एक कहानी चार सहेलियों की… और उनकी अनगिनत खुराफ़ातों की!
सर्दियों की सुबह थी। ठंडी हवा चल रही थी और गलियों में अभी भी ख़ामोशी पसरी हुई थी। ज़्यादातर लोग रज़ाई में दुबके पड़े थे। किसी को बिस्तर छोड़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी, तो कोई अलार्म बंद करके दोबारा सो चुका था।
लेकिन एक घर ऐसा भी था, जहाँ सुबह-सुबह आवाज़ गूँज उठी।
मम्मी, मैं जा रही हूँ!
अंदर से तुरंत सवाल आया। कहाँ जा रही है इतनी सुबह-सुबह?
बस, थोड़ी देर में आती हूँ!
और इससे पहले कि कोई अगला सवाल पूछता, आद्या घर से निकल चुकी थी।
पैरों में चप्पल, नीचे गरम लोअर और ऊपर पापा की जैकेट पहने वो ठंड में ऐसे निकल रही थी, जैसे किसी ज़रूरी मिशन पर जा रही हो। हालाँकि उसका मिशन क्या था, ये उसे ख़ुद भी ठीक से नहीं पता था। बस घर में बैठे-बैठे बोर हो रही थी और उसे अपनी बोरियत का इलाज अपनी सहेलियों में ही नज़र आता था।
सबसे पहले उसका निशाना थी समीक्षा।
समीक्षा को आद्या पहले ही मम्मी के फ़ोन से कॉल करके बुला चुकी थी। कुछ ही देर में वो अपनी बैंगनी हुडी पहने वहाँ पहुँच गई।
लो जी, हमारी बैंगनी परी आ गई!
तूने बुलाया था या मेरी सुबह की दौड़ का ठेका लिया हुआ है? - समीक्षा ने हाँफते हुए कहा।
सेहत के लिए अच्छा है। शुक्रिया बोल!
समीक्षा ने उसे घूरा, लेकिन आद्या पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वो तो वैसे भी चलते-फिरते कमेंट्री बॉक्स थी। किसी की शक्ल हो, कपड़े हों या कोई हरकत, उसके पास हर चीज़ पर टिप्पणी तैयार रहती थी।
और समीक्षा? उसके दिमाग़ में हर पाँच मिनट में कोई नया विचार आता था। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि उसके दिमाग़ में विचार नहीं, सीधे-सीधे खुराफ़ात की फैक्ट्री चलती है।
दोनों हँसती-बतियाती परी के घर की तरफ़ चल पड़ीं।
वहाँ पहुँचते ही उन्हें घर के अंदर से परी की मम्मी की आवाज़ सुनाई दी। सुबह-सुबह घर के काम न करने पर परी की क्लास लग रही थी।
आद्या और समीक्षा ने एक-दूसरे को देखा। दोनों के चेहरे पर वही शरारती मुस्कान आ गई।
लगता है, आज हमारी मैडम की हाज़िरी घर पर लग रही है। - आद्या ने धीरे से कहा।
कुछ देर बाद परी बाहर आई। उसके चेहरे से साफ़ पता चल रहा था कि घर के काम और मम्मी की डाँट के बीच उसका सुबह का सारा जोश निकल चुका था।
समीक्षा ने उसे देखते ही कहा,
बहन, घर के कामों में इतनी मेहनत कर लेती, तो आज तेरी मम्मी तुझे डाँटने के बजाय अवॉर्ड दे रही होतीं!
तुम दोनों को तो बस मज़ाक चाहिए! - परी ने मुँह बनाते हुए कहा।
आख़िरकार कुछ काम निपटाने और मम्मी से बाहर जाने की इज़ाज़त लेने के बाद परी भी उनके साथ हो ली।
अब बारी थी इति की।
इति इन तीनों से थोड़ी अलग थी। सीधी-सादी, शांत और ज़रा-सी बात पर भी दस बार सोचने वाली। उसे घर से बाहर निकालना कोई आसान काम नहीं था।
तीनों उसके घर पहुँचीं, तो पहले दरवाज़ा खटखटाया और फिर आवाज़ लगाई।
अंदर से इति की आवाज़ आई...
क्या है???
बाहर आ!
क्यों?
