7 Month Pyaar ke - 2 PATEL RJ द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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7 Month Pyaar ke - 2



*7 महीने प्यार के - Part 2*

धीरज को गए हुए 4 महीने हो गए थे।

लोग बोलते हैं 4 महीने में सब ठीक हो जाता है। नहीं होता। 4 महीने में बस रोना कम होता है। पहले दिन में 10 बार रोती थी, अब दिन में 1 बार याद आता है। पर याद अब भी उतनी ही गहरी आती है।

चैट अब भी पिन पे थी। रितु ने डिलीट नहीं की। क्योंकि डिलीट करने से यादें डिलीट नहीं होती। उसने बस उस चैट को देखने का टाइम बदल दिया। पहले हर 10 मिनट में देखती थी। अब दिन में 2-3 बार। कभी-कभी तो पूरा दिन निकल जाता था बिना देखे। और जब देखती थी, तो पहले जैसा दर्द नहीं होता था, एक अजीब सी शांति होती थी।

पहले वो रात को 2 बजे तक जागती थी क्योंकि धीरज से बात करनी होती थी। अब वो 2 बजे तक जागती थी क्योंकि उसको खुद से बात करनी होती थी। खुद से पूछती थी, रितु तू ठीक है? आज तूने खाना खाया? आज तूने पानी पिया? आज तूने अपने लिए कुछ किया?

एक रात उसने अपनी पुरानी डायरी खोली। बहुत धूल लगी थी। लास्ट पेज पे उसने 7 महीने पहले लिखा था - "मुझे लाइफ में एक ही लड़का चाहिए, जो मेरा BF हो और वही मेरा हसबैंड बने। उसके साथ पूरी लाइफ।"

उसने उस लाइन को देखा और हँसी। ना गुस्से वाली हँसी, ना रोने वाली। बस एक समझ वाली हँसी। उसने उसके नीचे आज लिखा - "मुझे लाइफ में एक ही लड़की चाहिए, जो पहले खुद की बेस्ट फ्रेंड बने। उसके बाद जो आएगा देखा जाएगा।"

उस दिन उसको समझ आया, धीरज से पहले भी तो एक रितु थी। जो सुबह 6 बजे उठ जाती थी बिना अलार्म के। जो SR accountant बनना चाहती थी। जो अपनी मम्मी के लिए चाय बनाती थी और बोलती थी देखो मैं बड़ी हो गई। जो हँसती थी तो पूरा घर हँसता था। तो वो रितु कहाँ गई? क्या वो सिर्फ 7 महीने के प्यार में खो गई?

अगली सुबह रितु ने अलार्म 6 बजे का लगाया। किसी का GM का msg नहीं आया। फोन खाली था। उसने खुद को बोला - GM रितु। आज का दिन तेरा है। उठ जा। उसने चाय बनाई। पहले सपनों में सोचती थी धीरज के लिए बनाऊँगी, अपने हाथों से खिलाऊँगी। आज अपने लिए बनाई। थोड़ी कड़क, थोड़ी मीठी, जैसे उसको पसंद है। पहली बार चाय पीते हुए उसको लगा, अरे ये तो अच्छी बनी है।

कोच्चि वाला सपना याद है? धीरज ने बोला था मेरे पास पैसे नहीं है, शादी के बाद ले जाऊँगा पहली ट्रिप पे। रितु ने उस बात को सपना बना लिया था। हर रात सोचती थी समुंदर देखेंगे साथ में।

रितु ने अपनी सैलरी से कोच्चि की टिकट बुक की। अकेली। विंडो सीट। फ्लाइट में जब बादलों के ऊपर गई, तो उसको डर लगा। पहले सोचती थी धीरज होता तो हाथ पकड़ लेता। फिर खुद ही अपना हाथ पकड़ लिया। बोला, डर मत रितु, मैं हूँ।

समुंदर के सामने खड़ी होके उसने अपना नाम चिल्लाया - RITU! लोगों ने देखा। एक दो लोग हँसे भी। पर उसको शर्म नहीं आई। पहली बार लगा वो छोटी सी लड़की नहीं, पूरी रितु है। बड़ी, समझदार, अकेली चल सकने वाली।

रात को होटल में उसने वही पुराने chats खोले। वही लास्ट लाइन - "आज के बाद मुझे MSG मत करना।" उस लाइन को पढ़ के पहले साँस रुक जाती थी। आज भी रुकी। पर 2 सेकंड के लिए। उसने उस चैट को डिलीट नहीं किया। उसने उस चैट के ऊपर एक नया फोल्डर बनाया अपने फोन में। नाम रखा - "यादें"। उस फोल्डर में उसने डाला - धीरज का पहला hii, उसका "मोडक सारखी गोड गोड आहे", उसके good morning वाले msgs, उसके हँसाने वाले jokes.

