छग सरकार ने शहरी क्षेत्र में आवारा पशुओं की समस्या के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए प्रदेश के सभी नगर निगमों, नगरपालिकाओं व नगरपंचायतों को भारत सरकार के ‘‘भारत पशुधन पोर्टल’’ पर इनका अनिवार्यतः पंजीयन कराने के निर्देश दिए हैं।
यह कार्रवाई भारत सरकार के मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के आदेश के अनुपालन में की जा रही है। इसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में घूम रहे आवारा मवेशियों और आवारा कुत्तों का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना, इनकी निगरानी को प्रभावी बनाना तथा पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को अधिक व्यवस्थित करना है।
इससे जहां आवारा जानवरों की संख्या का वास्तविक आकलन संभव होगा, वहीं छग में आवारा पशुओं के कारण होनेवाले सड़क हादसों, यातायात बाधाओं और रेबीज जैसी बीमारियों के जाखिम को कम करने में मदद मिलेगी। यही नहीं, आवारा कुत्तों की नसबंदी संभव हो सकेगी।
छत्तीसगढ़ में पिछले तीन साल में केवल रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग तीन जिले में करीब 75 हजार लोग कुत्तों के हमलों से लहूलुहान हुए हैं। वहीं, एक साल की रिपोर्ट में रायपुर में 15 हजार, बिलासपुर में 12 हजार और दुर्ग जिले में 11 हजार से अधिक डॉग बाइट के मामले दर्ज किए गए हैं।
डॉग बाइट के उदाहरण देखिए-
छग राज्य के धमतरी जिले के बोराई थानांतर्गत ग्राम मैनपुर प्राथमिक पाठशाला में कक्षा चौथी की 9 साल की मासूम छात्रा आन्या स्कूल से आते ही घरबाड़ी में खेल रही थी कि 9 श्वानों ने उसपर हमला कर दिया।
आन्या को अकेली पाकर ये श्वान उसे नोचने लगे। रोने-चिल्लाने की आवाजें आने पर परिजन मौके पर पहुंचें और डंडे से उन्हें भगाया।
पहले उसे क्षत-विक्षत अवस्था में नगरी के अस्पताल में भरती किया गया। वहां से जिला अस्पताल धमतरी रेफर किया गया। आन्या के गाल, सिर, पेट, पीठ, पैर में 25 टांके लगे।
क्या ऐसे कुत्ते, जो गली-मुहल्लों व सड़कों में आतंक के पर्याय बन गए हैं, उन्हें वहां रहने का अधिकार होना चाहिए या उन्हें सेल्टर होम में पहुंचा देना चाहिए? यह एक ऐसा विषय है, जिसपर कुत्ताप्रेमी आपत्ति दर्ज करते रहते हैं।
असल में ऐसी दर्दनाक घटनाएं डॉग लवर की बच्चियों, बहनों, माताओं व बुजुर्गों या खुद पर नहीं हुई है, इसीलिए वे कुत्तों से फौरी प्रेम जताते रहते हैं। भगवान् न करे; जिस दिन उनके या उनके परिजनों के साथ ऐसी दर्दनाक घटनाएं घट जाएगी, उस दिन से उनका कुत्ताप्रेम दफा हो जाएगा।
अगला मिसाल देखिए, जो सीसीटीवी में कैद है और कुत्ताप्रेमियों के लिए सबक! एक आवारा कुत्ता गाय की पूंछ को खींच-खींच कर उसको लहूलुहान कर रहा था।
तभी एक स्कूटीवाला डंडा लेकर पहुंचा और कुत्ते को पीटकर गाय से अलग करवा दिया। डंडे के जोरदार प्रहार से कुत्ता वहीं बेसुध पड़ गया।
इतने में एक कुत्ताप्रेमी वहां टपक पड़ा और उस स्कूटीवाले से गालीगलौच करते हुए भिड़ गया, ‘‘तुमने कुत्ते को इतना क्यों मारा कि वह जख्मी हो गया। चलो, निकालो जेब से 1000 रुपया, जिससे उसका इलाज करवाया जा सके।’’
इसपर स्कूटीवाला अपनी सफाई दे रहा रहा था,‘‘गाय हमारी माता है। जो कोई गाय को काटेगा, उसका यही हाल करूंगा मैं।’’
