राज-मुकुट: गुमनाम 10 योद्धा rakshita pal द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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राज-मुकुट: गुमनाम 10 योद्धा

Leval :-1

शीर्षक : नंगे पाँव वाली पद्मश्री
-----by rakshita 


( karnataka)उत्तर कन्नड़ के होनाली गाँव में जब भी कोई नया पौधा उगता है, तो बूढ़े लोग आज भी एक ही नाम लेते हैं - तुलसी।

तुलसी गौड़ा का जन्म हलक्की जनजाति में हुआ था। वह आदिवासी जनजाति जो जंगल को ही अपना घर मानते हैं। उनके पिता नारायण गौड़ा और माँ नीली गौड़ा बहुत गरीब थे।उनके घर मेहनत ओर मजदूरी करके पालन- पोषण करता थे तुलसी जब दो साल की भी नहीं हुई थी कि पिता का देहांत हो गया। घर में खाने को कुछ नहीं था। माँ जंगल से लकड़ियाँ लाती और बेचती। छोटी सी तुलसी भी माँ के पीछे-पीछे जंगल जाने लगी। माँ के साथ जगंल में जाकर लकड़ी एकत्र करतीं। पेड़- पोधा से दोस्ती करने लगी। उसने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा। उसे अक्षर लिखना नहीं आता था, पर उसे जंगल पढ़ना आता था। जगंल को जनती थी उनकी दोस्ती समझ कर पडती थी। अपना बचपन उनके साथ जिया था

तुलसी की बारह साल की उम्र में उसकी शादी गोविंदे गौड़ा से कर दी गई। गोविंदे भी मजदूर था। दो बच्चे हुए - सुबराया और सोनी। लगा जीवन अब पटरी पर आएगा। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। गोविंदे की भी कम उम्र में मृत्यु हो गई। तुलसी बीस साल की उम्र में विधवा हो गई, गोद में दो छोटे बच्चे। असहाय और आपने छोटे बच्चों के लेकर कहा जाती। गाँव की औरतें बोलीं, अब क्या करेगी? तुलसी ने आँसू नहीं बहाए। वह सीधे वन विभाग की नर्सरी में गई और बोली, मुझे काम दो।

वह कुछ समय के लिए नर्सरी में उसे दिहाड़ी पर रखा गया। दिन के पैंतीस रुपये मिलते थे। काम था बीज से पौधे तैयार करना। यह काम कोई नहीं करना चाहता था, पर तुलसी के लिए यही उसकी पूजा बन गई। पैंतीस साल तक वह दिहाड़ी पर ही रही। न छुट्टी, न प्रमोशन। पर उसने एक दिन भी काम में बेईमानी नहीं की। पुरी ईमानदारी के साथ वह सुबह चार बजे उठती, टोकरी लेती और जंगल में बीज ढूँढने चली जाती। कौन सा बीज किस पेड़ का है, कौन सा बीज कितने दिन में उगेगा, किस बीज को कितना पानी चाहिए, यह सब उसे मुँह-जुबानी याद था। बड़े-बड़े वन अधिकारी जब आते तो वे भी हैरान रह जाते। तुलसी बिना देखे बता देती कि यह किस माँ पेड़ का बीज है। इसी कारण बाद में वैज्ञानिकों ने उसे जंगल की विश्वकोश कहना शुरू कर दिया। एक बार की बात है कि एक बैज्ञानिक आया हुआ था नसृरी में तो उसने तुलसी से पुछा ये पेड किस का है तुलसी ने पत्ते तोड़ कर जीभ से चाट लिया ओर बताया कि ये पेठ दृद की दवा है बाद में लैब में टेस्ट से पता चला है कि सच में पेठ दृद की दवा है
  तुलसी ने अपने हाथों से तीस हजार से भी अधिक पौधों को बड़ा किया है। कुछ पुराने रिकॉर्ड कहते हैं यह संख्या एक लाख से भी ऊपर है। उसने कभी गिना नहीं। वह बस लगाती रही।

सालों बाद उसे स्थायी नौकरी मिली। पंद्रह साल उसने स्थायी कर्मचारी के रूप में काम किया और फिर रिटायर हो गई। पर रिटायरमेंट के बाद भी वह खाली नहीं बैठी। वह अपने खेत में पौधे उगाती रही। फिर आया साल 2021। दिल्ली से फोन आया। आपको पद्मश्री के लिए चुना गया है। तुलसी को पता भी नहीं था कि पद्मश्री क्या होता है। गाँव वालों ने बताया यह बहुत बड़ा सम्मान है।

वह दिल्ली गई। वही तुलसी, नंगे पाँव, अपनी फटी हुई हलक्की साड़ी में, गले में तुलसी की माला पहने। राष्ट्रपति भवन में सब बड़े लोग सूट-बूट में थे। जब उसका नाम पुकारा गया, तो वह दौड़ती हुई मंच पर गई। राष्ट्रपति के सामने वह कुर्सी पर नहीं बैठी, सीधे जमीन पर बैठ गई। उसने कहा, जंगल कभी कुर्सी पर नहीं उगता, वह जमीन पर ही उगता है। उस दिन पूरा हॉल खड़ा हो गया और तालियों से गूँज उठा। वह तस्वीर आज भी इतिहास है। ये वो सादगी और ईमानदारी की सच्ची मुरत थी एक ऐसा कोहनुर जो जगंल को मां बनकर सजाया बेटी बनकर दुलारा दोस्त बन कर रक्षा की। 

सोलह दिसंबर दो हजार चौबीस को तुलसी ने अपनी अंतिम साँस ली। वह छियासी साल की थी। उसका अंतिम संस्कार उसके अपने ही खेत में किया गया, जहाँ उसने जीवन भर हाथ में बीज की टोकरी लिए एक नया जीवन को सजोंया था एक नयी उम्मीद को रोपा था ।   
उत्तर कन्नड़ के होनाली गाँव में जब भी कोई नया पौधा उगता है, तो बूढ़े लोग आज भी एक ही नाम लेते हैं - तुलसी।
तुलसी गौड़ा का जन्म हलक्की जनजाति में हुआ था और जगंल की माता भी कहते हैं