*नींद*
_लेखक : PATEL RJ_
1 : 3:13 AM*
मेरा नाम आध्या है।
मैं 27 साल की हूँ, और मुझे 9 दिन से नींद नहीं आई है।
शुरू में लगा स्ट्रेस होगा, काम का प्रेशर। फिर डॉक्टर के पास गई। उसने स्लीपिंग पिल्स दी। कोई फर्क नहीं पड़ा।
आज रात भी मैं बिस्तर पे लेटी थी। छत को घूर रही थी। पंखे की आवाज़ के अलावा सब खामोश था, तभी फोन बजा।
स्क्रीन पर लिखा था : Unknown
टाइम : 3:13 AM
मैंने कॉल काट दिया। हाथ काँप रहे थे।
5 सेकंड बाद एक मैसेज आया:
*"तुम आज फिर नहीं सोई। थक गई होगी।"*
मेरा खून जम गया। मेरे अलावा ये कौन जान सकता है?
मैंने तुरंत कॉल बैक किया। नंबर स्विच्ड ऑफ था।
सुबह उठी तो बाथरूम के शीशे पर खून से कुछ लिखा था:
*"सो जाओ"*
मैं अकेली रहती हूँ। फ्लैट की चाबी सिर्फ मेरे पास ह
डॉक्टर मेहता ने कहा, "आध्या, तुम्हें इनसोम्निया नहीं है। ये एंग्जायटी है। तुम ठीक दिखती हो।"
मैंने अपनी कलाई दिखाई। 3 नए खरोंच थे। पतले, लाइन में, जैसे किसी ने नाखून से किया हो।
"ये रात को खुद कर लेती होगी नींद न आने की वजह से" उन्होंने पेन घुमाते हुए कहा।
मैं हंस दी। फिर मुझे याद आया मैं सोती ही नहीं।
उसी रात मैंने एक काम किया। फोन में रिकॉर्डिंग ऑन करके बिस्तर के पास रख दी। अगर मैं उठ के कुछ कर रही हूँ, तो पकड़ी जाऊंगी।
सुबह अलार्म 7 बजे बजा। वीडियो देखी। 0:00 से 2:59 तक मैं लेटी थी। आँख खुली थी। 3:00 बजे मैं उठी, सीधी बाथरूम गई। शीशे के सामने खड़ी हुई। 3:03 बजे मैंने अपनी कलाई खरोंची। धीरे-धीरे, चेहरे पे कोई दर्द नहीं था। जैसे मैं मैं ही न हूँ।
3:06 बजे मैं वापस आ कर सो गई।
वीडियो के लास्ट 2 सेकंड में कैमरे के पीछे कोई साया दिखा। एक पल के लिए।
मैंने वीडियो डिलीट कर दी।
आज क्लिनिक में एक नई पेशेंट आई। नाम : मीरा।
वो भी नहीं सो पा रही थी। 8 दिन से।
"रात को 3:13 बजे कॉल आता है क्या?" मैंने बिना सोचे पूछ लिया।
वो चौंक गई। "हाँ। आपको कैसे पता?"
मेरा गला सूख गया।
"कौन करता है कॉल?"
"वो... कहती है कि अगर मैं सो गई तो वो वापस आ जाएगी"
"कौन?"
मीरा ने धीरे से कहा : *"मैं खुद।"*
उसी शाम मेरे घर का दरवाज़ा खटखटाया। बाहर कोई नहीं था। सिर्फ ज़मीन पर एक डायरी पड़ी थी। ऊपर मेरे ही हाथ से लिखा था:
*"दिन 10. अगर आज नहीं सोई, तो उसे आना ही पड़ेगा।"*
डायरी में सिर्फ 10 पन्ने थे। हर पन्ने पे एक डेट।
दिन 1 से दिन 9 तक सब लिखा था। "आज भी नहीं सोई। ज़ख्म बढ़ गए।"
दिन 10 वाला आज का था।
आखिरी पन्ने पे लिखा था : *"दिन 11 : दरवाज़ा खुलेगा"*
मेरे हाथ काँप गए। ये मेरी हैंडराइटिंग थी। पर मुझे याद नहीं।
मैंने मीरा को कॉल किया। उसने बताया उसके पास भी सेम डायरी आई थी। उसका दिन 11 भी आज ही था।
रात को मैंने जान बूझ के न सोने का फैसला किया। 3 बजे के 10 मिनट पे फोन बजा। Unknown। उठाया।
आवाज़ मेरी ही थी। "आध्या, दरवाज़ा मत खोलना। मैं आ रही हूँ।"
लाइन कट।
3:13 बजे दरवाज़े पे नॉक हुआ। 3 बार, धीरे-धीरे।
मैं बिस्तर से नहीं उठी।
मैं बिल्डिंग के गार्ड से CCTV माँगा। रात 3 बजे का फुटेज।
फुटेज में मैं 3:05 बजे घर से निकली। नाइट सूट में। बाल खुले। लिफ्ट से ग्राउंड फ्लोर गई। बिल्डिंग से बाहर। 10 मिनट बाद वापस आई। हाथ में खून।
गार्ड बोला, "मैडम आप ठीक हो?"
