वो रात जब सब बदल गया - 1 Ishaaa द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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वो रात जब सब बदल गया - 1

कुछ कहानियाँ मोहब्बत से नहीं शुरू होतीं...शुरू होती हैं एक ऐसे फैसले से, जिसे आप कभी बदल नहीं सकते।


लाल रंग का भारी दुल्हन का लहंगा।आईने के सामने खड़ी मेहर ने खुद को देखा।

गहनों की इस छन-छनाहट में एक दुल्हन की खुशी होनी चाहिए थी...पर उसके चेहरे पर सिर्फ एक गहरा, अनकहा खौफ था।

बाहर शहनाई और ढोल की आवाज़ गूँज रही थी।पर मेहर के टूटते दिल के लिए...यह संगीत किसी मातम की धुन जैसा लग रहा था।

उसका बाप बेहद ज़िद्दी और बेरहम था।जो उसकी शादी जबरदस्ती अद्वय से करवा रहा था।सिर्फ अपने व्यापार के फायदे के लिए।वह अपनी ही बेटी का सौदा कर रहा था।

"मैं यह शादी नहीं करना चाहती..."मेहर ने आईने के सामने खुद से कहा। आँसू गालों से बह रहे थे।

तभी दरवाज़ा खुला। उसकी बेबस माँ कमरे में आईं।काँपते कंधे पर हाथ रखा और रोते हुए कहा,"मेहर, अब हमारे परिवार की इज़्ज़त तुम्हारे ही हाथों में है, बेटा।

"मेहर खामोश रही।उसने अपनी इस बेरहम किस्मत को चुपचाप स्वीकार कर लिया।

मंडप।

पंडित जी के मंत्र।

हवन कुंड की लपकती हुई आग।

मेहर के ठीक बगल में अद्वय बैठा था।उसने मेहर का पीला पड़ा चेहरा देखा और पूछा,"मेहर, क्या तुम ठीक हो?"

मेहर ने बिना देखे बस सिर हिला दिया, "हम्म..."

पर अंदर ही अंदर उसका दिल चीख रहा था—‘भगवान, प्लीज कोई चमत्कार कर दो और इस शादी को रोक दो!’

और शायद... भगवान ने उसकी दुआ सुन ली थी।लेकिन एक खौफनाक और खतरनाक रूप में।

धाड़!!!

एक ज़ोरदार धमाका हुआ।

शादी के हॉल के भारी डबल दरवाज़े टूटकर गिर गए!पूरे हॉल में एक झटके में सन्नाटा छा गया।

दरवाज़े पर धूल के बीच एक शख्स खड़ा था।

लंबा, चौड़ा और बेहद आकर्षक।चेहरे पर ज़बरदस्त गुस्सा।उसका नाम था—रेयांश खन्ना!

उसके हाथ में एक चमकती हुई काली गन थी।पीछे खड़े थे उसके हथियारबंद आदमी।रेयांश ने अपनी गन सीधे मेहर के बाप की तरफ तानी।एक कातिलाना मुस्कान के साथ बोला—"वाह सहगल! बड़ी शानदार शादी चल रही है? अफसोस... ये यहीं खत्म होती है!"

मेहर के बाप का रंग उड़ गया, "रेयांश खन्ना! तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

रेयांश बिना डरे मंडप की तरफ बढ़ा

।उसने अपनी गन सीधे अद्वय के माथे पर टिका दी।एकदम ठंडी आवाज़ में कहा—"एक तरफ हट जा, वरना पहली गोली तेरे भेजे के पार जाएगी।

"मौत का मंज़र देखकर अद्वय के कदम पीछे हट गए।

पलक झपकते ही, रेयांश ने मेहर की नाज़ुक कलाई पकड़ी।एक ज़ोरदार झटके से उसे अपनी तरफ खींच लिया।

मेहर बेबस होकर रोने लगी, "त... तुम कौन हो? मुझे छोड़ दो!"

रेयांश उसके कान के पास झुका। धीरे से फुसफुसाया—"मैं कौन हूँ? अपने इस घटिया बाप से पूछो! आज से, तुम मेरे साथ चल रही हो।"

उसने मेहर को अपनी बाँहों में उठा लिया।अद्वय ने आगे बढ़ने की कोशिश की।

रेयांश ने गन हवा में उठाई और ट्रिगर दबा दिया—ठाँय!!!

गोली की आवाज़ से पूरा हॉल काँप उठा।रेयांश की आवाज़ किसी तूफान की तरह गरजी—"रोक सको तो रोक लो! अगर किसी में दम है तो!"

मेहर लगातार रो रही थी, "तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो?"

रेयांश ने अपनी जानलेवा नज़र दोबारा मेहर के बाप सहगल पर डाली।

वह पूरी ताकत से चिल्लाया—"सालों पहले तुमने मेरे बाप का खून किया था सहगल! मेरी ज़िंदगी की हर खुशी छीन ली थी!आज तुम्हारी बेटी तुम्हारे गुनाहों की कीमत चुकाएगी।यह मेरी कैद में रहेगी... और तुम हर एक दिन तड़पोगे!"

मेहर ने अपने छोटे-छोटे हाथों से उसकी मजबूत छाती पर मुक्के मारे।

खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की।

पर रेयांश की पकड़ फौलाद जैसी थी।

उसने मेहर की आँसुओं से भरी आँखों में देखा और कहा—"इतना आसान नहीं होगा"

हॉल में सिर्फ दहशत थी।

सबकी बेबस नज़रों के सामने, रेयांश उस रोती हुई दुल्हन को उठाकर बाहर ले गया।सीधे अपनी बड़ी काली गाड़ी की तरफ।

मेहर का बाप वहीं मंडप पर बिल्कुल अकेला, टूटा हुआ और बेबस खड़ा रह गया...जबकि उसकी बेटी की ज़िंदगी एक अँधेरी और बेरहम दुनिया में खींची जा रही थी।

एक ऐसी रात... जिसने सब कुछ बदल दिया।

अब सवाल यह है कि - 

क्या एक बेटी का वजूद सिर्फ अपने बाप के गुनाहों की बलि चढ़ना है?

अब रेयांश मेहर को कहाँ लेकर जा रहा है? क्या मेहर कभी इस नफ़रत की कैद से आज़ाद हो पाएगी?