Black Cargo: Port No. 7 sodha iqbal kasam द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Black Cargo: Port No. 7

धुएं की सिंडिकेट
बंदरगाह के टर्मिनल्स पर रात का अंधेरा कभी पूरी तरह से गहरा नहीं होता था। विशाल सोडियम लाइटों की पीली रोशनी में कोयले की काली धूल और यूरिया की बारीक परत हवा में तैरती रहती थी। जेटी नंबर चार पर जहाजों से कोयला खाली करने वाली क्रेनें विशाल राक्षसों की तरह झुकी हुई थीं। हवा में लोहे की रगड़, नमकीन समुद्र और यूरिया की हल्की गंध एक अजीब सा मिश्रण बना रही थी।
मुस्तफा अली अपनी पुरानी जिप्सी का बोनट टेककर खड़ा था। उसकी उम्र पचास के पार थी, और आंखों के नीचे पड़े गहरे गड्ढे यह बताने के लिए काफी थे कि उसने इस पोर्ट पर अपनी आधी जिंदगी खपा दी है। वह यहाँ का सबसे पुराना लोडिंग सुपरवाइजर था—वह शख्स जो पोर्ट के हर कोने को अपनी हथेली की रेखाओं की तरह जानता था।
"मुस्तफा भाई, तीसरे बेड़े से रेपसीड का जहाज लग चुका है। लेकिन कस्टम वाले क्लियरेंस रोक रहे हैं," छोटे लाल ने आकर धीमी आवाज में कहा। छोटे लाल, जो पिछले दस सालों से मुस्तफा का दायां हाथ था, उसका पूरा शरीर कोयले की गर्द से सना हुआ था।
मुस्तफा ने सिगरेट का धुआं हवा में छोड़ते हुए समंदर की तरफ देखा, जहाँ दूर क्षितिज पर कई जहाजों की लाइटें टिमटिमा रही थीं। "कस्टम वालों को क्या परेशानी है? टैक्स तो दोपहर में ही भर दिया गया था।"
"कस्टम की परेशानी नहीं है भाई," छोटे लाल ने इधर-उधर देखते हुए आवाज और नीची की। "राघवेंद्र शुक्ल जी के लडके का फोन आया था। कह रहे थे कि जब तक विधायक जी का हिस्सा तय नहीं होता, रेपसीड और यूरिया की एक बोरी भी गेट से बाहर नहीं निकलेगी।"
मुस्तफा के चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान आ गई। विधायक राघवेंद्र शुक्ल इस तटीय इलाके की राजनीति का वह मोहरा थे, जिनके बिना बंदरगाह पर हवा का झोंका भी नहीं बह सकता था। लेकिन शुक्ल अकेले नहीं थे। पोर्ट की यूनियन पर काबिज विक्रम सूरी और लोकल डिस्ट्रीब्यूशन संभालने वाला कबीर खान—यह पूरा नेटवर्क एक-दूसरे के दम पर टिका था। यूरिया का कालाबाजारी का खेल हो, या घटिया कंक्रीट की आड़ में सरकारी टेंडरों की हेराफेरी, सबमें सबका हिस्सा तय था।
उसी वक्त एक काली स्कॉर्पियो आकर रुकी। उसमें से विधायक राघवेंद्र का खासमखास और राजनीतिक दलाल, बलदेव निकला। उसके साथ कुछ स्थानीय लड़के थे।
"मुस्तफा, काम रोक दिया?" बलदेव ने सीधे आते ही रौबदार आवाज में पूछा।
"काम हमने नहीं रोका बलदेव," मुस्तफा शांति से बोला। "काम तुम रुकवा रहे हो। यह कोई कोयला नहीं है जिसे तुम महीने भर गोदाम में डंप रखोगे। यह रेपसीड और यूरिया है। नमी पकड़ेगा तो लाखों का नुकसान होगा।"
