अन्तर्निहित - 62 Vrajesh Shashikant Dave द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अन्तर्निहित - 62

[62]

नदी का जल पीकर दोनों ने भूख को शांत करने का प्रयास किया। 

“शैल, अब हमें आगे क्या करना चाहिए?”

“मैं भी यही विचार में हूँ। कुछ तो करना पड़ेगा।”

“मैं भी कुछ सोचती हूँ।”

कुछ मौन क्षणों के पश्चात, “शैल, कुछ उपाय मिला क्या?”

“एक ही उपाय है। समय की भी यही इच्छा है कि कुछ समय तक हमें यहाँ से कहीं दूर, किसी अज्ञात स्थान पर चला जाना चाहिए। हमें ऐसे के अज्ञातवास में जाना चाहिए जहां सभी के लिए हम अपरिचित हों, अज्ञात हों।”

“हाँ यह ठीक है। कुछ समय हम अपनी गतिविधियों से दूर रहेंगे तो सपन – निहारिका की दृष्टि से दूर हो जाएंगे। जब तक वे हमारे पीछे हैं, हम अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। तो कहाँ चलना है हमें?”

“इस ‘कहाँ’ का उत्तर ही तो खोजना है।”

दोनों पुन: मौन हो गए। दोनों के मन में बीते दिनों की घटनाएं रम रही थीं। 

“सरिता जी, उस ब्राह्मण युवक ने क्या कहा था, जिसने तुम्हें बचाया था?”

“क्या कहा था?”

“शरीर को नष्ट नहीं करो, शरीर मूल्यवान है।”

“हाँ। अभी इसका क्या है?”

“उसने यह भी कहा था कि शरीर के मूल्य के विषय में उसके पिता जानते हैं।”

“किन्तु उसके पिता तो गाँव से बाहर हैं।”

“उसी गाँव में सपन और निहारिका रात्रीभर रहे हैं।”

“उसने यह भी कहा था कि किसी शास्त्र के जानकार व्यक्ति से इस विषय में पूछना, वह बता सकता है।”

“किन्तु ऐसा शास्त्रों का जानकार कौन है, जिसके पास जाकर हम यह जान सकें?”

“मानो कि हमने ऐसे शास्त्रज्ञ से भेंट भी कर ली और हमने अपना परिचय उन्हें दिया और उसने सपन निहारिका को वहीं बुला लिया तो? तब क्या होगा इसका विचार किया है?”

“हमें ऐसे व्यक्ति के पास जाना होगा जो शास्त्रज्ञ हो और हमारे मिलन की बात किसी को भी न कहे।”

“ऐसा कौन है, शैल?”

“है, एक व्यक्ति है जो शास्त्रज्ञ भी है और हमारा भेद भी प्रकट नहीं करेगा।”

“कौन है वह, शैल?”

“वत्सर!”

“क्या? वत्सर?”

“हाँ, सरिता जी। वह अवश्य शास्त्रज्ञ है।”

“तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि वह शास्त्रों का ज्ञाता है?”

“न्यायालय की प्रक्रिया का स्मरण करो। जब राधा के अस्तित्व पर तर्क वितर्क चल रहे थे तब उसने सारे के सारे तर्कों को कैसे काट डाला था? उसने अपनी सारी बातें शास्त्रों के प्रमाण के आधार पर रखी थी। कपिल, स्वामीजी, कथाकार सब के सब उसके तर्क के सामने मौन हो गए थे।”

“यहाँ तक कि न्यायाधीश की पत्नी और बेटी भी वत्सर के तर्कों का उत्तर न दे सके थे।”

“और अंत में स्वयं न्यायाधीश भी वत्सर के तर्क को स्वीकार करने पर बाध्य हो गए थे।”

“यह सब तो मुझे स्मरण है शैल, किन्तु क्या वत्सर हमारी सहायता करेगा? कुछ समय तक हमें आश्रय देकर हमारे अज्ञातवास का स्वीकार करेगा?”

“क्यों नहीं करेगा?”

“हम पुलिसवाले हैं। हमने ही उसे मीरा की घटना में घसीटा था। न्यायालय में पुलिस ने ही उस पर मीरा हत्या का अभियोग चलाया था। इतना सब होने के पश्चात भी क्या वत्सर हमें आश्रय देगा?”

“मीरा घटना में हमने ही उसे घसीटा था किन्तु वह तो येला ने ही हमें उस शिल्प की बात कहकर प्रेरित किया था। दूसरी बात, वत्सर पर न्यायालय में अभियोग हमने नहीं नदीम – राहुल -सोनिया ने मिलकर किया था।”

“उन तीनों का नाम ही न लेना, शैल।”

“ठीक है, नहीं लूँगा।”

“तो चलें वत्सर के पास?”

“शैल, क्या उचित रहेगा? वत्सर के पास जाना या येला के पास?”

“येला के पास क्यों, सरिता जी? वह थोड़ी शास्त्रज्ञ है?”

“वत्सर येला की बात नहीं टालता। येला के पास जाकर उसे सब बात बता देते हैं। येला के ऊपर तो कभी किसी ने कोई अभियोग नहीं किया था। वह अवश्य हमारी सहायता करेगी ऐसा मेरा विश्वास है।”

“सरिता जी, येला के पास जाने में एक भयस्थान है।”

“क्या?”

