कोहरे का पुराना पुल और अंदर की आवाज़"
मैं खुद को अकेला, बेबस खड़ा समझ के आगे बढ़ रहा हूँ,
मेरे कदमों के पर-कच्चे उड़ रहे हैं।
कदमों की आहट में, मैं खुद को सुन रहा हूँ,
चारों तरफ अंधेरा है, घनघोर घटा सी छाई है......
मुझे लग रहा है, मैं खो रहा हूँ।
पर ये क्या?
पानी की लहर की आवाज़ आई है,
क्या यह मेरा भ्रम हैं?
लेकिन नहीं बहाव के साथ कोई आवाज आई हैं....
ओह! नीचे नदी है....... सरर-सरर कर रही है।
पर ये छन-छन की आवाज़ क्यों है?
क्या कोई सामने मेरे चुड़ैल खड़ी है?
यह पुराना पुल है, शायद कोई खड़ा हो......
कोई बेबस, अधमरा...... कभी डूबा हो नदी में,
क्या पता उसका ही साया खड़ा हो!
हो सकता है...
मगर साया भी हैं तो मुझे क्यों दिखे?
मैने तो कोई पाप ना किया.... ना कोई चौराहे में जाकर अपना पाँव धरा....
फिर यह कैसी आहट आई हैं?
मगर ठहरों...
मेरे मन से कोई हलचल आई हैं..
ओह्ह....तो मुझे याद किसी की आई है...
क्यों आई है? नहीं आनी थी ना!
आ गई अब तो, क्या कर सकते हैं?
रोक लेना? नहीं रुक सकती।
ये धुंध यादों की है क्या?
या फिर बीता कल है?
कुछ तो है इसमें...... इसमें इतनी हलचल है,
हलचल ऐसी जो मिट नहीं रही, मुझे समझ नहीं आ रहा ये क्यों है?
मेरे कदम रुक जाएँ क्या?
पर ये तो थम चुके हैं, आगे भी तो नहीं बढ़ रहे।
सुना-सुना सब यहां,कितना खालीपन है......
चारों तरफ अंधेरा, कोहरा है, कुछ दिखना भी अब बंद है।
रुक जाते हैं, बैठ जाते हैं......
कभी तो छटेगा ना ये कोहरा, तब आगे बढ़ जाएँगे,
पर कब तक इंतज़ार करेंगे?
पुराने में खो तो ना जाएँगे?
पुराना पुल है, कहाँ ही खोएँगे?
मगर
पुल की बात थोड़ी है...... यादों की बात हो रही है।
याद कैसे? पता नहीं।
"तुम पागल हो......"—सब कहते हैं।
अजीब मालूम है, सबको कहते सुना है।
"तुम्हें नहीं लगता तुम अजीब हो?"
लगता होगा..... सबको है, तो होगा।
पर खोना नहीं यादों में,
ये याद बड़ी बेचैन करती है,
बेचैनी खुद देती है, और पागल भी खुद होती है।
छोड़ दो यादों का पीछा, आगे बढ़ जाओ,
पुल पुराना है...... टूट जाएगा, खामखाँ जान गँवा बैठोगी!
"तुम्हें कैसे मालूम पड़ा? तुम तो यहाँ के नहीं लगते हो!
मुझे पागल समझते हो या खुद पागल बनते हो....
मैं तो अकेला हूँ यहाँ....... तुम यहाँ क्यों खड़े हो?"
*"मैं कहाँ खड़ा हूँ? मैं तो याद हूँ तुम्हारी...... अंदर की!
किसकी बातें कह रहे हो? जो चुड़ैल समझ के बैठे हो?
अरे पगले, दीवाने.......
ये पुल पुराना है, धुँधला-धुँधला चारों तरफ कोहरा,
और आगे नया ज़माना है!"
खो जाओगे तुम मुझमें यहाँ......
आगे बढ़ जाओ, भूल जाओ पिछली बातों को,
बस अपने में खो जाओ,
अच्छा है जो तुम यहाँ से समय रहते निकल जाओ.......
चलो अच्छा है, अब आगे बढ़ो......
ज़िंदगी तुम्हारी है, इसे जीना शुरू करो!
"मुझे जीना अच्छा लगता है, मालूम है मुझे!
तुम्हें समझाने की ज़रूरत नहीं है......
तुम तो खो गई ना? फिर क्यों समझा रही हो?"
"मैं खो गई, इसीलिए तो समझा रही हूँ!
जो होती सामने...... तो क्यों बताती तुम्हें, कि जीना कितना ज़रूरी है?
यह सामने तुम्हारे जो यादों की पुरानी दुनिया है, बेहद ख़ौफ़नाक है........"
"तुम्हें जैसे बड़ा मालूम है ना, कितनी ख़ौफ़नाक है!"
"क्यों ना मालूम हो? मैं खुद उस दुनिया का हिस्सा हूँ!!!!
जो तुम सामने मेरे खड़े हो, तुम यह दुनिया बना रहे हो.......
तुम्हें खुद नहीं मालूम, तुम इसमें राक्षस बैठा रहे हो......."