आद्या ने माथा पकड़ लिया। अभी तो दरवाज़ा भी नहीं खुला था और सवाल-जवाब शुरू हो गए थे।
काफ़ी मनाने के बाद आख़िरकार इति बाहर आने को तैयार हुई। तीनों के लिए ये किसी उपलब्धि से कम नहीं था।
इति अपनी मर्ज़ी से घर से बाहर निकलने को तैयार हुई थी। ये कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी।
और इसी ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद चारों सहेलियाँ निकल पड़ीं मोहल्ले की सैर पर।
मोहल्ले वालों को इन चारों की टोली के बारे में अच्छी तरह पता था। इसकी सबसे बड़ी वजह थी समीक्षा की आवाज़ और चारों की हँसी, जो किसी लाउडस्पीकर से कम नहीं थी। इनके आने की ख़बर कई बार इनके पहुँचने से पहले ही लोगों तक पहुँच जाती थी।
कुछ लोग इन्हें देखकर मुस्करा देते, तो कुछ मन-ही-मन सोचते कि आज फिर ये चारों कौन-सा नया कारनामा करने वाली हैं।
लेकिन इन चारों को इन बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। इन्हें तो बस अपनी मस्ती से मतलब था।
चलते-चलते चारों इति के बगीचे के पास पहुंचे। वहाँ लगे अमरूद के पेड़ पर नज़र पड़ते ही परी की आँखें चमक उठीं। उसके चेहरे के भाव ऐसे बदल गए, जैसे किसी भूखे इंसान को सामने खाने की पूरी थाली दिख गई हो।
ओए इति! अमरूद खिला दे यार!
इति ने पेड़ की तरफ़ देखा और बड़े आराम से जवाब दिया,
कच्चे हैं सारे।
परी का चेहरा उतर गया। उसने उम्मीद भरी नज़रों से एक बार फिर पेड़ को देखा, तभी उसकी नज़र बगल वाले घर पर पड़ी। वो आद्या का दूसरा घर था और वहाँ भी अमरूद का पेड़ लगा हुआ था।
समीक्षा की नज़र भी उसी पेड़ पर जा टिकी। बस, उसके दिमाग़ में खुराफ़ात का बल्ब जल उठा।
ओए! तो क्या हुआ? ये लो, एक और पेड़!
आद्या ने पहले पेड़ को देखा, फिर समीक्षा को।
आज तो मरवाकर ही मानेगी!
तीनों की नज़रें एक साथ आद्या पर टिक गईं। उन्हें देखकर साफ़ लग रहा था कि अब इस कारनामे की ज़िम्मेदारी उसी के कंधों पर आने वाली है।
आख़िरकार आद्या ने लंबी साँस ली और दादी से नज़र बचाकर चाबी लेने के बाद दूसरे घर का ताला खोल दिया। पीछे बाकी तीनों ऐसे खड़ी थीं, मानो किसी बड़े मिशन पर आई हों।
ताला खुलते ही चारों अंदर घुस गईं।
समीक्षा ने तुरंत एक कुर्सी खींची और पेड़ के नीचे रखकर उस पर चढ़ गई। अमरूद तोड़ने की उसकी कोशिशें लगातार नाकाम हो रही थीं।
नीचे खड़ी आद्या से रहा नहीं गया।
हो गया? या पेड़ से लिखित अनुमति भी लेनी पड़ेगी?
चुप रह! ध्यान भटक रहा है!
अच्छा! मुझे लगा था, अमरूद तोड़ने के लिए बस हाथ चाहिए!
परी की हँसी छूट गई। समीक्षा ने तीनों को घूरा और आख़िरकार पूरी ताक़त लगाकर एक अमरूद तोड़ ही लिया।
येस्स्स! तोड़ लिया!
वो खुशी से कुर्सी से नीचे उतरी और अमरूद हाथ में लिए आद्या की तरफ़ उछलती-कूदती बढ़ी। लेकिन अगले ही पल उसका संतुलन बिगड़ गया।
वो सीधे इति से टकराई और इति सँभलने की कोशिश में आद्या पर जा गिरी।
धप्प!
एक पल पहले तक आद्या आराम से खड़ी तमाशा देख रही थी और अगले ही पल ज़मीन पर पड़ी थी। कुछ सेकंड तक सब शांत रहा, फिर परी और समीक्षा की हँसी छूट गई।
आद्या ने दोनों को घूरा। उसे उठाने के बजाय दोनों ऐसे हँस रही थीं, जैसे दुनिया का सबसे मज़ेदार नज़ारा देख लिया हो।
किसी तरह इति को उठाकर आद्या भी खड़ी हुई। लेकिन समीक्षा की हँसी अब भी बंद नहीं हुई थी। बस फिर क्या था! आद्या ने झट से उसका पैर पकड़ लिया।
अब हँस! हँस और!