“सपन येला की शिल्पशाला में आता जाता रहता है। शिल्पकार जो है वह। वहाँ वह हमें देख सकता है। हमारा अज्ञातवास भंग हो सकता है।”

“तब तो वत्सर के पास जाना ही उचित रहेगा।”

“चलो, यहाँ से भागो। जहां से जो साधन मिले, सीधे वत्सर के पास जाते हैं।”

*()*()*()*()

यात्रा के विविध साधनों की सहायता से चार दिनों की यात्रा के पश्चात शैल और सरिता वत्सर के गाँव आ पहुंचे। 

“शैल, अभी तो दोपहर हो रही है। मंदिर बंद कर के वत्सर चला गया होगा। हमें उसके घर का ठिकाना  ज्ञात नहीं है।”

“सरिता जी, वत्सर का घर भी वही है, मंदिर भी वही है।”

“यदि वह सो रहा होगा या गाँव से बाहर होगा तो हम क्या करेंगे?”

“आपको इसकी चिंता नहीं करनी है। लीजिए, प्रसाद ग्रहण कीजिए। हाथ पाँव धो लीजिए। पश्चात मंदिर के भीतर आ जाना। भोजन आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।” दोनों का स्वागत करते हुए वत्सर ने कहा। 

“वत्सर!” दोनों आश्चर्य से बोल पड़े। वत्सर मौन ही मंदिर में प्रवेश कर गया। दोनों ने हाथ पाँव धोए, मंदिर में प्रवेश किया। 

“बैठिए। मंदिर का यह प्रसाद है आपके लिए। इसे ग्रहण कीजिए।”

दोनों बैठ गए, मौन होकर भोजन करने लगे। क्षुधा तृप्त हो गई। मंदिर से बाहर आ गए। वत्सर वहीं था। दोनों ने वत्सर को देखा, उसके मुख के भाव पूर्णत: स्थिर थे। अधरों पर मंद हास था। आँखों में तेज था। शैल और सरिता के मुख पर प्रश्न थे। 

‘हमें यहाँ देखकर वत्सर के मन में, मुख के भावों में आश्चर्य होना चाहिये था, प्रश्न होने चाहिए थे। जिज्ञासा, कुतूहल, चिंता भी होनी चाहिए थी। वह तो कितना शांत है! हमारे आगमन से उसे कोई विस्मय नहीं हुआ है। उल्टा हमारे मुख पर वत्सर को देखकर प्रश्नों के भाव प्रकट हो रहे हैं।’

उसने सरिता की तरफ देखा। उसके मुख पर भी कदाचित वही भाव थे। कुछ मौन के बितने पर सरिता ने कहा, “वत्सर, हमें यहाँ देखकर तुम्हारे भीतर कोई विपरीत भाव नहीं जागा। क्यों?”

वत्सर ने स्मित दिया। “बैठिए सारा जी। शैल आप भी।”

“नहीं, अब मैं सारा नहीं हूँ।”

“अब इनका नाम है सरिता जी।” 

“वह कैसे?” वत्सर ने पूछा। 

“पूरी बात बताता हूँ। प्रथम सरिता जी के प्रश्न का उत्तर दो। हमें देखकर तुम्हें कोई विपरीत भाव नहीं हुआ क्या? मन में घृणा नहीं जागी? क्रोध नहीं आया? तिरस्कार करने के स्थान पर तुमने हमारा स्वागत कैसे कर लिया? कैसे जान लिया कि हम भूखे हैं? कैसे, वत्सर कैसे?”

“इतने सारे प्रश्नों का एक ही उत्तर है।” वत्सर ने कृष्ण की तरफ संकेत किया। दोनों ने कृष्ण को देखा। 

“बस, यह सभी कृष्ण की माया है, जिसे हम मनुष्य लीला कहते हैं।”

दोनों ने वत्सर को देखा। ‘कितना निर्लेप है यह व्यक्ति!” दोनों ने मन ही मन परस्पर बात की। 

“आप लंबी यात्रा करके आए हैं, थके होंगे। विश्राम करना चाहोगे?”

“विश्राम नहीं करना है, तुमसे बात करनी है।” सरिता ने कहा। 

“हमारी बात सुनने को तत्पर हो? या कोई अन्य व्यस्तता है, वत्सर?”

“कोई व्यस्तता नहीं है, मैं तत्पर हूँ। कहिए।”

“हम तुमसे सहायता चाहते हैं। क्या तुम हमारी सहायता करोगे?”

“सरिता जी, मैं क्या सहायता कर सकता हूँ आप जैसे पुलिस अधिकारियों की?”

“अब हम पुलिस अधीकारी नहीं हैं। इसीलिए तुम्हारे पास आए हैं।”

“शैल, पूरी बात कहो, विस्तार से कहो। अभी तो मुझे कुछ समज नहीं आ रहा।”

“मैं बताती हूँ। तुम्हारे जाने के पश्चात हमने पुन: पुलिस अधीकारी का पद ग्रहण कर लिया। पश्चात ...।” सरिता ने सारी बातें वत्सर को बता दी। 

“और हम अपना जीव बचाकर, सारा सामान वहीं छोड़कर यहाँ चले आए।”

“हमें और कोई सुरक्षित स्थान ध्यान में नहीं आया। हमें लगा कि यही एक स्थान है जहां आश्रय भी मिलेगा, सुरक्षा भी मिलेगी और सहायता भी। कहीं हमारा आकलन मिथ्या तो नहीं, वत्सर?”

“अब हम तुम्हारे आश्रित हैं। हमारे साथ तुम जो व्यवहार करना चाहो, कर सकते हो।”

“सरिता जी, शैल जी। यह स्थान तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का स्थान है। अब जो भी होगा, स्वयं कृष्ण ही हमें मार्ग दिखलाएंगे। सारी चिंता, सारे प्रश्न, सारी शंकाएं उन्हें सौंप देते हैं। वही उसका समाधान करेंगे। यहाँ कृष्ण की शरण में रहिए और प्रतीक्षा करें। यहाँ आप सुरक्षित हैं।”

“कब तक?”

“जब तक कृष्ण हमें कुछ करने का संकेत न दे तब तक, सरिता जी।” 

“जैसी कृष्ण की इच्छा।”