इंस्टेंट मिलियनेयर - 4 aakash kumar द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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इंस्टेंट मिलियनेयर - 4


​होटल 'द इंपीरियल पैलेस' का भव्य संगमरमरी पोर्च रात की दुधिया रोशनी में नहाया हुआ था। शहर की नामी हस्तियां, मीडिया के कैमरे और दौलत की नुमाइश करते रईसों का हुजूम वहां मौजूद था। उसी चमक-दमक के बीच, ऑटो स्टैंड के पास अपने पुराने घिसे हुए जूतों और सादे कपड़ों में आकाश शाक्य शांत खड़ा था। उसके चेहरे पर न कोई घबराहट थी, न ही कोई हीनभावना। उसकी पैंट की जेब में एक ऐसा राज़ छिपा था, जो उस पूरी इमारत की कीमत चुकता कर सकता था—अमेरिकन एक्सप्रेस का दुर्लभ ब्लैक टाइटेनियम सेंटूरियन कार्ड।
​होटल के विशाल शीशे के दरवाज़े अचानक धड़धड़ाते हुए खुले। होटल का जनरल मैनेजर वर्मा, कोट के बटन बेतरतीब बंद किए, हांफता हुआ बाहर भागा चला आ रहा था। उसके माथे पर पसीने की मोटी बूंदें चमक रही थीं और सांसें उखड़ी हुई थीं।
​उसे देखते ही विक्रम मल्होत्रा के चेहरे पर एक घमंडी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी महंगी अरमानी जैकेट का कॉलर ठीक किया और रिया की कमर पर हाथ रखते हुए इतराकर बोला, "देखा रिया? इसे कहते हैं मल्होत्रा खानदान का रुतबा! शहर का सबसे महंगा मैनेजर खुद हमारे स्वागत के लिए नंगे पैर दौड़ा आ रहा है।"
​रिया की नज़रें तिरछी होकर एक बार फिर किनारे खड़े आकाश पर पड़ीं। उसने अपनी नाक सिकोड़ते हुए तंज कसा, "सही कहा विक्रम। कुछ लोग सिर्फ दूसरों की मर्सिडीज के पहियों की धूल चाटने के लिए ही पैदा होते हैं। जो अपनी किस्मत पर रोने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।"
​आकाश ने रिया की बात सुनकर सिर्फ एक हल्की, रहस्यमयी मुस्कान दी। वह चुपचाप तमाशा देख रहा था।
​मैनेजर वर्मा दौड़ता हुआ सीधा विक्रम के सामने आकर रुका। विक्रम ने बड़े रौब से हाथ आगे बढ़ाया, "वर्मा जी, शैंपेन का सबसे महंगा विंटेज अंदर भिजवाइए और—"
​"हाथ नीचे कीजिए, मिस्टर मल्होत्रा!"
​वर्मा की गरजती आवाज़ ने पूरे पोर्च में सन्नाटा खींच दिया। तालियों और गपशप का शोर एक झटके में थम गया।
​विक्रम का हाथ हवा में ही जम गया। उसकी त्योरियां चढ़ गईं, "तमीज़ भूल गए हो वर्मा? जानते हो किससे बात कर रहे हो?"
​वर्मा ने अपनी जेब से एक रूमाल निकालकर माथा पोंछा और सपाट लहजे में कहा, "अच्छी तरह जानता हूँ। और यह भी सुन लीजिए कि आज रात इस VIP बैंक्वेट हॉल की आपकी सारी बुकिंग्स तत्काल प्रभाव से रद्द की जाती हैं!"
​"क्या बकवास है?!" विक्रम दहाड़ा। आस-पास खड़े मीडिया के कैमरे तुरंत हरकत में आ गए और उनके लेंस विक्रम के लाल पड़ते चेहरे पर टिक गए।
​वर्मा ने अपनी टैबलेट स्क्रीन आगे करते हुए कहा, "हमारे नए मालिक का सीधा फरमान है। आज रात से इस हॉल का रेंट रिवाइज होकर 5 करोड़ रुपये प्रति घंटा कर दिया गया है। अगले पांच मिनट में पूरा भुगतान कीजिए, वरना आप सबको कॉलर पकड़कर बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।"
​पूरे हॉल में कानाफूसी शुरू हो गई। विक्रम की इज़्ज़त दांव पर थी। उसने दांत पीसते हुए अपना प्लेटिनम क्रेडिट कार्ड निकाला और वर्मा के सीने पर दे मारा, "स्वाइप कर इसे! 5 करोड़ क्या, 10 करोड़ ले! मल्होत्रा के पास पैसों की कमी नहीं है!"
​वर्मा ने स्वाइप मशीन मंगवाई। कार्ड स्वाइप हुआ।
​बीप... बीप... बीप...
​मशीन की लाल स्क्रीन पर बड़े अक्षरों में चमक उठा—TRANSACTION DECLINED.
​विक्रम का रंग उड़ गया। "रुको, ये दूसरा कार्ड लो!" उसने अपनी जेब से दूसरा कॉर्पोरेट कार्ड फेंका।
​मशीन ने एक बार फिर वही आवाज़ दी—CARD BLOCKED: INSUFFICIENT LIMIT.