"नुकसान तुम्हारा होगा, विधायक जी का नहीं," बलदेव मुस्कुराया। "शुक्ल जी ने साफ कहा है—इस बार जो कंक्रीट और चावल का कॉन्ट्रैक्ट निकला है, उसमें आधा शेयर उनके आदमी को मिलेगा। वरना पोर्ट ट्रिब्यूनल में एनवायरनमेंट क्लियरेंस की ऐसी याचिका पड़ेगी कि यह पूरा जेटी दो महीने के लिए सील हो जाएगा।"
इसी बीच वहां कबीर खान अपनी बुलेट से पहुंचा। कबीर युवा था, गरम दिमाग का, लेकिन पोर्ट के लॉजिस्टिक्स की समझ में उसका कोई मुकाबला नहीं था। उसने बुलेट से उतरते ही अपनी कमर में खोसा हुआ गमछा निकाला और चेहरे का पसीना पोंछा।
"बलदेव, शुक्ला जी से कहो कि अपनी राजनीति शहर की सड़कों तक रखें," कबीर ने कड़क आवाज में कहा। "यहाँ बंदरगाह पर माल रुकता है तो जहाज वाले प्रति घंटे का हरजाना ठोकते हैं। और वो पैसा न तुम दोगे, न तुम्हारे विधायक जी।"
"जबान संभाल कर बात कर कबीर," बलदेव का पारा चढ़ा। "इस पोर्ट की जमीन सरकार की है, और सरकार शुक्ल जी की मुट्ठी में है।"
"और इस जमीन पर उतरने वाला माल मजदूरों का है," पीछे से एक भारी आवाज आई। विक्रम सूरी, लेबर यूनियन का अध्यक्ष, अपने कुछ साथियों के साथ अंधेरे से निकलकर सामने आया। सूरी की पकड़ बंदरगाह के हजारों मजदूरों पर थी। अगर सूरी एक सीटी बजा दे, तो कोयले की क्रेन से लेकर यूरिया की बोरियां उठाने वाली बेल्ट तक सब ठप हो सकती थीं।
अब उस बंद जेटी पर माहौल पूरी तरह गरमा चुका था। एक तरफ सत्ता का घमंड (बलदेव और राघवेंद्र शुक्ल), दूसरी तरफ जमीनी नेटवर्क और रसूख (कबीर खान), मजदूरों की ताकत (विक्रम सूरी), और इन सब के बीच फंसा मुस्तफा अली, जो जानता था कि अगर इस बार संतुलन बिगड़ा, तो यह बंदरगाह केवल व्यापार का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि श्मशान बन जाएगा।
"तुम सब अपनी-अपनी रंजिशें कल सुबह टेबल पर निपटाना," मुस्तफा ने दोनों हाथों को उठाकर माहौल को शांत करने की कोशिश की। "फिलहाल, यूरिया और रेपसीड के ट्रकों को निकलने दो। अगर सुबह तक माल डंपिंग यार्ड नहीं पहुंचा, तो ऊपर से इंटरनेशनल बायर्स का प्रेशर आएगा, और फिर न सूरी बचेगा, न कबीर, और न ही तुम्हारे विधायक जी।"
बलदेव ने कबीर और सूरी को घूरा, फिर थूकते हुए बोला, "ठीक है। आज रात माल निकलने दो। लेकिन कल सुबह 10 बजे पोर्ट अथॉरिटी के गेस्ट हाउस में मीटिंग होगी। अगर हल नहीं निकला, तो समझ लेना कि इस बंदरगाह पर आग लगेगी।"
बलदेव अपनी गाड़ी में बैठकर चला गया। सूरी ने भी अपने आदमियों को काम पर लौटने का इशारा किया। कबीर ने मुस्तफा के कंधे पर हाथ रखा, "मुस्तफा भाई, यह मामला सिर्फ हिस्सेदारी का नहीं है। मुझे लगता है शुक्ल जी कंक्रीट और कोयले के टेंडर की आड़ में किसी बहुत बड़ी खेप को पोर्ट से पार कराने की फिराक में हैं।"