इससे डॉग-लवर तेरी तो कहकर उसका कॉलर पकड़नेवाला था कि वह घायल कुत्ता सहसा उठा और उसी आवाराप्रेमी के पैर को अपने जबड़े से कसकर पकड़ व जकड़ लिया।
इससे कुत्ताप्रेमी औंधे मुंह गिर पड़ा। कुत्ता उसके पैर को छोड़ने का नाम नहीं लिया और इधर-से-उधर घसीटता रहा। यह तो अच्छा हुआ कि आसपास के लोगों ने मिलकर कुत्ते को उससे छुड़ाया, वरना कुत्ताप्रेमी अधमरा हो गया होता।
ऐसा सीन देखकर सब हक्के-बक्के रह गए कि जो पशुप्रेमी श्रीमान कुत्ते की तरफदारी कर रहा था, उसी को कुत्ते ने अंततः काट खाया।
जब शेर या बाघ नरभक्षी हो जाता है, तब वह किसी को नहीं बख्सता। ऐसी सूरत में उससे बचने का एक ही उपाय है कि उसको मार डाला जाए या पकड़कर पिंजरे में कैद कर लिया जाए।
जब हाथी या कुत्ता पागल हो जाता है, तब उसका भी मानव व पशुओं की जान की रक्षा के लिए यही हश्र किया जाता है।
आदमी भी जब आतंकवादी, नक्सलवादी और अपराधी की तरह शूटर बनकर गोलियां दागता है और मासूम लोगों की जानें ले लेता है, तब फोर्स उसको एनकाउंटर में ढेर कर देती है या पकड़कर जेलों में ठूंस देती है। यही सभ्य समाज की रीत है।
फिर आतंककारी कुत्तों के प्रति नरमी क्यों?
पीआईबी की हालिया रिपोर्ट कहती है कि पिछले दो साल में देश में डॉग बाइट के मामले चार गुना बढ़े हैं। उक्त रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 2022 में 21,89,909 कुत्तों के काटने के मामले सामने आए हैं, जो 2024 में बढ़कर 37,15,713 हो गए, जो तकरीबन दोगुना हैं।
अफसोसनाक तो यह कि इसमें से 20 प्रतिशत से अधिक शिकार 15 से कम आयुवर्ग के बच्चे व किशोर हुए हैं।
2022 में देश में 21 लोगों के प्राण रेबीज से गई, तो 2024 में 54 लोग असमय मौत को प्राप्त हुए। इसमें भी सर्वाधिक पीड़ित ग्रामीण व गरीब आबादी है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 1.4 करोड़ स्ट्रीट डॉग हैं।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की दो सदस्यीय बेंच ने आवारा कुत्तों के आतंक और रेबीज से लोगों की मौत पर दर्ज याचिका का निराकरण करते हुए सख्त आदेश दिया है, ‘‘इंसानों की सुरक्षा सर्वोपरि है। दिल्ली-एनसीआर में सभी आवारा कुत्तों को आबादी वाले क्षेत्रों से हटाकर आठ सप्ताह में शेल्टर होम भेजा जाए।’’
फैसले से विवाद चरम पर पहुंच गया। विवाद अब कुत्ताप्रेमी बनाम कुत्ताविरोधी हो गया। वरना इस सहनशील देश में कुत्ते का काटना कोई बड़ा मुद्दा कभी नहीं रहा।
इसी से कुत्ता प्रेमी-प्रेमिका तो ऐसे-ऐसे तर्क देने लगे कि लोग सुनकर दंग रह जाएंगे। उनका कहना है कि रेबीज से होनेवाली 54 मौतों की तुलना में कार, बस, ट्रक आदि दुघर्टनाओं में हर हफ्ते लगभग 2000 लोग मर जाते हैं। वाह! क्या दलील है? भगवान बचाए ऐसे दलीलबाजों से!
शीर्ष कोर्ट के दो सदस्यीय बेंच ने यह भी कहा था कि कोई व्यक्ति या संगठन इस प्रक्रिया का विरोध करता है, तो उसके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी।
बेंच ने पीपल फॉर एनिमल की ओर से दी जानेवाली दलील को खारिज करते हुए कहा है, ‘‘क्या तथाकथित पशुप्रेमी, उन बच्चों को वापस ला पाएंगे, जिनकी रेबीज की वजह से जान चली गई है।’’
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लेख ‘‘आवारा आतंकियों की समस्या-1’’ का शेष अगले भाग-30 में पढ़िए।