लखनऊ, नवाबों का शहर। शाम के सात बज रहे थे। हजरतगंज की रौशनी, चौक की चाट की खुशबू और गोमती नगर की ठंडी हवा, सब कुछ रोज की तरह ही था। पर आयशा के लिए आज कुछ भी रोज जैसा नहीं था।
आयशा सिद्दीकी, इक्कीस साल की एक सीधी-सादी लड़की। लखनऊ यूनिवर्सिटी में बी.ए. फाइनल ईयर की छात्रा। पापा रफीक अहमद एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। माँ घर संभालती थीं और एक छोटा भाई अमन था। आयशा को किताबें पढ़ना और डायरी लिखना बहुत पसंद था। वह अपनी डायरी में रोज कहानियाँ लिखती थी, पर उसकी अपनी जिंदगी की कहानी अभी अधूरी थी।
आज वह अपनी सहेली सना के साथ कैफे में बैठी थी। कल उनका आखिरी पेपर था।
"चल आयशा, अब घर चलते हैं, अंधेरा हो रहा है।" सना ने कहा।
"हाँ चल।" आयशा ने किताबें समेटीं।
जैसे ही दोनों कैफे से बाहर निकलीं, अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। लखनऊ की बारिश का कोई भरोसा नहीं होता।
सना तो जल्दी से एक ऑटो में बैठकर चली गई, पर आयशा वहीं फंस गई। उसके पास छाता नहीं था। उसके फोन की बैटरी सिर्फ दो प्रतिशत बची थी। उसकी किताबें भीग रही थीं।
तभी उसके सामने एक काली थार आकर रुकी। पूरी तरह से काली, जिसके शीशे भी काले थे। लखनऊ में हर कोई जानता था कि यह गाड़ी किसकी है।
यह गाड़ी थी अव्यांश राठौर की।
अव्यांश राठौर, राठौर ग्रुप ऑफ होटल्स के मालिक विक्रम राठौर का इकलौता बेटा। चौबीस साल का, छह फुट लंबा, हमेशा काले कपड़े पहनने वाला। आँखों में हमेशा एक गुस्सा, चेहरे पर हमेशा एक घमंड। यूनिवर्सिटी में सब उसे डेविल कहते थे, क्योंकि वह किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता था।
थार का शीशा नीचे हुआ। अंदर अव्यांश बैठा था।
"भीग क्यों रही हो? आ जाओ, छोड़ दूंगा।" उसकी आवाज में रूखापन था, पर चिंता भी थी।
"नहीं, धन्यवाद। मैं चली जाऊंगी।" आयशा ने अकड़ में कहा। उसे अव्यांश बिल्कुल पसंद नहीं था। एक बार अव्यांश ने उसे लाइब्रेरी में धक्का दे दिया था और माफी भी नहीं मांगी थी।
"जिद मत करो। बारिश बहुत तेज है। बीमार पड़ जाओगी। बैठ जाओ।"
आयशा ने इधर-उधर देखा, कोई ऑटो नहीं था। मजबूरी में वह थार की पिछली सीट पर बैठ गई। उसके कपड़े पूरी तरह से भीग चुके थे।
अव्यांश ने उसे देखा और तुरंत अपनी नजरें हटा लीं। उसने पीछे से एक जैकेट निकाली और उसकी तरफ फेंकी।
"इसे पहन लो।"
"मुझे नहीं चाहिए।"
"पहन लो आयशा, तुम्हें ठंड लग रही है। तुम्हारे होंठ नीले पड़ गए हैं।" अव्यांश ने कहा।
आयशा हैरान रह गई। उसे ठंड लग रही है, यह बात अव्यांश ने कैसे जान ली? उसने धीरे से जैकेट पहन ली। जैकेट में से एक महंगे परफ्यूम की खुशबू आ रही थी। आयशा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
"तुम कहाँ रहती हो?"