मुस्तफा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपनी सिगरेट का आखिरी कश लिया और उसे जमीन पर कुचल दिया। उसे भी पिछले कुछ दिनों से कुछ अजीब लगने लगा था। चावल की बोरियों के जो डिब्बे सील होकर आ रहे थे, उनका वजन कागज पर लिखे वजन से काफी अलग था।
रात के 3 बज चुके थे। यूरिया और रेपसीड के ट्रक एक-एक करके गेट से बाहर निकलने लगे। मुस्तफा अपने केबिन में जाकर बैठ गया और पुराने रजिस्टर की धूल झाड़ने लगा। उसने एक गुप्त डायरी निकाली, जिसमें वह सालों से पोर्ट पर होने वाली हर असामान्य गतिविधि का हिसाब रखता था।
तभी केबिन का दरवाजा जोर से खटखटाया गया। मुस्तफा ने चौंककर देखा। दरवाजे पर छोटे लाल खड़ा था, उसका चेहरा डर से पूरी तरह पीला पड़ा हुआ था। उसके हाथ कांप रहे थे।
"क्या हुआ छोटे?" मुस्तफा खड़ा हो गया।
"मुस्तफा भाई... जेटी नंबर सात पर... जहाँ शक्कर और चावल के कंटेनर उतारे जा रहे थे... वहाँ दुर्घटना हो गई है," छोटे लाल हकलाते हुए बोला।
"कैसी दुर्घटना? कोई मजदूर घायल हुआ क्या?"
"नहीं भाई... क्रेन का हुक छूट गया और एक सीलबंद कंटेनर सीधे नीचे कंक्रीट के फर्श पर गिरकर पटख गया। कंटेनर टूट गया है..."
"तो इसमें इतना डरने की क्या बात है? चावल या शक्कर ही तो बिखरी होगी," मुस्तफा ने आश्वस्त करते हुए कहा।
छोटे लाल ने मुस्तफा के करीब आकर बेहद खौफनाक लहजे में फुसफुसाया, "नहीं मुस्तफा भाई... उस कंटेनर के अंदर न चावल था, न शक्कर... उसमें तो..."
छोटे लाल अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि पूरे पोर्ट पर लगे इमरजेंसी हूटर (सायरन) की तेज आवाज गूंज उठी। चारों तरफ लाल लाइटें ब्लिंक करने लगीं। दूर से पुलिस और पोर्ट सिक्योरिटी की गाड़ियों के सायरन की आवाजें तेजी से जेटी नंबर सात की तरफ बढ़ती सुनाई देने लगीं।
मुस्तफा का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने छोटे लाल की आंखों में देखा, जहाँ मौत का खौफ साफ दिखाई दे रहा था।



2
सीलबंद ताबूत
सायरन की तीखी आवाजें पोर्ट की सर्द रात की हवा को चीर रही थीं। लाल और नीली लाइटों की गूंज में जेटी नंबर सात किसी अपराध के बड़े थ्रिलर सीन की तरह चमक रही थी। मुस्तफा अली और छोटे लाल तेजी से कदम बढ़ाते हुए बिखरे हुए सामान के ढेर की तरफ पहुंचे। वहाँ सुरक्षाकर्मियों और मजदूरों की भारी भीड़ लगी हुई थी।
कंक्रीट के फर्श पर विशाल लोहे का कंटेनर एक तरफ से पूरी तरह से फट चुका था। क्रेन का हुक टूटने की वजह से यह हादसा हुआ था। चारों तरफ यूरिया और कोयले की गर्द फैली हुई थी, लेकिन सब लोग जिस चीज़ को टकटकी लगाए देख रहे थे, वह यूरिया या कोयला नहीं था।