​वहां मौजूद रईसों की भीड़ में से दबी हुई हंसी फूट पड़ी। किसी ने फुसफुसाया, "लगता है मल्होत्रा खानदान दिवालिया हो गया है!"
​अपमान और गुस्से से विक्रम का दिमाग सुन्न हो चुका था। तभी उसने देखा कि किनारे खड़ा आकाश उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा रहा है। विक्रम का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वह अपनी बेइज़्ज़ती का सारा गुस्सा आकाश पर उतारने के लिए चीखा, "गार्ड्स! इस सड़कछाप भिखारी को देख रहे हो? यह अंदर घुसने की ताक में है! इसकी टांगें तोड़ो और लात मारकर सड़क पर फेंको!"
​चार हट्टे-कट्टे बाउंसर लाठियां संभालते हुए आकाश की तरफ लपके।
​आकाश एक इंच भी पीछे नहीं हटा। उसके फटे जूतों की शांत थाप संगमरमर के फर्श पर गूंजी। उसने बहुत इत्मीनान से अपनी पैंट की जेब में हाथ डाला और एक भारी, काला टाइटेनियम कार्ड निकाला। उसने वह कार्ड किसी के सामने लहराया नहीं, बस वर्मा की नज़रों के ठीक सामने ला दिया।
​काले कार्ड के बीचों-बीच सोने की बारीक नक्काशी वाला लोगो और उस पर उभरे हुए अक्षर देखकर वर्मा की सांसें हलक में अटक गईं। उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया, जैसे किसी मुर्दे को देख लिया हो। वह बुरी तरह कांपने लगा। उसके होंठ फड़फड़ाए, "ये... ये तो... सुप्रीम सेंटूरियन कार्ड... यानी नए मालिक..."
​आकाश ने एक कदम आगे बढ़ाया और वर्मा के कंधे के पास झुककर बहुत धीमी, बर्फ जैसी ठंडी आवाज़ में कहा, ताकि सिर्फ वर्मा सुन सके, "सिंघानिया साहब का सख्त हुक्म है... इन दोनों फटीचरों को बिना किसी रियायत के अभी धक्के देकर बाहर फेंको। ये हमारे होटल का माहौल खराब कर रहे हैं।"
​वर्मा का जिस्म कांप उठा। उसे समझ आ गया कि सामने खड़ा यह साधारण सा दिखने वाला लड़का ही उस पूरे साम्राज्य का असली कर्ता-धर्ता है।
​वर्मा ने एक पल की भी देरी नहीं की। उसने तुरंत पलटकर बाउंसरों पर दहाड़ लगाई, "रुको बेवकूफों! हाथ मत लगाना इन्हें!"
​वर्मा की उंगली अब सीधे विक्रम और रिया की तरफ तनी हुई थी, "सिक्योरिटी! इन दो ढोंगियों को अभी के अभी कॉलर पकड़कर बाहर निकालो! 5 करोड़ का पेमेंट करने की औकात नहीं है और हमारे वीआईपी गेस्ट पर हुक्म चला रहे हैं! और कान खोलकर सुन लो... इस नौजवान (आकाश) को कोई हाथ भी नहीं लगाएगा, ये हमारे नए मालिक के सबसे खास और सम्मानित मेहमान हैं!"
​इससे पहले कि विक्रम कुछ समझ पाता, दो विशाल गार्ड्स ने उसकी महंगी जैकेट को पीछे से दबोच लिया। एक महिला सुरक्षाकर्मी ने रिया का हाथ मरोड़कर उसे आगे धकेल दिया।
​"छोड़ो मुझे! तुम जानते नहीं मेरा बाप कौन है!" विक्रम बदहवास होकर चिल्लाता रहा, लेकिन कैमरों की चमकती फ्लैशलाइटों के बीच दोनों को घसीटते हुए होटल के मुख्य गेट से बाहर सड़क पर पटक दिया गया। विक्रम की गाड़ियां भी होटल के गेट से बाहर कर दी गईं।
​रिया सड़क की धूल में गिरी, अपनी बिखरी जुल्फों के बीच से फटी-फटी आंखों से होटल के पोर्च को देख रही थी।
​वहां, फटे जूतों और मामूली कपड़ों में खड़ा वही आकाश, जिसे उसने कुछ मिनट पहले दो कौड़ी का भिखारी कहा था, अब होटल के मैनेजर और पूरे स्टाफ के झुके हुए सिरों के बीच किसी शहंशाह की तरह खड़ा था। वर्मा खुद उसके आगे दोनों हाथ जोड़कर झुक रहा था।
​रिया का दिमाग चकरा गया। उसके अंदर खौफ और सवालों का बवंडर उठ खड़ा हुआ—आखिर कौन है यह आकाश? फटे कपड़ों के पीछे यह लड़का होटल के नए मालिक का खास मेहमान कैसे बन गया? और उसने वर्मा को ऐसा क्या दिखाया जिसने एक झटके में पूरे शहर के सबसे ताकतवर खानदान को सड़क पर ला पटका?
​क्या रिया आकाश के इस अरबपति सच का पर्दाफाश कर पाएगी? या आकाश का अगला कदम मल्होत्रा इंडस्ट्रीज की जड़ें हिला देगा? जानने के लिए पढ़ते रहिए... अगला एपिसोड!