समीक्षा का संतुलन बिगड़ा और वो भी नीचे जा गिरी। परी की हँसी और तेज़ हो गई।
आद्या ने उसकी तरफ़ देखा, तो परी ने तुरंत अपनी हँसी रोकने की कोशिश की। मगर तब तक देर हो चुकी थी। कुछ ही पलों में आद्या ने उसे भी नीचे गिरा दिया।
अब चारों ज़मीन पर थीं। किसी के कपड़ों पर मिट्टी लगी थी, किसी के बाल बिखरे थे और समीक्षा अब भी अमरूद को ऐसे पकड़े बैठी थी, जैसे इस पूरे हंगामे में वही सबसे समझदार निकली हो।
इति ने अपने कपड़े झाड़ते हुए कहा,तुम तीनों पागल हो! सच में पागल हो!
समीक्षा ने अमरूद उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
ले, तू भी खा ले। इतना सब तेरे लिए ही तो किया है!
मुझे नहीं खाना!
तो फिर ये सब किसलिए किया? - परी ने हँसते हुए पूछा।
इति ने बस सिर पकड़ लिया। उसकी हालत देखकर बाकी तीनों फिर हँस पड़ीं।
कुछ देर तक चारों वहीं बैठी हँसती रहीं। तभी समीक्षा के खुराफ़ाती दिमाग़ में एक नया विचार आया।
उसने अचानक कहा...चलो यार, चूल्हे पर मैगी बनाते हैं!
इति ने उसे ऐसे देखा, जैसे उसने मैगी नहीं, मिट्टी खाने का प्रस्ताव रख दिया हो।
भक्क! चूल्हा कहाँ से लाएँगे? मिट्टी खोदकर?
हाँ यार, चल! मज़ा आएगा! - आद्या ने भी तुरंत हामी भर दी।
परी ने दोनों को देखा और फिर बड़ी गंभीरता से बोली,
यार, पैसे ही नहीं हैं!
बस! इतना सुनते ही चारों को याद आया कि दुनिया में मैगी के अलावा पैसे नाम की भी एक चीज़ होती है।
परी के घर से पैसे मिलने की उम्मीद तो वैसे भी कम थी। सुबह-सुबह जिस तरह वो डाँट खाकर आई थी, उसके बाद दोबारा पैसे माँगना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था।
आख़िर तय हुआ कि समीक्षा, आद्या और इति पाँच-पाँच रुपये एक्स्ट्रा लेकर आएँगी। इससे मैगी का इंतज़ाम तो शायद हो जाता, लेकिन अब भी एक बड़ी समस्या बाकी थी।
चूल्हा!
तीनों की नज़र धीरे-धीरे आद्या पर घूम गई।
आद्या ने उन्हें देखते ही माथा पकड़ लिया।
अरे, मेरे घर में चूल्हा है तो क्या मैं तुम्हें मैगी की दावत देने बैठी हूँ?
दादी को पता चला न, तो हम चारों की हड्डी-पसली एक हो जाएगी!
इति ने तुरंत हामी भरी।
सही कह रही है। आद्या की दादी से ख़तरनाक कोई नहीं है। तुम लोग ही कुछ करो, मुझे इसमें मत घसीटना।
वाह! मुसीबत आते ही दोस्ती ख़त्म! - आद्या ने उसे घूरते हुए कहा।
इति ने बिना शर्माए जवाब दिया...अपनी जान सबको प्यारी होती है, बहन!
समीक्षा को अचानक इति के घर की भट्टी याद आ गई।
अरे, तेरे यहाँ भी तो भट्टी है! वहीं बना लेते हैं।
बिल्कुल नहीं! - इति ने तुरंत मना कर दिया।
उसे मनाने की कोशिश करना भी बेकार था। इति एक बार किसी बात के लिए मना कर दे, तो उसे मनाने में जितनी मेहनत लगती, उससे कम में शायद नई मैगी की दुकान ही खुल जाती।
अब चारों फिर सोच में पड़ गईं।
मैगी का प्लान तैयार था, पैसों का इंतज़ाम भी हो सकता था, लेकिन चूल्हे का कोई ठिकाना नहीं था।
समीक्षा कुछ देर चुप रही। फिर उसके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान लौट आई।
आद्या ने उसे देखा और तुरंत चेतावनी दी,देख समीक्षा, अब कोई नया कांड मत सोचना!