"गोमती नगर, विनय खंड।"
अव्यांश ने गाड़ी गोमती नगर की तरफ मोड़ी। पर रास्ते में बहुत पानी भरा हुआ था। पुलिस ने रास्ता बंद कर दिया था।
"लगता है गोमती नगर का रास्ता बंद है।"
"तो अब क्या होगा?" आयशा घबरा गई।
"घबराओ मत। मैं हूँ ना। हम थोड़ी देर कहीं रुक जाते हैं। बारिश रुकते ही मैं तुम्हें घर छोड़ दूंगा।"
अव्यांश उसे अपने होटल, होटल राठौर पैलेस में ले गया। होटल बहुत बड़ा और सुंदर था।
"तुम मुझे यहाँ क्यों लाए हो? लोग क्या कहेंगे?" आयशा ने डरते हुए कहा।
"लोगों का काम है कहना। तुम्हें बुखार आ जाएगा, इसकी चिंता है मुझे।" अव्यांश ने कहा और उसे अपने केबिन में ले गया।
उसने वेटर को बुलाया, "दो गरम चाय और सैंडविच लाओ। और एक तौलिया भी।"
आयशा ने तौलिए से अपने बाल सुखाए। चाय पीकर उसे थोड़ी गर्मी महसूस हुई।
"धन्यवाद अव्यांश।"
"धन्यवाद की कोई बात नहीं।"
उस शाम पहली बार आयशा को लगा कि अव्यांश डेविल नहीं है। वह बस अकेला है। वह किसी पर भरोसा नहीं करता।
एक घंटे बाद बारिश रुक गई। अव्यांश ने उसे गोमती नगर में उसके घर के सामने छोड़ दिया।
"कल से छाता लेकर निकलना। हर बार मैं नहीं मिलूंगा।" कहकर अव्यांश चला गया।
आयशा घर के अंदर भाग गई। पर उसका दिल अभी भी थार में ही था। रात भर उसे नींद नहीं आई। बार-बार अव्यांश का चेहरा उसकी आँखों के सामने आ रहा था।
दूसरी तरफ अव्यांश भी अपने बड़े से कमरे में बेचैन था। उसने आज तक किसी लड़की के लिए अपनी गाड़ी नहीं रोकी थी। फिर आज आयशा के लिए क्यों रोकी? उसे खुद समझ नहीं आ रहा था।
अगले दिन यूनिवर्सिटी में।
आयशा लाइब्रेरी में बैठी नोट्स बना रही थी। पूरी यूनिवर्सिटी में बात फैल गई थी कि आयशा कल अव्यांश की गाड़ी में थी। सब उसे ही देख रहे थे।
तभी किसी ने उसके सामने एक कॉफी रखी। आयशा ने ऊपर देखा, अव्यांश था।
"कल की चाय का बदला।" अव्यांश मुस्कुराया।
"तुम यहाँ? तुम तो कभी लाइब्रेरी में नहीं आते।" आयशा हैरान थी।
"आज से आऊंगा।"
तभी वहाँ सोनिया आ गई। सोनिया मल्होत्रा, बहुत ही आधुनिक और घमंडी लड़की। वह खुद को अव्यांश की गर्लफ्रेंड समझती थी।
"अव्यांश बेबी, तुम यहाँ क्या कर रहे हो? और ये कौन है?" सोनिया ने आयशा को घूरते हुए कहा।
अव्यांश को बहुत गुस्सा आया। उसने सबके सामने आयशा का हाथ पकड़ लिया।
"ये आयशा है, मेरी होने वाली गर्लफ्रेंड। और आज से तुम इसे भाभी बुलाओगी।"
पूरी लाइब्रेरी में सन्नाटा छा गया।
"गर्लफ्रेंड? तुमने मुझसे पूछा भी नहीं!" आयशा ने हाथ छुड़ाते हुए कहा।
अव्यांश ने सबके सामने घुटनों पर बैठकर कहा, "आयशा सिद्दीकी, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। विल यू बी माय गर्लफ्रेंड?"
