दिल का मुसाफ़िर - 1 Suri Trishna द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दिल का मुसाफ़िर - 1






शाम के करीब 6:40 बजे।

सूरत रेलवे स्टेशन हमेशा की तरह भीड़ से भरा हुआ था।

कहीं कोई अपने परिवार को विदा कर रहा था, तो कहीं कोई अपनी ट्रेन का इंतज़ार करते हुए बार-बार घड़ी देख रहा था। प्लेटफॉर्म पर चाय वालों की आवाज़ें, यात्रियों की बातचीत और आती-जाती ट्रेनों का शोर लगातार गूंज रहा था।

उसी भीड़ के बीच एक लड़का प्लेटफॉर्म के किनारे खड़ा था।
आरव।

उसकी नजरें सामने से गुजरती ट्रेनों पर थीं।
एक ट्रेन आती…
कुछ देर रुकती…
और फिर चली जाती।

लेकिन आरव बस खामोशी से उन्हें देखता रहता।
उसके चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था।
जैसे वह यहां किसी का इंतज़ार नहीं कर रहा था…
बस खुद से थोड़ा दूर खड़ा था।

तभी दूसरी तरफ से एक लड़की तेज़ी से उसकी ओर आती दिखाई दी।
आध्या।
एक हाथ में फोन था और उसकी नजरें पूरी तरह फोन की स्क्रीन पर टिकी हुई थीं।

वह मैसेज पढ़ते-पढ़ते चल रही थी 
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसके रास्ते में कोई खड़ा है।


और अगले ही पल—
धड़ाम!

आध्या सीधे आरव से टकरा गई। 
उसका पैर फिसला और वह प्लेटफॉर्म पर गिर पड़ी।

उसके हाथ से फोन भी छूटकर थोड़ी दूर जा गिरा। लेकिन आरव नही गिरा
लेकिन वो पता नहीं थोड़ा बैठ गया 
कुछ पल के लिए वह बस नीचे बैठी रही।

फिर जल्दी से उठी और अपना फोन उठाने के लिए भागी।
फोन हाथ में आते ही उसने उसे देखा।
स्क्रीन ठीक थी।

उसने राहत की सांस ली।
लेकिन अगले ही पल उसकी नजर आरव पर पड़ी।

और फिर शुरू हुआ उसका गुस्सा।
“अंधे हो क्या?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।
कुछ नहीं बोला।

आध्या ने गुस्से में कहा—
“दिखाई नहीं देता? सामने से कोई आ रहा है!”

आरव अब भी शांत खड़ा था।
आध्या ने पीछे मुड़कर देखा।

उसकी ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी थी।
उसके चेहरे का रंग ही बदल गया।
" O no !”

फिर वह वापस आरव की तरफ मुड़ी।
“मेरी ट्रेन छूट गई तुम्हारी वजह से!”

आरव चुप।

“अब बस से घर जाने में दो घंटे और लगेंगे!”
फिर उसने झुंझलाकर कहा—

“तुम छोड़ोगे मुझे?”

आरव ने बस उसे देखा।
कोई जवाब नहीं।

आध्या ने आंखें छोटी करते हुए पूछा—
“क्या हुआ? बोल क्यों नहीं रहे?”

आरव का चेहरा देखकर लग रहा था कि वह खुद भी काफी गुस्से में था।

लेकिन उसने अपना गुस्सा आवाज़ में नहीं आने दिया।
आरव ने पहली बार धीमे से कहा—
“तुम फोन में देख रही थीं।”

आध्या कुछ पल उसे देखती रही।

फिर बोली—

“तो क्या हुआ? तुम भी तो सामने देख सकते थे! बोल नही सकते थे की मैडम सामने देख लो एक नोजावान खड़ा है " 

आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

आध्या ने मुंह बनाया और वहां से हटकर अपनी ट्रेन के बारे में पता करने चली गई।
कुछ देर बाद उसे पता चला कि अगली ट्रेन करीब दो घंटे बाद थी।

वह वापस उसी प्लेटफॉर्म पर आकर बैठ गई।
आरव अभी भी कुछ दूरी पर खड़ा था।
दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।