मैं बेहोश हो गई।
डॉक्टर मेहता के क्लिनिक में पुराने रिकॉर्ड मिले। 5 साल पहले एक केस आया था। लड़की आध्या। एक्सीडेंट।
उस एक्सीडेंट में उसकी छोटी बहन "मायरा" मर गई थी। आध्या गाड़ी चला रही थी। नींद की वजह से।
तब से आध्या को नींद नहीं आती। गिल्ट की वजह से।
डॉक्टर ने कहा था, "तुमने डिसोसिएशन डेवलप कर लिया है। रात को तुम्हारा दूसरा रूप बाहर आता है। जो सज़ा देना चाहता है।"
मैं मीरा का घर गई। घर बंद था। पड़ोसी ने कहा, "यहाँ तो 2 साल से कोई नहीं रहता। मीरा नाम की लड़की यही रहती थी। सुसाइड कर लिया था। नींद न आने की वजह से।"
मेरा फोन बजा। 3:13 AM।
मीरा की आवाज़ : *"अब तुम्हारी बारी है आध्या।"*
उसी रात मैंने शीशे के सामने बैठ के खुद से बात की।
"कौन हो तुम?"
शीशे में मेरा अक्स बोला: "मैं वो हूँ जिसे तुमने मार दिया। मैं मायरा हूँ।"
"मैंने नहीं मारा..."
"तुम सो गई थी। स्टीयरिंग पे। इसलिए मैं मर गई।"
शीशा क्रैक हो गया।
डायरी के हिसाब से आज दरवाज़ा खुलना था। रात 3 बजे घर की सारी लाइट चली गई। दरवाज़ा खुद खुल गया। सामने 10 साल की लड़की खड़ी थी। भीगी हुई। मेरी बहन जैसी।
उसने कहा "दीदी, अब सो जाओ। मैं जागती हूँ।"
वो लड़की अंदर आई। मेरा ज़ख्म चेक किया।
"हर रात तुम खुद को सज़ा देती हो। पर सज़ा मुझे मिलनी चाहिए थी"
उसने चाकू उठाया। अपनी कलाई काट ली। खून नहीं निकला।
"मैं भूत नहीं हूँ दीदी। मैं तुम्हारा गिल्ट हूँ।"
डॉक्टर मेहता आए। "आध्या तुम्हें हॉस्पिटलाइज़ होना पड़ेगा।"
मैंने मना कर दिया। "अगर मैं सो गई, तो मायरा चली जाएगी। और मैं उसे फिर नहीं मिल पाऊँगी।"
मायरा बोली, "तो जागते रहो। मैं तुम्हारे साथ रहूँगी।"
9 दिन के बाद पहली बार नींद आई। सपने में मायरा थी, वो हंस रही थी।
"दीदी, अब ठीक हो ना?"
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
सुबह उठी तो हाथ साफ थे। कोई ज़ख्म नहीं।
फोन पे एक मैसेज: "Thank you. अब मैं जा सकती हूँ।"
नंबर: Unknown.
6 महीने बाद
मैं अब ठीक हूँ। थेरेपी चल रही है। नींद आती है। 8 घंटे।
पर कभी रात 3:13 बजे आँख खुल जाती है।
कमरा खाली होता है।
शीशे पे धुंध से लिखा होता है:
*"Good night Didi"*
और मैं मुस्कुरा के वापस सो जाती हू.
फ्लैशबैक्स: एक्सीडेंट के बाद आध्या कोमा में गई थी 3 दिन। उठने के बाद दिमाग ने ट्रॉमा ब्लॉक कर दिया।
नींद न आना, कॉल्स, डायरी, सब आध्या ने खुद किया था। डिसोसिएटिव आइडेंटिटी। "मायरा" नाम की पर्सनैलिटी रात को जागती थी।
मीरा? वो भी आध्या ही थी। एक फेक नाम। एक फेक पेशेंट थी।
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