सबने अपने फोन निकाल लिए और वीडियो बनाने लगे।
आयशा रोने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।
तभी उसके फोन पर उसकी माँ का फोन आया।
"आयशा, जल्दी घर आ, तेरे पापा को दिल का दौरा पड़ा है। मेदांता अस्पताल में हैं।"
आयशा का फोन हाथ से गिर गया। वह बेहोश होते-होते बची।
अव्यांश ने फोन उठाकर सारी बात सुनी और बिना एक सेकंड गंवाए आयशा को अपनी गोद में उठा लिया और भागा। उसने उसे थार में बैठाया और सौ की स्पीड से मेदांता अस्पताल पहुंचा।
डॉक्टर ने कहा, "इनके पापा को तुरंत ऑपरेशन करना होगा। पाँच लाख रुपये लगेंगे।"
आयशा के पास पाँच हजार भी नहीं थे। उसकी माँ रो रही थी।
आयशा जमीन पर बैठ गई, "मैं इतने पैसे कहाँ से लाऊंगी?"
तभी अव्यांश ने आगे बढ़कर अपना ब्लैक कार्ड डॉक्टर को दिया, "इसमें से पैसे ले लीजिए। जितने लगे।"
ऑपरेशन चार घंटे चला। चार घंटे तक आयशा बाहर बैठी रोती रही और अव्यांश उसका हाथ पकड़कर बैठा रहा।
ऑपरेशन सफल रहा। डॉक्टर ने कहा, "आपके पापा की जान बच गई।"
आयशा ने अव्यांश को गले लगा लिया, "धन्यवाद अव्यांश, अगर तुम नहीं होते तो पता नहीं क्या होता।"
"मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ आयशा।"
अगली सुबह जब आयशा घर जाने के लिए निकली, तो उसने देखा अस्पताल के बाहर अव्यांश के पापा विक्रम राठौर खड़े थे, बहुत गुस्से में।
"अव्यांश! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे कार्ड से पाँच लाख खर्च करने की? और इस लड़की के लिए? तुम्हें पता है ये लड़की कौन है?"
"पापा ये आयशा है, मैं इससे प्यार करता हूँ।"
"प्यार? तुम्हें पता है ये किसकी बेटी है? ये उसी रफीक अहमद की बेटी है जिसने दस साल पहले मेरी कंपनी को दो करोड़ का धोखा दिया था! इसी आदमी की वजह से मैं बर्बाद होते-होते बचा था!"
आयशा के पैरों तले जमीन खिसक गई, "नहीं, मेरे पापा ऐसा नहीं कर सकते।"
"अपने पापा से ही पूछ लो जाकर!"
आयशा भागकर अपने पापा के पास गई जो अभी-अभी होश में आए थे।
"पापा, क्या आपने राठौर ग्रुप को धोखा दिया था?"
उसके पापा की आँखों में आँसू आ गए, "हाँ बेटा, मजबूरी थी। तेरी माँ बहुत बीमार थी, मुझे पैसों की बहुत जरूरत थी। मुझे माफ कर दे बेटा।"
आयशा वहीं जमीन पर बैठ गई।
अब क्या होगा? क्या अव्यांश अपने पापा की दुश्मनी के लिए आयशा को छोड़ देगा? क्या आयशा अपने पापा के पाप की सजा भुगतेगी?
और सबसे बड़ा सवाल, क्या विक्रम राठौर सच बोल रहे हैं या इसके पीछे कोई और साजिश है?
क्या एक अनजाना सा इश्क दुश्मनी में बदल जाएगा?
जानने के लिए पढ़िए भाग 2 - एक अनजाना सा इश्क - दुश्मनी या प्यार?
अगर आपको भाग 1 तो भाग 2 जानने के लिए मुझे फॉलो करें....