समय बीतता गया।
एक घंटा…
फिर दूसरा घंटा भी।

लेकिन जिस ट्रेन का इंतज़ार आध्या कर रही थी…वह अभी तक नहीं आई।

आध्या ने घड़ी देखी।
फिर स्टेशन की स्क्रीन।

फिर थककर अपना सिर पीछे कर लिया।
“बस बहुत हुआ…”
उसने खुद से कहा।
“अब ट्रेन का इंतज़ार करने से अच्छा है की मे बस से ही घर चली जाऊँ।”


उसने अपना बैग उठाया और स्टेशन से बाहर निकल गई।
कुछ देर बाद वह पास के बस स्टैंड के पास जाकर बैठ गई।
बारिश की हल्की बूंदें गिरने लगी थीं।
आध्या चुपचाप बैठी अपने फोन में कुछ देख रही थी कि तभी वहां बैठे कुछ लड़कों की नजर उस पर पड़ी।

उनमें से एक उसके पास आया।

“मैडम, अकेली बैठी हो?”
आध्या ने उसे नजरअंदाज कर दिया।

दूसरा लड़का हंसते हुए बोला—
“इतना attitude क्यों?”

आध्या उठकर दूसरी तरफ जाने लगी।
लेकिन वे लड़के भी उसके पीछे चलने लगे।

आध्या थोड़ा परेशान हो गई।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई—

“ किसी को कोई परेशानी है क्या ?”

लड़कों ने पीछे मुड़कर देखा।
आरव वहां खड़ा था।

चेहरा पहले से ज्यादा गंभीर।
वह धीरे-धीरे आगे आया।

उसकी आवाज़ में ऐसी सख्ती थी कि लड़कों की हंसी अचानक गायब हो गई।

“मैंने पूछा… कोई परेशानी है?”

लड़कों ने एक-दूसरे को देखा।
फिर वहां से चले गए।

आध्या ने राहत की सांस ली।

आरव ने उसकी तरफ देखा।
“चलो। तुम यहाँ safe नही हो " 

आध्या ने हैरानी से पूछा—
“कहां?”

लेकिन आहान बस दूसरी ओर चलने लगा... ओर उसके पूछे पीछे आध्या। 

बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।
लेकिन फिर भी 
दोनों सड़क पर चलने लगे।

कुछ ही मिनटों में दोनों पूरी तरह भीग चुके थे।

आध्या ने अपने बाल पीछे किए और आरव की तरफ देखा।
कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।
फिर अचानक बोली—

“चाय पियोगे?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।
“नहीं।”

“क्यों?”

“बस नहीं।”

आध्या मुस्कुराई।
“मुझे तुम्हें thank you बोलना है।”

आरव चुप रहा।
आध्या ने सामने इशारा किया।
“मेरी favorite चाय की जगह यहीं पास में है।”

आरव ने मना करने की कोशिश की।

लेकिन आध्या ने कहा—
“बस एक चाय। उसके बाद तुम अपनी राह, मैं अपनी राह।”

कुछ पल बाद आरव ने आखिरकार हल्का-सा सिर हिला दिया।
दोनों कैफे में चले गए।


कुछ देर बाद उनके सामने गर्म चाय रखी थी।
आध्या ने कप उठाया।

फिर अचानक पूछा—
“वैसे तुम्हारा नाम क्या है?”

आरव ने चाय की तरफ देखते हुए कहा—
“आरव।”

आध्या ने हल्की मुस्कान के साथ अपना हाथ कप के चारों ओर रखा।
“मैं आध्या।”

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर आध्या ने पूछा—
“तुम यहां क्या कर रहे थे?”

आरव ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद कहा—
" में सूरत किसी न किसी काम से आता रहता हूं।”

वह थोड़ा रुका।

फिर बोला—
“लेकिन आज मेरा purse चोरी हो गया।”

आध्या का चेहरा गंभीर हो गया।
“क्या?”

