राज-मुकुट : वो राजा जिसके पैर में चप्पल नहीं थी rakshita pal द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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राज-मुकुट : वो राजा जिसके पैर में चप्पल नहीं थी

 एपिसोड 2
वो राजा जिसके पैर में चप्पल नहीं थी 
सन् 1920 
उस दिन एक अंग्रेज ने उस पर हंस कर कहा था - 'अनपढ़' एक ऐसा शब्द जो उस इंसान को अपने अन्दर हीनता जैसे भाव ला दे 23 साल बाद उसी अनपढ़ आदमी को लेने के लिए राष्ट्रपति भवन से गाड़ी आई थी। ये कहानी है नंगे पैर वाले उस राजा की, जिसने संतरे बेच कर एक स्कूल खरीद लिया।

नाम था हरेकला हजाब्बा

मैंगलोर स्टेशन एक कोने में एक बूढ़ा आदमी, सिर पर पुरानी टोकरी, उसमें संतरे। पैर में चप्पल नहीं, चेहरे पर धूप की लकीरें  लोग आते, दाम पूछते, चले जाते  एक दिन एक विदेशी आया, अंग्रेजी में पूछा - "How much?"

हजाब्बा समझा नहीं। बस हाथ में संतरा लिए खड़ा रहा। विदेशी हंस दिया। पास खड़े लड़के भी हंस दिए उस दिन हजाब्बा के कुछ खटका पर वो भी मुस्कुरा दिया  उस रात हजाब्बा ने खाना नहीं खाया बस गुमसुम  बैठा रहा। बीवी ने पूछा - क्या हुआ? बोला - "आज लगा जैसे मैं कुछ हूँ ही नहीं। एक भाषा नहीं आती तो क्या मैं इंसान नहीं? क्या एक भाषा न आना बड़ी बात होती है  फिर उसने आसमान की तरफ देखा और बोला - "मैं तो अनपढ़ रह गया, पर मेरे गांव के बच्चे अनपढ़ नहीं रहेंगे वो नहीं पढ़े पर पुरे गाँव को पढ़ने की खसम खा लिया पर बहुत आमिर नहीं उसके खाने-पीने और दैनिक जारूरत के लिए रेलवे स्टेशन में सन्तरे बेच  कर जीवन चल रहा था  पर स्कूल का सपना बड़ा था इसलिए दिन भर  सन्तरे बेच कर  उसमें से 2 रुपया एक लोहे के डिब्बे में निकल कर रख दिया करते   धूप हो, बारिश हो, बुखार हो - टोकरी लेकर निकल जाता लोग कहते - पागल है। बीवी कहती - घर में राशन नहीं और तू पैसा जोड़ रहा है हमारी परेशानी कम है क्या ये जिद कर रहे हैं वो चुप रहता, क्योंकि उसके दिल में एक स्कूल बन रहा था।

23 साल। पूरे 23 साल उसने ऐसे ही 2-2 रुपया जोड़ा। कभी चप्पल नहीं खरीदी, कभी नई शर्ट नहीं ली  साल 2000 में उसने वो डिब्बा खोला। उसमें 1 लाख 20 हजार रुपये थे।उस पैसे से उसने गांव में जमीन ली, बांस का छप्पर बनाया, एक ब्लैकबोर्ड लाया और लिख दिया - "स्कूल"

पहले दिन 8 बच्चे आए। आज 175 बच्चे पढ़ते हैं। वही बच्चे जो कभी खेत में काम करते थे, आज अंग्रेजी में कविता सुनाते हैं। जब कलेक्टर को पता चला तो वो खुद मिलने आया। बोला - आपने तो सरकार का काम कर दिया।

2020 में जब पद्म श्री का फोन आया तो सबको लगा कोई बड़ा साहब होगा। जब राष्ट्रपति भवन में एक दुबला-पतला बूढ़ा, नंगे पैर, धोती पहने पहुंचा तो सब खड़े हो गए।

राष्ट्रपति ने पूछा - कैसा लग रहा है?

हजाब्बा की आंखों में आंसू थे। बोला - "मुझे आज भी अंग्रेजी नहीं आती साहब, पर मेरे बच्चे अब अंग्रेजी गाते हैं। यही मेरा इनाम है।"

ये है असली राज-मुकुट। जो सोने से नहीं, पसीने से बनता है।

पहली योद्धा थी तुलसी गौड़ा - जिसने जंगल बचाया।
दूसरा योद्धा है हजाब्बा - जिसने भविष्य बचाया।

तीसरी कौन है? कमेन्ट में बताईये  ।कहानी अगले हफ्ते।

*- रक्षिता पाल*
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