महबूब की वह हसीन रात Dharmpal Sroj द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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महबूब की वह हसीन रात

लखनऊ की सर्दियों की रात थी। दिसंबर का महीना, घड़ी में रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे और हजरतगंज की गलियां कोहरे से ढकी हुई थीं।
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‎आरव अपनी पुरानी स्कूटी पर बैठा इंतजार कर रहा था। हाथ में एक छोटा सा गुलाब था जो अब ठंड से मुरझाने लगा था। आज से ठीक तीन साल पहले इसी जगह, इसी बेंच पर उसने नायरा को पहली बार देखा था।
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‎नायरा दिल्ली से लखनऊ आई थी, अपनी नानी के घर। एम.ए. में उर्दू की स्टूडेंट, शायरी पसंद करने वाली लड़की। और आरव, लखनऊ यूनिवर्सिटी में फोटोग्राफी का छात्र।
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‎"तुम रोज़ यहाँ बैठकर किसकी फोटो लेते हो?" नायरा ने पहले दिन पूछा था।
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‎"इंतजार की," आरव ने जवाब दिया था।
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‎"इंतजार की भी कोई फोटो होती है?"
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‎"होती है, जब वो पूरा होता है तब पता चलता है।"
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‎बस वहीं से बात शुरू हुई थी।
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‎तीन साल में दोनों के बीच हजारों शामें, सैकड़ों चाय के कुल्हड़, और एक अधूरा वादा बन गया था। नायरा को वापस दिल्ली जाना था। उसके अब्बा ने उसका रिश्ता तय कर दिया था। आज उसकी लखनऊ में आखिरी रात थी।
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‎तभी कोहरे को चीरती हुई एक रिक्शा आई। उसमें से नायरा उतरी। सफेद सलवार कमीज, ऊपर शॉल, आँखों में काजल और होंठों पर वही मुस्कान जो आरव को पागल कर देती थी।
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‎"तुम पागल हो, इतनी ठंड में यहाँ क्यों बैठे हो?" नायरा बोली, लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।
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‎आरव ने कुछ नहीं कहा। बस गुलाब उसकी तरफ बढ़ा दिया।
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‎"तुम्हें पता है, अब्बा ने कहा है कल सुबह की ट्रेन से दिल्ली, और फिर..." नायरा की बात अधूरी रह गई।
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‎"और फिर क्या?" आरव ने पूछा।
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‎"और फिर निकाह। लड़का अच्छा है, दुबई में इंजीनियर है।"
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‎आरव हंसा। "और तुम्हारा क्या ख्याल है?"
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‎"मेरा ख्याल? मेरा ख्याल तो इस बेंच पर रह गया है, इस चाय की टपरी पर, तुम्हारी इन बेकार शायरियों में।"
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‎आरव ने अपनी जेब से एक पुराना कैमरा निकाला। वही कैमरा जिससे उसने पहली बार नायरा की फोटो ली थी।
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‎"याद है मैंने कहा था इंतजार की फोटो होती है?"
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‎नायरा ने सिर हिलाया।
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‎आरव ने कैमरा ऑन किया। उसमें एक फोटो थी - नायरा हंस रही है, पीछे हजरतगंज की रोशनी है, हाथ में चाय का कुल्हड़ है।
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‎"ये फोटो मैंने उस दिन ली थी, जब तुमने कहा था तुम्हें लखनऊ बिल्कुल पसंद नहीं।"
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‎"अब पसंद है," नायरा धीरे से बोली।
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‎"क्यों?"
