ना पूछना ही बेहतर है। इसके बाद से लोगों ने जग्गू को केस देना लगभग बंद कर दिया था। सुबह का समय हो रहा था और जग्गू बाहर बरामदे में बैठ कर अख़बार से एक मजे हुए जासूस की भांति ख़बरों का जायजा ले रहा था और रतन रसोई में बाॅस के लिए चाय बना रहा था। चाय को ज्यादा देर होता देख कर जग्गू ने रतन को पुकारा- ‘‘रतन.. ओ रतन, अबे चाय को बना रहा है या बागान में चाय उगा रहा है’’ ‘‘बस दो मिनट और बाॅस’’ - रतन अंदर से बोला। ‘‘ये लो बाॅस अपनी स्पेशल गरमा-गरम चाय’’ - अपना माथे का पसीना पोंछता हुआ रतन बोला। ‘‘चाय तो तु मस्त बनाता है यार’’ - जग्गू चाय की चुस्की लेकर बोला। ‘‘तो बाॅस इस बार मेरी सैलरी बढ़ा दो, इतने मै अब नहीं चलता है, आई-बाबा भी कई बार बोल चुके है। कब तक उनको झूठा दिलासा देता रहुंगा।’’ - थोड़ा रूंसुआ होकर रतन बोला। ‘‘अरे तु चिन्ता मत कर, जैसे ही कोई अच्छा सा केस हाथ लगेगा हम दोनो के दिन फिर जायेंगे।’’ - चाय का कप रखते हुए जग्गू बोला। ‘‘पर बाॅस......’’ रतन ने अभी मुंह खोला ही था की दरवाजे पर एक आहट सुनकर जग्गू ने उसे चुप करा दिया। ‘‘देख कोई क्लाईंट आ रहा है, तु जाकर दरवाजा खोल।’’ - जग्गू बोला। रतन बात सुनकर जोश के साथ दरवाजे की तरफ दौड़ा और उसने दरवाजा खोला। जग्गू तुरन्त ही कुर्सी पर आंख बंद करके बैठ गया और गहरी सोच का दिखावा करने लगा। दरवाजे पर एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था। पहनावे से तो खाते-पीते परिवार का लग रहा था। उसको देखकर रतन बोला- ‘‘जी बोलिए किससे मिलना है‘‘। रतन की बात को लगभग अनसुना करके वो आदमी सीधा अन्दर की ओर आ गया और जग्गू की ओर देखकर बोला- ‘‘आप ही जग्गू जासूस हो’’। ‘‘बैठ जाओ’’ आंखे बंद करे हुए जग्गू ने उसको कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। वो आदमी कुर्सी पर बैठ गया और ध्यान से जग्गू की ओर देखने लगा। ‘‘तुम्हारी परेशानी को मैं समझ गया, तुम्हारी एक बड़ी सुन्दर बीवी है जो तुमसे उम्र मैं काफी छोटी है’’ - अपनी आंखें खोलकर सीधा बैठते हुए जग्गू बोला। वो आदमी कुछ बोलने ही वाला था की उसे चुप रहने का इशारा करके जग्गू फिर बोला। ‘‘तुम्हारी बीवी का तुम्हारे ड्राईवर के साथ चक्कर चल रहा है और वो तुम्हारी सारी जायदाद को अपने नाम करवाकर उसके साथ भागना चाहती है और तुम्हारी जान को ख़तरा है, इसलिए मेरे पास आये हो ना’’ - थोडे़ कुटील अंदाज की जासूसों वाली हंसी में जग्गू बोला। उसकी बात सुनकर वो आदमी माथे की त्यौरी चढ़ाते हुए उठ खड़ा हुआ और जोर से बोला - ‘‘नहीं जी ऐसी कोई बात नहीं है। पता नहीं क्या बकवास कर रहे हो तुम। मेरी बीवी बड़ी शरीफ और घरेलू औरत है। मै तो यहां अपने कुत्ते के लिए आया हूं। मेरा कुत्ता 4 दिन पहले खो गया था। पुलिस के पास गया तो वो ढुढ़ने में ज्यादा समय लगा रहे थे तो सोचा क्यों ना किसी जासूस की मदद लूं। कहीं से तुम्हारा नाम सुना तो चला आया पर तुम तो निरे काठ के उल्लू निकले। तुमसे मेरा काम नहीं हो पायेगा।’’ इतना बोल कर वह दनदनाता हुआ घर से बाहर निकल गया। जग्गू की कुछ समझ नहीं आया कि यह क्या हुआ?। पीछे से रतन अपना सर पीट कर बोला- ‘‘अरे.....बाॅस वैसे ही हमारे पास क्लाईन्ट नहीं आते जो आते है उनको तुम अपनी ये बातें सुनाकर भगा देते हो। किसने कहा था शर्लक होल्मस बनने के लिए, चुपचाप उसकी बात को सुन नहीं सकते थे।’’ रतन की बात सुनकर जग्गू बोला - ‘‘अबे मैने तो अंदाजा लगाया था। साला बुढढा लग रहा था मैनें सोचा बीवी का चक्कर होगा, ज्यादातर अमीर लोग इस उम्र मे जवान औरत से शादी कर लेते है और बाद में यही सब होता है। मुझे क्या पता था ये भाग जायेगा।’’ रतन ने गुस्से से कहा- ‘‘बाॅस ऐसे कुछ ना हो पायेगा। कब तक खाली बैठेंगे। तुम्हारे चक्कर में मुझ भी कोई नौकरी नहीं मिल रही। सबको पता है मैं तुम्हारे साथ काम करता हूं।’’ ‘‘चुप कर, ज्यादा बोल रहा है आजकल। ज्यादा चूूूं चपड़ की तो भगा दूंगा यहां से’’- गुस्से से जग्गू गरजा। उसको गुस्सा होता देख रतन गिडगिडाता हुआ उसके पास पहुंचा और बोला- ‘‘अरे बाॅस नाराज क्यों हो रहे हो, मैं तो हम दोनों के भले के लिए बोल रहा था।’’ रतन पर अपनी भड़ास निकालने के बाद जग्गू थोडा सा संजिदा होकर आगे के बारे में सोचने लगा। इतने सालों में एक भी ऐसा केस नहीं मिला जिसमें नाम और ईनाम दोनों एक साथ मिला हो। पता नहीं कौन सी पनौती लगी हुई है किस्मत में। “आज मुझे महसूस हो रहा है कि कोई बड़ा केस आने वाला है।” - थोड़ा सा गंभीर होकर जग्गू बोला। “बाॅस कल भी आपने यही कहा था।” - रतन चिड़चिड़ाते हुए बोला। “अरे यार कल मेरा अंदाजा थोड़ा गलत हो गया पर आज नहीं होगा, तु चिंता मत कर कुछ ना कुछ तो होगा आज।” - रतन को थोड़ा बहलाता हुआ जग्गू बोला। रतन कुछ बोलता उससे पहले दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई। दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। जग्गू ने तुरंत अपनी कमीज सीधी की, बालों पर हाथ फेरा और गंभीर आवाज में बोला- “रतन... लगता है कोई नया क्लाईंट आया है।” रतन ने धीरे से कहा- “बाॅस पहले दरवाजा खोल के देखता हूं कहीं दूधवाला न हो, उसके पैसे भी तो बकाया है कई बार मांग चुका है। अब ये दिन भी आ गये है की साला दूध वाला भी धमकी देकर चला जाता है।” रतन ने डरते दिल से हिम्मत करके दरवाजा खोला तो सामने एक आदमी घबराया हुआ खड़ा था। उसने अपना नाम गोपाल दास बताया और एकदम से अंदर आया और बोला- “क्या आप ही जग्गू जी हैं... देखिये मेरे भाई का खून हो गया है! और मैं बड़ी मुसीबत में पड़ गया हूं। एक तो भाई गया ऊपर से पुलिस ने मेरी नाक में दम कर रखा है।” कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। जग्गू की आँखें फैल गईं। रतन हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। इतने साल बाद उन्हें आखिरकार... एक हत्या का केस मिला रहा था! जग्गू ने अपनी आवाज को बेहद गंभीर बनाने की कोशिश की और बोला- “बैठिए। घबराइए मत। हमें पूरी बात बताइए।” गोपाल बैठ गया और माथे का पसीना पौछता हुआ बताने लगा कि