उसने लिखा - ये सब झूठ नहीं था। ये 7 महीने सच थे। बस पूरे सच नहीं थे। और अधूरे सच को साथ लेके भी जिया जा सकता है। इसमें रोने वाली कोई बात नहीं।

कोच्चि से वापस आने के बाद रितु ने अपने रूम में एक बोर्ड लगाया। उसपे लिखा - "रितु के rules"

Rule 1 - रोज़ सुबह खुद को GM बोलना है। बिना किसी के msg का wait किये।
Rule 2 - रोज़ रात को खुद को GN बोलना है। खुद को बताना है आज क्या अच्छा किया।
Rule 3 - कोई याद आये तो भगाना नहीं, लिख देना है। डायरी में।
Rule 4 - अपने सपने किसी और के लिए postpone नहीं करने।

उसने अपनी CA की books जो 7 महीने से बंद थी, वापस खोली। पहले पेज पे धीरज का नाम लिखा था दिल के साथ। उसने whitener लगाया और लिखा - "रितु पटेल, CA. - अपने लिए।" पढ़ाई करते करते जब मन भटकता, तो वो याद कर लेती। फिर वापस book खोल लेती। पहले guilty लगता था कि याद क्यों आ रही है। अब बोलती थी - याद आना normal है, पढ़ाई रोकना नहीं।

शाम को वो walk पे जाने लगी। Earphone में गाने नहीं लगाती थी। बस हवा सुनती थी, लोगो को देखती थी। कभी रास्ता भूल जाती और नए रास्ते पे चली जाती। पहले डरती थी। अब बोलती - नया रास्ता है, देख लेते हैं कहाँ जाता है। एक दिन walk करते करते उसको एक चाय की टपरी मिली। वहाँ बैठ के उसने चाय पी। अकेली। और अच्छा लगा।

एक दोस्त ने पूछा, रितु तू ठीक है? Move on हो गया तेरा?

रितु ने बोला, पता नहीं move on क्या होता है। Dictionary वाला move on तो नहीं हुआ। मैं बस move कर रही हूँ। रोज़ थोड़ा थोड़ा। कभी आगे, कभी एक कदम पीछे, पर रुक नहीं रही। और शायद यही move on है।

एक रात उसने बिना किसी occasion के अपने लिए एक cake order किया। छोटा सा। ऊपर लिखा - "Thank you, Ritu." खुद ही काटा। खुद को खिलाया। मम्मी ने देखा तो बोली, पागल है क्या अकेली cake कौन काटता है। रितु बोली, मैं काटती हूँ। मुझे अच्छा लग रहा है।

तब उसको समझ आया। प्यार खत्म नहीं हुआ है। बस उसका address बदल गया है। पहले धीरज के पास रहता था, अब खुद के पास रहता है। पहले उसके लिए सजती थी, अब अपने लिए सजती है। पहले उसके लिए हँसती थी, अब अपने लिए।

आज भी रितु कभी-कभी रात को 2 बजे जाग जाती है। पुरानी chats पढ़ती है। आँखें नम होती हैं। कभी एक आँसू आ भी जाता है। पर अब वो फोन रख के रोती नहीं। फोन रख के मुस्कुराती है और बोलती है - Thank you Dhiraj, तुमने मुझे 7 महीने प्यार करना सिखाया, और उसके बाद मैंने खुद से प्यार करना सीख लिया।

चैट आज भी पिन पे है। पर अब दर्द के लिए नहीं, इस याद के लिए कि मैंने सच में प्यार किया था। और सच में प्यार करना गलत नहीं था।

और रितु? रितु आगे बढ़ गई है। यादों को लेके। खुद के साथ। खुद से प्यार करते हुए। रोज़ थोड़ा और।

उसने diary के last page पे आज लिखा -

"अभी breakup को 1 साल भी नहीं हुआ, सिर्फ 4 महीने हुए हैं।
मैं पूरी ठीक नहीं हुई हूँ।
पर मैं ठीक हो रही हूँ।
हर सुबह थोड़ा और।
और अगर तुम ये पढ़ रहे हो और तुम भी इस phase में हो, तो याद रखना - कोई चला जाए तो दुनिया खत्म नहीं होती।
बस प्यार करने का तरीका बदल जाता है।
खुद से शुरू करो।"

इंटरेस्ट से शुरू हुआ था,
प्यार तक गया था,
फिर प्यार अधूरा रह गया,
पर मैं पूरी रह गई।

सोचा था कोई आएगा,
मुझे संभालेगा,
फिर समझा कोई नहीं आता,
खुद को खुद ही संभालना पड़ता है।

पहले लगता था,
कोई हाथ पकड़ेगा तो चलूँगी,
अब समझा,
हाथ छूटा तो भी चलना पड़ता है,
और मैं चल ली।

अब रातों को 2 बजे नींद खुलती है तो,
घबराती नहीं हूँ,
खुद से पूछती हूँ,
रितु, चाय पियेगी?
और खुद ही बोलती हूँ, हाँ, बना लेते हैं।

किसी ने सिखाया था प्यार करना,
किसी ने नहीं सिखाया था खुद से प्यार करना,
वो मैंने खुद सीख लिया,
थोड़ा रोज़, थोड़ा रोज़।

मैं वापस नहीं आई हूँ किसी के पास,
मैं वापस आ गई हूँ खुद के पास

*Thanks Dhiraj*

Thanks तुझे, तूने अधूरा छोड़ा,
वरना मैं पूरी कैसे होती?

तू चला गया, मैं रह गई,
लोग कहते हैं मैं अकेली रह गई,
उन्हें कौन समझाये,
तू गया तभी तो मैं खुद से मिली हूँ।

तूने मेरा नाम "रितु" से "तेरी रितु" किया था,
तूने "तेरी रितु" से वापस "सिर्फ रितु" बना दिया,
इससे बड़ा एहसान क्या होगा?

तेरी कमी में मैंने खुद को ढूंढा है,
तेरी याद में मैंने खुद को लिखा है,
तू मेरी कहानी का हिस्सा था,
अब तू मेरी कविता की वजह है।

Thanks Dhiraj,
तूने प्यार देकर छोड़ा नहीं,
तूने प्यार लेकर छोड़ दिया,
तभी तो आज मेरे पास,
देने के लिए अब भी प्यार बचा है,
खुद के लिए।

PATEL RJ