मुस्तफा ने भीड़ को चीरते हुए आगे कदम बढ़ाया। बिखरी हुई लकड़ी की पेटियों और बोरियों के बीच से जो बाहर निकला था, उसे देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
वहाँ लकड़ी के बक्सों में भूसे की पैकिंग के बीच दर्जनों छोटे-छोटे एल्युमिनियम के सीलबंद केस पड़े थे। उनमें से दो-तीन केस टूटने की वजह से खुल गए थे। उन केसों के अंदर से कोई सफेद पाउडर या साधारण सामान नहीं निकला था, बल्कि उनके अंदर अत्याधुनिक सैन्य ग्रेड के ऑटोमैटिक हथियार और संदिग्ध केमिकल से भरे कांच के बड़े सिलेंडरों का जखीरा था।
"मुस्तफा भाई... यह सब..." छोटे लाल का गला सूख चुका था।
"चुप रहो छोटे!" मुस्तफा ने सख्त लहजे में फुसफुसाते हुए कहा। "मुंह बंद रखो, अगर अपनी और अपने परिवार की जान प्यारी है तो।"
तभी भीड़ को हटाते हुए कबीर खान और विक्रम सूरी भी वहाँ पहुँच गए। सूरी ने जब जमीन पर पड़े हथियारों और केमिकल सिलेंडरों को देखा, तो उसकी आँखें फैल गईं।
"यह चावल और शक्कर के टेंडर का माल है?" सूरी ने गुस्से और डर से कबीर की तरफ देखा। "कबीर! तुमने कहा था कि इस बेड़े में सिर्फ डिस्ट्रीब्यूशन का माल है! तुम हमें किस दलदल में धकेल रहे हो?"
"मुझे खुद नहीं पता था सूरी!" कबीर ने घबराते हुए हाथ उठाए। "कागजात पर यह सारा शिपमेंट विधायक राघवेंद्र शुक्ल के भांजे अमरनाथ की फर्जी लॉजिस्टिक्स कंपनी के नाम पर रजिस्टर्ड है! मुझे सिर्फ क्लीयरेंस और माल गाड़ियों में लोड करवाने का जिम्मा दिया गया था।"
"अमरनाथ?" मुस्तफा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। अगर इस खेल में विधायक का भांजा शामिल था, तो इसका मतलब यह कोई मामूली तस्करी नहीं थी। यह एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय और राजनीतिक रैकेट था।
इससे पहले कि वे सब वहां से हट पाते, पोर्ट पुलिस की तीन गाड़ियां और विजिलेंस विभाग की काली जिप्सी वहां आकर रुकी। गाड़ियों से भारी संख्या में सशस्त्र पुलिस बल बाहर निकला। सबसे आगे से उतरी एक सख्त मिजाज पुलिस अधिकारी—डिप्टी एसपी नीलम शर्मा।
नीलम शर्मा ने आते ही पूरे इलाके को सील करने का हुक्म दिया। उसकी तीखी निगाहें तुरंत मुस्तफा, कबीर और सूरी पर जाकर टिकीं।
"सब लोग जहाँ हैं, वहीं रुक जाओ!" नीलम ने अपनी पिस्टल की होल्स्टर पर हाथ रखते हुए कहा। "कोई भी अपनी जगह से एक इंच नहीं हिलेगा।"
नीलम ने टॉर्च की रोशनी बिखरे हुए बक्सों पर डाली। ऑटोमैटिक राइफलों की बैरल और कांच के जार में तैर रहे उस गाढ़े हरे केमिकल को देखकर उसकी भृकुटियां तन गईं। उसने तुरंत अपने अधीनस्थ अधिकारी को इशारा किया, "आईजी साहब को फोन लगाओ। पोर्ट पर जो मिला है, वह किसी गैंग की तस्करी नहीं है... यह सीधे-सीधे देश सुरक्षा से जुड़ा मामला है। पूरे पोर्ट के एग्जिट गेट तुरंत बंद कराओ!"