उसका छोटा भाई मोहन रात को अपने पुराने बंगले में अकेला था। सुबह नौकर ने कमरे का दरवाजा खोला तो मोहन मृत पड़ा था और कमरे में सारा सामान बिखरा हुआ था। खिड़की खुली थी और मेज पर एक अजीब-सा कागज़ पड़ा था। पुलिस ने वहाँ छानबीन करना शुरू कर दिया था, लेकिन गोपाल को शक था कि मामला साधारण नहीं बल्कि हत्या का है। जग्गू ने अपने चेहरे के भाव को बदला और बोला- “गोपाल जी... मामला गंभीर है, इसमें हमें बहुत सावधानी से काम करना होगा, एक भी गलती की गुंजाइश नहीं है।” “बाॅस... पिछली बार भी आपने यही कहा था।”- रतन घीरे से बोला तो जग्गू ने उसे घूरकर देखने लगा। फिर दोनों गुरू और चेला गोपाल के साथ तुरंत बंगले की तरफ निकल पड़े। बंगला शहर से बाहर बहुत बड़ा, सुनसान और डरावना लग रहा था। बंगले के गेट पर पुलिस खड़ी थी। वहां पहुंच कर जग्गू ने बड़े अंदाज से अपनी जेब से अपना एक पुराना सा कार्ड निकाला और पुलिस वाले को दिखाया। कार्ड पर लिखा था- “जग्गू जासूस, विशेष जाँच अधिकारी।” पुलिस वाले ने कार्ड देखा, फिर जग्गू को देखा, फिर कार्ड देखा और मुस्कुराते हुए बोला- “अच्छा तो आप वही जासूस हैं?” जग्गू ने गर्व से हाँ कहा तो पुलिस वाला कुछ देर चुप रहा और फिर बोला- “अंदर जाइए।” उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जैसे वह मन ही मन कह रहा हो कि अब भगवान ही इस केस को बचा सकते हैं। बंगले के अंदर कमरे के बीचों-बीच मोहन की लाश पड़ी थी। जग्गू ने गंभीरता से कमरे का निरीक्षण शुरू किया। रतन उसके पीछे-पीछे चल रहा था। जग्गू ने अपनी जेब से लेंस निकाला और फर्श को ध्यान से देखने लगा और रतन से बोला-“रतन! यहाँ देखो....धूल, बहुत महत्वपूर्ण सबूत है।” “कैसे?” - रतन ने पूछा। “अरे बेवकूफ, जहाँ धूल है, वहाँ कोई चला नहीं है, इसका मतलब कातिल बाहर से नहीं आया।” “वाह बाॅस”- रतन ने सिर हिलाया। जग्गू आगे बढ़ा तो मेज पर रखा कागज देखकर उसकी आँखें चमक उठीं। कागज पर लिखा था- “जिसे तुम ढूँढ रहे हो, वह तुम्हारे बहुत करीब है।” जग्गू ने कागज उठाया और बोला- “रतन... यह कोई साधारण संदेश नहीं है, कातिल हमें चुनौती दे रहा है।” “लेकिन इसका मतलब क्या है?”- रतन ने हां में सर हिलाते हुए पूछा। “अबे... यही तो पता लगाना है।”- जग्गू ने उसकी तरफ घूरकर देखा। “मुझे तो लगता है कातिल ने आपको चिढ़ाने के लिए लिखा है।”- रतन ने कहा और ठीक उसी समय रतन की नजर खिड़की पर गई तो वा चिल्ला कर बोला- “बाॅस! खिड़की के पास मिट्टी लगी है।” जग्गू तुरंत वहाँ पहुँचा और अपने लेंस से निशान की गहराई से जांच करने लगा। मिट्टी में जूते का निशान था जिस जग्गू झुककर देखने लगा और बोला-“जूते का लगभग नौ नंबर का है।” रतन ने पूछा आपको कैसे पता? “अबे मैं जासूस हूँ, जूते के नंबर का भी अंदाजा लगा लेता हूं” -जग्गू ने आत्मविश्वास से कहा तो रतन ने माथा पकड़ लिया। जग्गू ने कमरे में मौजूद हर चीज की जाँच शुरू कर दी। एक कुर्सी, एक मेज, एक फूलदान, एक घड़ी, एक टूटा हुआ गिलास और फिर... उसे एक चाकू