लेकिन समीक्षा तो समीक्षा थी। उसके दिमाग़ में एक और विचार आ चुका था।
समीक्षा कुछ देर चुप रही। फिर अचानक आद्या की तरफ़ मुड़ी। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी, जिसे देखकर आद्या को अपने फ़ैसलों पर दोबारा सोचने का मन करने लगा।
देख आद्या, आज शाम अपने प्लान को अंजाम देते हैं!
आद्या ने शक़ भरी नज़रों से उसे देखा।
समीक्षा ने अपना पूरा प्लान समझाया। शाम को आद्या की दादी मंदिर चली जाती थीं और कुछ देर पहले ही आद्या ने बताया था कि उसकी मम्मी को भी कहीं बाहर जाना है। यानी घर पर नज़र रखने वालों की संख्या कुछ समय के लिए कम होने वाली थी।चूल्हा छत पर रख देंगे, किसी कोने में। वहीं मैगी बना लेंगे! - समीक्षा ने ऐसे कहा, जैसे उसने कोई बहुत बड़ी खोज कर ली हो।
आद्या के चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट आई। उसे दादी का ख़याल तो आया, लेकिन फिर उसने ख़ुद को समझाया कि वो किसी से डरने वालों में से थोड़ी है!
आख़िरकार उसने भी हामी भर दी।
परी तो ख़ुशी के मारे सातवें आसमान पर थी। उसे लग रहा था कि आज की शाम यादगार होने वाली है। दूसरी तरफ़ इति चुपचाप बैठी थी। ऊपर से वो इस पूरे प्लान से दूर-दूर रहने का नाटक कर रही थी, लेकिन अंदर ही अंदर उसे भी थोड़ा मज़ा आने की उम्मीद थी।
चारों ने तय किया कि घर जाकर नहा-धोकर शाम को आद्या के घर मिलेंगी। साथ ही, समीक्षा ने ऐलान किया कि तीनों को बीस-बीस रुपये लेकर आने होंगे।
आद्या ने तुरंत हिसाब लगाया।
मतलब साठ रुपये की मैगी? हम खाएँगे या दुकान खोलेंगे?
चुप! बजट की चिंता मुझे करने दे - समीक्षा ने जवाब दिया।
आद्या ने मन-ही-मन सोचा कि जिस दिन समीक्षा बजट सँभालने लगी, उस दिन देश की अर्थव्यवस्था को भी भगवान ही बचाएँगे।
ख़ैर, प्लान बन चुका था। अब बस शाम होने का इंतज़ार था।
शाम होते-होते ठंड एक बार फिर बढ़ने लगी थी। आसमान पर हल्का अँधेरा उतर आया था और मोहल्ले में लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे।
आद्या अपने पापा की वही जैकेट पहने घर के बाहर इंतज़ार कर रही थी। उसके चेहरे पर उत्साह भी था और थोड़ी घबराहट भी। बार-बार घर की तरफ़ देख लेती, फिर गली में झाँकने लगती।
कुछ ही देर में बाकी तीनों भी आ पहुँचीं।
परी आते ही बोली...चलो बहनों, कांड नंबर 109 को अंजाम देते हैं!
आद्या ने उसे घूरा।
एक सौ नौ? इतने कांड कब किए हमने?
गिनने बैठी तो रात हो जाएगी - परी ने बेफ़िक्री से जवाब दिया।
समीक्षा ने तुरंत अपने मिशन का नाम घोषित किया,
पेश है आज का ऐतिहासिक अभियान : प्रोजेक्ट खुराफ़ाती खिचड़ी।
तीनों कुछ पल उसे देखती रहीं।
फिर आद्या बोली...नाम मैगी का है या किसी फ़िल्म के फ्लॉप होने का?