तभी कबीर के फोन की वाइब्रेशन हुई। उसने छुपकर जेब से फोन निकाला। स्क्रीन पर 'अमरनाथ (शुक्ल)' का नाम चमक रहा था।
कबीर ने चुपके से फोन कान से लगाया। दूसरी तरफ से अमरनाथ की घबराई हुई लेकिन धमकी भरी आवाज आई, "कबीर! जो भी हुआ है, उसे तुरंत संभालो। अगर विजिलेंस या पुलिस ने उस केमिकल और हथियारों के बक्सों की एंट्री रजिस्टर में मेरा या विधायक जी का नाम देख लिया, तो तुम सब जिंदा नहीं बचोगे।"
"अमरनाथ! यह सब क्या है? तुमने मुझे फंसा दिया!" कबीर दबी आवाज में गुर्राया।
"बहस का वक्त नहीं है!" अमरनाथ ने कहा। "मुस्तफा को बोलो कि वह सारा इल्जाम लेबर यूनियन या किसी अज्ञात ठेकेदार पर डाल दे। अगर वह चुप रहा तो उसके बेटे का सरकारी नौकरी का टेंडर मंजूर हो जाएगा, वरना सुबह का सूरज उसका बेटा नहीं देख पाएगा।"
कबीर ने मुस्तफा की तरफ देखा। मुस्तफा ने कबीर के चेहरे का डर और बेबसी पढ़ ली थी। वह समझ गया था कि राजनीतिक आकाओं ने अपना बचाव करने के लिए मोहरा चुन लिया है।
नीलम शर्मा तेजी से मुस्तफा के करीब आई। "मुस्तफा अली, तुम यहाँ के सबसे पुराने लोडिंग इंचार्ज हो। इस शिपमेंट के कागजात और सील चेक करने की जिम्मेदारी तुम्हारी थी। बताओ, यह माल किस कंपनी का है और इसे यहाँ किसने उतरवाया?"
पूरी जेटी पर सन्नाटा छा गया। सूरी, कबीर और छोटे लाल—सबकी निगाहें मुस्तफा पर टिकी थीं। अगर मुस्तफा सच बोलता तो विधायक का भांजा अमरनाथ नापा जाता, लेकिन उसकी अपनी जान और परिवार खतरे में पड़ जाता। अगर वह झूठ बोलता तो वह खुद देशद्रोह के मामले में जेल सड़ता।
मुस्तफा ने गहरा सांस लिया। उसने अपनी कांपती उंगलियों से जेब से अपनी पुरानी डायरी निकाली, जिसमें उसने हर फर्जी शिपमेंट का असली हिसाब लिख रखा था।
"मैडम..." मुस्तफा ने बोलना शुरू किया, "यह माल जिस कंपनी का है... उसका असली मालिक..."
इससे पहले कि मुस्तफा नाम लेता, अचानक जेटी नंबर सात की मुख्य बिजली की लाइन में एक जोरदार धमाका हुआ!
पूरे पोर्ट की लाइटें एक झटके में बंद हो गईं। चारों तरफ घनघोर अंधेरा छा गया। अफरा-तफरी मच गई। पुलिस वाले चिल्लाने लगे और टॉर्चें जलाने लगे।
अंधेरे के ठीक उसी पल, एक साये ने मुस्तफा को पीछे से जोर से धक्का दिया और उसके हाथ से वह खुफिया डायरी छीनने की कोशिश की! मुस्तफा जमीन पर गिरा। तभी अंधेरे में एक गूंजती हुई गोली चलने की आवाज आई—'ठांय!'