मिला। जग्गू ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया की तभी रतन चिल्लाया-“बाॅस! सबूत है!” जग्गू ने हाथ रोक लिया और मुस्कुराकर बोला-“सही कहा। मेरे साथ रहकर तु भी काफी कुछ सीख गया है” फिर उसने रूमाल निकाला और चाकू उठाया। जग्गू ने चाकू को ध्यान से देखा, उस पर खून लगा था। जग्गू तुरंत बोला- “मामला साफ है यही हत्या का हथियार है।” पुलिस इंस्पेक्टर ने दूर से कहा-“वो चाकू रसोई का है, कल सब्ज़ी काटते हुए नौकर का हाथ कट गया था ये वही खून है।” तो जग्गू थोड़ा झेंपकर बोला- “मैं अपना अंदाजा लगा रहा था, पर आपने तो एक दम सही बात को पकड़ लिया।” जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि मोहन के तीन करीबी लोग थे- उसका भाई गोपाल, एक पुराना नौकर रामू और पड़ोस में रहने वाली महिला छाया। जग्गू को तीनों पर शक था। जग्गू ने पूछताछ शुरू की। सबसे पहले रामू को बुलाया गया और उससे पूछा कि हत्या वाली रात वो कहाँ था तो रामू ने बताया की वो दस बजे तक रसोई में था और उसके बाद खाना खाकर वो सो गया था। उसकी बात सुनकर जग्गू ने आँखें सिकोड़ लीं और बोला- “रात दस बजे सो गए, “बहुत जल्दी नहीं सोते हो तुम?” इस पर रामू बोला, गरीब आदमी हूँ साहब, अमीर लोगों की तरह कहीं बाहर पार्टी करने नहीं जाता। जग्गू ने रतन की तरफ देखा और बोला- “लिखो” तो रतन ने पूछा-“क्या लिखूँ?” “यही कि यह आदमी बहुत जल्दी सोता है।”- थोड़ा गुस्से से जग्गू बोला। रतन ने अपना सिर पकड़ लिया और सोचने लगा कैसे आदमी से पाला पडा है मेरा, ये भी कोई लिखने की चीज़ है। इसके बाद छाया की बारी आई तो जग्गू ने एक दम देवानन्द के फिल्मी अंदाज में उससे पूछा की वो मोहन को कैसे जानती है तो उसने बताया वो उसकी पड़ोसी है। जग्गू ने आगे पूछा की क्या तुम्हारा मोहन से कभी झगड़ा हुआ था तो इस पर छाया बोली की हाँ, क्योंकि मोहन की बिल्ली रोज उसके घर में घुस जाती थी। जग्गू ने गंभीर होकर बिल्ली का नाम पूछा तो छाया ने बिल्ली का नाम काली बताया। जग्गू अचानक चैंका और रतन से बोला की रतन यह नाम याद रखना। रतन ने पूछा, क्यों? तो जग्गू कुटील सी हंसी के साथ बोला-“अरे काली... अंधेरा... रात... हत्या!” इस पर रतन ने बोला बाॅस, बिल्ली का रंग भी काला है। जग्गू कुछ पल चुप रहा और फिर आंखें चमकाते हुए बोला- “वही तो! दाल में जरूर कुछ काला है, मामला और गहरा बहुत गहरा है।” जाँच करते-करते रात हो गई। जग्गू और रतन बंगले के बाहर बैठे थे। दोनों थके हुए थे। तभी रतन ने कहा बाॅस, एक बात समझ नहीं आ रही, अगर कातिल इतना चालाक है तो उसने खिड़की खुली क्यों छोड़ी? जग्गू ने बोला- “क्योंकि वह चाहता था कि हम समझें कि कातिल खिड़की से भागा है जबकी असली कातिल घर के अंदर ही है।” रतन की आँखें फैल गईं और वह बोला की बाॅस कौन कातिल हो सकता है- गोपाल?, रामू?, छाया? या ये बिल्ली? जग्गू ने कुछ पल सोचा और बोला-“बिल्ली को नजरअंदाज मत करो, कभी-कभी ये घरेलू जानवर भी षड़यत्र का हिस्सा होते हैं।” रतन ने आसमान की