इति की हँसी छूट गई। समीक्षा ने उसे घूरा, फिर सबको अपने साथ चलने का इशारा किया।
चारों ऐसे आगे बढ़ीं, जैसे किसी बहुत गुप्त मिशन पर जा रही हों। जबकि असलियत ये थी कि उनके पास एक पैकेट मैगी बनाने का प्लान, थोड़े-से पैसे और ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास था।
और इन तीनों में भी आत्मविश्वास सबसे ज़्यादा समीक्षा के पास था।
आद्या के घर पहुँचकर चारों ने पहले इधर-उधर देखा। दादी मंदिर गई हुई थीं और मम्मी भी घर पर नहीं थीं। समीक्षा ने राहत की साँस ली, मानो आधी जंग जीत ली हो।
अब बारी थी असली काम की।
मैगी, बर्तन और बाकी सामान जुटाया जाने लगा। चूल्हे को छत पर एक सुरक्षित जगह रखने की तैयारी हुई। आद्या बीच-बीच में घर की तरफ़ देख लेती, जबकि परी की नज़र बार-बार मैगी के पैकेट पर जा रही थी।
इति अब भी थोड़ी सतर्क थी। उसे पता था कि अगर कुछ गड़बड़ हुई, तो ये तीनों सबसे पहले एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाएँगी और आख़िर में सबको याद आएगा कि वो भी वहीं मौजूद थी।
समीक्षा ने सबको काम बाँटने की कोशिश की, लेकिन पाँच मिनट के अंदर ही सबकी हालत ऐसी हो गई कि काम कम और बहस ज़्यादा होने लगी।
आद्या ने आखिरकार हाथ उठाकर कहा...
एक मिनट! मैगी बनानी है, कोई किला नहीं जीतना!
चारों हँस पड़ीं।
आख़िरकार चारों ने अपने ऐतिहासिक मिशन की शुरुआत कर ही दी।
समीक्षा और आद्या मैगी बनाने में लगी थीं, परी बीच-बीच में अपनी सलाह दे रही थी और इति एक तरफ़ बैठकर सबको ऐसे देख रही थी, जैसे कोई कुकिंग शो चल रहा हो और वो उसकी मुख्य दर्शक हो।
सच तो ये था कि इति को काम का 'क' भी नहीं आता था। उसे काम में शामिल करने का मतलब था काम बढ़ाना और चारों का धैर्य घटाना।
कुछ देर तक मैगी को पकते हुए देखने के बाद परी के दिमाग़ में एक और इच्छा जागी।
यार, इसके साथ अदरक वाली चाय भी बन जाती, तो क्या ही कहना!
समीक्षा ने तुरंत बचे हुए पैसों का हिसाब लगाया।
पैसे बचे हैं न? जा, दूध ले आ!
परी दूध लेने निकल गई और आद्या चायपत्ती, चीनी और चाय बनाने के बर्तन उठा लाई। मैगी के बर्तन भी उसी ने जुटाए थे। कुल मिलाकर घर के सामान की ऐसी बारात निकली थी कि अगर मम्मी को पता चल जाता, तो शायद अगली बार आद्या को रसोई में घुसने से पहले अनुमति-पत्र भरना पड़ता।
धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ने लगा। मैगी भी पकने के करीब थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था, आद्या की घबराहट बढ़ती जा रही थी।
वो बार-बार सीढ़ियों की तरफ़ देखती। बाकी तीनों को बस मैगी की पड़ी थी, जबकि आद्या के दिमाग़ में एक ही सवाल घूम रहा था - अगर मम्मी या दादी आ गईं, तो?
और मानो उसकी मनोकामना सुन ली गई हो!
घर के अंदर मम्मी और दादी की एंट्री हो गई।
अँधेरा हो चुका था, इसलिए उन्हें छत पर चल रहे इस महान अभियान के बारे में तुरंत कुछ पता नहीं चला। उधर चारों की मैगी तैयार हो चुकी थी। आद्या ने फटाफट चाय भी चढ़ा दी।
फिर क्या था! चारों ऊपर वाले कमरे में बैठकर मैगी खाने लगीं। चेहरे ऐसे खिले हुए थे, जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीतकर आई हों।
इति भी बड़े आराम से मैगी खा रही थी। काम के समय भले ही उसने एक उँगली न हिलाई हो, लेकिन खाने के समय उसकी मौजूदगी शत-प्रतिशत थी।
सब कुछ ठीक चल रहा था।
और यही सबसे बड़ी चिंता की बात थी।
नीचे मम्मी को अचानक कुछ जलने और धुएँ जैसी गंध महसूस हुई। उन्होंने इधर-उधर देखा और फिर छत की तरफ़ बढ़ने लगीं।
उधर आद्या के कानों ने जैसे ही मम्मी की पायल की छन-छन पहचानी, उसके चेहरे की सारी खुशी गायब हो गई।
अरे बाप रे!