मुस्तफा के मुंह से एक दर्दनाक चीख निकली।



3
अंधेरे में गोलियां और सियासत
धमाके के साथ पोर्ट की सभी सोडियम लाइटें बुझ चुकी थीं। समंदर की खारी हवा में बारूद की गंध घुल गई। काली रात के उस भयानक अंधेरे में चारों तरफ चीख-पुकार और बदहवासी का माहौल था। टॉर्चों की पीली रोशनी इधर-उधर पागलों की तरह नाच रही थी।
"मैडम! नीचे झुकिए!" एक सिपाही की आवाज गूंजी।
डिप्टी एसपी नीलम शर्मा ने तुरंत अपनी सर्विस रिवाल्वर निकाली और कंक्रीट के पिलर की आड़ ली। गोली मुस्तफा के बेहद करीब से गुजरी थी, जो उसके कंधे को छीलती हुई पीछे खड़े यूरिया के बोरे में जा धंसी। मुस्तफा दर्द से कराहते हुए जमीन पर गिर पड़ा।
अंधेरे का फायदा उठाकर कबीर खान ने तुरंत मुस्तफा की तरफ छलांग लगाई। मुस्तफा की जेब से बाहर निकली वह काली खुफिया डायरी कबीर के हाथ लग चुकी थी। कबीर ने बिना एक सेकंड गंवाए डायरी को अपनी जैकेट के अंदर छुपाया और लोहे के विशाल कंटेनरों की भूलभुलैया में गायब हो गया।
"कोई भी बाहर नहीं जाना चाहिए! चारों तरफ घेराबंदी करो!" नीलम चिल्लाई। लेकिन जब तक पोर्ट के बैकअप जनरेटर चालू हुए और लाइटें वापस आईं, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
जेटी नंबर सात का नजारा बदल चुका था। मुस्तफा खून से लथपथ पड़ा था, कबीर गायब था, और सबसे खौफनाक बात—टूटे हुए कंटेनर के अंदर रखे एल्युमिनियम केसों में से एक मुख्य केस गायब था! वह केस, जिसमें वह खतरनाक हरा केमिकल भरा कांच का जार था, अब वहाँ नहीं था।
शहर के वीआईपी इलाके में स्थित एक आलीशान बंगले में, रात के 4 बजे सिगार का धुआं हवा में तैर रहा था। विधायक राघवेंद्र शुक्ल अपने स्टडी रूम में टहल रहे थे। उनके सामने मेज पर पुलिस कमिश्नर और राज्य के गृह राज्य मंत्री का फोन स्पीकर पर था।
"शुक्ल जी, पोर्ट पर विजिलेंस और पुलिस ने जो माल पकड़ा है, उसकी खबर मीडिया तक पहुँचने वाली है," गृह मंत्री की भारी आवाज आई। "अगर वह केमिकल जार और मिलिट्री ग्रेड हथियार आपके भांजे अमरनाथ की कंपनी से लिंक हो गए, तो सिर्फ आपकी कुर्सी नहीं जाएगी, पूरी सरकार गिर जाएगी।"
राघवेंद्र शुक्ल ने सिगार की राख झाड़ी। उनके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी, सिर्फ एक ठंडी और जहरीली शांति थी।
"मंत्री जी, राजनीति में हर हादसे को एक मौके में बदला जा सकता है," शुक्ल ने ठंडे लहजे में कहा। "बंदरगाह पर हमेशा से लेबर यूनियन और गैंग्स की दुश्मनी रही है। उस घायल बूढ़े मुस्तफा और भागने वाले कबीर खान को देशद्रोही घोषित कर दीजिए। कह दीजिए कि ये लोग बंदरगाह की आड़ में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का सिंडिकेट चला रहे थे। अमरनाथ की कंपनी के फर्जी दस्तखत का दावा हम सुबह की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर देंगे।"
"और वह गायब हुआ केमिकल जार?" कमिश्नर ने पूछा।
"उसे ढूंढने का काम नीलम शर्मा को मत दीजिए," शुक्ल की आंखें सिकुड़ीं। "उसे शहर की सड़कों पर भटकने दीजिए। उस केमिकल को ढूंढने के लिए मेरे अपने आदमी निकलेंगे... क्योंकि वह सिर्फ केमिकल नहीं है, वह मेरी अगली तीन पीढ़ियों के चुनाव का फंड है।"
दूसरी तरफ, पोर्ट के पिछले गेट के पास बने एक पुराने और वीरान वेयरहाउस में, कबीर खान हांफता हुआ दाखिल हुआ। उसकी शर्ट पसीने से भीगी हुई थी और हाथ में मुस्तफा की वह डायरी थी।
कमरे की पीली रोशनी में एक औरत घूमकर खड़ी हुई। उसकी उम्र चालिस के आसपास थी, आंखों में गजब का रोब और होंठों पर एक तीखी मुस्कान। वह थी शबाना बानो—पोर्ट की सबसे बड़ी लॉजिस्टिक्स माफिया और विधायक राघवेंद्र शुक्ल की सबसे बड़ी व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी। कंक्रीट और चावल के आधे से ज्यादा अवैध टेंडर शबाना के इशारे पर ही उठते थे।
"तो कबीर... आखिरकार तुम विधायक के तलवे चाटना छोड़कर मेरे पास आ ही गए?" शबाना ने अपनी सिगरेट का धुएं का छल्ला बनाते हुए कहा।
"शबाना आपा, मजाक का वक्त नहीं है," कबीर ने कांपते हाथों से मुस्तफा की डायरी मेज पर पटकी। "शुक्ल हमें और पूरे पोर्ट को बलि का बकरा बना रहा है। जेटी पर जो मिला है, वह सामान्य तस्करी नहीं है। और सबसे बड़ी बात..."