तरफ देखा रहा था कि उसी समय अंदर से जोर की आवाज आई। धड़ाम! दोनों उछल पड़े। जग्गू ने फुसफुसाकर कहा- “कातिल!” दोनों तेज़ी से कमरे की तरफ भागे। दरवाजा खोला। अंदर कोई नहीं था लेकिन खिड़की खुली थी। जमीन पर एक बड़ा-सा काला कपड़ा पड़ा था। जग्गू ने उसे उठाया और गंभीर होकर बोला-“रतन... यही है! कातिल का भेष, उसकी ड्रैस जो उसने कत्ल के समय पहनी थी” रतन ने कपड़ा देखा फिर बोला- “अरे बाॅस... ये तो परदा है, तुम भी कुछ भी बोल देते हो”। जग्गू कुछ पल चुप रहा फिर बोला- “कातिल बहुत चालाक है, ये परदा भी कातिल का एक हथियार हो सकता है”। अगली सुबह पुलिस को एक नई जानकारी मिली। मोहन की मौत रात के दस से ग्यारह बजे के बीच हुई थी लेकिन गोपाल ने बताया था कि उसने अपने भाई से रात साढ़े दस बजे फोन पर बात की थी, इसका मतलब... मोहन उस समय जिंदा था। जग्गू ने तुरंत कहा-“रतन! हमारे पास कत्ल का समय है रात साढ़े दस बजे का।” “पर बाॅस ये तो समय है, सबूत नहीं।”- रतन झुझलाकर बोला। जग्गू ने फोन की जाँच करवाई तो पता चला कि फोन पर बात तो हुई थी, लेकिन आवाज मोहन की नहीं थी। गोपाल को किसी और ने फोन किया था। अब मामला और उलझ गया। यानी कातिल ने मोहन बनकर फोन किया था। जग्गू ने गर्व से कहा- “अब केस हमारी मुट्ठी में है।” उसी वक्त पीछे से आवाज आई- “किसकी मुट्ठी में?” सबने मुड़कर देखा तो पुलिस इंस्पेक्टर खड़ा था। जग्गू बोला केस मेरी मुट्ठी में है तो इंस्पेक्टर ने कहा अच्छा तो खोलिए मुट्ठी। जग्गू ने धीरे से हाथ खोला तो कुछ नहीं था। यह देख कर रतन बुदबुदाया और बोला- “बाॅस, केस तो भाग गया।” शाम होते-होते जग्गू ने सबको एक कमरे में इकट्ठा किया, गोपाल, रामू, छाया और इंस्पेक्टर। जग्गू ने कमरे की बत्ती बंद कर दी और गंभीर स्वर में बोला कि आज इस कमरे से कातिल बाहर नहीं जाएगा। रतन ने सर खुजाते हुए धीरे से पूछा की अगर कातिल यहां नहीं हो तो? “तो कोई बात नहीं तब हम सबको बैठाकर चाय पिलाएँगे।” - जग्गू झेंपकर बोला। तभी बत्ती जलती है और जग्गू कमरे के बीचों-बीच खड़ा था। वो मुस्कुराते हुए बोला- “मोहन का कातिल हममें से ही कोई है।” सब एक-दूसरे को देखने लगे। जग्गू ने कहा की मेरे पास सबूत है और उसने अपनी जेब से एक कागज निकाला। “यह वही संदेश है जो लाश के पास मिला था।” यह कहकर उसने संदेश पढ़ा- “जिसे तुम ढूँढ रहे हो, वह तुम्हारे बहुत करीब है।” “इसका मतलब था कि कातिल कोई बाहर का आदमी नहीं था।” -इंस्पेक्टर ने भी हां मैं जसिर हिलाया। जग्गू ने गोपाल की तरफ देखा और उंगली से इशारा किया -“आप!” गोपाल घबरा गया, “मैं.....?” “हाँ!” कमरे में सन्नाटा छा गया। जग्गू ने अचानक कहा- “क्योंकि... आपके जूते का नंबर नौ है!” सब हैरान रह गए। गोपाल ने अपने जूते की तरफ देखा फिर बोला- “पर मेरे जूते का नंबर तो दस है।” जग्गू का चेहरा उतर गया। रतन ने आँखें बंद कर लीं और इंस्पेक्टर ने माथा पीट लिया। तभी बाहर से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। वह बंगले का दूसरा