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‎"क्योंकि यहाँ तुम हो।"
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‎दोनों कुछ देर चुप रहे। ठंड बढ़ रही थी। पास की चाय की टपरी वाला भी दुकान बंद करके जा चुका था। पूरी गली में सिर्फ दो लोग, एक बेंच और एक अधूरी कहानी।
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‎"आरव, तुम्हारे पास क्या है? न नौकरी, न घर। मेरे अब्बा कभी नहीं मानेंगे।"
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‎आरव ने नायरा का हाथ पकड़ा। हाथ बर्फ जैसे ठंडे थे।
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‎"मेरे पास कुछ नहीं है, सिवाय एक बात के। मैं तुम्हें वो जिंदगी नहीं दे सकता जो दुबई वाला देगा। पर मैं तुम्हें वो सुबह दे सकता हूँ जहाँ तुम अपनी शायरी लिख सको, वो शाम जहाँ हम बिना किसी डर के चाय पी सकें। मैं तुम्हें आजादी दे सकता हूँ।"
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‎नायरा की आँखों में आंसू आ गए।
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‎"और अगर मैं न गई तो?"
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‎"तो?"
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‎"तो अब्बा नाराज हो जाएंगे। सब नाराज हो जाएंगे।"
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‎आरव ने जेब से दो ट्रेन के टिकट निकाले। दिल्ली के नहीं, बनारस के।
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‎"मैंने सोचा था, अगर तुम हाँ कहो तो हम आज रात बनारस चलते हैं। वहाँ मेरी एक दोस्त है, उसके होस्टल में तुम रह सकती हो। तुम्हारी एम.ए. पूरी हो जाएगी। मैं फोटोग्राफी कर लूंगा। हम छोटा सा घर ले लेंगे। कोई बड़ा सपना नहीं, बस एक छोटी सी, सच्ची जिंदगी।"
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‎नायरा टिकट देखती रही। उसकी आँखों में डर था, और डर के पीछे एक रोशनी भी।
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‎"ये भागना हुआ, आरव।"
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‎"नहीं, ये खुद को चुनना हुआ।"
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‎तभी दूर से मस्जिद से बारह बजने की आवाज आई। कोहरे में आवाज और भी गहरी लग रही थी।
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‎नायरा ने एक लंबी सांस ली। उसने शॉल ठीक किया, और आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।
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‎"चलो," उसने कहा।
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‎"कहाँ?"
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‎"जहाँ इंतजार पूरा होता है।"
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‎आरव ने हैरानी से देखा। "तुम सच में?"
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‎नायरा मुस्कुराई। उस मुस्कान में आंसू भी थे और हिम्मत भी।
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‎"मुझे वो हसीन रात चाहिए, आरव, जिसके बारे में हम किताबों में पढ़ते हैं। वो रात जो सिर्फ हमारी हो। अगर वो आज है, तो आज ही सही।"
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‎दोनों ने स्कूटी स्टार्ट की। पुरानी स्कूटी, दो लोग, और कोहरे भरी सड़क जो सीधे चारबाग स्टेशन की तरफ जा रही थी।
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‎रास्ते में नायरा ने आरव के कंधे पर सिर रख दिया और धीरे से कहा -
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‎"आरव, एक शायरी सुनाओ।"
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‎"कौन सी?"
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‎"वही, जो तुमने मेरे लिए लिखी थी।"
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‎आरव ने ठंडी हवा में कहा -
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‎"तेरी हँसी में लखनऊ बसता है,
‎तेरी आँखों में शायरी लिखी है,
‎आज की रात अगर तू मेरी हो गई,
‎तो समझो मेरी सारी जिंदगी लिखी है।"
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‎नायरा हंस दी। "बेकार है, पर मेरी है।"
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‎स्टेशन आया। ट्रेन खड़ी थी। बनारस जाने वाली आखिरी ट्रेन।
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‎दोनों ट्रेन में बैठे। खिड़की के बाहर लखनऊ धीरे-धीरे पीछे छूट रहा था। अंदर, एक छोटी सी बर्थ पर, दो लोगों ने एक नई जिंदगी की तरफ आँखें बंद कर लीं।
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‎वो रात वाकई हसीन थी। इसलिए नहीं कि सब कुछ आसान था, बल्कि इसलिए कि उस रात दो लोगों ने डर से ज्यादा प्यार को चुना था।
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‎और कहते हैं, जब प्यार को चुना जाता है, तो हर रात हसीन हो जाती है।
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