चोर मचाए शोर - 1 Virendra Dewangan द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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चोर मचाए शोर - 1

गरमी की छुट्टी लगते ही बनैला गांव के स्कूली बच्चे बोर होने लगे थे। उन्हें किसी काम में मजा नहीं आ रहा था। न बाटी-भौंरा, पिट्ठूल, लुका-छाई, पतंग उड़ाई में और न ही दादा-दादी के किस्से-कहानियों में।

ऊपर से उनके खास दोस्त, विवेक व विजय अपने मामा के घर जा चुके थे। वे स्कूल खुलने पर ही लौटकर आनेवाले थे।

खेती चूंकि असिंचित थी, इसलिए गरमी के मौसम में खेतों में उनके लिए कुछ काम न था।

वे एक-दो बार अपने-अपने पालकों के साथ जंगल में महुआ व साल बीज बीनने और चिरौंजी व आंवला तोड़ने के लिए गए भी, पर वहां भालू के डर से दोबारा-तिबारा जाने से कतराने लगे।

भालू जब उन्हें दौड़ाएगा, तब वे नन्हे बच्चे अपनी सुरक्षा के लिए क्या कर पाएंगे? उनका छोटा-छोटा पैर क्या भालू की गति से तेज दौड़ लगा पाएगा। ऐसे में उन्हें पेड़ों में चढ़कर अपनी जान बचाना भी मुश्किल जान पड़ने लगा।

गांव में हम उम्र में केवल बब्बू, पारूल, सोनू, आदिल, मानू व बबीता रह गए थे, जो कभी लुका-छाईं, बाटी-भौंरा, गिल्ली-डंडा, पिट्टुल, फुटबाल, खो-खो, कबड्डी खेलकर, तो कभी पतंग उड़ाकर टाइम पास कर रहे थे।

वे सुबह-शाम साइकिल भी सीख लेते थे, तो भरी दोपहरी में पटेल तिराहे के आम पेड़ की घनी छांव में मटरगश्ती कर लेते थे।

वे कच्चे-पक्के आमों पर पत्थर व ठंडे से निशाना भी लगा लिया करते थे, जिससे उस सार्वजनिक पेड़ में आम इने-गिने ही बचे थे।

इसके बाद भी, उनका मन नहीं भर रहा था। उन्हें लग रहा था कि इस साल की छुट्टी में कुछ कमी रह गई है।

एक दिन पारूल, जो शिवांगी की बेटी थी, स्वाभाविक लीडर बनकर सबसे बोली,‘‘स्कूल के पीछवाड़े में साहूकार की अमवाड़ी है। वहां ढेरों आम फले हैं। सुना है, बड़े मीठे हैं। तुम सब साथ दो, तो हम फलों के राजा का मजा ले सकते हैं।’’

‘नेकी और पूछ-पूछ?’ इस पर सबने हामी भर दी।

अगले दिन सभी बच्चे स्कूल के खेल मैदान में जमा होने लगे।

जैसा कि आम तौर पर होता है; लीडर आगे-आगे चलता है और अनुयायी पीछे-पीछे; वे भी उसी तरह चल पडे़।

वे वहां पहुंचकर साहूकार की अमवाड़ी में दाखिल होने की जुगत जमाने लगे।

अमवाड़ी चारों ओर से पक्की दीवारों से घिरा हुआ था। वहां अंदर जाने का एकमात्र रास्ता सामने का दरवाजा था, जो अंग्रेजों के जमाने का लग रहा था।

लेकिन, अफसोस कि दरवाजे में बाहर से एक मजबूत ताला जड़ा हुआ था।

बाहर से लगा हुआ ताला मासूम बच्चों को यही संदेश दे रहा था कि भीतर कोई नहीं है। गर अंदर कोई रहता, तो ताला यूं बाहर जड़ा नहीं मिलता? दरवाजा अंदर से बंद होता।

अंदर एक कोने में, जो झोपड़ी-सी मालूम होती थी, संभवतः उसमें भी कोई नहीं है। तभी तो बाहर ताला लटका है। अर्थात मैदान साफ है, उन्हें केवल मैदान मारने की देरी है।

पर, सवाल गहरा था कि ऐसे में अंदर दाखिल कैसे हुआ जा सकता है?