कबीर ने अपनी जैकेट के अंदर से एक कपड़े में लिपटा हुआ भारी गोल जार निकाला और मेज पर रख दिया। कांच के जार के अंदर वही गाढ़ा हरा केमिकल जगमगा रहा था।
शबाना ने जार को देखा और उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। "यह तो वही है ना... जो ब्लैक मार्केट में करोड़ों डॉलर का बिकता है?"
"यह सिर्फ पैसा नहीं है आपा," कबीर ने फुसफुसाते हुए कहा। "यह इस पोर्ट का सबसे बड़ा राज है। लेकिन मुस्तफा भाई को अस्पताल में पुलिस ने घेर लिया है। अगर मुस्तफा ने नीलम शर्मा के सामने अपना मुंह खोल दिया, तो शुक्ल जी से पहले हम सब जेल में होंगे या कब्र में।"
अस्पताल के आईसीयू के बाहर पुलिस का कड़ा पहरा था। मुस्तफा के कंधे पर पट्टी बंधी थी। उसके बेड के पास डिप्टी एसपी नीलम शर्मा खड़ी थी।
"मुस्तफा," नीलम ने धीमी और कड़क आवाज में कहा। "गोली तुम्हें कबीर या सूरी के आदमी ने नहीं मारी थी। गोली पोर्ट सिक्योरिटी के उस गार्ड ने चलाई थी जो विधायक शुक्ल का पेरोल पर था। तुम बलि का बकरा बन रहे हो। अगर अपनी जान और अपने परिवार की सलामती चाहते हो, तो मुझे बताओ—वह गायब हुआ केमिकल जार किसके पास है?"
मुस्तफा ने बंद आंखों से एक गहरी सांस ली। उसने अपनी सूखी जीभ से होंठों को नम किया।
"मैडम..." मुस्तफा ने कमजोर आवाज में कहा, "वह जार... कबीर के पास नहीं है... और न ही विधायक के पास... उस जार को जो लेने आ रहा है... उसका नाम सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे..."
तभी अचानक आईसीयू की खिड़की का कांच जोर से टूटा! एक धुआं उड़ाने वाला टियर-गैस और फ्लैश-बैंग ग्रेनेड कमरे के अंदर आ गिरा!
कमरे में तेज रोशनी और भयानक धमाका हुआ। नीलम की आंखें चौंधिया गईं और वह जमीन पर गिर पड़ी। धुएं के बीच दो नकाबपोश बंदूकधारी खिड़की से अंदर कूद पड़े। उन्होंने नीलम पर बंदूक तानने के बजाय सीधे मुस्तफा के स्ट्रैचर को पकड़ा और उसे खिड़की से बाहर खड़ी एक एम्बुलेंस में खींचने लगे।
नीलम ने धुएं में खांसते हुए अपनी पिस्टल से फायर किया, लेकिन तब तक नकाबपोश मुस्तफा को लेकर गायब हो चुके थे!