वो तुरंत नीचे की तरफ़ भागी और सीढ़ियों के पास मम्मी से जा मिली।
क्या कर रही हो छत पर? - मम्मी ने पूछा।
आद्या ने घबराहट छिपाते हुए बात घुमानी शुरू कर दी। कभी इधर की बात, कभी उधर की। मम्मी कुछ पल के लिए उसकी बातों में उलझ भी गईं।
बस, इसी मौके का फ़ायदा उठाकर आद्या वापस ऊपर भागी।
भागो! मम्मी ऊपर आ रही हैं! जल्दी बर्तन साफ़ करो!
अब जो नज़ारा था, वो देखने लायक था।
समीक्षा ने कढ़ाई उठाई, परी ने चाय के बर्तन सँभाले और इति ने पहली बार बिना कहे काम करने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही उन सबकी नज़र बर्तनों पर पड़ी, चारों की आत्मा तक काँप गई।
मैगी की कढ़ाई और चाय के बर्तन पूरी तरह काले पड़ चुके थे!
चारों को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि चूल्हे पर बर्तन ऐसे काले भी हो सकते हैं।
आद्या ने माथा पीट लिया।अरे, ये क्या हो गया?!
समीक्षा ने कढ़ाई को उलट-पलटकर देखा, मानो उसे साफ़ करने का कोई गुप्त बटन ढूँढ़ रही हो।यार, ये बर्तन हैं या कोयले के टुकड़े?
परी ने घबराकर कहा,
अब मम्मी को क्या बोलेंगे?
आद्या ने उसे घूरा।
पहले इन्हें साफ़ तो कर लो, फिर मिलकर अपनी अंतिम इच्छा लिखना!
परी और समीक्षा बर्तन लेकर ऊपर वाले बाथरूम में घुस गईं। इति भी उनके पीछे-पीछे ऐसे भागी, जैसे पुलिस से बचने के लिए पूरी टोली एक ही ठिकाने पर छिप रही हो।
उधर आद्या सीढ़ियों के पास खड़ी मम्मी को बातों में उलझाने की कोशिश कर रही थी।
बाथरूम के अंदर समीक्षा और परी बर्तन रगड़ने में लगी थीं। इति दरवाज़े के पास खड़ी बाहर की आहट सुन रही थी। उसकी हालत ऐसी थी कि अगर कोई छींक भी देता, तो वो डरकर दूसरी मंज़िल से सीधे नीचे पहुँच जाती।
काफ़ी मेहनत के बाद बर्तन कुछ साफ़ हुए। तीनों ने राहत की साँस ली और उन्हें कमरे में रखकर बाहर निकलने लगीं।
लेकिन किस्मत को शायद इनकी खुशी बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
तभी मम्मी छत पर पहुँच गईं।
उनकी नज़र सबसे पहले चूल्हे पर पड़ी। फिर बर्तनों पर। फिर कमरे की तरफ़।
और अगले ही पल उनकी आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी...आद्यााआआ!
आद्या सीढ़ियों पर ही ठिठक गई।
समीक्षा और परी के चेहरे ऐसे पड़ गए, जैसे मैगी के साथ उनकी सारी हिम्मत भी उबलकर खत्म हो गई हो। इति तो डर के मारे वापस बाथरूम में घुस गई और दरवाज़े के पीछे खड़ी हो गई।
आद्या नीचे खड़ी डाँट सुन रही थी। उसकी तीनों सहेलियाँ पीछे से चुपचाप निकलने की कोशिश कर रही थीं। उनके कदम इतने धीमे थे कि लगता था ज़मीन पर पैर नहीं, रुई रख रही हों।
तभी दादी भी वहाँ आ पहुँचीं।
अब तो आद्या की हालत देखने लायक थी।
मम्मी की डाँट अलग और अब तो ऐसा लग रहा था मानो सामने साक्षात यमराज दिख गये हो ।
वो सीढ़ियों पर खड़ी मन-ही-मन सोच रही थी कि आख़िर सुबह घर से निकलते समय उसे इतनी खुशी किस बात की थी।
उधर समीक्षा, परी और इति ने मौका देखकर बर्तन कमरे में रखे और दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरने लगीं।
तीनों को लगा कि उनका बच निकलना लगभग तय है।
लेकिन तभी दादी की नज़र उन पर पड़ गई।
अरे! तुम तीनों यहाँ क्या कर रही हो?