“हां। मेरे पास खाने तक के पैसे नहीं हैं। ओर मुझे बस अहमदाबाद जाना है । में बस इस लिए शांत खड़ा था ”

आध्या चुपचाप उसे देखने लगी।
आरव ने आगे कहा—

“ और फोन में recharge भी खत्म हो गया है। वरना किसी को call कर लेता...लेकिन शायद call करने का भी की मतलब नही ।”

आध्या ने उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी।

फिर अचानक अपने पेट पर हाथ रखकर बोली—
“वैसे मुझे भूख लगी है।”

आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तो खा लो।”

आध्या हंस पड़ी।
“तुमसे लड़ते-लड़ते मुझे भूख लग गई।”

आरव के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।

आध्या ने कहा—
“चलो, कुछ खाते हैं।”

आरव ने तुरंत कहा—
“मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

आध्या ने सहजता से कहा—
“मैं दे दूंगी।”

आरव ने उसे देखा।
“क्यों?”

आध्या मुस्कुराई।
“लड़कों से बचाने के लिए treat समझ लो।”


कुछ देर बाद दोनों एक ढाबे पे पहुँच गये जहाँ से खाने की मस्त खुशबु आ रही थी 

वही पे जाके बैठे गए और कुछ देर बाद छोले भटूरे खाने लगे 
छोले भटूरे खत्म होने के बाद आध्या ने अचानक —
उसने अपना बैग खोला।

फिर अपने पैसे निकाले।
उसकी आज ही income आई थी।
उसने उसमें से ₹5,000 निकाले और आरव की तरफ बढ़ा दिए।

आरव ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“ये क्या है?”

“रख लो।”

“नहीं मुझे नही चाहिए।”
तुमने मुझे खाना ही खिला दिया इतना ही काफी है

“आरव, रख लो।”
“लेकिन मैं तुम्हें जानता तक नहीं हूं।”

आध्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“तो?”

आरव ने पैसे लेने से पहले पूछा—

“इतना भरोसा कैसे कर सकती हो?”

आध्या कुछ सेकंड चुप रही।

फिर बोली—

“देखो भरोसे की बात नहीं है।”

उसने पैसे उसके हाथ में रख दिए।

“जैसे मैंने आज तुम्हारी मदद की है… वैसे ही कल तुम किसी और की मदद कर देना। और वेश भी तुम मेरे पैसे लेके जा सकतें हो , मेरी किस्मत तो नहीं लेके जा सकते न ।" 


आरव कुछ कह नहीं पाया। 
आध्या ने अपना बैग उठाया।

फिर जाते-जाते मुस्कुराकर बोली—
“और हां… कभी मिले तो पैसे वापस कर देना।”

वह मुड़ी और वहां से चली गई।

आरव वहीं खड़ा रहा।
उसकी मुट्ठी में अभी भी वो पांच हजार रुपये थे।
उसकी नजरें लगातार आध्या के पीछे जा रही थीं।

कुछ दूर जाकर आध्या ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

दोनों की नजरें मिलीं।
बस एक पल के लिए।

फिर आध्या आगे बढ़ गई।
आरव उसे जाते हुए देखता रहा।

उसके चेहरे पर पहली बार गुस्सा नहीं था।
बस एक सवाल था—

“ये लड़की आखिर है कौन?”

और शायद…

उसे खुद भी नहीं पता था कि आज हुई ये छोटी-सी मुलाकात उसकी जिंदगी के सबसे लंबे सफ़र की शुरुआत थी।

To Be Continue 

1.आध्या ने एक अजनबी पर इतना भरोसा करके उसे ₹5,000 क्यों दिए?

2. क्या आरव सच में वो ₹5,000 लौटाने के लिए आध्या को दोबारा ढूंढेगा?

3. अगली बार जब आरव और आध्या मिलेंगे, तो क्या उन्हें अपनी पहली मुलाकात याद होगी?

4. और सबसे बड़ा सवाल… क्या स्टेशन पर हुई ये छोटी-सी टक्कर उनकी पूरी ज़िंदगी का सफ़र बदलने वाली थी? ❤️ 

जानने के लिए पढ़ते रहिये 
दिल का मुसाफ़िर 🫂