उन्होंने दरवाजे के छिद्रांे से झांककर देखा, तो उन्हें भरी गरमी में भी अंदर हरियाली नजर आने लगी।

उन्होंने इधर-उधर तांक-झांक कर कई बार देखा, तो पता चला कि पूरा अमवाड़ी किस्म-किस्म के पेड़-पौधों से भरा हुआ है।

वहां अधिकांश आम के पेड़ हैं, जो पके, पीले व मीठे लग रहे हैं।

पेड़ में पके आमों को देखकर छोटे बच्चों के मुंह में उसके मीठे स्वाद की तासीर समाने लगी।

वहां आम के अलावा, अमरूद, जामुन, कटहल, पपीता, बेर, मुनगा, केला, गन्ना, लौकी, गिलकी के पेड़-पौधे भी थे, जो बाग की छटा को बिखेर रहे थे।

यही नहीं, अंदर कुंआ और ट्यूबबेल भी दिख रहा था। अमवाड़ी के किनारे-किनारे नए-पुराने गमले सजे हुए थे, जिसमें रंगबिरंगे गुलाब, गैंदा व चमेली के फूल खिले हुए थे।

कुल मिलाकर सब दूर हरियाली व रंगीनी छाई हुई थी, जो सबके मन को लुभा रही थी।

बच्चों ने सोचा। आम खाने का इससे अच्छा मौका कहां और कब मिलेगा? यहां झोपड़ी पर कोई है भी नहीं।

इस तरह बागान खाली और अंदर का झोपड़ीनुमा मकान भी खाली; अब तो उन्हें लगने लगा कि खालीपन उन सबका इंतजार कर रहा है।

पर, अंदर जाएं, तो जाएं कैसे? यह सवाल सबको सताने लगा।

तभी पारूल को तरकीब सूझी। वह जरा दूजे किस्म की बालिका थी, जिसको कोई काम सूझ जाता था, तो पीछे नहीं हटती थी, फिर नतीजा चाहे कुछ हो जाए।

वह आगे-पीछे देखकर बोली,‘‘एक के ऊपर एक चढ़कर दरवाजा लांधते हैं। चार बच्चे उस पार दाखिल होगें, जिसमें से दो आम तोडेंगे और दो आम लाकर दरवाजे के नीचे से बाहर करते जाएंगे। जो दो बच्चे बाहर रहेंगे, वे उसे सकेल कर एक कोने में रखेंगे।’’

इस पर मानू बोला,‘‘पारूल और बबीता इस पार रहेंगी। वे अंदर नहीं जा पाएंगी।’’

लड़कियों के नाम पर सबने हामी भर दी,‘‘ओके! डन!!’’

सबने एक साथ एक स्वर में फुसफुसाया,‘‘डन, डनाडन।’’

इस प्रकार, आम तोड़ने और उसको दरवाजा के पार लगाने का ‘आपरेशन मैंगो’ चालू हो गया।

दो लड़के पेड़ में चढ़कर पके आम तोड़ रहे थे और दो लड़के उन पके आमों को पेंट-शर्ट की जेब व हाथ में भरकर गेट तक लाकर उन्हें दरवाजे के छेद से बाहर की ओर ढकेल रहे थे। जो दो लड़कियां बाहर थीं, वे उसे उठा-उठा कर अलग करीने से सजा रही थीं।

जो दो लड़के पेड़ के नीचे आम उठा रहे थे, वे बीच-बीच में हाथों को लंबा कर और उचककर आम की डालियां पकड़ लेते थे और जहां तक नन्हा हाथ जाता था, वहां तक आम तोड़ लेते थे।

तभी जिस कमजोर तना को झुकाकर दो बच्चे आम तोड़ रहे थे, उसको खींचकर पकडने़ और उस पर जोर देकर झूलने से वह डाल लड़कों के बोझ से सहसा भरभरा कर टूटने लगा।

टूटते ही डाली ‘कटकट’ का भारी-भरकम आवाज किया और जमीन पर भरभरा कर गिर पड़ा।

भरभराहट की आवाज से अमवाड़ी के कोने में झोपड़ी में बंधा व सोया हुआ कुत्ता भौं-भौं कर जाग उठा और भौंकते-भौंकते संकल को जोरों से खिंचने लगा।

कुत्ते के भौं-भौं की आवाज से बब्बू की नींद खुल गई। वह उठ बैठा, तो महसूसा कि घर का कुत्ता भी बाहर के गेट पर खड़ा होकर भौंक रहा है। इसके भोंकने और अमवाड़ी के कुत्ते के भौंकने में गजब की समानता है।

अब वह डरा-सहमा सा दुबककर पुनः सोने लगा, तो उसके दिल दिमाग में अमवाड़ी पर बीती घटना किसी पिक्चर की नाई फिर चलने लगी।

--निरंतर--

इसका शेष भाग-2 में पढियेगा।