तीनों वहीं जम गईं।
परी ने मुस्कराने की कोशिश की।
समीक्षा ने नज़रें झुका लीं और इति ने तो ऐसे चेहरा बना लिया, जैसे वो गलती से किसी दूसरे मोहल्ले में आ गई हो।
दादी ने तीनों को देखा, फिर सीढ़ियों पर खड़ी आद्या को।अच्छा! तो ये पूरा गिरोह मिलकर मैगी बना रहा था?
आद्या ने धीरे से कहा,
दादी, वो... बस थोड़ी-सी मैगी...
दादी ने तुरंत पूछा,और बर्तन काले करने का भी कोई प्रोजेक्ट था?
पीछे खड़ी समीक्षा से हँसी रोकते नहीं बनी। लेकिन जैसे ही दादी ने उसकी तरफ़ देखा, उसकी हँसी वहीं गायब हो गई।
मम्मी ने चारों को एक साथ खड़ा कर दिया और फिर शुरू हुई पूछताछ। कौन मैगी लाया, किसने चूल्हा जलाया, किसने चाय बनाई और किस महान दिमाग़ ने ये पूरा प्लान बनाया?
चारों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
फिर तीनों की नज़र धीरे-धीरे समीक्षा पर जा टिकी।
समीक्षा ने अविश्वास से उन्हें देखा।
वाह! प्लान सबका था और गुनहगार मैं अकेली?!
आद्या ने तुरंत जवाब दिया,
आइडिया तेरा था, बहन। हम तो बस भावनाओं में बह गए थे!
परी ने भी हामी भर दी।
हाँ, मैं तो बस मैगी खाने आई थी!
इति ने सबसे पीछे से धीरे से कहा,और मैं तो कुछ कर ही नहीं रही थी।
चारों एक पल के लिए चुप हो गईं।
फिर मम्मी ने पूछा,अच्छा! तो बर्तन अपने आप काले हो गए?
इस बार किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
आख़िरकार चारों को बर्तन साफ़ करने की ज़िम्मेदारी मिली और साथ में ऐसी डाँट भी, जिसे वो अगले कई रविवार तक याद रखने वाली थीं।
बर्तन धोने का काम शुरू हुआ। चारों सहेलियाँ रसोई में ऐसे मुँह लटकाकर बैठी थीं, जैसे बर्तन नहीं, अपनी ज़िंदगी के फैसले धो रही हों।
“हे भगवान! ये आख़िरी प्लेट है या इसका पूरा खानदान बाकी है?” समीक्षा ने प्लेट को घूरते हुए कहा।
“चुपचाप धो ले! तेरी वजह से ही तो ये सब हुआ है!” आद्या फुसफुसाई।
“मेरी वजह से? मैगी बनाने का आइडिया किसका था?”
“आइडिया मेरा था, लेकिन गैस पर भगोना तूने रखा था!”
“अच्छा! तो अब मैं ही फाँसी चढ़ जाऊँ?”
“अरे चुप रहो तुम दोनों!” परी ने दाँत पीसते हुए कहा, “दादी ने सुन लिया ना, तो फाँसी से पहले झाड़ू-पोछा भी लगवा देंगी!”
तभी बाहर से दादी की कड़कती आवाज़ आई...
“अरे ओ घर की चार महारानियो! बर्तन माँज रही हो कि उनकर मुँह देखकर कथा बाँच रही हो? इत्ते देर में तो हमार गाँव भर के बर्तन धुल जातें!”
चारों ने एक-दूसरे को देखा।
इति ने धीरे से कहा, “यार, दादी को कैसे पता चल जाता है कि हम काम नहीं कर रहे?”
समीक्षा बोली, “उनके पास CCTV नहीं, सास वाली स्पेशल डिटेक्शन पावर है!”
चारों की हँसी छूटते-छूटते बची।
दादी फिर चिल्लाईं, “और सुनो! छत में जो मैगी का कीचड़ फैला है, ऊ भी साफ करो! का हमारी छत है या नाली के बगल वाला ठेला?”