नौकर था। उसने हाँफते हुए कहा- “साहब! असली बात मुझे पता है!” सब उसकी तरफ देखने लगे। उसने कहा- “मोहन साहब का खून किसी इंसान ने नहीं किया।” कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। जग्गू ने धीरे से पूछा- “तो किसने किया?” नौकर ने कहा- “उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।” सबकी आँखें फटी रह गईं और एक साथ सबके मुंह से निकला “क्या?” नौकर बोला- “जी हां डॉक्टर की रिपोर्ट आ गई है। उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थी।” कुछ सेकंड तक किसी ने कुछ नहीं कहा। फिर इंस्पेक्टर ने जग्गू की तरफ देखा। “मतलब... हत्या हुई ही नहीं? और तुम बेवजह अपनी शेखी बघार रहे है”। रतन ने जग्गू की तरफ घूरकर देखा तो जग्गू ने गला साफ़ करते हुए बोला- “मैं तो पहले से जानता था।” रतन ने हैरानी से पूछा- “क्या?” “यही कि हत्या नहीं हुई।” “तो फिर इतने दिन से जाँच क्यों कर रहे थे?” इस पर जग्गू ने गंभीर चेहरा बनाया और बोला- “मैं पुलिस की मदद कर रहा था।” रतन ने बड़बड़ाते हुए धीरे से कहा- “बाॅस, आपने पुलिस की मदद की है या इस केस की हत्या?” इंस्पेक्टर ने गुस्से में कहा- “और वो कागज?” जब गोपाल ने कागज देखा तो वह चैक पड़ा और बोला- “अरे! ये तो मेरे भाई कि लिखावट है, वह हमेशा पहेलियाँ लिखता था। उस दिन भी शायद कोई पहेली लिख रहा होगा।” जग्गू ने कागज वापस जेब में रख लिया और कहा- “बहुत चालाक आदमी था।” रतन गुस्से से बोला- “केस का सत्यानाश करके भी यह बोल रहे हो?” जग्गू ने उसे घूरकर देखा। अगले दिन अखबारों में खबर छपी- “मशहूर जासूस जग्गू ने सुलझाया रहस्यमयी मौत का केस!” नीचे लिखा था- “तीन दिन की गहन जाँच के बाद जग्गू जासूस ने साबित किया कि यह हत्या नहीं बल्कि प्राकृतिक मौत थी।” जग्गू ने अखबार पढ़ा और मुस्कुराया “देखा रतन? नाम हो गया।” रतन ने मजे लेते हुए कहा- “लेकिन बाॅस, अखबार ने यह नहीं लिखा कि आपने तीन दिन में कितने कांड किये हैं।” जग्गू ने चाय उठाई और बुदबुदाया- “महान जासूसों की छोटी-मोटी गलतियाँ इतिहास नहीं लिखता।” रतन बोला- “इतिहास नहीं लिखता, लेकिन मैं लिख रहा हूँ।” उसने जेब से एक मोटी डायरी निकाली। उसके कवर पर लिखा था- “जग्गू की जासूसी गलतियाँ- भाग 1।” जग्गू ने डायरी देखी, “भाग 1?” रतन मुस्कुराया- “और भाग 2 आपके अगले केस के बाद लिखूँगा।” जग्गू ने उत्सुकता से पूछा- “तो क्या अगला केस मिल गया?” रतन ने मुस्कुरा कर कहा- “जी हां।” जग्गू की आँखें चमक उठीं, “क्या है?” रतन ने कहा- “मोहल्ले के जो मिंया जी हैं उनकी मुर्गी गायब है।” जग्गू तुरंत खड़ा हो गया और अपनी टोपी पहनी, लेंस जेब में रखा फिर गंभीर आवाज में बोला- “रतन... यह कोई साधारण मुर्गी चोरी का मामला नहीं है, मुझे पूरा यकीन है... इसके पीछे बहुत बड़ा गिरोह है।” रतन ने फिर सिर पकड़ लिया और बोला- “बाॅस ये डायलाॅग मत बोला करो अब तो लोग हंसते हैं हम पर।” इसके बाद दोनों महान जासूस अपने अगले केस की तबाही के लिए निकल पड़े। - राकेश शर्मा