“दादीईई! कीचड़ नहीं, मैगी थी!” आद्या मुँह दबाकर बोली।
“हाँ-हाँ! और हमारी छत में जो कोयला हो रहा है, ऊ का तुम्हरे ससुराल की रसोई से आया है?”
अब तो समीक्षा ने अपना मुँह ही प्लेट में छिपा लिया। हँसी रोकना मुश्किल हो रहा था।
थोड़ी देर बाद चारों ने एक-दूसरे को इशारा किया।
ऑपरेशन भागम-भाग शुरू!
आद्या ने धीरे से दरवाज़ा खोला। समीक्षा ने चप्पल हाथ में उठा ली। परी ने अपनी जैकेट सँभाली और इति ने जाते-जाते एक बिस्कुट उठा लिया।
“अबे! बिस्कुट क्यों उठा रही है?” आद्या ने फुसफुसाकर पूछा।
“भागने के बाद भूख लगेगी ना!”
“तेरे पेट में चूहा रहता है क्या?”
“चूहा नहीं, पूरा चिड़ियाघर!”
चारों दबे पाँव दरवाज़े तक पहुँची ही थीं कि पीछे से आवाज़ आई-
“अरे वाह रे! काम पूरा भवा नहीं, और मेहमाननवाज़ी करके जा रही हो?”
चारों के पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गई।
धीरे-धीरे पलटीं तो दादी हाथ में बेलन लिए खड़ी थीं।
समीक्षा ने आद्या के पीछे छिपते हुए कहा, “दादी, आप बेलन लेकर क्यों खड़ी हैं?”
दादी बोलीं, “का करिहैं? आरती उतारिहैं तुम चारों की? आओ, माथा आगे करो, टीका लगा दें!”
“दादी, आप तो मज़ाक भी बहुत अच्छा करती हैं!” इति ने हँसी दबाते हुए कहा।
“और तुम चारों काम भी बहुत अच्छा करती हो! एक भगोना जलायो, चाय में नमक डालो, अब हमरे घर को होटल समझकर भाग रही हो!”
परी ने मासूम चेहरा बनाकर कहा, “दादी, गलती तो इंसान से ही होती है।”
“हाँ बिटिया, पर तुम चारों से तो गलती भी टोली बनाकर होती है! अकेले कोई काम नहीं होता का?”
बस! ये सुनते ही समीक्षा ज़ोर से हँस पड़ी।
“दादी, टोली बनाकर गलती करना भी एक कला है!”
दादी ने बेलन उठाकर हवा में घुमाया।
“अच्छा! अब कला दिखाऊँ का? चारों की चारों झाड़ू उठाओ! जब तक छत चमके ना, तब तक कोई बाहर नहीं जाएगा!”
“लेकिन दादी…” आद्या ने कहना शुरू किया।
“लेकिन-वेकिन कुछ नहीं! और सुनो, कल से खाना बनाना सीखोगी। पहिले चाय बनाना सीखो, फिर दुनिया जीतने निकलना!”
चारों ने एक साथ मुँह बनाया।
“जी दादी…”
अगले दिन चारों को फिर रसोई में बुलाया गया। दादी सामने खड़ी थीं और चारों चाय बनाने में लगी थीं।
समीक्षा ने कप में चाय डाली, एक घूँट लिया और मुँह बना लिया।
“क्या हुआ?” आद्या ने पूछा।
“यार… इसमें चीनी डाली थी या नमक?”
दादी ने कप चखा और सिर पकड़ लिया।
“हे भगवान! ई चाय है कि समुद्र का पानी? तुम चारों को चाय बनाना सिखाएँ कि घर बेचकर हलवाई बुलाएँ?”
परी ने धीरे से कहा, “दादी, एक काम करते हैं। हम चाय बनाना छोड़कर सीधा हलवाई ही बन जाते हैं।”
दादी ने घूरकर देखा।
“पहिले बर्तन तो ठीक से माँजना सीख ले, हलवाई की नातिन!”
चारों एक दूसरे की तरफ देखकर फिर हँसने लगीं।
क्योंकि इन चारों की दोस्ती में एक नियम बिल्कुल पक्का था....
“कांड चाहे कोई भी करे, फँसेंगी चारों ही… और डाँट सबसे पहले दादी से ही पड़ेगी!”